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भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

श्रीरासलीलारहस्य २४७ श्रीकृष्णचन्द्र लक्ष्मीकी उपेक्षा करके वेणु-निनादद्वारा समस्त गोपांगनाओंके सहित उन्हें बुलानेका प्रयास क्यों करते ? इससे सिद्ध होता है कि उन श्रीराधिकाजीका सौन्दर्य विलक्षण ही था। समस्त व्रजांगनाएँ भी श्रीराधिकारूपा होकर ही भगवान्‌को प्राप्त करती हैं। इसीसे लोकमें भगवान्‌को रुक्मिणी-रमण या सत्यभामा- वल्लभ न कहकर श्रीराधा-रमण या गोपीवल्लभ ही कहते हैं। इससे निश्चय होता है कि भगवान्‌की यथार्थ शोभा श्रीराधिकाजीसे ही है। अथवा—‘योगाय व्रजाङ्गनानां रासादिमुख- प्रापणाय या माया वयुनात्मिका¹ सङ्कल्पशक्ति- स्तामुपाश्रितः’। अर्थात् गोपांगनाओंको रसादि-सुख प्राप्त करानेके लिये जो माया-ज्ञानात्मक संकल्प उसे आश्रयकर भगवान्‌ने रमण करनेकी इच्छा की। तात्पर्य यह है कि वहाँ किसी अन्य बाह्यसाधन

२४८ भक्तिसुधा विभक्त होकर अपने स्वरूपभूत आनन्दका स्वयं ही आस्वादन करते हैं। इसीसे भगवान् अपनी स्वरूपभूता व्रजांगनाओंमें रमणेच्छा उत्पन्न करके भी पहले स्वयं कुछ कालतक 'अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रः' इत्यादि श्रुतिके अनुसार सर्वसंकल्पशून्य और निःस्पृह ही रहे। किंतु अब उन्होंने भी रमणकी इच्छा की। परंतु यह रमण कैसा है? यहाँ एक ही परमतत्त्वको अनेकों नायकों और नायिकाओंके रूपमें प्रकटकर अपने ही स्वरूपभूत आनन्दका रसास्वादन करना है। वास्तवमें 'भज सेवायाम्' या 'रमु क्रीडायाम्' के अनुसार एक प्रकार असाधारण भावसे तादात्म्यापत्ति अथवा जो स्वरूपभूत आनन्द है, उसको अपने अनन्य भक्तोंमें स्थापित करना ही यह भजनानन्दरूप रमण है। इससे आपातदृष्टिसे यह जान पड़ता है कि यदि उस कूटस्थ परमानन्द तत्त्वका अन्यत्र संक्रमण किया गया तो अपने स्वरूपसे च्युत होनेके कारण उसे अच्युत नहीं कहा जा सकता। इस आशंकाका निराकरण करनेके लिये ही कहा है- 'भगवानपि' अर्थात् जो अप्रच्युत स्वभाव भगवान् अपने अचिन्त्यानन्त ऐश्वर्यके माहात्म्यसे अपने स्वरूपभूत परमानन्दका अन्यत्र संचार करके भी सदा अच्युत ही रहते हैं, उन्होंने रमण करनेकी इच्छा की। जिस प्रकार चिन्तामणि, कल्पतरु एवं कामधेनु आदि अपने समीपस्थ लोगोंको उनके संकल्पित पदार्थ देकर भी स्वयं अक्षुण्ण ही रहते हैं, उसी प्रकार भक्तोंको प्रेम प्रदान करनेपर भी भगवत्स्वरूपमें कोई च्युति नहीं होती। किंतु यहाँ पुनः सन्देह होता है कि इस प्रकार स्वरूपानन्दका अन्यत्र संक्रमण होनेसे भगवत्स्वरूप भले ही अविकारी रहे तथापि वह स्वरूपानन्द तो अपने स्थानका त्याग करनेके कारण विकारी हो ही जायगा। वह कूटस्थ या अविकारी नहीं रह सकता। इसीसे कहा है- 'योगमायामुपाश्रितः'। भगवान्‌की योगमाया एक ऐसी शक्ति है, जो उस पदार्थको अन्यत्र ले जानेपर भी विकृत नहीं होने देती। इसीसे भगवान् अपने कूटस्थ परमानन्दको अन्यत्र दूसरोंमें संक्रमित करके भी स्वयं अविकृत ही रहते हैं और उनके उस आनन्दमें भी कोई विकार नहीं होता है। इसीसे यह देखा जाता है कि यद्यपि भगवान्ने अपने कई भक्तोंको स्वात्मसमर्पण किया है तो भी उनमें कोई च्युति नहीं हुई; वे ज्यों-के-त्यों अविकारी ही बने हुए हैं। श्रीब्रह्माजी कहते हैं— एषां घोषनिवासिनामुत भवान् किं देव रातेति न- श्चेतो विश्वफलात् फलं त्वदपरं कुत्राप्ययन् मुह्यति। सद्वेषादिव पूतनापि सकुला त्वामेव देवापिता यद्धामार्थसुहृत्प्रियात्मतनयप्राणाशयास्त्वत्कृते ॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।३५) अर्थात् हे देव! आप इन घोष-निवासियोंको क्या देंगे? आप विश्वफलात्मा हैं; आपसे बढ़कर और दूसरी क्या वस्तु हो सकती है, जिसे देकर आप उनसे उऋण होंगे? प्राणी विविध प्रकारके ऐहिक- आमुष्मिक सुखको ही परम पुरुषार्थ समझता है, किंतु जिनके आँगनमें उस सुखका परमोद्गम स्थान साक्षात् परब्रह्म मूर्तिमान् होकर धूलिधूसरित हुआ खेल रहा है, उनके लिये वे क्षुद्र सौख्यकण कैसे फलरूप हो सकते हैं? जिन्हें जो वस्तु अप्राप्त होती है, वही उन्हें फलरूपसे स्वीकृत हुआ करती है। अतः जिन्हें आप आत्मीय-रूपसे अहर्निश प्राप्त हैं, उन्हें सर्वज्ञ एवं सर्वशक्तिमान् होकर भी आप क्या दे सकते हैं? इसलिये इनके तो आपको ऋणी ही रहना पड़ेगा। इस विषयमें कुछ निश्चय न होनेके कारण मेरा चित्त मोहित हो रहा है। यदि कहें कि मैं अपनेको ही समर्पण कर दूँगा तो इसमें भी कोई महत्त्वकी बात न होगी; क्योंकि जो पूतना दम्भसे माताके समान आचरण दिखलाती हुई आपका अनिष्ट करनेके लिये स्तनोंमें विष लगाकर आयी थी, उसे भी उसके कुलसहित आपने अपने स्वरूपको ही प्राप्त करा दिया था; फिर जिनके धन, धाम, स्वजन, प्रिय, आत्मा, प्राण और चित्त आपहीपर निछावर हैं, उन व्रजवासियोंको

श्रीरासलीलारहस्य २४९ आप क्या देंगे? उनके तो आप ऋणी ही रहेंगे। अहो! जिन व्रजबालकोंका उच्च स्वरसे किया हुआ हरिगुण-गान तीनों लोकोंको पवित्र कर देता है, उनके चरणकमलोंकी वन्दना हम बारम्बार करते हैं। इस लोकमें वे बड़े ही भाग्यशाली हैं, जिन्होंने इस गोकुलमें किसी वनवीथिकाके पास तृण-गुल्मादिरूपसे जन्म लिया है; क्योंकि उन्हें उन कृष्णप्राणा गोप- वधूटियोंके पद-पद्मपरागसे अभिषिक्त होनेका सुअवसर प्राप्त होता है।* इससे यहाँ यही कहना है कि भगवान् अनेकोंको स्वात्मसमर्पण करके भी पूर्णरूपसे ही अवशिष्ट रहते हैं। अतः भगवान्‌की यह योगमाया शक्ति ही है, जिससे वे सदा सब कुछ करते हुए भी अक्षुण्ण ही रहते हैं। उन्होंने रमणकी इच्छा कैसे की? इसपर कहते हैं—'ताः कात्यायन्यर्चनव्रतसन्तुष्टेन भगवता वरत्वेन प्रदत्ताः शरदोत्फुल्लमल्लिकाः रात्रीः वीक्ष्य।' अर्थात् कात्यायनी-पूजन एवं व्रतादिसे सन्तुष्ट हुए श्रीभगवान्‌ने जिन्हें वररूपसे दिया था, उन शरदोत्फुल्लमल्लिका रात्रियोंको देखकर भगवान्‌ने रमणकी इच्छा की। उन रात्रियोंको ग्रहणकर और उनमें आधिदैविकी रात्रियोंका निवेशकर भगवान्‌ने रमणकी इच्छा की। ऐसा करके उन्होंने उन रात्रियोंको पूर्ण बना दिया; क्योंकि आधिदैविकी रात्रियाँ भगवद्रूपा हैं। इस प्रकार उन सबको पूर्णिमारूप बनाकर और ऋतुको भी शरद्-ऋतुमें ही परिणत कर दिया अर्थात् समस्त रात्रियोंमें ऋतु-परिवर्तनका क्रम न रखकर केवल एक ही ऋतु रखा और उनमें मल्लिकादि समस्त पुष्प विकसित कर दिये। इस प्रकार उन रात्रियोंको समस्त उद्दीपन-सामग्रियोंसे सम्पन्नकर मुरली- ध्वनिद्वारा गोपांगनाओंका आह्वानकर उनके साथ रमण करनेकी इच्छा की। यदि विचार किया जाय तो स्वरूपतः अशेष- विशेष-शून्य पूर्ण परब्रह्म एवं अचिन्त्यानन्द निखिल- गुणगणास्पद श्रीभगवान् ये एक ही हैं; क्योंकि सजातीय-विजातीय-स्वगतभेदशून्य एक स्वप्रकाशतत्त्व ही 'भगवत्' शब्दका लक्ष्य है। जैसा कि कहा है— वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम्। ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते॥ (श्रीमद्भा० १।२।११) अर्थात् जो अद्वय ज्ञानस्वरूप तत्त्व है; तत्त्वज्ञ लोग उसीको तत्त्व समझते हैं। वह 'ब्रह्म', 'परमात्मा' या 'भगवान्' ऐसा कहा जाता है। अतः अद्वितीय परब्रह्म ही भगवान् है। जिस प्रकार 'गच्छतीति गौः' इस व्युत्पत्तिसे 'गमेर्डोः' आदि सूत्रोंके अनुसार सिद्ध हुआ 'गो' शब्द केवल गमन करनेवालेका ही वाचक नहीं होता; क्योंकि गमन करनेवाले तो सभी पशु हैं, बल्कि गल-कम्बलादियुक्त 'गो' का ही वाचक होता है, उसी प्रकार यह अद्वय पदार्थ ही भगवत्-पदवाच्य है। किंतु इसका यौगिक अर्थ लेनेपर तो भगोपलक्षित अचिन्त्यानन्तगुणगणास्पद परमेश्वर ही 'भगवत्' शब्दका अर्थ है। इससे यही सिद्ध हुआ कि परमार्थतः जो एक अद्वयतत्त्व सर्वभेदरहित और स्वप्रकाश है, वही अपनी अचिन्त्य एवं अनिर्वचनीय लीलाशक्तिसे निखिल ब्रह्माण्डका अधीश्वर भी है। उस भगवान्‌ने ही रमणकी इच्छा की। यहाँ दोनों प्रकारसे विरोध प्रतीत होता है। यदि उसके निर्विशेषरूपपर विचार करते हैं तो 'असङ्गो न हि सज्यते' (बृहदारण्यक० ३।९।२६) इस श्रुतिके अनुसार उसका रमण होना असम्भव है। जो स्वप्रकाश, असंग और अद्वय है—वह किसको देखकर, किसलिये, किसके साथ, कैसे रमण करेगा? और यदि भगवान्‌के सविशेषस्वरूपपर ध्यान देते हैं तो वे भी सब प्रकारके ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्यसे पूर्ण तथा अचिन्त्यानन्दरूप अपने ऐश्वर्यमें सन्तुष्ट रहनेके कारण आप्तकाम एवं पूर्णकाम हैं। उन्हें किसीको देखकर रमणकी इच्छा कैसे हो सकती है? जो अनाप्तकाम होता है, वही

  • 'वन्दे नन्दव्रजस्त्रीणां पादरेणुमभीक्ष्णशः। यासां हरिकथोद्गीतं पुनाति भुवनत्रयम् ॥' (श्रीमद्भा० १०।४७।६३) 'तद् भूरिभाग्यमिह जन्म किमप्यटव्यां यद् गोकुलेऽपि कतमाङ्घ्रिरजोऽभिषेकम्।' (श्रीमद्भा० १०।१४।३४)

