भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरमणकी इच्छा की। इसका तात्पर्य यह है कि लक्ष्मीजीका माहात्म्य तो सुज्ञेय है, किंतु श्रीवृषभानु- नन्दिनीकी महिमा अत्यन्त दुर्बोध है; क्योंकि जिन श्रीभगवान्के कृपाकटाक्षकी अपेक्षा समस्त देवगण रखते हैं, वे ही इनके कृपाकटाक्षकी बाट निहारा करते हैं। वे वृषभानुनन्दिनी कैसी हैं? 'न गच्छतीति अगा, अगा अचला सदैकरूपा मा अङ्गशोभा सौन्दर्यलक्ष्मीः यस्याः सा'—अर्थात् जिनके अंगकी शोभा सर्वथा अक्षुण्ण है, उन्हीं श्रीराधिकाजीके अद्भुत सौन्दर्य-माधुर्यसे मोहित हुए श्रीभगवान्ने उन्हें बुलाकर उनके साथ रमण करनेकी इच्छा की। यहाँतक अज्ञ और मुमुक्षुओंकी दृष्टिसे अर्थ किये गये; अब मुक्तोंकी दृष्टिसे व्याख्या करते हैं— 'ताः ज्ञानीरूपाः प्रजा वीक्ष्य ता आहूय ताभिः सह रन्तुं मनश्चक्रे'— उन ज्ञानीरूपा प्रजाओंको देखकर उनका आह्वानकर उनके साथ रमण करनेकी इच्छा की। वे ज्ञानीरूपा प्रजाएँ कैसी हैं?—'ताः'—तदात्मिका अर्थात् भगवद्रूपा हैं, क्योंकि ऐसा कहा भी है—'ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्', (गीता ७।१८) 'एकभक्ति- र्विशिष्यते' (गीता ७।१७) इत्यादि और कैसी हैं?—'रात्रीः' अर्थात् भगवान्में अशेष-विशेष-समर्पण करनेवाली हैं। यहाँ पूर्ण स्वात्मसमर्पण है; क्योंकि अन्य-निष्ठाओंमें अपना पृथक् अस्तित्व रह ही जाता है अथवा 'रात्रीः' पदका यह भी तात्पर्य हो सकता है कि वह आत्मस्वरूपा होनेके कारण रात्रियोंके समान हैं; क्योंकि ये आत्मस्वरूपा हैं और व्यवहारका अविषय होनेके कारण अज्ञानियोंके लिये आत्मा रात्रिरूप ही है अथवा यह भी तात्पर्य हो सकता है कि जितना व्यावहारिक प्रपंच है, वह जिसकी दृष्टिमें रात्रिरूप अर्थात् असत् है, वह ज्ञानीरूपा प्रजा रात्रि है अथवा जिस प्रकार रात्रि अस्पष्टप्रकाशवाली होती है, उसी प्रकार यह ज्ञानीरूपा प्रजा भी अस्पष्टप्रकाशा अर्थात् अव्यक्त गति है; जैसा कि कहा भी है— 'अव्यक्तलिङ्गा अव्यक्ताचाराः' यन्न सन्तं न चासन्तं नाश्रुतं न बहुश्रुतम्। न सुवृत्तं न दुर्वृत्तं वेद कश्चित् स ब्राह्मणः ॥ (नारदपरिव्राजकोपनिषद ४।३४) पुनः यह ज्ञानीरूपा प्रजा कैसी है ? 'शरद्यपि जाड्यमये अविद्यालेशावशेष- युक्तेऽपि अन्तःकरणे उत्फुल्लानि मल्लिकोप- लक्षितशान्तिदान्त्याद्यशेषपुष्पाणि यासां हृदि इति शरदोत्फुल्लमल्लिकाः ।' अर्थात् शरदमें यानी जिनके अविद्यालेशावशेषयुक्त अन्तःकरणमें भी शान्ति, दान्ति आदि मल्लिकोपलक्षित समस्त पुण्य विकसित हो रहे हैं। अथवा— 'विवेकविचाररूपैः शरैरर्दिताः खण्डिताः इति शारदाः उत्फुल्लमल्लिकाः उत्फुल्लमल्लिका- द्युपलक्षितानि संसारसुखानि यासु।' अर्थात् विवेक-विचाररूप शरोंसे खण्डित उत्फुल्लमल्लिकादि उपलक्षित संसारसुख हैं जिनमें, वे रात्रियाँ 'शरदोत्फुल्लमल्लिका' हैं। अथवा— 'शरदा निमित्तेन शान्त्यावहेन उत्फुल्ल- मल्लिकाभासानि संसारसुखानि यासु।' अर्थात् शान्ति आदिके कारण जिनके लिये संसारसुख केवल पुष्परूप यानी देखनेमात्रके लिये रह गये, ऐसी प्रजाओंको देखकर भगवान्ने योगमायाका आश्रय ले, उन प्रजाओंका आवाहनकर उनके अन्तःकरणमें रमण करनेका विचार किया; क्योंकि ज्ञानीरूपा प्रजाका रमण अपने आत्मभूत भगवान्के ही साथ होता है। ज्ञानी लोग आत्मरति ही हुआ करते हैं। इसीसे ज्ञानीको लक्ष्य करके कहा है— 'एकभक्तिर्विशिष्यते', क्योंकि उसकी भक्ति, रति, मति एकमात्र भगवान्में ही होती है। भगवान्की रासलीला मुमुक्षुओंके लिये कोई ऐसा भी कहते हैं कि भगवान्की यह लीला मुमुक्षुओंके ही लिये है। इस लीलाके व्याजसे भगवान्ने निवृत्तिपक्षका ही पोषण किया है। भगवान्ने