भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
DevanagariHindipublished778 पृष्ठ
पृष्ठ 256, कुल 778 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 256
२४४ भक्तिसुधा कात्यायनीमुपाश्रितः भगवान् रन्तुं मनश्चक्रे ।' अर्थात् योग (भगवान्के साथ सम्बन्ध) करानेके लिये जिसकी माया-कृपा है, उस कात्यायनीदेवीका आश्रय लेकर भगवान्ने रमण करनेकी इच्छा की। अथवा- 'योगाय सम्बन्धाय मां मतिम् आययति प्रापयति या सा योगमाया कात्यायनी तामुपाश्रितः।'
- योग अर्थात् सम्बन्धके लिये जो मां- मतिको प्राप्त कराती है, वह कात्यायनीदेवी ही योगमाया है, उसका आश्रय लेकर भगवान्ने रमणकी इच्छा की; क्योंकि कात्यायनीदेवीके अर्चनद्वारा ही ऐसा अदृष्ट हुआ था कि जिससे गोपांगनाओंको भगवान्की प्राप्ति हुई। अथवा- 'योगाय व्रजाङ्गनाभिः सह सम्बन्धाय भगवतः श्रीकृष्णस्य मां मतिम् आययति या सा वृषभानुनन्दिनी योगमाया तामुपाश्रितः ।'
- व्रजांगनाओंके साथ सम्बन्ध स्थापित करनेके लिये भगवान्की बुद्धिको प्रवृत्त करनेवाली जो श्रीवृषभानुनन्दिनी हैं, वे ही योगमाया हैं, उनका आश्रयकर उन्होंने रमण करनेकी इच्छा की। लोकमें तो सापत्न्य-भाववश ईर्ष्या रहा करती है; परंतु इधर श्रीवृषभानुनन्दिनी परम करुणामयी हैं; उनमें सापत्न्यभाव नहीं है। उनके कारण उनकी लीला-भूमिके जीव- जन्तुओंका भी पारस्परिक विरोध निवृत्त हो जाता है। इसीसे वहाँ समस्त ऋतुओंका एकत्र समावेश होता है। तो फिर स्वयं उन वृषभानुदुलारीमें ही विरोध कैसे रह सकता है ? वे तो यही चाहती हैं कि सारा संसार मेरे ही समान भगवान्के अतिविशुद्ध सौन्दर्यसुधारसका पान करे। यह बात सर्वथा निश्चित ही है कि जबतक जीव भगवान्से तादात्म्य प्राप्त नहीं करता, तबतक वह परम पदका अधिकारी नहीं हो सकता और न उसका दुःख ही निवृत्त हो सकता है। इसीसे यह भी देखा जाता है कि जो लोग आध्यात्मिक मार्गका अनुसरण करते हुए परब्रह्म परमात्माकी ओर अग्रसर हो रहे हैं, उनकी भी अन्य लोकोंके प्रति ऐसी भावना नहीं रहती कि वे हमारी ओर न आयें। महर्लोकवासियोंके विषयमें भी यही कहा है कि वे सर्वसुखसम्पन्न होनेपर भी केवल इसीलिये दुःखी रहते हैं कि उनकी अपेक्षा निम्नतर लोकोंमें रहनेवाले जीव उस अति विलक्षण भगवत्सुखका समास्वाद नहीं कर सकते। उन अज्ञानियोंके प्रति करुणा होनेके कारण ही उनके हृदयमें खेद होता है- 'यच्चित्ततोऽदः कृपयानंदंविदाम्।' (श्रीमद्भा० २।२।२७) अतः भक्तिमार्ग या ज्ञानमार्गमें प्रवृत्त होनेवाले जितने लोग हैं, वे यही चाहते हैं कि अन्य पुरुष भी उन्हींके मार्गका अनुसरण करें। इसीसे उनमें सम्प्रदायवृद्धिकी भावना देखी जाती है। इस प्रकार जब सामान्य साधकोंमें भी अपने साथ ही भगवान्की ओर सब लोगोंको जानेकी प्रवृत्ति देखी जाती है तो साक्षात् प्रेमरूपा श्रीवृषभानुनन्दिनीकी सहृदयता एवं लोकहितैषिताके विषयमें तो कहा ही क्या जा सकता है ? उनमें किसी प्रकारकी ईर्ष्या कैसे रह सकती है? वस्तुतः ईर्ष्या तो वहीं रहा करती है, जहाँ स्वामी परिच्छिन्न और अल्पसुख प्रदान करनेवाला होता है। किंतु यहाँ श्रीराधिकारमण तो अपरिच्छिन्न- अनन्त-सुखमय और सर्वशक्तिसम्पन्न हैं। इसलिये उन्हें किसी प्रकारकी ईर्ष्या क्यों होने लगी? अतः अपना आश्रय लेनेपर वे उन गोपांगनाओंके साथ रमण करनेके लिये भगवान्की मतिको प्रेरित कर देती हैं। अथवा- 'योगाय भगवता श्रीकृष्णेन सह सम्बन्धाय, मां सर्वेषां मुक्तमुमुक्षुविषयिणां मतिम् आययति प्रापयति इति योगमाया तामुपाश्रितः ।' -जो भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रके साथ तादात्म्य प्राप्त करानेके लिये मुक्त, मुमुक्षु और विषयी लोगोंकी मतिका सम्पादन करती हैं, वे श्रीवृषभानुनन्दिनी योगमाया हैं, उनमें उपाश्रित श्रीभगवान्ने रमणकी इच्छा की। श्रीवृषभानुसुताकी कृपासे ही मनुष्योंकी