भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीरासलीलारहस्य २४७ श्रीकृष्णचन्द्र लक्ष्मीकी उपेक्षा करके वेणु-निनादद्वारा समस्त गोपांगनाओंके सहित उन्हें बुलानेका प्रयास क्यों करते ? इससे सिद्ध होता है कि उन श्रीराधिकाजीका सौन्दर्य विलक्षण ही था। समस्त व्रजांगनाएँ भी श्रीराधिकारूपा होकर ही भगवान्को प्राप्त करती हैं। इसीसे लोकमें भगवान्को रुक्मिणी-रमण या सत्यभामा- वल्लभ न कहकर श्रीराधा-रमण या गोपीवल्लभ ही कहते हैं। इससे निश्चय होता है कि भगवान्की यथार्थ शोभा श्रीराधिकाजीसे ही है। अथवा—‘योगाय व्रजाङ्गनानां रासादिमुख- प्रापणाय या माया वयुनात्मिका¹ सङ्कल्पशक्ति- स्तामुपाश्रितः’। अर्थात् गोपांगनाओंको रसादि-सुख प्राप्त करानेके लिये जो माया-ज्ञानात्मक संकल्प उसे आश्रयकर भगवान्ने रमण करनेकी इच्छा की। तात्पर्य यह है कि वहाँ किसी अन्य बाह्यसाधन