२५० भक्तिसुधा अपनेसे भिन्न किसी पदार्थको देखकर उसकी आसक्तिवश रमणकी इच्छा कर सकता है। इसीसे 'योगमायामुपाश्रितः' ऐसा कहा है। योगमाया अर्थात् अघटित घटनाके लिये जो माया है—उस योगमायाका सन्निधिमात्रसे आश्रय लेकर भगवान्ने रमणकी इच्छा की। तात्पर्य है कि इस योगमायाके प्रभावसे ही उस स्वप्रकाश, असंग एवं अद्वय ब्रह्मकी अपनेसे भिन्न प्रतीत होनेवाली गोपांगनाओंके साथ रमण करनेमें प्रवृत्ति हो गयी। यही उस मायाकी अघटितघटनाशक्ति है। यह वही माया है, जिसके विषयमें श्रुति कहती है— ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन् देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम्। (श्वेताश्वतरो० १।३) अर्थात् अपने गुणोंसे आच्छादित जिस भगवच्छक्तिका ऋषियोंने ध्यानयोगसे साक्षात्कार किया था, महर्षियोंद्वारा साक्षात्कृत तथा कोटि-कोटि ब्रह्माण्डोंकी कारणभूता उस अचिन्त्यानन्त मायाशक्तिसे ही भगवान्का अपनेसे भिन्न किसीको देखना, अपनेसे भिन्नकी इच्छा करना और अपनेसे भिन्नके साथ रमण करना सम्भव है? तात्पर्य यह है कि यद्यपि भगवान् स्वयंप्रकाश, कूटस्थ और अद्वय होनेके कारण अपनेसे भिन्न किसी औरको नहीं देख सकते तथापि अपनी इस लीला-शक्तिसे उन्होंने अपनेसे भिन्न रूपसे प्रादुर्भूत जो अपनी ही स्वरूपभूता व्रजांगनाएँ हैं, उन्हें देखकर रमण करनेकी इच्छा की। यह जितना भी अघटनघटन है, उसके सम्पादनमें भगवान्की माया समर्थ है। इसीसे इन समस्त विरोधोंका निराकरण हो जाता है। इसी प्रकार सगुणपक्षमें भी समझना चाहिये। वहाँ भी भगवान् आप्तकाम, पूर्णकाम, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् एवं सम्पूर्ण वैराग्य और ऐश्वर्यसम्पन्न होनेपर भी इस योगमाया अर्थात् योग-सम्प्रयोगके लिये जो माया—कृपा है, उसका आश्रय लेकर ही वररूपसे दी हुई उन रात्रियोंको देखकर भक्तानुग्रह- परवश हुए उन गोपांगनाओंके साथ रमण करनेकी इच्छाको स्वीकार करते हैं। अतः यहाँ भी उनकी रमणेच्छामें योगमाया ही प्रधान कारण है। रासपंचाध्यायीके दूसरे श्लोककी व्याख्या इस प्रकार जिस समय भगवान्ने उन शरदोत्फुल्ल- मल्लिका रात्रियोंको और गोपांगनाओंको देखकर रमणकी इच्छा की— तदोडुराजः ककुभः करैर्मुखं प्राच्या विलिम्पन्नरुणेन शन्तमैः। स चर्षणीनामुदगाच्छुचो मृजन् प्रियः प्रियाया इव दीर्घदर्शनः ॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।२) अन्वय—'तदा चर्षणीनां शुचो मृजन् दीर्घदर्शनः प्रियः प्रियाया इव करैर्धृतेन अरुणेन प्राच्याः ककुभः मुखं विलिम्पन् उडुराजः उदगात्।' भावार्थ—उसी समय लोगोंके शोकका मार्जन करता हुआ तथा जिस प्रकार दीर्घकालमें मिलनेवाला प्रियतम अपनी प्रियतमाके शोककी निवृत्ति करता है, उसी प्रकार अपने शीतल करों (किरणों या हाथों)-में धारण की हुई उदयकालीन लालिमासे पूर्व दिशाके मुखका लेपन करता हुआ चन्द्रमा उदित हुआ। 'तदा' अर्थात् जिस क्षणमें भगवान्को रमणकी इच्छा हुई, उसी समय चन्द्रमा उदित हुआ; क्योंकि सेवककी यह रीति है कि जिस समय स्वामीकी इच्छा हो, उसी समय सेवामें उपस्थित हो जाय। ये उडुराज क्यों उदित हुए? क्योंकि ये उद्दीपन विभाव हैं अर्थात् भगवान्की जो रमणेच्छा है, उसे और भी उद्दीप्त करनेके लिये ही इनका प्राकट्य हुआ है। 'उडुराज' शब्दका अर्थ है 'उडूनां तारकाणां राजा' अर्थात् तारोंका राजा। इससे उस समय चन्द्रदेवका सपरिवार उदित होना ध्वनित होता है। उनके अभ्युदयसे ही चर्षणी—जो समस्त प्राणी उनके शरत्कालीन सूर्यसे प्राप्त हुए तापसे तप्त थे, उनकी मनोग्लानि शान्त हो गयी। श्रीगोसाईंजी महाराज कहते हैं—

श्रीरासलीलारहस्य २५१

सरदातप निसि ससि अपहरई । संत दरस जिमि पातक टरई ॥ (रा०च०मा० ४।१७।६) वे उदित किस प्रकार हुए ?—'प्राच्याः ककुभः मुखं करैर्धृतेन अरुणेन विलिम्पन्' अर्थात् अपनी शीतल और सुकोमल किरणोंमें धारण किये हुए अरुण रागसे पूर्व दिशाके मुखको लेपित करते हुए। मानो इस प्रकार नायक-नायिकाकी रीतिको प्रदर्शित करते हुए चन्द्रदेव यहाँ शृंगाररसके उद्दीपन बने हुए हैं। यद्यपि चन्द्रमाका सम्बन्ध सभी दिशाओंसे है तथापि उनमें पूर्वांदिक् ही प्रधान है। अतः पूर्व दिशाके साथ संश्लिष्ट होकर अपनी किरणोंमें धारण किये हुए अरुणसे उसका मुखलेपन करता हुआ और स्वयं भी अनुरक्त होता हुआ वह उदित हुआ अर्थात् प्राची दिशासे संश्लिष्ट होनेपर चन्द्रमाने उसे भी अनुरक्त किया और वह स्वयं भी अनुरंजित हुआ। इससे पूर्वांदिक्संसर्गसे उसका अनुराग होना स्वयं सिद्ध है, जैसे नायिकाके प्राप्त होते ही नायक अनुरक्त हो जाता है। इसका भी विशेषण है 'दीर्घदर्शनः' यह 'उडुराजः' और 'प्रियः' दोनोंहीका विशेषण हो सकता है। 'दीर्घं बहूनां रात्रीणामन्ते दर्शनं यस्य स दीर्घदर्शनः' अर्थात् जिसका दर्शन बहुत-सी रात्रियोंके पश्चात् हुआ हो, उसे दीर्घदर्शन कहते हैं। पूर्व दिशाके साथ चन्द्रमाका ठीक-ठीक सम्बन्ध पूर्णिमाको ही होता है, इसलिये चन्द्रमा दीर्घदर्शन है। इधर दृष्टान्त पक्षमें यह प्रियका भी विशेषण है अर्थात् जिसका दर्शन बहुत कालके पश्चात् हुआ है—ऐसा कोई प्रियतम जिस प्रकार 'शान्तमैः करैः' अपने सुखावह कर-व्यापारोंसे प्रियतमाका शोक निवृत्त करता है, उसी प्रकार चन्द्रमा अपनी किरणोंसे पूर्व दिशाके मुखको रागरंजित करता हुआ उदित हुआ। इस प्रकार कर-व्यापारोंसे भी शृंगाररसका उद्दीपन ही सूचित होता है। इसे प्रकृत प्रसंगमें दूसरी तरह भी लगाते हैं— 'यथा उडुराजः चर्षणीनां शुचो मृजन् शान्तमैः करैः करधृतेन अरुणेन च प्राच्या ककुभः मुखं विलिम्पन् उद्गातथा दीर्घदर्शनः प्रियः श्रीकृष्णः प्रियायाः श्रीवृषभानुनन्दिन्याः मुखं शान्तमैः करैः करधृतेन अरुणेन कुङ्कुमेन च विलिम्पन् चर्षणीनां गोपीजनानां शुचः शोकाश्रूणि मृजन् उद्गात्।' अर्थात् जिस प्रकार चन्द्रमा मनुष्योंका शोकापनोदन करता हुआ तथा अपनी शीतल किरणोंसे उनमें धारण की हुई उदयकालीन लालिमासे पूर्व दिशाका मुख लेपन करता हुआ उदित हुआ, उसी प्रकार बहुत कालके बाद दिखायी देनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण अपनी प्रियतमा श्रीवृषभानुसुताके मुखारविन्दको अपने करकमलोंमें धारण किये हुए कुंकुमसे लेपनकर गोपीजनोंके शोकाश्रुओँका मार्जन करते हुए प्रकट हुए। यहाँ 'चर गतिभक्षणयोः' इस धातुपाठके अनुसार 'चर्षणीनाम्' इस पदका अर्थ गति और भक्षणपरायण है। 'गति' शब्दसे कर्म और 'भक्षण' शब्दसे कर्मफल समझना चाहिये। अतः इससे वे मनुष्य* विवक्षित हैं, जो केवल कर्म और कर्मफलमें ही आसक्त हैं। इन संसारी लोगोंके सर्वविध तापका निराकरण करता हुआ उडुराज—चन्द्रमा उदित हुआ; क्योंकि वह उदित होकर उद्दीपन-विभाव-रूपसे परमानन्दघन श्रीकृष्णचन्द्रके चित्तमें रमणकी इच्छा उत्पन्न करेगा, जो कि श्रीकृष्ण-प्रेमियोंको बहुत कालसे अभिलषित है। अतः भगवान्‌की प्रेयसी व्रजांगनाओंके शोकका मार्जन होनेसे सारे संसारका शोक मार्जित हो जायगा; क्योंकि यह नियम है कि जिस क्रियासे भगवद्भक्तोंका शोक निवृत्त होता है, उससे सारे संसारका ही शोक निवृत्त हो जाता है और जिससे भगवद्भक्त सन्तप्त होते हैं, उससे सभीको


  • 'चर्षणी' शब्द मनुष्य अर्थमें रूढ़ है। यह बात निम्नलिखित श्लोकसे सिद्ध होती है— अर्यम्णो मातृका पत्नी तयोश्चर्षणीयः सुताः। यत्र वै मानुषी जातिर्ब्राह्मणा चोपकल्पिता ॥ (श्रीमद्भा० ६।६।४२) अर्यमाकी पत्नी मातृका नामवाली थी। उसके 'चर्षणी' संज्ञक पुत्र हुए। उन चर्षणीयोंमें ही ब्रह्माजीने मानुषी जातिकी कल्पना की।

