भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४० भक्तिसुधा ऐश्वर्यवत्त्व अर्थात् नियन्तृत्व देखता है और भगवान्— परम ऐश्वर्यवान् परमात्मामें उसके नियम्य और आधेयरूपसे समस्त भूतोंको देखता है, वही श्रेष्ठ भगवद्भक्त है। इनमें जो उत्तमा भक्ति है, वह भी तीन प्रकारकी है। जहाँ भगवदाकाराकारित अन्तःकरणसे समस्त विद्यमान जगत्का भगवद्रूपसे ग्रहण किया जाय, वह प्रथम कोटिकी उत्तमा-भक्ति है। ऊपर जो उत्तमा- भक्तिका लक्षण बतलाया है, वह प्रथम कोटिकी ही है। दूसरी कोटिकी उत्तमा-भक्ति वह है, जहाँ भगवदाकाराकारित द्रुत अन्तःकरणसे प्रपंचमिथ्यात्व- निश्चयपूर्वक सबकी भगवद्रूपताका निश्चय किया जाय; जैसे कि कहा है— तस्मादिदं जगदशेषमसत्स्वरूपं स्वप्नाभमस्तधिषणं पुरुदुःखदुःखम्। त्वय्येव नित्यसुखबोधतनावनन्ते मायात उद्यदपि यत् सदिवावभाति॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।२२) और जहाँ प्रपंचके मिथ्यात्व और सत्यत्व दोनों ही भावोंसे रहित द्रुतचित्तसे केवल भगवान्का ही ग्रहण हो, वह तीसरी कोटिकी उत्तमा भक्ति है; जैसे— ध्यायतःचरणाम्भोजं भावनिर्जितचेतसा। औत्कण्ठ्याश्रुकलाक्षस्य हृद्यासीन्मे शनैर्हरिः ॥ प्रेमातिभरनिर्भिन्नपुलकाङ्गोऽतिनिर्वृतः । आनन्दसम्प्लवे लीनो नापश्यमुभयं मुने॥ (श्रीमद्भा० १।६।१७-१८) इस प्रकार द्रुतचित्तकी भगवदाकारा मानसी वृत्तिको 'मा' कहते हैं; अयोगोंकी जो मा-प्रीति अर्थात् मति है, वही 'अयोगमा' है, उस अयोगमामें उपाश्रित हुए अर्थात् व्रजांगनाओंकी ऐसी प्रीतिमती बुद्धिसे आकर्षित हुए भगवान्ने रमण करनेकी इच्छा की अर्थात् अपने प्रति जो ऐसी प्रीतिमती बुद्धि है, उसके परतन्त्र हुए भगवान् उन गोपांगनाओंका आवाहनकर उनके साथ रमण करनेकी इच्छा की; क्योंकि भगवान् प्रेम-मधु-मधुकर हैं और जो प्रेम- मधु-आकर सुमनसोंके सुमनस हैं, उनके प्रति भगवान्का आकर्षण होना उचित ही है। उधर जिनका चित्त समस्त सुमनाओंके सुमनस श्रीभगवान्के प्रति आकर्षित होता है, वे सुमना कहे जाते हैं। श्रीभगवान्के प्रति आकर्षित होना ही उनका सुमनस्त्व है। अतः शोभन स्वभाववालोंका सिद्धान्त यही है कि भगवान्से प्रीति करें। वही वाक् सुन्दर है, जिसे भगवान्का गुणगान होता है, वे ही कर्णपुट धन्य हैं, जिनसे भगवत्कथाओंका श्रवण होता है और वे ही चरण धन्य हैं, जिनसे भगवद्धामोंमें गमन होता है। इसीसे अर्जुनसे भी भगवान्ने यही कहा है— मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय। निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः॥ मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु। मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥ (गीता १२।८; १८।६५) यह बात तो अमना भगवान्के विषयमें है। ये व्रजांगनाएँ तो सुमनसोंकी शिरोमणि हैं। अतः उनका जो मन है, वह तो प्रेमका आकर है ही। उनके प्रेमकणसे ही समस्त संसार प्रेममय हो रहा है। अतः इनके प्रेममधु-आकर मनका प्रेम-मधु-मधुप भगवान् समाश्रयण करेंगे ही। इसीसे भगवान्ने गोपांगनाओंका आह्वानकर उनके साथ रमण करनेकी इच्छा की। अथवा 'योगमायामुपाश्रितः'—इस पदका यह तात्पर्य समझो—'अन्यत्र चञ्चलापि भगवत्य- चञ्चला या मा सा अगमा तस्यामुपाश्रितो यः' अर्थात् अन्यत्र चंचला होनेपर भी जो भगवान्के प्रति अचंचला है, उस मा—लक्ष्मीको अगमा कहते हैं। उस अगमामें जो भगवान् उपाश्रित हैं, उन्होंने रमणकी इच्छा की। यह बात गोपांगनाओंके प्रेमसौष्ठवकी द्योतक है। इसीके पोषणमें यह भी अर्थ किया जाता है—'अगमा दुरवगममाहात्म्या या मा वृषभानुनन्दिनी तस्यामुपाश्रितः'—जिन श्रीवृषभानुनन्दिनीका माहात्म्य अत्यन्त दुर्बोध है, उनमें आश्रित जो भगवान् उन्होंने