भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 257

श्रीरामलीलारहस्य २४५ भगवान्‌के प्रति प्रवृत्ति होती है; अन्यथा उनका चित्त अनेक प्रकारके ऐहिक-आमुष्मिक भोगोंमें ही आसक्त रहता है। किंतु यदि वे विचारपूर्वक देखें तो भगवत्प्राप्ति ही उनका परम स्वार्थ है—'स्वार्थ साँच जीव कहुँ एहा। मन क्रम बचन राम पद नेहा॥' (रा०च०मा० ७।९६।१) शास्त्रोंमें जैसे स्वार्थकी निन्दा की गयी है, वैसे ही उसकी महत्ता भी कम नहीं बतलायी गयी, जैसा कि कहा है— 'स्वकार्यं साधयेद्धीमान् कार्यध्वंसो हि मूर्खता।' अर्थात् बुद्धिमान् पुरुषको अपना काम बना लेना चाहिये, कामको बिगाड़ देना ही मूर्खता है। कृतार्थताकी सभीने प्रशंसा की है; किंतु इसका तात्पर्य क्या है? कृतार्थताका अर्थ है काम पूरा कर लेना। यह काम दूसरोंका नहीं है; क्योंकि दूसरोंके कामोंकी तो कभी पूर्ति नहीं हो सकती। अतः सिद्धान्त यही है कि स्वकार्यसिद्धि ही कृतार्थता है। स्वप्नमें स्वप्नद्रष्टा अत्यन्त प्रयत्न करके भी कितने स्वप्न-पुरुषोंका कल्याण कर सकेगा? उन सबके कल्याणका एकमात्र साधन तो यही है कि वह स्वयं जग जाय। इसी प्रकार संसारका परम कल्याण भी अपने ही कल्याणमें है। यदि लोकदृष्टिसे देखें तो भी जबतक तुम स्वयं कृतकृत्य नहीं हो, तबतक तुम्हारी बात कौन सुनेगा? इस दृष्टिसे स्वार्थसाधन ही परम कर्तव्य है। परंतु स्वार्थकी निन्दा भी कम नहीं की गयी। स्वार्थसे बढ़कर कोई बुराई नहीं मानी गयी। अतः समझना चाहिये कि यहाँ 'स्व' शब्दके अर्थमें भेद है। जो पुरुष शरीरको ही 'स्व' समझता है, वह क्षुद्र है। यह 'स्व' जितना ही विस्तृत होगा, उतना ही स्वार्थ परमार्थरूप हो जायगा। जो पुरुष 'स्व' शब्दका अर्थ शरीर समझेगा, उसका सिद्धान्त 'ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्' हो जायगा। जो सारे संसारको अपना आत्मा मानेगा, उसकी दृष्टिमें लोककल्याण ही आत्मकल्याण होगा और जो स्वयं प्रकाशपूर्ण परब्रह्ममें आत्मबुद्धि करेगा, वह उस कर्तृत्व- भोक्तृत्वादिशून्य शुद्ध परब्रह्ममें जो कर्तृत्वादिका आरोप हो रहा है, उसकी निवृत्ति करेगा। इससे उसके यज्ञादि सारे कर्म ही आत्मार्थ होंगे। इस प्रकार देखते हैं कि वास्तविक स्वार्थ तो बहुत ही ऊँचा है। देह, इन्द्रिय, चित्त और चिदाभासको सुख पहुँचानेके लिये जितनी चेष्टाएँ की जाती हैं, वे वस्तुतः स्वार्थ नहीं हैं; क्योंकि ये देहादि तो आत्मा नहीं हैं, बल्कि अनात्मा हैं। यदि कहो कि आत्मा न सही आत्मीय तो हैं ही; अतः आत्मीय होनेके कारण भी उनके उद्देश्यसे जो कर्म किया जायगा, वह स्वार्थ ही कहा जायगा—सो ऐसी बात भी नहीं है; क्योंकि उनमें आत्मीयताकी प्रतीति भी भ्रमके ही कारण है। आत्मा तो असंग है; इसलिये उसका किसीके साथ सम्बन्ध नहीं हो सकता—'असङ्गो न हि सज्जते'। अतः 'स्व' शब्दवाच्य आत्माके लिये जो चेष्टा है, वह तो परम कल्याणमयी ही है; क्योंकि सबके आत्मा तो भगवान् कृष्ण ही हैं; वे केवल मायासे ही देहवान् प्रतीत होते हैं— कृष्णमेनमवेहि त्वमात्मानमखिलात्मनाम्। जगद्धिताय सोऽप्यत्र देहीवाभाति मायया॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।५५) इससे सिद्ध हुआ कि भगवान् सर्वात्मा हैं, अतः यथार्थ स्वार्थ भगवत्प्राप्ति ही है। यहाँ 'अखिलात्मनाम्' पदसे सविशेषात्मा समझने चाहिये; क्योंकि सविशेषा- त्माओंका ही आत्मा निर्विशेष आत्मा है, जैसे कि घटाकाशादिका अधिष्ठान महाकाश है। अतः भक्त, मुमुक्षु और मुक्तोंको भी भगवद्विषयिणी सुमति प्रदान करनेवाली श्रीराधिकाजी ही हैं। भावुक भक्तजन तो उस ऐकान्तिकी भगवन्निष्ठाके सामने कैवल्य और अपुनरावर्तनरूप मोक्षपदको भी कुछ नहीं समझते; इसीसे भगवान् कहते हैं— न किञ्चित् साधवो धीरा भक्ता ह्येकान्तिनो मम। वाञ्छन्त्यपि मया दत्तं कैवल्यमपुनर्भवम्॥ (श्रीमद्भा० ११।२०।३४) किंतु भगवान्‌के मुख्य भक्त जो ज्ञानी लोग हैं, उन्हें किस सुमतिकी अपेक्षा है? वे तो आप्तकाम