२५२ भक्तिसुधा सन्ताप होता है। देखो, जिस समय ध्रुवजीने भगवत्तादात्म्यको प्राप्त होकर श्वासनिरोध किया था, उस समय सारे संसारका ही श्वास निरुद्ध हो गया था। ऐसा क्यों हुआ ? क्योंकि भगवान् सर्वात्मा हैं; अतः यदि भगवद्भक्त सन्तप्त होता है तो सारा संसार ही सन्तप्त हो उठता है। ये गोपांगनाएँ तो भगवान्‌की अत्यन्त अन्तरंग हैं। ये भगवद्विप्रयोगके कारण चिरकालसे सन्तप्त थीं। अब उस विरहव्यथाका अन्त होनेवाला था। इसीसे भगवान्‌को रमणकी इच्छा हुई। अतः इसका यह भी अर्थ हो सकता है— 'चर्षणीनां व्रजाङ्गनाजनानां शोकापनोदेन चर्षणीनां गतिभक्षणपराणां कर्म तत्फलभोग- परिनिष्ठानां जगतामेव शुचो मृजन् उद्गात्।' अर्थात् चर्षणी यानी व्रजांगनाओंकी शोकनिवृत्ति करके चर्षणी-कर्म और कर्म-फल-भोगमें लगे हुए संसारी लोगोंका शोक निवृत्त करते हुए चन्द्रदेव प्रकट हुए। इसीसे उन्हें उडुराज अर्थात् नक्षत्रमण्डलका राजा कहा है। वे परम सौभाग्यशाली और अत्यन्त पुण्यात्मा हैं; क्योंकि उनके कारण गोपांगनाओंकी शोकनिवृत्ति होनेसे सारे संसारका ही सन्ताप शान्त हो जाता है। अतः ये उडुराज 'उडुषु राजत इति उडुराजः' हैं अर्थात् नक्षत्रोंमें अत्यन्त शोभायमान हैं। इधर जिस प्रकार जीवोंकी शोकनिवृत्ति करनेके कारण यह उडुराज पुण्यात्मा है, उसी प्रकार मानो श्रीकृष्णचन्द्र भी उडुराज ही हैं; क्योंकि उन्होंने भी चर्षणी यानी व्रजांगनाओंका शोकापनोदन करके सारे संसारका ही शोक निवृत्त किया है। अतः 'उडुराज' शब्दसे उनका भी अन्वादेश होता है। जैसे इस ओर ताराओंमें अत्यन्त देदीप्यमान चन्द्रमा है, उसी प्रकार उधर गोपांगनाओंमें नायक-रूपसे अत्यन्त देदीप्यमान भगवान् श्रीकृष्ण हैं। इसीसे आचार्योंने यह भी कल्पना की है कि जिस समय भगवान्‌ने 'अमना' और 'अप्राण' होकर भी योगमायाका आश्रय लेकर गोपांगनाओंके साथ रमण करनेका संकल्प किया, उस समय उनमें मन तो था नहीं। मनका अधिष्ठाता चन्द्रमा है। जिस प्रकार सूर्य आदि अधिष्ठातादेवताओंसे अधिष्ठित हुए बिना नेत्रादिमें रूपादिके प्रकाशनका सामर्थ्य नहीं होता, उसी प्रकार मन भी चन्द्रमासे अधिष्ठित हुए बिना संकल्पमें समर्थ नहीं हो सकता था। किंतु यहाँ भगवान्‌के तो मन ही नहीं था; अतः वे मनके बिना रमण कैसे करते ? यद्यपि अपने दिव्य ऐश्वर्यसे वे बिना मनके भी रमण कर सकते थे तथापि लोकमर्यादाका अतिलंघन न करके भगवान्‌ने नवीन अप्राकृत मनका निर्माण किया; क्योंकि वस्तुकी सरसता अथवा नीरसताका आस्वादन तो मनसे ही होता है। भगवान्‌का मन अप्राकृत था, इसलिये उसका अधिष्ठाता चन्द्रमा भी अप्राकृत ही होना चाहिये था। जिस प्रकार चन्द्रमा ताराओंके सहित शोभायमान होता है, उसी प्रकार व्रजांगनाओंके मन उडुस्थानीय हैं और भगवान्‌का मन उन उडुओंका अधिनायक चन्द्रमा है। अतः जिस प्रकार नक्षत्रोंसे चन्द्रमाकी शोभा है, उसी प्रकार गोपांगनाओंके मनोंसे भगवान्‌के मनकी शोभा है। यहाँ यह शंका होती है कि इस अप्राकृत चन्द्रमाकी वस्तुतः आवश्यकता क्या थी ? यदि भगवान्‌के रचे हुए नवीन अप्राकृत मनका नियमन करनेके लिये इसकी आवश्यकता मानी जाय तो ठीक नहीं; क्योंकि भगवान् तो सर्वशक्तिमान् हैं, वे स्वयं ही उस मनको कार्यसम्पादनकी योग्यता प्रदान कर सकते थे। यदि कहें कि व्रजांगनाओंके मनोंके अधिष्ठाता जो प्राकृत चन्द्रमा हैं, वे नक्षत्रोंके रूपमें उदित हैं, उनकी रक्षा करनेके लिये ही भगवान्‌के अप्राकृत मनके अधिष्ठाता अप्राकृत चन्द्रमाका उदय हुआ है तो ऐसा मानना भी ठीक नहीं; क्योंकि उनका नियमन भी भगवान् स्वयं ही कर सकते थे। यदि उद्दीपनके लिये इसका उदय माना जाय तो भगवान्‌को इसके लिये भी किसी साधनकी अपेक्षा नहीं है और यदि अन्धकारकी निवृत्तिके लिये इसका उदय मानें तो यह काम भी प्राकृत चन्द्रमासे ही निष्पन्न हो सकता था;

: In the user prompt, let's inspect line 59: "हृदयारण्ये रन्तुं मनश्चक्रे तदैव उडुराजः मोहजैशत-" -> wait, let's look at the letter between 'ह' and 'श': Could it be "जै"? Wait, look at 'ज' in 'उडुराजः' on the same line! In 'उडुराजः', 'ज' has a top bar, vertical line, then from the middle, a line goes left and curves down and up. Now look at the letter in question: Does it have a vertical line on the right? Yes. Does a line go left from the middle? Wait, look at the loop: it is at the bottom, like 'न'! Wait, compare it with 'न' in 'जनानां' in line 58: 'न' has a vertical line, a horizontal line going left from the bottom, curving into a small loop. Now look at the letter in question: It looks very similar to 'न'! Wait, could it be 'नै'? Yes, 'न' with 'ै' = 'नै'. Wait, why did I wonder if there's an 'े' on 'ह'? If it were "मोहेनैशत-", it would be "मोहेन नैशतमोव्याप्त...". But there is no space, and 'ह' has no 'े'. Wait, could it be "मोहैर्नै

हुआ। इससे सिद्ध होता है कि जिस समय भगवान् अपने भक्तके हृदयमें रमण करनेकी इच्छा करते हैं, तभी यह भजनानन्दचन्द्र उदित हो जाता है। वह क्या करता हुआ उदित हुआ ?—'चर्षणीनां गतिभक्षण- शीलानां कर्मतत्फलव्यासक्तमनसां जनानां शुचः आर्त्तीः स्वात्मभूतपरप्रेमास्पदभगवद्विप्रयोगवेदनाः ताः मृजन्।' अर्थात् यह चर्षणी यानी कर्म और कर्मफलभोगमें आसक्त-चित्त पुरुषोंके शोक—अपने आत्मभूत परप्रेमास्पद भगवान्के वियोगसे होनेवाली वेदनाका मार्जन करता हुआ उदित हुआ अथवा कर्म और कर्म-फल-भोगजनित श्रान्ति ही आर्ति है या जितनी भी वेदनाएँ सम्भव हैं, वे सभी आर्ति हैं, उन सभीका मार्जन करते हुए भगवान् उदित हुए। यहाँ 'शुचः' में बहुवचन है; इसलिये यह शोकोपलक्षित समस्त संसारका भी उपलक्षण है। किसके द्वारा शोकमार्जन करता हुआ उदित हुआ ?—'शन्तमैः करैः—स्वयं शन्तमाः परमसुखरूपाः अन्येषु कराः कं सुखं रान्ति समर्पयन्तीति कराः तैः भगवदीयगुण- गणगानतानवितानादिभिः।' शन्तम करोंसे अर्थात् जो स्वयं परम सुखरूप हैं और दूसरोंको सुख प्रदान करनेवाले हैं; उन भगवद्- गुणगानादिसे भक्तोंका शोक निवृत्त करता हुआ उदित हुआ। इस प्रकार यह भजनानन्दरूप चन्द्रका उदय समस्त शोकोंकी निवृत्ति करनेवाला है; क्योंकि जिस समय जीव भगवद्भजनमें प्रवृत्त होता है, उसी समय उसके सारे पाप-ताप नष्ट हो जाते हैं। मन करि बिषय अनल बन जरई। होइ सुखी जौं एहिं सर परई ॥ (रा०च०मा० १।३५।८) यह मनरूप मत्तगजेन्द्र संसारानलमें जल रहा है; जिस समय यह भगवद्भजनमें लगता है, उसी समय मानो शीतल गंगाजलमें अवगाहन करने लगता है। अब यह विचार करना चाहिये कि ये जो भजनानन्दचन्द्र, भक्तिरूपा प्रभा और गुणगानवितानादि- रूप शन्तम कर हैं, इनमें भेद क्या है? क्योंकि बिना भेदके कोई व्यवहार नहीं हो सकता। वस्तुतः भगवद्भक्तिरूपा प्रभा और भगवदीय गुणगणगानतानादि भजनानन्दचन्द्रके अन्तर्गत ही हैं। इनका भेद 'राहोः शिरः' के समान केवल व्यवहारके लिये है। यद्यपि राहुका सिर राहुसे कोई पृथक् पदार्थ हो ऐसी बात नहीं है तथापि लोकमें इसका इस प्रकार सम्बन्ध- ग्रहणपूर्वक व्यवहार अवश्य होता है। जैसे 'देवदत्त हाथोंसे वृक्ष काटता है' इस वाक्यमें 'देवदत्त' कर्ता है और 'हाथ' करण हैं। इसलिये इन दोनोंमें भेद होना चाहिये। परंतु वस्तुतः देवदत्त क्या है? वह हाथ, पाँव, सिर आदिका संघात ही तो है। वह अवयवी है और हाथ-पाँव आदि उसके अवयव हैं। नैयायिकोंके मतानुसार अवयव कारण होता है और अवयवी उसका कार्य होता है। लोकमें कार्य अपने कारणके द्वारा ही सारे व्यापार किया करता है। इसलिये अवयवीमें मुख्यताका व्यपदेश होता है और अवयवमें गौणताका। इसी प्रकार भक्तिरूपा प्रभा और भगवद्गुणगानरूप किरणें अवयव हैं तथा भजनानन्दचन्द्र अवयवी है। अतः भजनान्द कार्य है और भक्ति तथा भगवद्गुणगानादि उसके कारण हैं। यह भजनानन्दचन्द्र हृदयारण्यको सुशोभित भी करता है; क्योंकि जहाँ चन्द्रालोकका विस्तार नहीं होता, वह स्थल रमणके योग्य भी नहीं होता। इसी प्रकार जिस हृदयमें भजनानन्दचन्द्रकी भक्तिरूपा प्रभाका विस्तार नहीं हुआ है, वह भगवान्‌का रमण-स्थल होनेयोग्य भी नहीं है तथा वह भजनानन्दचन्द्र और क्या करते हुए उदित हुआ ?—'प्राच्याः—प्राचि भवा प्राची तस्याः बुद्धेः मुखं सत्त्वात्मकं प्रधानं भागं अरुणेन कुङ्कुमेनेव रागेण विलिम्पन्।' अर्थात् वह प्राची यानी अपनेसे पूर्व उत्पन्न हुई बुद्धिके सत्त्वमय प्रधान भागको, अरुण कुंकुमद्वारा मुखलेपनके समान अनुरक्त करता हुआ उदित हुआ। यही भजनानन्दचन्द्रका कार्य है। जिस प्रकार अग्निसे पिघले हुए लाखमें रंग भर देनेपर वह उसी रंगका हो जाता है, उसी प्रकार यह बुद्धिके सत्त्वात्मक भागको

श्रीरासलीलारहस्य २५५ द्रवीभूत करके उसमें भगवत्स्वरूपरूपी रंग भर देता है। इससे वह बुद्धिसत्त्व भगवन्मय हो जाता है और फिर किसी समय उसे भगवान्‌की विस्मृति नहीं होती। तथा वह भजनानन्दचन्द्र है कैसा?—‘ककुभः —कं सुखं तद्रूपतया कुषु कुत्सितेष्वपि भाति शोभत इति ककुभः।’ ‘क’ सुखको कहते हैं। वह सुखरूपसे कुत्सितोंमें भी भासमान है, इसलिये ‘ककुभ’ है। उस भजनानन्द- चन्द्रका आलोक पड़नेपर तो चाण्डाल भी कृतकृत्य हो सकता है, यथा— अहो बत श्वपचोऽतो गरीयान् यज्जिह्वाग्रे वर्तते नाम तुभ्यम्। तेपुस्तपस्ते जुहुवुः सस्नुरार्या ब्रह्मानूचुर्नाम गृणन्ति ये ते॥ (श्रीमद्भा० ३।३३।७) अर्थात् हे प्रभो! जिसकी जिह्वापर आपका नाम विराजमान है, वह श्वपच भी इन (भक्तिहीन द्विजों)- की अपेक्षा श्रेष्ठ है। जो आपका नामोच्चारण करते हैं, उन महानुभावोंने तो सब प्रकारके तप, होम, स्नान और वेदपाठ कर लिये। यही नहीं, आपके नामोंका श्रवण या कीर्तन करनेसे तथा कभी आपको प्रणाम या स्मरण कर लेनेसे चाण्डाल भी शीघ्र ही सवन- कर्मका अधिकारी हो सकता है; फिर हे भगवन्! जिन्हें साक्षात् आपका दर्शन हुआ हो उनके विषयमें तो कहना ही क्या है? यन्नामधेयश्रवणानुकीर्तनाद् यत्प्रह्वणाद्यत्स्मरणादपि क्वचित्। श्वादोऽपि सद्यः सवनाय कल्पते कुतः पुनस्ते भगवन्नु दर्शनात्॥ (श्रीमद्भा० ३।३३।६) सवनकर्मका अधिकार केवल द्विजोंको ही है। अतः इस श्लोकमें जो ‘सद्यः’ शब्द है, उसका ‘तत्काल’ अर्थ करके कोई-कोई ऐसा कहने लगते हैं कि भगवत्स्मरणके प्रभावसे चाण्डाल भी उसी जन्ममें सवनाधिकारी यानी द्विज हो सकता है। परंतु ऐसी बात नहीं है। ‘सद्यः’ का अर्थ शीघ्र है और शीघ्रता सापेक्ष हुआ करती है। शास्त्रसिद्धान्त तो ऐसा है कि पशु एवं तिर्यक् योनियोंको भोग चुकनेपर जब जीवको मनुष्य-शरीर प्राप्त होता है तो सबसे पहले उसे पुल्कसयोनि मिलती है। उससे उत्तरोत्तर कई जन्मोंमें स्वधर्म-पालन करते-करते वह वैश्य होता है; और तभी उसे द्विजोचित कृत्योंका अधिकार प्राप्त होता है। अतः यहाँ ‘सद्यः’ शब्दसे यही तात्पर्य है कि यदि चाण्डाल स्वधर्मनिष्ठ रहकर भगवच्चिन्तन करेगा तो उसे एक-दो जन्मके पश्चात् ही द्विजत्वकी प्राप्ति हो जायगी; अनेकों जन्मोंमें नहीं भटकना पड़ेगा। यह क्रम स्वधर्मनिष्ठोंके ही लिये है। स्वधर्मका आचरण न करनेपर तो शूद्रको भी पुनः चाण्डाल- योनि प्राप्त होती है। जैसे कहा है— कपिलाक्षीरपानेन ब्राह्मणीगमनेन च। वेदाक्षरविचारेण शूद्रश्चाण्डालतामियात्॥ अर्थात् कपिला गौका दूध पीनेसे, ब्राह्मणीके साथ मैथुन करनेसे और वेदाक्षरका विचार करनेसे शूद्र चाण्डालत्वको प्राप्त हो जाता है और यदि शूद्र स्वधर्ममें ही तत्पर रहे तो उसी जन्ममें देहपातके अनन्तर स्वर्ग भी प्राप्त कर सकता है। ‘स्वधर्मे संस्थितः सम्यक् शूद्रोऽपि स्वर्गमश्नुते।’ अतः स्वधर्मका अतिक्रमण कभी न करना चाहिये। यदि कहो कि तत्क्षण ही क्यों न माना जाय? तो ऐसा हो नहीं सकता; क्योंकि जाति नित्य है, वह नामस्मरणमात्रसे परिवर्तित नहीं हो सकती। यदि नामस्मरणमात्रसे जाति-परिवर्तन हो सकता तो गर्दभीको भी नाम सुनाकर कामधेनु बनाया जा सकता था। परंतु ऐसा नहीं होता। जाति जन्मसे होती है, अतः उसका परिवर्तन जन्मान्तरमें ही हो सकता है। जिस प्रकार गौ एवं गर्दभादि योनियाँ हैं, उसी प्रकार ब्राह्मण और चाण्डालादि भी योनियाँ हैं। श्रुति कहती है— ‘ब्राह्मणयोनिं वा चाण्डालयोनिं वा।’ तात्पर्य यह है कि चाहे जाति-परिवर्तन हो या

