भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीरासलीलारहस्य २५७ हैं—‘अद्वेष्टृत्वादिवत्तेषां स्वभावो भजनं हरेः।' अर्थात् जिस प्रकार उनमें स्वभावसे ही अद्वेष्टृत्वादि गुण रहते हैं, उसी प्रकार भगवान्का भजन करना भी उनका स्वभाव ही है। यहाँ एक शंका यह भी होती है कि भक्ति तो भेदमें होती है और तत्त्वज्ञोंकी अभेददृष्टि रहा करती है, फिर वे भक्तिभावमें कैसे प्रवृत्त हो सकते हैं? इसपर वे कहते हैं—‘विभेदभावमाहृत्य' अर्थात् वे भेदभावका अध्याहार करके भगवान्का भजन करते हैं। इस प्रकारका काल्पनिक भेद सब प्रकार मंगलमय ही है। इसीसे कहा है— द्वैतं मोहाय बोधात्प्राक् प्राप्ते बोधे मनीषिणा। भक्त्यर्थं कल्पितं द्वैतमद्वैतादपि सुन्दरम् ॥ अद्वैतं परमार्थो हि द्वैतं भजनहेतवे। तादृशी यदि भक्तिश्चेत्सा तु मुक्तिशताधिका ॥ अर्थात् द्वैत तभीतक मोहजनक होता है, जबतक ज्ञान नहीं होता; जिस समय विचारद्वारा बोधकी प्राप्ति हो जाती है, उस समय तो भक्तिके लिये कल्पना किया हुआ द्वैत अद्वैतकी भी अपेक्षा सुन्दर है। यदि पारमार्थिक अद्वैतबुद्धि रहते हुए भजनके लिये द्वैतबुद्धि रखी जाय तो ऐसी भक्ति तो सैकड़ों मुक्तियोंसे भी बढ़कर है। भाष्यकार भगवान् श्रीशंकराचार्यजीकी भक्ति भी ऐसी ही थी; इसीसे वे कहते हैं— सत्यपि भेदापगमे नाथ तवाहं न मामकीनस्त्वम्। सामुद्रो हि तरङ्गः क्वचन समुद्रो न तारङ्गः॥ अर्थात् हे नाथ! यद्यपि आपका और मेरा भेद नहीं है तथापि मैं आपका ही हूँ, आप मेरे नहीं हैं; क्योंकि तरंग ही समुद्रका होता है, समुद्र तरंगका कभी नहीं होता। इसी विषयमें किसी भावुकका कथन है— प्रियतमहृदये वा खेलतु प्रेमरीत्या पदयुगपरिचर्यां प्रेयसी वा विधत्ताम्। विहरतु विदितार्थो निर्विकल्पे समाधौ ननु भजनविधौ वा तुल्यमेतद्द्वयं स्यात्॥ अर्थात् प्रियतमा चाहे तो प्रणयविधिसे प्रियतमके वक्षःस्थलपर विहार करे और चाहे उसके चरणयुगलकी परिचर्यामें लगी रहे—बात एक ही है। इसी प्रकार जिसे परमार्थबोध प्राप्त हो गया है, वह चाहे तो निर्विकल्प समाधिमें स्थित रहे और चाहे भगवान्के भजन-पूजनमें लगा रहे—कोई भेद नहीं है। जो लोग विचारशून्य हैं, उन्हींकी दृष्टिमें भगवान्का आत्मत्वेन साक्षात्कार उनका अपमान है। यदि विचार करके देखा जाय तो इस प्रकारका अभेद तो प्रेमातिशयकी रीति ही है। प्रेमका अतिरेक होनेपर तो भेदभावकी तिलांजलि हो ही जाती है। जो अरसिक हैं, उत्कृष्ट प्रेमातिशयके रहस्यको जाननेवाले नहीं हैं, उनकी दृष्टिमें प्रियतमाका प्रियतमके वक्षःस्थलमें विहार करना अयुक्त हो सकता है; किंतु रसिकजन तो जानते हैं कि प्रेमातिरेकमें ऐसा ही हुआ करता है। अतः अभेदरूपसे स्वरूप-साक्षात्कार हो जानेपर भी काल्पनिक भेद स्वीकार करके निष्कपट भावसे भक्ति हो ही सकती है। तत्त्वज्ञोंके यहाँ ऐसी ही भक्ति स्वीकार है। इस प्रकार यह भजनानन्दचन्द्र विषयी, मुमुक्षु और मुक्त सभीके लिये प्रिय है। इसके सिवा और भी वह भजनानन्दचन्द्र कैसा है?–'दीर्घदर्शनः–दीर्घं अनपबाध्यं दर्शनं यस्य' अर्थात् जिसका दर्शन-ज्ञान किसीसे बाधित नहीं होता। जो ज्ञान भ्रमात्मक होता है, वह तो ज्ञानान्तरसे बाधित हो जाता है; किंतु यह भजनानन्दचन्द्र ज्ञानान्तरसे बाधित होनेवाला नहीं है, यह ज्ञानान्तराबाध्य भजनानन्दचन्द्र चर्षणियोंके शोकका मार्जन करता तथा प्राग्भवा तमोव्याप्ता बुद्धिके सत्त्वात्मक प्रधान भागको अनुरागात्मक कुंकुमसे लेपन करता हुआ उदित हुआ, जिस प्रकार कोई चिरप्रोषित प्रियतम प्रवाससे लौटकर अपनी प्रियतमाके शोकाश्रुओंका मार्जन करते हुए करधृत कुंकुमसे उसके मुखका लेपन करता है। अथवा यों समझिये कि जिस समय भगवान्ने रमण करनेकी इच्छा की, उसी समय प्राची— नित्यप्रिया श्रीवृषभानुनन्दिनीका मुख विलेपन करते