भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 255

ज्ञानमुत्पद्यते पुंसां क्षयात्पापस्य कर्मणः॥ —ऐसी जो मुमुक्षुरूपा प्रजा है, उसे देखकर अथवा यह भी तात्पर्य हो सकता है कि निष्काम कर्मरूप भगवदाराधन करनेसे—क्योंकि निष्काम कर्म ही सबसे पहला भगवदाराधन है—जिसमें शान्ति- दान्तिरूप पुष्प विकसित हो रहे हैं। ये पुष्प मुमुक्षुओंको अत्यन्त अपेक्षित भी हैं; जैसा कि कहा है— 'शान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षुः समाहितो भूत्वा- त्मन्येवात्मानं पश्यति।' (जाबालोपनिषद् खण्ड ९) इस प्रकार निष्काम-कर्मद्वारा साधनचतुष्टयसम्पन्न हुई प्रजाओंको देखकर उनके हृदयोंमें श्रुतियोंका आह्वानकर उनके साथ रमण करनेकी इच्छा की; क्योंकि जो पुरुष भगवदाराधनद्वारा शुद्धान्तःकरण नहीं है, उनके अन्तःकरणमें श्रुतियोंका ब्रह्मपरत्व निश्चित नहीं होता। अशुद्ध अन्तःकरणमें ऐसा होना असम्भव है। अतः उन मुमुक्षुओंके अन्तःकरणोंमें उनका परम तात्पर्य निश्चयकर उनके साथ रमण करनेका विचार किया। अथवा— 'योगमायामुपाश्रितः'—यः अगामायां स्वस्माद- गच्छत्सु गोपदारेषु या माया कृपा तां उपाश्रितः। अर्थात् अपने पाससे न जानेवाली गोपांगनाओंके प्रति (माया) कृपाका आश्रय लेकर। अथवा— 'अगा अचला मा मतिः यस्याः सा अगमा तस्यामुपाश्रितः।' अर्थात् जिनका चित्त भगवान् श्रीकृष्णसे कभी नहीं हटता था, जिनके मन, देह और इन्द्रियवर्ग भगवान्‌से तनिक भी बिछुड़ना नहीं चाहते थे, उन गोपांगनाओंमें उपाश्रित हो भगवान्‌ने रमणकी इच्छा की। जब भगवान्‌का वेणुनाद सुनकर समस्त व्रजवनिताएँ भगवान्‌के पास दौड़ आयीं और भगवान्‌ने उन्हें पातिव्रतका उपदेश देते हुए घर लौट जानेको कहा तो वे कहने लगीं— चित्तं सुखेन भवतापहृतं गृहेषु यन्निर्वशत्युत करावपि गृहकृत्ये। पादौ पदं न चलतस्तव पादमूलाद् यामः कथं व्रजमथो करवाम किं वा॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।३४) उन्होंने कहा—जो चित्त गृहकृत्योंमें लग सकता था, उसे तो आपने हर लिया। रहे हाथ, सो वे भी उसी समय घरके धन्धोंमें प्रवृत्त होते हैं, जब चित्त इनका साथ दे और तभी चरण भी चल सकते हैं। किंतु अब, जब कि आपने वेणुनादद्वारा हमारा चित्त हर लिया है, हमारा मन उनमें कैसे लग सकता है? अब तो आपसे विमुख होकर ये चरण आपके चरणोंको छोड़कर एक पग भी नहीं चल सकते। अतः हम किस प्रकार व्रजको जायें और करें तो क्या करें? इससे सिद्ध हुआ कि व्रजांगनाओंके मन, बुद्धि, इन्द्रिय और देह—ये सब भगवत्परतन्त्र हैं। 'अयोगमायामुपाश्रितः'—इसका एक अर्थ यह भी हो सकता है— 'अयोगाय मायाः* शब्दो यस्यां सा अयोगमाया तामुपाश्रितः।' अर्थात् लौकिक-वैदिक व्यवहारमें उपयोगी जितने पुत्र, पति आदि हैं, उनके अयोग अथवा लौकिक, वैदिक व्यवहारोंके अयोग—असम्बन्धके लिये जिसमें शब्द है, उस मुरलीका आश्रय लेकर भगवान्‌ने रमणकी इच्छा की। व्रजांगनाएँ लौकिक-वैदिक कर्मोंमें परिनिष्ठित थीं। उनका लौकिक-वैदिक-कर्मोंसे विच्छेद करानेके लिये अथवा उन्हें भगवद्व्यतिरिक्त सम्बन्धोंसे छुड़ानेके लिये इस मुरलिकाका शब्द अत्यन्त समर्थ है; क्योंकि इसीसे आकर्षित होकर वे सारे सम्बन्धों और कृत्योंको तिलांजलि देकर भगवान्‌की सन्निधिमें आती हैं। अथवा— 'योगमायामुपाश्रितः—योगाय भगवता सम्बन्धाय माया कृपा यस्याः कात्यायन्यास्तां

  • 'माइमाने शब्दे च'।