२५६ भक्तिसुधा न हो, परंतु नामस्मरणसे चाण्डाल भी परम पवित्र अवश्य हो सकता है। इसका यह अभिप्राय नहीं है कि उसकी अस्पृश्यता निवृत्त हो जाती है। अपवित्रता दो प्रकारकी है; जातिनिमित्तक और कर्मनिमित्तक। कर्मनिमित्तक पातित्य पुण्य-कर्मसे निवृत्त हो सकता है; किंतु जातिनिमित्तक पातित्य कर्मसे निवृत्त नहीं हो सकता। चाण्डालका पातित्य जातिनिमित्तक है। अतः चाण्डाल शरीर रहते हुए उसकी अव्यवहार्यताका प्रयोजक पातित्य निवृत्त नहीं हो सकता। किंतु भगवत्स्मरणसे वह कर्मजनित पातित्यसे मुक्त होकर शुद्धान्तःकरण हो जाता है और उसके द्वारा वह भगवत्प्राप्ति भी कर सकता है; उसका कुल पवित्र हो जाता है और उसे परलोकमें वह गति प्राप्त होती है, जो भक्तिहीन ब्राह्मणके लिये भी दुर्लभ है। इसीसे भगवान्ने भी कहा है— मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः। स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्॥ (गीता ९।३२) अतः सिद्ध हुआ कि वह भजनानन्दचन्द्र कुत्सितोंको भी सुख प्रदान करता है, इसलिये ककुभ है। 'प्रियः' भी उस भजनानन्दचन्द्रका ही विशेषण है। वह भजनानन्दचन्द्र मानो विषयी, मुमुक्षु और मुक्त सभी प्राणियोंके परम प्रेमका आस्पद है। वह लोकमनोऽभिराम होनेके कारण विषयी पुरुषोंको और भवौषध होनेके कारण मुमुक्षुओंको प्रिय है तथा जीवन्मुक्तोंको भी वह अत्यन्त प्रिय है; क्योंकि इसीके कारण उन्हें भगवत्सान्निध्यरूप परमोत्कृष्ट वैभव प्राप्त हुआ है। इसीसे श्रीगोसाईंजी महाराज कहते हैं— अस बिचारि हरि भगत सयाने। मुक्ति निरादर भगति लुभाने॥ (रा०च०मा० ७।११९।७) अतः बहुतसे अद्वैतनिष्ठ तत्त्वज्ञजन भी कल्पित भेदको स्वीकारकर निश्छलभावसे अति तत्परतापूर्वक भगवान्‌की भक्ति किया करते हैं, जैसा कि कहा है— यत्सुभक्तैरतिशयप्रीत्या कैतववर्जनात्॥ स्वभावस्य स्वरसतो ज्ञात्वापि स्वाद्वयं पदम्। विभेदभावमाहृत्य सेव्यतेऽत्यन्ततत्परैः॥ अर्थात् पूर्ण अद्वैतपद सुभक्तोंद्वारा फलाभिसन्धिरूप कैतव (कपट)-से रहित होकर उपासित होता है; क्योंकि जो लोग लौकिक या पारलौकिक अभिलाषाओंसे पूर्ण होंगे, उनकी उपासना कैतवशून्य नहीं हो सकती। हाँ, जो मुक्त हो गया है उसे अवश्य किसी वस्तुकी आकांक्षा नहीं रहती; अतः वही निष्कपट उपासना भी कर सकता है। इससे निश्चय हुआ कि सुभक्त जो ज्ञानी लोग हैं, उनके द्वारा वह अद्वयतत्त्व अत्यन्त प्रीतिपूर्वक उपासित होता है। जिन लोगोंने समस्त प्रपंचका मिथ्यात्व निश्चय कर लिया है, वे ही किसी पदार्थमें आसक्ति और प्राप्तव्य-बुद्धि न होनेके कारण अद्वयभावसे उसकी अकैटव उपासना कर सकते हैं, परंतु यहाँ शंका होती है कि यदि उन जीवन्मुक्तोंको कोई प्रयोजन ही नहीं होता तो वे भजनमें प्रवृत्त ही क्यों होंगे? इस सम्बन्धमें हमारा कथन है कि जीवन्मुक्त महात्माओंपर शास्त्रका शासन नहीं होता; क्योंकि वे कृतकृत्य हो जाते हैं, जैसा कि कहा है— गुणातीतः स्थितप्रज्ञो विष्णुभक्तश्च कथ्यते। एतस्य कृतकृत्यत्वाच्छास्त्रमस्मान्निवर्तते॥ अर्थात् प्रथम कोटिमें साधक यथाविधि वैदिक और स्मार्त कर्मोंका अनुष्ठान करके उपासनाद्वारा चित्तके दोषोंको निवृत्त करता है; फिर श्रवण, मनन और निदिध्यासनद्वारा भगवान्‌का साक्षात्कार करनेपर वह गुणातीत, जीवन्मुक्त या स्थितप्रज्ञ कहा जाता है। इसी क्रमसे कर्म और उपासनामें पूर्वमीमांसा, श्रवणमें उत्तरमीमांसा, मननमें न्याय और वैशेषिक तथा निदिध्यासनमें सांख्य और योगदर्शनका कार्य समाप्त हो जाता है। इस प्रकार कृतकृत्य हो जानेके कारण फिर अपना कोई प्रयोजन न रहनेके कारण शास्त्र यद्यपि उस महापुरुषसे निवृत्त हो जाता है तथापि अपने पूर्वाभ्यासके कारण उससे कर्म और उपासना स्वभावतः होते रहते हैं। श्रीमद्मधुसूदन स्वामी कहते

श्रीरासलीलारहस्य २५७ हैं—‘अद्वेष्टृत्वादिवत्तेषां स्वभावो भजनं हरेः।' अर्थात् जिस प्रकार उनमें स्वभावसे ही अद्वेष्टृत्वादि गुण रहते हैं, उसी प्रकार भगवान्‌का भजन करना भी उनका स्वभाव ही है। यहाँ एक शंका यह भी होती है कि भक्ति तो भेदमें होती है और तत्त्वज्ञोंकी अभेददृष्टि रहा करती है, फिर वे भक्तिभावमें कैसे प्रवृत्त हो सकते हैं? इसपर वे कहते हैं—‘विभेदभावमाहृत्य' अर्थात् वे भेदभावका अध्याहार करके भगवान्‌का भजन करते हैं। इस प्रकारका काल्पनिक भेद सब प्रकार मंगलमय ही है। इसीसे कहा है— द्वैतं मोहाय बोधात्प्राक् प्राप्ते बोधे मनीषिणा। भक्त्यर्थं कल्पितं द्वैतमद्वैतादपि सुन्दरम् ॥ अद्वैतं परमार्थो हि द्वैतं भजनहेतवे। तादृशी यदि भक्तिश्चेत्सा तु मुक्तिशताधिका ॥ अर्थात् द्वैत तभीतक मोहजनक होता है, जबतक ज्ञान नहीं होता; जिस समय विचारद्वारा बोधकी प्राप्ति हो जाती है, उस समय तो भक्तिके लिये कल्पना किया हुआ द्वैत अद्वैतकी भी अपेक्षा सुन्दर है। यदि पारमार्थिक अद्वैतबुद्धि रहते हुए भजनके लिये द्वैतबुद्धि रखी जाय तो ऐसी भक्ति तो सैकड़ों मुक्तियोंसे भी बढ़कर है। भाष्यकार भगवान् श्रीशंकराचार्यजीकी भक्ति भी ऐसी ही थी; इसीसे वे कहते हैं— सत्यपि भेदापगमे नाथ तवाहं न मामकीनस्त्वम्। सामुद्रो हि तरङ्गः क्वचन समुद्रो न तारङ्गः॥ अर्थात् हे नाथ! यद्यपि आपका और मेरा भेद नहीं है तथापि मैं आपका ही हूँ, आप मेरे नहीं हैं; क्योंकि तरंग ही समुद्रका होता है, समुद्र तरंगका कभी नहीं होता। इसी विषयमें किसी भावुकका कथन है— प्रियतमहृदये वा खेलतु प्रेमरीत्या पदयुगपरिचर्यां प्रेयसी वा विधत्ताम्। विहरतु विदितार्थो निर्विकल्पे समाधौ ननु भजनविधौ वा तुल्यमेतद्द्वयं स्यात्॥ अर्थात् प्रियतमा चाहे तो प्रणयविधिसे प्रियतमके वक्षःस्थलपर विहार करे और चाहे उसके चरणयुगलकी परिचर्यामें लगी रहे—बात एक ही है। इसी प्रकार जिसे परमार्थबोध प्राप्त हो गया है, वह चाहे तो निर्विकल्प समाधिमें स्थित रहे और चाहे भगवान्‌के भजन-पूजनमें लगा रहे—कोई भेद नहीं है। जो लोग विचारशून्य हैं, उन्हींकी दृष्टिमें भगवान्‌का आत्मत्वेन साक्षात्कार उनका अपमान है। यदि विचार करके देखा जाय तो इस प्रकारका अभेद तो प्रेमातिशयकी रीति ही है। प्रेमका अतिरेक होनेपर तो भेदभावकी तिलांजलि हो ही जाती है। जो अरसिक हैं, उत्कृष्ट प्रेमातिशयके रहस्यको जाननेवाले नहीं हैं, उनकी दृष्टिमें प्रियतमाका प्रियतमके वक्षःस्थलमें विहार करना अयुक्त हो सकता है; किंतु रसिकजन तो जानते हैं कि प्रेमातिरेकमें ऐसा ही हुआ करता है। अतः अभेदरूपसे स्वरूप-साक्षात्कार हो जानेपर भी काल्पनिक भेद स्वीकार करके निष्कपट भावसे भक्ति हो ही सकती है। तत्त्वज्ञोंके यहाँ ऐसी ही भक्ति स्वीकार है। इस प्रकार यह भजनानन्दचन्द्र विषयी, मुमुक्षु और मुक्त सभीके लिये प्रिय है। इसके सिवा और भी वह भजनानन्दचन्द्र कैसा है?–'दीर्घदर्शनः–दीर्घं अनपबाध्यं दर्शनं यस्य' अर्थात् जिसका दर्शन-ज्ञान किसीसे बाधित नहीं होता। जो ज्ञान भ्रमात्मक होता है, वह तो ज्ञानान्तरसे बाधित हो जाता है; किंतु यह भजनानन्दचन्द्र ज्ञानान्तरसे बाधित होनेवाला नहीं है, यह ज्ञानान्तराबाध्य भजनानन्दचन्द्र चर्षणियोंके शोकका मार्जन करता तथा प्राग्भवा तमोव्याप्ता बुद्धिके सत्त्वात्मक प्रधान भागको अनुरागात्मक कुंकुमसे लेपन करता हुआ उदित हुआ, जिस प्रकार कोई चिरप्रोषित प्रियतम प्रवाससे लौटकर अपनी प्रियतमाके शोकाश्रुओंका मार्जन करते हुए करधृत कुंकुमसे उसके मुखका लेपन करता है। अथवा यों समझिये कि जिस समय भगवान्‌ने रमण करनेकी इच्छा की, उसी समय प्राची— नित्यप्रिया श्रीवृषभानुनन्दिनीका मुख विलेपन करते

