भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४२ भक्तिसुधा इस लीलाद्वारा यह प्रदर्शित किया है कि जिनके एक रोमकें सौन्दर्यकणसे भी अनन्तकोटि कन्दर्पोंका दर्प दलित हो जाता है, उन्हीं श्रीहरिके साथ सुरम्य यमुनाकूलमें अनन्तकोटि ब्राह्मरात्रियोंपर्यन्त रमण करके भी व्रजबलाएँ सन्तुष्ट नहीं हुईं तो साधारण सांसारिक लोग इन बाह्यविषयोंसे किस प्रकार सन्तुष्ट हो सकते हैं? इस लीलाद्वारा भगवान्ने अपनेमें अनुरक्तोंकी अनुरक्ति और संसारसे विरक्तोंकी विरक्ति दोनों ही पुष्ट की है। इसी प्रकार भगवान् श्रीरामने भी सीताहरणके पश्चात् शोकाकुल होकर विषयासक्त पुरुषोंकी दुर्दशाका प्रदर्शन किया था—‘कामिन्ह कै दीनता देखाई।’ (रा०च०मा० ३।३९।२) भगवान् श्रीराम स्वयं तो अच्युत हैं, उन्हें कोई भी परिस्थिति कैसे विचलित कर सकती है? और अपनी आह्लादिनी- शक्ति श्रीजनकनन्दिनीजीसे उनका वियोग होना भी कब सम्भव है? परंतु इस नरना