भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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हुआ करते हैं। यह ठीक है; परंतु भगवद्विषयिणी भक्तिरूपा स्निग्धमति उन्हें भी अभिलषित होती है। देखो, सनकादिकी भी क्या अभिलाषा थी ? कामं भवः स्ववृजिनैर्निरयेषु नः स्ता- च्चेतोऽलिवद्यदि नु ते पदयो रमेत। वाचश्च नस्तुलसिवद्यदि तेऽङ्घ्रिशोभाः पूर्येत ते गुणगणैर्यदि कर्णरन्ध्रः ॥ (श्रीमद्भा० ३।१५।४९) वे कहते हैं— भगवन् ! यदि हमारा चित्त भ्रमरके समान आपके चरणकमलोंमें निरत रहे, यदि हमारी वाणी तुलसीके समान आपकी पादकान्तिका आश्रय ले और यदि हमारे कर्णकुहर आपके गुणगणसे पूरित रहें तो हमें भले ही अपने पापपुंजोंके कारण नरकोंमें भी जाना पड़े—इसकी हमें कोई चिन्ता नहीं है। इस प्रकार श्रीराधिकाजी जैसे भक्तोंको भगवन्निष्ठा और मुक्तोंको भगवद्रति प्रदान करती हैं, वैसे ही वे अन्य (विषयी और मुमुक्षु) लोगोंको भी प्रमा— भगवत्-साक्षात्काररूपा मति प्राप्त कराती हैं अर्थात् मुमुक्षु और विषयी पुरुषोंकी भगवान्‌के प्रति इष्ट-बुद्धि कराती हैं, इसलिये वे योगमाया हैं। उन योगमायारूपा श्रीराधिकाजीका आश्रय लेकर भगवान्‌ने रमण करनेकी इच्छा की। अथवा— 'योगाय मां मतिं आययति प्रापयति या सा स्वाङ्गकान्तिर्योगमाया तामुपाश्रितः।' अर्थात् जो संयोगके लिये मति प्रदान करती है, वह—अपने अंगकी कान्ति ही योगमाया है, उसका आश्रय लेकर, अथवा— 'योगाय व्रजाङ्गनाभिः सह उद्दीपनविधया संयोगाय मां मतिं आययति प्रापयति या सा शरद्घनशोभा तामुपाश्रितः।' अर्थात् जो उद्दीपन-विभाव होनेके कारण व्रजांगनाओंके साथ संयोग करनेकी मति प्रदान करती है, वह शरद्-ऋतु या वनकी शोभा ही योगमाया है। उसका आश्रय लेकर भगवान्ने रमणकी इच्छा की। अथवा— 'श्रीकृष्णस्य योगे सम्प्रयोग एव मा शोभा यस्याः सा वृषभानुनन्दिनी योगमा तस्यामुपाश्रितः।' अर्थात् श्रीकृष्णचन्द्रके सम्प्रयोगमें ही जिनकी शोभा है, वे श्रीवृषभानुसुता ही योगमा हैं, उनमें उपाश्रित हुए भगवान्ने रमणकी इच्छा की; क्योंकि— प्रभा जाइ कहँ भानु बिहाई। कहँ चंद्रिका चंदु तजि जाई॥ (रा०च०मा० २।९७।६) जैसे भानु बिना प्रभाकी, चन्द्रमा बिना चन्द्रिकाकी और सरोवर बिना कमलिनीकी शोभा नहीं है, वैसे ही परमानन्दकन्द भगवान् श्रीकृष्णके बिना श्रीराधिकाजीकी शोभा नहीं है। इसीसे जिस समय उन्हें भगवान्का सम्प्रयोग प्राप्त था, उस समय उनकी कैसी शोभा थी ? किंतु जब श्रीश्यामसुन्दरका वियोग हुआ तो सारा वृन्दावन ही श्रीहीन हो गया; उस समय रसिकशिरोमणिभूता श्रीवृषभानुसुताकी जो दशा थी, उसका तो वर्णन ही कैसे किया जा सकता है? उसके साथ ही यह भी समझना चाहिये कि— 'यस्या योगे सम्प्रयोग एव श्रीकृष्णस्य मा शोभा सा श्रीवृषभानुसुता योगमा तस्यामुपाश्रितः'— जिनके संयोगमें ही श्रीकृष्णचन्द्रकी शोभा है, वे वृषभानुनन्दिनी ही योगमा हैं अर्थात् जैसे श्रीकृष्णचन्द्रसे विप्रयुक्ता श्रीराधिकाजीकी शोभा नहीं है, वैसे ही श्रीराधिकाजीके बिना श्यामसुन्दरकी शोभा नहीं है। जिस प्रकार प्रभाशून्य सूर्य, चन्द्रिकाहीन चन्द्र और मधुरिमारहित अमृत फीके हैं, उसी प्रकार अपनी आह्लादिनी-शक्तिरूपा श्रीकीर्तिसुताके बिना श्रीनन्दनन्दनकी शोभा नहीं है। यदि ऐसी बात न होती तो जिनके कृपाकटाक्षके लिये ब्रह्मा और रुद्रादि देवगण भी लालायित रहते हैं, वे श्रीलक्ष्मीजी भी जिनके विशाल वक्षःस्थलमें अविचल रूपसे निवास करती हुई उनके तुलसीगन्धयुक्त पदपद्मपरागकी कामना करती हैं१, वे ही भगवान् १. श्रीर्यत्पदाम्बुजरजश्चकमे तुलस्या लब्ध्वापि वक्षसि पदं किल भृत्यजुष्टम्। यस्याः स्ववीक्षणकृतेऽन्यसुरप्रयासस्तद्वद् वयं च तव पादरजः प्रपन्नाः॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।३७)