२५८ भक्तिसुधा हुए उडुराज ( श्रीकृष्णचन्द्र) उस विहारस्थलमें उदित हो गये। यहाँ ‘उडुराज’ शब्दमें उपमालंकार है अर्थात् श्रीकृष्णरूप चन्द्र जो कि चन्द्रमाके समान हैं, वे प्रियतमा श्रीराधिकाजीका मुखविलिम्पन करते हुए उस विहारस्थलमें इसी प्रकार प्रकट हुए, जैसे चन्द्रमा प्राची दिशाको अनुरंजित करते हुए उदित होते हैं। उडुराज जिस प्रकार प्राची दिशाके मुख यानी प्रधान भागको करों (किरणों)-से अनुरंजित करते हैं, उसी प्रकार यहाँ क्रीड़ाभूमिमें श्रीकृष्णचन्द्र करकमलोंमें ली हुई होलिका-रोलिका (होलीके गुलाल)-से श्रीराधिकाजीका मुखमण्डल अनुरंजित करते हैं। जिस प्रकार उदयकालीन चन्द्रमा उदयरागसे प्राची दिशा और समस्त आकाशको अरुण कर देता है, ठीक उसी प्रकार भगवान् कृष्णने प्रकट होकर अपने शन्तम-कर अर्थात् मंगलमय कर-व्यापारोंसे समस्त व्रजांगनाओंके मुखमण्डलको अरुण कर दिया। यहाँ ‘शन्तमैः करैः’ यह भगवान्‌के समस्त मंगलमय अंगोंका उपलक्षण है। वे अंग मंगलमय हैं और मंगलकारक भी हैं; क्योंकि भगवान् ‘आनन्दमात्रकरपाद- मुखोदरादि’ तथा— नमो विज्ञानरूपाय परमानन्दमूर्तये । सच्चिदानन्दरूपाय कृष्णायाक्लिष्टकारिणे ॥ —आदि वाक्योंके अनुसार शुद्ध सन्मात्र, चिन्मात्र और आनन्दमात्र तत्त्व हैं तथा ‘एष ह्येवानन्दयति’ इस श्रुतिके अनुसार वे ही सब प्राणियोंको आनन्दित भी करते हैं, अतः वे आनन्दप्रद भी हैं। उन्होंने नित्यप्रिया श्रीवृषभानुनन्दिनीके समान अन्य व्रजांगनाओंके मुखमण्डलको भी सुखमय और सुखावह कर- व्यापारोंसे अरुण किया तथा उनके कर्णरन्ध्रोंको वेणुरागसे और हृदयाकाशोंको प्रेमरागसे रंजित कर दिया। इस प्रकार वे उदित हुए। यहाँ ‘करैः’ में जो बहुवचन है, वह स्वरूपोंकी बहुलताके अभिप्रायसे भी हो सकता है; क्योंकि यहाँ रासलीलामें भगवान्‌को अनेक रूपसे आविर्भूत होना है। अतः भगवान्‌के अनेक रूपोंकी अपेक्षासे बहुवचनका प्रयोग उचित ही है। व्रजांगनाओंको जो भगवान्‌के साथ विहारावसर प्राप्त न होनेका शोक था, उसे भी अपने शन्तम-कर यानी सुखप्रद लीलामय विहारविशेषोंसे ही निवृत्त करते हुए भगवान् प्रकट हुए। यहाँ ‘वर्तमानसामीप्ये वर्तमानवद्वा’ इस सूत्रके अनुसार ‘मृजन्’ में भविष्यदर्थमें वर्तमानका प्रयोग हुआ है अर्थात् भगवान् अपने साथ विहार करनेका सुअवसर न मिलनेके कारण जो गोपांगनाओंको शोक था, उसकी निवृत्ति करेंगे, इसीलिये उदित हुए हैं। यहाँ— रलयोर्डलयोश्चैव सषयोर्बवयोस्तथा। वदन्त्येषां च सावर्ण्यमलङ्कारविदो जनाः ॥* इस वचनके अनुसार ‘उडुराजः’ की जगह ‘उरुराजः’ भी समझा जाता है अर्थात् जिस समय भगवान् वृन्दारण्यमें पधारे, उस समय श्रीयशोदा और नन्दबाबाको विकलता होनेकी सम्भावना हुई; क्योंकि जिस प्रकार फणि मणिको नहीं छोड़ सकता, उसी प्रकार वे भगवान्‌से विलग नहीं रह सकते थे। अतः भगवान् अनेक रूपसे प्रकट हुए अर्थात् वृन्दारण्यमें प्रकट होनेपर भी वे एक रूपसे श्रीयशोदाजीके शयनागारमें ही रहे। इसीसे उन्हें ‘उरुधा—बहुधा राजते यः स उरुराजः’ इस व्युत्पत्तिके अनुसार उरुराज—अनेक रूपसे सुशोभित होनेवाले कहा है। यहाँ ‘प्रियः’ यह उडुराजका विशेषण है। जिस प्रकार रसिक और भक्त पुरुष दोनोंको ही चन्द्रमा प्रिय है, उसी प्रकार भगवान् भी सबके परम-प्रेमास्पद हैं। चन्द्रमामें रसिकोंका प्रेम तो शृंगाररसका उद्दीपन विभाव होनेके कारण है; किंतु साथ ही वह भक्तोंको भी अत्यन्त प्रिय है; क्योंकि उसके मध्यमें जो श्यामता है, वह उन्हें हृदयाकाशमें स्थित ध्यानाभिव्यक्त भगवत्स्वरूपका स्मरण दिलाती है तथा उसके दर्शनमात्रसे भी अपने प्रियतमके प्रति प्रेमियोंके अनुरागकी वृद्धि होती है। देखो, चन्द्रमा अत्यन्त दूर देशमें है तो भी वह समुद्रकी अभिवृद्धिका हेतु होता है। जान पड़ता

  • अर्थात् अलंकाररहस्यज्ञ महानुभाव र और ल, ड और ल, स और ष तथा ब और व इनकी सवर्णता बतलाते हैं।

है कि मानो समुद्र अपनी उत्ताल तरंगोंद्वारा चन्द्रमासे मिलना चाहता है। इससे यह सूचित होता है कि प्रिय वस्तु चाहे कितनी ही दूर रहे; किंतु प्रेमीको उसके प्रति अनुरागकी वृद्धि होती है। इसीसे जब-जब पूर्णचन्द्रका उदय होता है, तभी-तभी समुद्र अत्यन्त उत्सुकतासे उससे मिलनेके लिये उत्ताल तरंगोंसे उछलने लगता है। यह सब देखकर प्रेमियोंकी ऐसी भावना हो जाती है कि जिस प्रकार यह समुद्र अपने प्रियतमतक पहुँचनेके प्रयत्नमें बारम्बार असफल होते रहनेपर भी हताश नहीं होता, उसी प्रकार हमें भी अपने प्रियतमसे निराश या निरपेक्ष नहीं होना चाहिये। इस प्रकार प्रेमियोंको प्रेमरीति सिखानेवाला, भगवान् कृष्णमें रमणेच्छा उत्पन्न करानेवाला तथा समस्त जीवोंको आनन्दित करनेवाला होनेके कारण चन्द्रमा सब प्रकारसे प्रेमास्पद ही है। इसी प्रकार सर्वान्तरात्मा श्रीभगवान् भी सभीके परम-प्रेमास्पद हैं; क्योंकि कोई पुरुष कैसा ही नास्तिक या देहाभिमानी क्यों न हो, उसे भी अपनी आत्मामें ही निरतिशय प्रेम होता है। यह चन्द्रमा कैसा है? 'दीर्घदर्शनः—दीर्घ- कालान्तरे अनेकरात्र्यवसाने दर्शनं यस्य स दीर्घदर्शनः' अर्थात् जिसका दर्शन बहुत-सी रात्रियोंके पीछे होता है; क्योंकि पूर्णचन्द्र एक मासके अनन्तर ही उदित होता है। यदि इसे भगवान्‌का विशेषण माना जाय तो इस प्रकार अर्थ होगा—'दीर्घमबाध्यं दर्शनं यस्य स दीर्घदर्शनः' अर्थात् जिनका दर्शन दीर्घ यानी अबाध्य है; क्योंकि 'न हि द्रष्टुर्दृष्टे- र्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वात्' इस सूत्रके अनुसार सर्वसाक्षी भगवान्‌की दर्शनशक्तिका लोप कभी नहीं होता। भगवान् कृष्ण प्रत्यगात्मा होनेके कारण ही 'प्रियः'—परप्रेमास्पद हैं तथा सर्वान्तरतम प्रत्यगात्मा होनेके कारण ही सर्वद्रष्टा हैं। जो सर्वद्रष्टा है, वह किसीका दृश्य नहीं हो सकता; क्योंकि वह जिसका दृश्य होगा, उसका द्रष्टा नहीं हो सकता और ऐसा होनेपर उसका सर्वद्रष्टृत्व बाधित हो जायगा। अतः सर्वद्रष्टा श्रीभगवान्की दर्शनशक्तिका किसी समय लोप नहीं होता। दर्शन दो प्रकारका है—बौद्धदर्शन और पौरुषेय- दर्शन। भिन्न-भिन्न इन्द्रियोंद्वारा अन्तःकरणका उन इन्द्रियोंके विषयोंसे संश्लिष्ट होकर तदाकार हो जाना बौद्धदर्शन है। यह बुद्धिका परिणाम है। यहाँ बुद्धि ही इन्द्रियोंद्वारा विषयोंको व्याप्तकर उनके आकारमें परिणत हो जाती है। इसीको कहीं-कहीं पौरुषेयदर्शन भी कहा है। बुद्धिमें जो पुरुषत्वका आरोप होता है, उसीके कारण बुद्धिनिष्ठ दर्शन पुरुषनिष्ठ-सा जान पड़ता है। तात्पर्य यह है कि बुद्धिमें जो विवेक-ज्ञान और शब्दादि- ज्ञान है, इनका अपनेमें आरोप करके यह पुरुष 'अहं विवेकवान्' और 'अहं शब्दज्ञानवान्' प्रतीत होता है। वस्तुतः तो यह आरोप भी बुद्धिमें ही है। पुरुषसे इसका कोई सम्बन्ध नहीं है। यहाँ यह सन्देह होता है कि यदि यह आरोप बुद्धिनिष्ठ है तो इसकी पुरुषनिष्ठता प्रतीत नहीं होनी चाहिये, बुद्धिनिष्ठता ही अनुभूत होनी चाहिये। किंतु बुद्धि प्रकृतिका विकार होनेके कारण जड़ है, अतः यह आरोप अनुभवका विषय (दृश्य) ही होना चाहिये, अनुभवरूप नहीं होना चाहिये। परंतु ऐसी बात तो है नहीं; इसलिये इसे बुद्धिनिष्ठ ही क्यों माना जाय? इसका उत्तर यह है कि यह बुद्धिनिष्ठ आरोप बुद्धिमें पुरुषत्वकी भ्रान्ति करानेके कारण बुद्धिनिष्ठ होनेपर भी पुरुषनिष्ठ-सा जान पड़ता है; इसीसे वस्तुतः वह आरोप अनुभवका विषय होनेपर भी अनुभवरूप-सा प्रतीत होता है। इस प्रकार सिद्धान्ततः यही निश्चय हुआ कि बौद्ध बोध ही पौरुषेय बोध-सा प्रतीत होता है। पौरुषेय बोध बुद्धिबोधसे भिन्न नहीं है। इसीसे कहा है—'एकमेव दर्शनं ख्यातिरेव दर्शनम्'। यहाँ तत्तदाकारवृत्ति ही 'ख्याति' कही गयी है। व्युत्थान- अवस्थामें पुरुष ख्यात्याकार हो जाता है—'वृत्ति- सारूप्यमितरत्र'। वृत्तियाँ शान्त, घोर और मूढ़भेदसे

