भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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श्रीरासलीलारहस्य २३९ उसके प्रति जो 'अय:'—लोहेके समान आकर्षित होती हैं, वे ब्रजवनिताएँ ही अयोगा हैं। तात्पर्य यह है कि गोपांगनाएँ भगवान्के पास अपनी इच्छासे नहीं गयीं, बल्कि भगवत्सौन्दर्यरूप अयस्कान्तने उन्हें अपनी ओर आकर्षित कर लिया। अतः उनपर कृपा करके भगवान्ने वे रात्रियाँ बनायीं। अथवा— 'स्वेन सह युज्यन्ते ये ते योगाः गोपदाराः; तेषां या माया—कृपा तामूपाश्रितः योगमाया- मुपाश्रितः।' अर्थात् जो अपनेसे युक्त होनेवाली हैं, वे गोपवधूटी ही 'योगा' हैं। उनके प्रति जो माया है, उसीका नाम योगमाया है। उसका आश्रय लेकर उन्होंने रमण करनेकी इच्छा की। इस प्रकार अयोग और योग—दोनों ही पदोंसे गोपांगनाएँ अभिप्रेत हैं। अतः— 'योगानामयोगानाञ्च या मा स्वविषयीणी प्रीतिमती* मा प्रमा स्निग्धा मानसी वृत्तिः सा योगमा।' अर्थात् योग और अयोग, इन दोनोंकी ही जो अपने प्रति प्रेममयी मनोवृत्ति है, वह योगमाया है। भक्ति और ज्ञान ये दोनों अन्तःकरणके ही परिणाम हैं। परमप्रेमास्पद भगवान्का जो अत्यन्त उत्सुकतापूर्वक चिन्तन है, वही भक्ति है। इसी प्रकार प्रमा भी अन्तःकरणकी ही वृत्ति है, परंतु जो मानसिक द्रवताकी अपेक्षासे रहित अन्तःकरणकी प्रमायाकाराकारित वृत्ति है, उसका नाम प्रमा है और जो प्रमाण अथवा संस्कारजनित द्रवताकी अपेक्षावाली प्रेमास्पदाकारा वृत्ति है, उसे भक्ति कहते हैं। वेदान्तमें जिन भक्ति और ज्ञानका विचार किया गया है उनके स्वरूप, साधन और फल श्रीमद्मधुसूदन स्वामीने भिन्न-भिन्न बतलाये हैं। वे कहते हैं कि अन्तःकरणकी जो सविशेष भगवदाकाराकारित स्निग्धा वृत्ति है, वह भक्ति है और जो अन्तःकरणद्रवतानपेक्ष महावाक्यजनित निर्विशेष ब्रह्माकाराकारित वृत्ति है, उसे ज्ञान कहते हैं। भक्तोंके तीन भेद उनके कथनानुसार भक्तिके तीन भेद हैं— प्राकृता, मध्यमा और उत्तमा। उनमें प्राकृत भक्त वह है जो केवल भगवान्की प्रतिमाओंमें ही श्रद्धा रखता है और उन्हींकी पूजा करता है, भगवान्के भक्तों तथा अन्य पुरुषोंमें श्रद्धा नहीं रखता; यथा— अर्चायामेव हरये पूजां यः श्रद्धयेहते। न तद्भक्तेषु चान्येषु स भक्तः प्राकृतः स्मृतः ॥ (श्रीमद्भा० ११।२।४७) जो ईश्वरमें प्रेम करता है, भगवान्के आश्रित रहनेवालोंके प्रति मित्रताका भाव रखता है, मूर्खोंपर कृपा करता है और भगवद्वेषियोंकी उपेक्षा करता है, वह मध्यम है— ईश्वरे तदधीनेषु बालिशेषु द्विषत्सु च। प्रेममैत्रीकृपोपेक्षा यः करोति स मध्यमः ॥ (श्रीमद्भा० ११।२।४६) उत्तम भक्त उसे कहते हैं, जो सम्पूर्ण प्राणियोंमें अपना भगवद्भाव देखता है और समस्त प्राणियोंको अपने आत्मारूप भगवान्में देखता है, जैसा कि कहा है— सर्वभूतेषु यः पश्येद् भगवद्भावमात्मनः। भूतानि भगवत्यात्मन्येष भागवतोत्तमः ॥ (श्रीमद्भा० ११।२।४५) ऊपरके श्लोकका तात्पर्य यह है—'आत्मनः स्वस्य त्वंपदार्थस्य भगवद्भावं तत्पदार्थत्वं सर्वभूतेषु पश्येत्' अर्थात् (जिस प्रकार उपाधिका बाध करने पर घटाकाशकी महाकाशरूपसे व्यापकता है, उसी प्रकार) जो समस्त प्राणियोंमें तत्पदार्थरूपसे त्वंपदार्थकी व्यापकता देखता है एवं भगवदभिन्न आत्मामें समस्त भूतोंको कल्पित रूपसे देखता है, अथवा 'आत्मनोऽ- न्तर्यामिणो भगवद्भावमैश्वर्यवत्त्वं नियन्तृत्वं सर्वत्र भावयति तथा भगवति परमैश्वर्यवत्यात्मनि आत्मनियम्यत्वेनाधेयत्वेन च भूतानि पश्येत्' अर्थात् जो सर्वत्र आत्मा यानी अन्तर्यामीका भगवद्भाव—

  • प्रीतिर्द्रुतिः प्रणयो द्रवावस्था इति मधुसूदनस्वाम्युक्तेः।