२६० भक्तिसुधा

तीन प्रकारकी हैं, अतः व्युत्थानावस्थामें पुरुष भी शान्त, घोर और मूढ़रूप हो जाता है। यह कथन लोकव्यवहारोपयुक्त दर्शनकी दृष्टिसे है। वास्तवमें तो इस बौद्धबोधसे व्यतिरिक्त पुरुषका स्वभावभूत चैतन्य ही पौरुषेयदर्शन है। यदि बौद्धबोधको ही पुरुषका स्वभाव माना जाय तो यह प्रश्न होता है कि समाधि-अवस्थामें समस्त चित्तवृत्तियोंका निरोध हो जानेपर पुरुषका क्या स्वभाव रहता है ? तात्पर्य यह है कि यदि उसका स्वभाव बौद्धबोध ही है तो उस अवस्थामें समस्त बुद्धिवृत्तियोंका निरोध हो जानेके कारण वह स्वभावशून्य होकर कैसे रहेगा ? कारण, ऐसा कोई समय नहीं है, जबकि पुरुष शब्दादि वृत्तियोंमेंसे किसीके साथ तादात्म्यापन्न न हो। समस्त वृत्तियाँ पाँच विभागोंमें विभक्त की गयी हैं—प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति; इनमेंसे किसी-न-किसीके साथ पुरुषका सारूप्य रहता ही है। जिस प्रकार अग्नि दाहकत्व- प्रकाशकत्वशून्य नहीं रहता, उसी प्रकार पुरुष शान्त, घोर या मूढ़वृत्तियोंसे शून्य कभी नहीं रहता। अतः ये उसके स्वभाव ही हैं। यदि कहें कि समाधिकालमें वृत्तियोंका निरोध हो जानेपर भी वह उस निर्वृत्तिक अन्तःकरणका ही भोक्ता रहता है तो ठीक नहीं; क्योंकि निर्वृत्तिक अन्तःकरण भोगोपयोगी नहीं है; क्योंकि भोग और सत्त्व-पुरुषान्यताख्यातिरूप पुरुषार्थ- सम्पादन करनेवाली अन्तःकरणरूपमें परिणत हुई ही प्रकृति पुरुषकी भोग्य हो सकती है। निर्वृत्तिक चित्तमें तो ये दोनों ही बातें नहीं हैं। अतः समाधि-अवस्थामें पुरुषका कोई स्वभाव ही नहीं रहता। कोई भी भावरूप पदार्थ अपने स्वभावको छोड़कर नहीं रह सकता। पुरुष भावरूप है, अतः समाधि-अवस्थामें भी उसका सद्भाव रहनेके कारण क्या हो सकता है ? इसपर सिद्धान्ती कहता है—'तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्' अर्थात् समस्त वृत्तियोंका निरोध हो जानेपर द्रष्टाकी अपने स्वरूपमें स्थिति हो जाती है। तात्पर्य यह है कि भावके दो रूप हैं—औपाधिक और अनौपाधिक। बौद्धबोध पुरुषका औपाधिक रूप है, अतः समाधिमें उसका अभाव हो जानेपर भी पुरुषका निरुपाधिक अर्थात् स्वाभाविक स्वरूप तो रहता ही है। यही मुख्य पौरुषेय-बोध है। यह पुरुषका स्वाभाविक चैतन्य ही वास्तविक दर्शन है। दृष्टि दो हैं—नित्या और अनित्या। ख्याति अनित्या दृष्टि है, यह उदयास्तमयशालिनी है। इसकी साक्षीभूता जो नित्या दृष्टि है, उसीके विषयमें श्रुति कहती है— 'न हि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते।' (बृहदारण्यक० ४।३।२३) अर्थात् द्रष्टाकी दृष्टिका लोप कभी नहीं होता। यही दीर्घा दृष्टि है और यही मुख्य भी है। इसीसे भगवान्‌को अविलुप्तदृक् कहा है। यह दृष्टि समस्त अनित्य दृष्टियोंकी दृष्टि (साक्षिणी) है; अर्थात् अनित्य दृष्टियोंकी दृष्टि और उनका द्रष्टा एक ही बात है। यहाँ 'द्रष्टुः दृष्टिः' यह कथन ऐसा ही है, जैसे 'राहोः शिरः' अर्थात् जिस प्रकार सिर राहुसे तनिक भी भिन्न नहीं है, उसी प्रकार यह दृष्टि भी द्रष्टासे भिन्न नहीं है, अतः 'द्रष्टुः' इस पदमें जो षष्ठी है, वह समानाधिकरण्यमें है; अर्थात् जो दृष्टि द्रष्टासे अभिन्न है, वही द्रष्टाकी दृष्टि है और यदि व्यधिकरण—षष्ठी मानकर अर्थ किया जाय तो इसके दो तात्पर्य होंगे— द्रष्टुजन्या दृष्टि या द्रष्टृ-प्रकाशिका अर्थात् द्रष्टृविषयिणी दृष्टि। इनमें पहली द्रष्टाके आश्रित है और दूसरी द्रष्टाका आश्रय है तथा पहली अनित्या है और दूसरी नित्या। इससे सिद्ध हुआ कि घटादि-दर्शनका आश्रय तो द्रष्टा है तथा उस द्रष्टाका जो दर्शन है, जिस दर्शनका विषय वह द्रष्टा है, वही शुद्ध आत्मा है। वह दृष्टि क्या है? वह द्रष्टाकी स्वरूपभूता है। यहाँ 'द्रष्टा' शब्दसे काल्पनिक द्रष्टा अभिप्रेत है। उस (काल्पनिक द्रष्टा)—का आश्रय ही उसका पारमार्थिक स्वरूप है, जैसे रज्जुमें अध्यस्त सर्पका रज्जु। वह दृष्टि कौन-सी है? इसका परिचय श्रुति इस प्रकार देती है— 'सा द्रष्टुर्दृष्टैर्यया स्वप्ने पश्यति' इत्यादि।

इस प्रकार जिसके द्वारा स्वाप्निक पदार्थोंकी प्रतीति होती है, वह दृष्टि आत्मस्वरूपा ही है। यहाँ शंका होती है कि उसके भी तो उत्पत्ति और नाश देखे जाते हैं; अतः वह भी अनित्या ही है। इसपर हमारा कथन यह है कि ऐसा मानना उचित नहीं; क्योंकि उस समय चक्षु आदि इन्द्रियाँ तो अज्ञानमें लीन हो जाती हैं और अन्तःकरण विषयरूप हो जाता है। जाग्रदवस्थाके हेतुभूत अविद्या, काम और कर्मोंका क्षय तथा स्वप्नावस्थाके हेतुभूत अविद्या, काम और कर्मोंका उदय होनेपर, जाग्रदवस्थामें अपने-अपने अधिष्ठातृदेवतासे अनुगृहीत भिन्न-भिन्न इन्द्रियोंद्वारा उत्पन्न हुए भिन्न-भिन्न ज्ञानोंके संस्कारोंसे संस्कृत हुआ अन्तःकरण ही स्वाप्निक पदार्थोंके रूपमें परिणत हो जाता है, जिस प्रकार सिनेमामें अनेक प्रकारके चित्रोंसे चित्रित पट ही विशेष प्रकारके प्रकाश, गति और काँचसे संयुक्त होकर नाना प्रकारकी गतियाँ करता प्रतीत होता है। किंतु उस समय (स्वप्नमें) इन सबका दर्शन किसके द्वारा होता है ? यदि कहो कि जिस प्रकार अनिर्वचनीय रूपादि उत्पन्न हुए हैं, उसी प्रकार अनिर्वचनीय दृष्टि भी उत्पन्न हो जाती है तो यह हो नहीं सकता; क्योंकि प्रातिभासिक अनिर्वचनीय पदार्थ सदा ज्ञातसत्ताक ही होते हैं। उनका सर्वदा अपरोक्ष- ज्ञान हुआ करता है। किंतु इन्द्रियाँ अज्ञातसत्ताक भी होती हैं; क्योंकि वे स्वयं अज्ञात रहकर भी वस्तुका प्रकाशन करनेमें समर्थ हैं। अतः अज्ञातसत्ताक होनेके कारण उसका आरोप नहीं हो सकता; अतः स्वाप्निक रूपकी दृष्टि शुद्ध आत्मा ही है। यहाँ यह प्रश्न होता है कि यदि स्वाप्निक रूपकी दृष्टि शुद्ध आत्मा ही है तो उसमें दृष्टि, श्रुति, विज्ञाति आदि भेद नहीं हो सकते; क्योंकि वह तो निर्विशेष अर्थात् सामान्यरूप है। उसमें यह नामरूपात्मक भेद कैसे हो गया ? इसका उत्तर यह है कि इन अनिर्वचनीय शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्धका अनिर्वचनीय सम्बन्ध स्वप्रकाश आत्मामें अनिर्वचनीय श्रुति, अनिर्वचनीय मति एवं अनिर्वचनीय विज्ञाति आदि उत्पन्न कर देता है, जिस प्रकार एकरस प्रकाश भी नील-पीत, हरित काँचोंके साथ संश्लिष्ट होनेपर तत्तद्रूपवान् प्रतीत होता है। किन्हीं-किन्हीं लैम्पोंमें देखा जाता है कि उसके भिन्न-भिन्न पार्श्वोंमें भिन्न- भिन्न वर्णके काँच लगे रहते हैं। उनके कारण उसकी दीपशिखा एकरूप होनेपर भी भिन्न-भिन्न ओरसे विभिन्न वर्णकी दिखलायी पड़ती है। इसी प्रकार एक ही शुद्ध ब्रह्म विविध उपाधियोंके कारण विविध रूपोंमें प्रतीत होता है। यहाँ दृष्टान्तमें दीपशिखाके सन्निहित होनेवाले नील, पीत, हरित काँच समान- सत्तावाले हैं अर्थात् उन सभीकी व्यावहारिक सत्ता है; इसलिये उसका वैवर्ण्य पारमार्थिक भी कहा जा सकता है। परंतु आत्मासे संश्लिष्टसे शब्दादि तो अतात्त्विक हैं; अतः अतात्त्विक शब्दादिके सम्बन्धसे होनेवाला तात्त्विक-आत्माका भेद भी अतात्त्विक ही है। यहाँ एक बात यह समझ लेनी चाहिये कि चक्षुरादिजन्य रूपाद्याकाराकारितवृत्तिरूप जो दृष्टि आदि हैं, उनके संस्कारोंसे संस्कृत अन्तःकरण ही शब्दादिरूपसे परिणत होता है। अतः दर्शन-श्रवण आदिके संस्कारोंसे संस्कृत जो अन्तःकरण है, उसके सम्बन्धसे ही शुद्ध चैतन्यमें दृष्टि-श्रुति आदि अनेक भेद प्रतीत होते हैं; जिस प्रकार सुषुप्तिमें यद्यपि अहंकार नहीं रहता तथापि जागनेपर यही अनुभव होता है कि ‘मैं सुखपूर्वक सोया’। इस प्रकारकी स्मृतिसे उस समय भी अहंकारकी सत्ता सिद्ध होती है। परंतु वस्तुतः उस समय अहंकार नहीं रहता; क्योंकि उस अवस्थामें इच्छा, द्वेष, प्रयत्नादि अहंकारके धर्म नहीं देखे जाते और धर्मके बिना धर्मीकी स्थिति सम्भावित नहीं है; तथापि अहंकार न रहनेपर भी अहं संस्कार-संस्कृत अज्ञान तो रहता ही है; इसीसे जागृतिमें उसका परामर्श होता है। रासपञ्चाध्यायीके दूसरे श्लोककी एक अन्य व्याख्या अब हम इस श्लोकके तात्पर्यका एक अन्य

प्रकारसे विचार करते हैं—'उडुराजः, उडुषु उडुसदृशर्तुषु राजत इति उडुराजः—वसन्तः। यदैव भगवान् रन्तुं मनश्चक्रे तदैव उडुराजो—वसन्त उदगात्।' अर्थात् जो उडुस्थानीय अन्य ऋतुओंमें शोभायमान है, वह वसन्त ही उडुराज है। जिस समय भगवान्‌ने रमण करनेकी इच्छा की, उसी समय वह वसन्तरूप उडुराज उदित हो गया। वह वसन्त-ऋतु कैसा है ? 'दीर्घदर्शनः—दीर्घकाले दर्शनं यस्य।' अर्थात् वर्तमान जो शरद्-ऋतु है, उसकी अपेक्षा जिसका दर्शन दीर्घकालमें होना सम्भव है। ऐसा वसन्त-ऋतु भी कालका अतिक्रमण करके उदित हुआ। उसीका विशेषण है 'ककुभः—के स्वर्गे कौ पृथिव्यां भातीति ककुभः' अर्थात् जो क—स्वर्ग और कु—पृथिवीमें भासित होता है। इससे वसन्तोपलक्षित होलिकामें होनेवाले उत्सवादि भी सूचित होते हैं। 'प्रिय' भी उसीका विशेषण है; क्योंकि सबके प्रेमका आस्पद होनेके कारण वह सबका प्रिय भी है। वह वसन्तरूप ककुभ और प्रिय उडुराज उदित हुआ। क्या करता हुआ उदित हुआ ? 'प्रियसङ्गमाभावजनितविषादान् मृजन् शान्तमैः करैश्च स्वोद्दीपनविभावजनितेन अरुणेन प्रिय- सङ्गमसम्भावनाजनितेनानुरागेण प्राच्या नित्य- प्रियायाः श्रीवृषभानुनन्दिन्या इव चर्षणीनां श्रीकृष्णेन सह रन्तुं गमनशीलानामन्यासां व्रजाङ्गनानां विरहाग्निना पीतं मुखं विलिम्पन्'। अर्थात् वह प्रियसंगमाभावके कारण उत्पन्न हुए विषादको अपनी शान्त किरणोंसे (अथवा सुखस्वरूप एवं सुखप्रद किरणोंसे) निवृत्त करते हुए तथा अपने उद्दीपनविभावरूप चन्द्रमासे उत्पन्न हुए अरुण यानी प्रियतमके समागमकी सम्भावनासे प्रकट हुए अनुरागद्वारा प्राची—नित्यप्रिया श्रीवृषभानुसुताके समान, अन्य सब चर्षणीगण भगवान् श्रीकृष्णके साथ रमण करनेके लिये अभिसरण करनेवाली समस्त गोपांगनाओंके विरहाग्निजनित पीड़ासे पीले पड़े हुए मुखोंका लेपन करते हुए उदित हुए। यहाँ 'प्राच्या मुखम् अरुणेन विलिम्पन्' इसका अर्थ यह भी हो सकता है— 'प्राच्याः नित्यप्रियायाः व्रजभुवः मुखं मुख्यं भागं श्रीवृन्दारण्यम् अरुणेन किंशुकादिपुष्प- विकासेन विलिम्पन्।' अर्थात् नित्यप्रिया व्रजभूमिके मुख (मुख्य भाग) श्रीवृन्दारण्यको अरुण-किंशुकादि रक्तपुष्पोंके विकासद्वारा रंजित करते हुए उदित हुए। उस समय वसन्तके उदयसे यों तो सभी जीव और भूमियोंकी ग्लानि निवृत्त हो गयी थी; किंतु उसने प्रधानतया वृन्दारण्यको तो किंशुककुसुमादिकी अरुणिमासे और भी अनुरंजित कर दिया था। इस प्रकार जब समस्त जड़वर्ग भगवान्‌की लीलामें उपयुक्त होनेके लिये उद्यत हुआ तो विराट् भगवान्‌का मनरूप चन्द्रमा भी उस रमणलीलामें उद्दीपनरूपसे सहायक होकर उदित हुआ; क्योंकि विराट् तो भगवान्‌का परम भक्त है। उस चन्द्रमामें जो उदयकालीन लालिमा है, वह उसका भगवद्विषयक अनुराग है तथा उसमें जो श्यामता है, वह मानो ध्यानाभिव्यक्त भगवत्स्वरूप है। उस चन्द्रमाकी जो अरुण कान्ति है, वह मानो भगवल्लीलाकी सम्भावनासे प्रादुर्भूत हुए मानसिक उल्लासके कारण जो उसकी मन्द मुसकान है, उसीके कारण विकसित हुई दन्तावलीकी अधर-कान्तिमिश्रित आभा है तथा उस चन्द्रमाका जो निखिलव्योमव्यापी अमृतमय शीतल प्रकाश है, वह भगवद्दर्शनके अनन्तर विराट् भगवान्‌का उदार हास है। विराट्के ईषत्-हासमें उसकी देदीप्यमान दन्तपंक्तिकी आभा ओष्ठोंकी अरुणिमासे अरुण होकर प्रकट होती है; किंतु उसके उदार हासमें ओष्ठोंके दूर हो जानेसे उन ओष्ठोंकी अरुणिमाका सम्बन्ध बहुत कम रह जाता है, इसलिये उस समय उस दन्तपंक्तिकी दीप्ति बहुत स्फुट होती है। नक्षत्रमण्डल ही विराट् भगवान्‌की दन्तावली है। उस उल्लासके कारण जो

श्रीरासलीलारहस्य २६३ हर्षोत्कर्षसे उद्गत रोमावली है, वे ही ये वृक्ष हैं। इस प्रकार भगवल्लीला-दर्शनके लिये उल्लसित होकर विराट् भगवान्‌का मनरूप चन्द्रमा प्रकट हुआ। उस चन्द्रमाका विशेषण है— ‘ककुभः—के स्वर्गे मण्डलरूपेण कौ पृथिव्यां प्रकाशरूपेण च भातीति ककुभः।’ अर्थात् जो मण्डलरूपसे आकाशमें और प्रकाशरूपसे पृथिवीमें प्रकाशित होता है, वह चन्द्रमा ककुभ है। वह क्या करता हुआ उदित हुआ ? ‘शान्तैः करैश्चर्षणीनां श्रीकृष्णरसास्वादनाय वृन्दारण्यं प्रति अभिसरणशीलानां व्रजाङ्गनाजनानां शुचः तम आदिरूपान् प्रतिबन्धान् मृजन् उद्दीपन- विधया वा लोककुलमर्यादारूपान् प्रतिबन्धान् मृजन् उद्गात्।’ अर्थात् वह अपनी सुखस्वरूप एवं सुखप्रद किरणोंसे, श्रीकृष्णरसास्वादनके लिये वृन्दारण्यकी ओर जानेवाली व्रजांगनाओंके शोक अर्थात् अन्धकारादि- रूप प्रतिबन्धोंका अथवा उद्दीपनरूपसे उनके लोक एवं कुलमर्यादारूप प्रतिबन्धोंका निराकरण करता हुआ उदित हुआ। इसके सिवा अपनी नित्यप्रिया श्रीवृषभानुदुलारीके समान अन्य गोपांगनाओंके भी विरहतापसन्तप्त पीले मुखोंको प्रियतमके संगमकी सम्भावनासे होनेवाले अनुरागरूप उदयकालीन अरुणिमासे अनुरंजित करता हुआ उदित हुआ। भगवान्‌की परमाह्लादिनी शक्तिरूपा श्रीराधिकाजी तो नित्य ही भगवत्-संश्लिष्टा हैं, अतः उन्हें यह वियोगजनित ताप नहीं है और इसीसे उनके मुखमें पीतता भी नहीं है, प्रत्युत नित्य ही दीप्तियुक्त अरुणिमा है। किंतु अन्य व्रजांगनाओंको यह सौभाग्य उपासनाके पश्चात् प्राप्त होता है। अतः उपासनाकी परिपक्वतासे पूर्व, जब कि पूर्वरागका भी प्रादुर्भाव नहीं होता, वे भगवद्विरहसे व्यथित रहती हैं और उनका समस्त अंग पीला पड़ जाता है। इस समय इस चन्द्रमाने उदित होकर प्रियतमके समागमका सन्देश सुनाकर उस पीतिमाको अरुणिमामें परिणत कर दिया। परम प्रेमास्पद परमानन्दकन्द श्रीकृष्णचन्द्रसे तादात्म्य-प्राप्तिके लिये भला कौन उत्सुक न होगा ? परंतु अधिकांश उपासक तो उपासनाका परिपाक होनेके अनन्तर ही उन्हें प्राप्त कर पाते हैं। किंतु श्रीराधिकाजीका भगवान्‌के साथ शाश्वत सम्प्रयोग है। जिस प्रकार सुधासमुद्रमें मधुरिमा नित्य-निरन्तर और सर्वत्र है, उसी प्रकार भगवान् श्रीकृष्णमें उनकी आह्लादिनी शक्ति श्रीवृषभानुनन्दिनी हैं। अतः श्रीकृष्ण और राधिकाजीका नित्य संयोग है। उनके सिवा और किसीको यह सौभाग्य प्राप्त नहीं है। यद्यपि तत्त्वतः तो भगवान् सद्घन, चिद्घन और आनन्दघन ही हैं। अतः उनमें अन्य वस्तुके संयोगका अवकाश तभी हो सकता है, जब वह भगवद्रूप हो। विजातीय वस्तुका उसके साथ कभी योग नहीं हो सकता और वस्तुतः विजातीय कोई वस्तु है भी नहीं। विचारवानोंने तो जीवको भगवत्स्वरूप ही कहा है। श्रीगोसाईंजी महाराज कहते हैं— ईस्वर अंस जीव अबिनासी। चेतन अमल सहज सुखरासी॥ (रा०च०मा० ७।११७।२) जीवमें जो सुखित्व-दुःखित्वादि प्रतीत होते हैं, वे यदि स्वाभाविक होते तो उसमें भगवत्सम्प्रयोगकी योग्यता ही नहीं हो सकती थी। अतः उसके ये धर्म आरोपित हैं। आरोपकी निवृत्ति होते ही जीवका भी भगवान्‌से तादात्म्य हो जाता है। इसी प्रकार श्रीवृषभानुसुता तो भगवान्‌से नित्यसंश्लिष्टा हैं; किंतु इतर व्रजबालाओंका उनसे कल्पित भेद है। उस भेदकी निवृत्ति होते ही उनका भी भगवान्‌से अभेद हो जायगा। मायामोहित जीव प्रायः भगवान्‌की ओर प्रवृत्त नहीं होता; इसीसे वह बाह्य प्रपंचमें आसक्त रहता है। जिस समय किसी महान् पूर्वपुण्यके प्रभावसे उसकी प्रवृत्ति भगवान्‌की ओर होती है, उस समय वह बाह्य

प्रपंचसे विरत हो जाता है और धीरे-धीरे उसे भगवत्तत्त्व ही परप्रेमास्पद प्रतीत होने लगता है। फिर उसे भगवान्का एक क्षणका वियोग भी असह्य हो जाता है। इस प्रकारके विरहानलसे सन्तप्त होकर उसका अन्तःकरण सर्वथा शुद्ध हो जाता है और जिन दोषोंके कारण वह अपने प्रियतमकी उपेक्षाका भाजन बना हुआ था, वे सर्वथा निवृत्त हो जाते हैं। इस विरहावस्थामें उसका मुख पीला पड़ जाता है। भक्तशिरोमणि श्रीभरतजीकी इसी अवस्थाका वर्णन करते हुए श्रीगोसाईंजी महाराज कहते हैं— बैठे देखि कुसासन जटा मुकुट कृस गात। राम राम रघुपति जपत स्रवत नयन जलजात॥ (रा०च०मा० ७।१ (ख)) इस प्रकार प्रियतमके विप्रयोगमें प्रियतमके प्रेमास्पदत्वकी अनुभूति हो जाती है। जबतक प्रेमास्पद प्रेमास्परूपसे अनुभूत नहीं होता, तभीतक प्रमाद रहता है। उसमें प्रेमास्पदत्वकी अनुभूति होनेपर तो उसके बिना एक पलके लिये भी चैन नहीं पड़ता। फिर तो उसकी वियोगाग्निमें झुलसकर शरीर दुर्बल हो जाता है तथा मुख पीला पड़ जाता है। इसी प्रकार गोपांगनाओंके मुख भी भगवद्विप्रयोगमें पीले पड़ गये थे। अतः आज जो चन्द्रमा उदित हुए हैं, वे एक विलक्षण चन्द्र हैं। आज इनके उदयसे उद्दीपनविधया जो भगवान्के संगमकी सम्भावनासे एक उत्साहविशेष होगा, उससे उनकी वह पीतिमा अरुणिमामें परिणत हो जायगी। जब कुछ प्रतीक्षाके बाद विलम्बसे प्रेमीका दर्शन होता है, तब कुछ विलक्षण ही रस आता है। अतएव उडुराजको दीर्घदर्शन कहा है, दीर्घकालमें दर्शन हुआ है जिसका, उसे वह दीर्घदर्शन है। इधर श्रीकृष्णका भी बहुत प्रतीक्षाके बाद विलम्बमें ही दर्शन होता है, अतः वे भी दीर्घदर्शन ही हैं अथवा अनुरागजन्य विह्वलतासे दीर्घकालतक प्रियामुखका दर्शन करनेवाले श्रीकृष्ण दीर्घदर्शन हैं अथवा दीर्घ अर्थात् नित्य है दर्शनस्वरूपभूता दृष्टि जिसकी वे श्रीकृष्ण दीर्घदर्शन हैं। यहाँ समझ लेना चाहिये कि दृष्टि दो प्रकारकी है—एक अन्तःकरणवृत्तिरूपा अनित्य दृष्टि श्रुति आदि और दूसरी आत्मस्वरूपभूता नित्य दृष्टि। उसी नित्य दृष्टिको ही स्वप्नकी दृष्टि, श्रुति, मति, विज्ञाति कहा जाता है— 'सा द्रष्टुर्दृष्टेर्या स्वप्ने पश्यति।' यहाँ यह सन्देह होता है कि यदि स्वप्नकी दृष्टि, श्रुति, मति एवं विज्ञाति आदि तो आत्मस्वरूपा होनेके कारण नित्य हैं; नित्य होनेसे उनका नाश नहीं हो सकता और नाश न होनेसे संस्कार नहीं बन सकता; क्योंकि संस्कार ज्ञानादिका नाश होनेपर ही उत्पन्न होता है, जिस प्रकार घटज्ञानका नाश होनेपर ही घटसंस्कारकी उत्पत्ति होती है। इसीसे ज्ञानकालमें स्मृति नहीं हुआ करती। अतः यदि स्वप्नकी दृष्टि, श्रुति आदि नित्य हैं तो उनकी स्मृति नहीं होनी चाहिये। परंतु स्मृति होती ही है। इसका क्या समाधान होगा? इसका उत्तर यह है कि स्वप्नके समय दृष्टि, श्रुति आदि तो आत्मस्वरूप ही हैं तथापि उनके विषयोंका नाश तो होता ही है। उनके नाशसे ही संस्कार बनता है। इसीसे उनके ज्ञानका भी नाश कहा जा सकता है। यहाँ विलक्षणता यही है कि नित्य होनेपर भी उसका नाश कहा जा सकता है। इसमें कारण यही है कि विशेष्यके नित्य बने रहनेपर भी विशेषणके नाशवान् होनेके कारण विशिष्टके नाशका व्यवहार होता है; जैसे आकाशके बने रहनेपर भी घटरूप विशेषणका नाश होनेपर घटाकाशका नाश कहा जाता है। विशिष्ट पदार्थका अभाव तीन प्रकार माना जाता है—विशेषणाभावप्रयुक्त विशिष्टाभाव, विशेष्याभावप्रयुक्त विशिष्टाभाव तथा उभयाभावप्रयुक्त विशिष्टाभाव; जैसे कोई दण्डधारी पुरुष है, उसके दण्डित्वका अभाव तीन प्रकारसे हो सकता है—(१) दण्डरूप विशेषणका अभाव होनेपर, (२) पुरुषरूप

श्रीरासलीलारहस्य २६५

विशेष्यका अभाव होनेपर अथवा (३) दण्ड और पुरुष दोनोंहीका अभाव होनेपर। इसी प्रकार यहाँ विशेष्यस्थानीय आत्मचैतन्य तो बना हुआ है, केवल शब्दादि विशेषणोंके नाशसे ही दृष्टि, श्रुति, मति आदि विशिष्ट ज्ञानोंका नाश कहा जाता है; क्योंकि केवल आत्मचैतन्य ही दृष्टि, श्रुति आदि नहीं है; अपितु अनिर्वचनीय-रूपादिसे सम्बन्धित चैतन्य ही दृष्टि-श्रुति आदि है। अतः केवल चैतन्यके बने रहनेपर भी रूपादिविशेषके नाशमात्रसे रूपादिविशिष्ट चैतन्यका नाश कहा जा सकता है। इस प्रकार दृष्टि, श्रुति आदिका नाश हो जानेसे उनके संस्कार और स्मृति दोनों ही बन सकते हैं। इसीसे कई आचार्योंने सुखकी स्मृति भी सुखका नाश होनेपर ही मानी है; क्योंकि घटादि-वृत्तियोंके समान वे सुखकी वृत्तिको सुखसे पृथक् नहीं मानते। वे कहते हैं कि वृत्ति तो आवरणकी निवृत्तिके लिये है। जो वस्तु अज्ञातसत्ताक होती है, उसीका आवरण हटानेके लिये वृत्ति होती है। सुख-दुःखादि तो अज्ञातसत्ताक हुआ ही नहीं करते। यदि कहो कि वृत्ति चैतन्यसे सम्बन्ध करानेके लिये है; क्योंकि भिन्न-भिन्न आचार्योंके मतानुसार वृत्ति दो प्रकारकी है—आवरणाभिभवात्मिका और चैतन्य-सम्बन्धार्था। सिद्धान्त यह है कि घटादिका प्रकाश घटाद्यवच्छिन्न चैतन्यसे ही होता है; किंतु जबतक वह आवृत रहता है, तबतक उसका प्रकाश नहीं होता; क्योंकि ज्ञान अनावृत चैतन्यसे ही होता है। अतः वृत्तिका काम यही है कि आवरणकी निवृत्तिकर अनावृत चैतन्यसे सम्बन्धित घटादिका ज्ञान कराये। दूसरे आचार्य वृत्तिको चैतन्य-सम्बन्धार्था मानते हैं। वे कहते हैं कि सबका परमकारण होनेसे ब्रह्मका घटादिसे सम्बन्ध तो है ही, अतः घटादिका ज्ञान होना ही चाहिये; परंतु ऐसा होता नहीं। अतः एक विलक्षण सम्बन्ध माननेकी आवश्यकता है। उसे अभिव्यंग्य-अभिव्यंजक सम्बन्ध कहते हैं। चैतन्यका वस्तुपर अभिव्यंजक कैसे होता है ? जैसे दर्पणादिमें सूर्यादिका प्रतिबिम्ब पड़ता है, उसी प्रकार जिस पदार्थमें चैतन्यका प्रतिबिम्ब पड़ता है—उसीका प्रकाश हुआ करता है। लोकमें यह देखा जाता है कि दर्पणादि स्वच्छ वस्तुएँ ही प्रतिबिम्बको ग्रहण करनेवाली हुआ करती हैं, घटादि अस्वच्छ वस्तुओंमें उसका प्रतिबिम्ब नहीं पड़ता, उसी प्रकार चेतनका प्रतिबिम्ब भी अन्तःकरणमें ही पड़ता है, कुड्यादि अस्वच्छ वस्तुओंमें नहीं पड़ता। किंतु जिस प्रकार स्वच्छ जलादिका योग होनेपर अस्वच्छ कुड्यादिमें प्रतिबिम्ब-ग्रहणकी योग्यता आ जाती है, उसी प्रकार स्वच्छ अन्तःकरणका योग होनेपर घटादि भी चेतनका प्रतिबिम्ब ग्रहण करनेमें समर्थ हो जाते हैं। अन्तःकरणकी घटाद्याकाराकारिता वृत्ति चैतन्यके साथ घटादिका सम्बन्ध करानेके लिये ही होती है। जिस समय अन्तःकरणकी वृत्ति घटाद्याकारा होती है, उस समय अन्तःकरणवृत्तिसंश्लिष्ट घट चैतन्यका प्रतिबिम्ब ग्रहण कर लेता है; इसीसे घटकी स्फूर्ति होती है। इसी प्रकार कोई-कोई आचार्य अन्तःकरणकी वृत्तिका प्रधान प्रयोजन जीव-चैतन्यके साथ विषयावच्छिन्न चैतन्यका ऐक्य कराना मानते हैं। उनका मत ऐसा है कि जो वस्तु जिस चैतन्यमें अध्यस्त होती है, वही उसका प्रकाशक होता है; अतः घटाद्यवच्छिन्न चैतन्यको अपनेमें अध्यस्त घटादिका ज्ञान हो सकता है। तथापि प्रमाता जो जीव है, उसे उसका ज्ञान किस प्रकार हो ? अतः इन्द्रियमार्गसे विषयतक गयी हुई अन्तःकरणकी वृत्ति उस विषयावच्छिन्न चेतनके साथ जीवचेतनका अभेद कर देती है। उस समय वह विषयावच्छिन्न चेतनमें अध्यस्त विषय अन्तःकरणावच्छिन्न चेतन यानी जीवचेतनमें अध्यस्त कहा जा सकता है। अतः इस प्रकार अन्तःकरणावच्छिन्न चेतनके साथ विषयका आध्यासिक सम्बन्ध होनेसे उसके द्वारा उस विषयका स्फुरण हो जाता है।

२६६ भक्तिसुधा इससे यही सिद्ध हुआ कि वृत्तियोंकी आवश्यकता चाहे आवरणाभिभवके लिये मानें चाहे जीवके साथ विषयका सम्बन्ध करानेके लिये मानें और चाहे अन्तःकरणावच्छिन्न चेतन और विषयावच्छिन्न चेतनके अभेदके लिये मानें, सुखके प्रकाशके लिये वृत्तियोंकी आवश्यकता नहीं है; क्योंकि सुख तो अन्तःकरणके समान स्वच्छ ही है। घटादि तो अस्वच्छ थे, इसलिये उन्हें चैतन्य सम्बन्धके लिये वृत्तिकी आवश्यकता थी। किंतु सुख तो स्वतः स्वच्छ है; इसलिये जीवचैतन्यके साथ उसके सम्बन्धके लिये वृत्तिकी आवश्यकता नहीं है। यहाँ अन्तःकरणावच्छिन्न चेतनके साथ सुखावच्छिन्न चेतनके अभेद-सम्पादनके लिये भी वृत्तिकी आवश्यकता नहीं है; क्योंकि सुखका आश्रय तो अन्तःकरण ही है, अतः वहाँ आवरणभंगके लिये वृत्तिकी अपेक्षा नहीं है; क्योंकि आवरण वहाँ होता है, जहाँ पदार्थकी सत्ता ज्ञात नहीं होती। सुख अज्ञातसत्ताक है ही नहीं। इसलिये आवरण न होनेके कारण आवरणाभिभवात्मिका वृत्तिकी भी आवश्यकता नहीं है। इसीसे सुखको केवल साक्षीभास्य मानते हैं। यदि ऐसा न मानेंगे तो वृत्तिके प्रकाशके लिये भी वृत्ति माननी पड़ेगी। यदि वृत्तिके प्रकाशके लिये वृत्ति नहीं मानते तो सुखके प्रकाशके लिये ही क्यों मानते हो ? यहाँ किन्हीं-किन्हींका ऐसा मत है कि सुखका स्मरण होता है, इसलिये सुखाकाराकारिता वृत्ति माननी चाहिये; क्योंकि उसका नाश होनेपर ही सुखका संस्कार होगा और संस्कारसे ही स्मृति होगी। किंतु विशेष विचार करनेपर इसकी आवश्यकता प्रतीत न होगी। सुखज्ञान क्या है ? साक्षीका जो सुखके साथ सम्बन्ध है, वही सुखज्ञान है। सुखका नाश होनेसे साक्षीगत सुखसंश्लिष्टत्वका नाश हो जायगा। इस प्रकार सुखके नाशसे ही उसका संस्कार बन जायगा और उसीसे स्मृति भी बन जायगी। अतः सुखज्ञानके लिये वृत्तिकी आवश्यकता नहीं है। नैयायिकोंके मतमें सुख और सुखज्ञानका कारण आत्ममनःसंयोग है, किंतु सुखकी उत्पत्ति भी आत्ममनःसंयोगसे ही होती है। अतः एक आत्ममनः- संयोग तो सुखकी उत्पत्तिके लिये मानना होगा और दूसरा सुखज्ञानके लिये। ये दोनों एक समय हो नहीं सकते। इसलिये जिस समय सुखज्ञानका हेतुभूत आत्ममनःसंयोग होगा, उस समय सुखका हेतुभूत आत्ममनःसंयोग नष्ट हो जायगा और उसका नाश हो जानेसे सुख भी नहीं रहेगा; क्योंकि असमवायि कारणका नाश होनेपर कार्यका भी नाश हो जाता है, जैसे तन्तुसंयोगका नाश होनेपर पटका भी नाश हो जाता है। इस प्रकार सुखके रहते हुए तो सुखज्ञान न हो सकेगा और सुखज्ञानके समय सुख न रहेगा। यद्यपि यहाँ नैयायिकोंका कथन है कि असमवायि कारणका नाश होनेपर उसके कार्यभूत द्रव्यका ही नाश होता है, गुणका नाश नहीं होता और सुख गुण है; इसलिये इसका भी नाश नहीं हो सकता तथापि इस संकोचमें कोई कारण नहीं दीख पड़ता। यहाँ हमें इतना ही विचार करना है कि जिस प्रकार जाग्रत्में सुखज्ञान आत्मस्वरूप है, उसी प्रकार स्वप्नमें शब्दादिज्ञानरूप जो दृष्टि, श्रुति एवं मति आदि हैं, वे भी आत्मस्वरूप दर्शन ही हैं। अतः यह दर्शन ही आत्मदर्शन है। अतः 'दीर्घं पौरुषेयं चैतन्यात्मकं अबाध्यं दर्शनं यस्य असौ दीर्घदर्शनः' अर्थात् जिसका दीर्घ यानी पौरुषेय चैतन्यात्मक अबाध्य दर्शन है, उसे दीर्घदर्शन कहते हैं। ऐसे भगवान् श्रीकृष्ण दीर्घदर्शन हैं। उनका चैतन्यात्मक दर्शन अलुप्त है। अतः जिन- जिन गोपांगनाओंके अन्तःकरणमें जितने प्रीति आदि भाव थे, उन सभीके अलुप्तदृक् साक्षी श्रीभगवान् उनकी अभिरुचिकी पूर्तिके लिये विहार-स्थलमें प्रकट हुए। अथवा 'दीर्घं सर्वविषयं दर्शनं यस्य असौ