भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५६ भक्तिसुधा न हो, परंतु नामस्मरणसे चाण्डाल भी परम पवित्र अवश्य हो सकता है। इसका यह अभिप्राय नहीं है कि उसकी अस्पृश्यता निवृत्त हो जाती है। अपवित्रता दो प्रकारकी है; जातिनिमित्तक और कर्मनिमित्तक। कर्मनिमित्तक पातित्य पुण्य-कर्मसे निवृत्त हो सकता है; किंतु जातिनिमित्तक पातित्य कर्मसे निवृत्त नहीं हो सकता। चाण्डालका पातित्य जातिनिमित्तक है। अतः चाण्डाल शरीर रहते हुए उसकी अव्यवहार्यताका प्रयोजक पातित्य निवृत्त नहीं हो सकता। किंतु भगवत्स्मरणसे वह कर्मजनित पातित्यसे मुक्त होकर शुद्धान्तःकरण हो जाता है और उसके द्वारा वह भगवत्प्राप्ति भी कर सकता है; उसका कुल पवित्र हो जाता है और उसे परलोकमें वह गति प्राप्त होती है, जो भक्तिहीन ब्राह्मणके लिये भी दुर्लभ है। इसीसे भगवान्ने भी कहा है— मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः। स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्॥ (गीता ९।३२) अतः सिद्ध हुआ कि वह भजनानन्दचन्द्र कुत्सितोंको भी सुख प्रदान करता है, इसलिये ककुभ है। 'प्रियः' भी उस भजनानन्दचन्द्रका ही विशेषण है। वह भजनानन्दचन्द्र मानो विषयी, मुमुक्षु और मुक्त सभी प्राणियोंके परम प्रेमका आस्पद है। वह लोकमनोऽभिराम होनेके कारण विषयी पुरुषोंको और भवौषध होनेके कारण मुमुक्षुओंको प्रिय है तथा जीवन्मुक्तोंको भी वह अत्यन्त प्रिय है; क्योंकि इसीके कारण उन्हें भगवत्सान्निध्यरूप परमोत्कृष्ट वैभव प्राप्त हुआ है। इसीसे श्रीगोसाईंजी महाराज कहते हैं— अस बिचारि हरि भगत सयाने। मुक्ति निरादर भगति लुभाने॥ (रा०च०मा० ७।११९।७) अतः बहुतसे अद्वैतनिष्ठ तत्त्वज्ञजन भी कल्पित भेदको स्वीकारकर निश्छलभावसे अति तत्परतापूर्वक भगवान्की भक्ति किया करते हैं, जैसा कि कहा है— यत्सुभक्तैरतिशयप्रीत्या कैतववर्जनात्॥ स्वभावस्य स्वरसतो ज्ञात्वापि स्वाद्वयं पदम्। विभेदभावमाहृत्य सेव्यतेऽत्यन्ततत्परैः॥ अर्थात् पूर्ण अद्वैतपद सुभक्तोंद्वारा फलाभिसन्धिरूप कैतव (कपट)-से रहित होकर उपासित होता है; क्योंकि जो लोग लौकिक या पारलौकिक अभिलाषाओंसे पूर्ण होंगे, उनकी उपासना कैतवशून्य नहीं हो सकती। हाँ, जो मुक्त हो गया है उसे अवश्य किसी वस्तुकी आकांक्षा नहीं रहती; अतः वही निष्कपट उपासना भी कर सकता है। इससे निश्चय हुआ कि सुभक्त जो ज्ञानी लोग हैं, उनके द्वारा वह अद्वयतत्त्व अत्यन्त प्रीतिपूर्वक उपासित होता है। जिन लोगोंने समस्त प्रपंचका मिथ्यात्व निश्चय कर लिया है, वे ही किसी पदार्थमें आसक्ति और प्राप्तव्य-बुद्धि न होनेके कारण अद्वयभावसे उसकी अकैटव उपासना कर सकते हैं, परंतु यहाँ शंका होती है कि यदि उन जीवन्मुक्तोंको कोई प्रयोजन ही नहीं होता तो वे भजनमें प्रवृत्त ही क्यों होंगे? इस सम्बन्धमें हमारा कथन है कि जीवन्मुक्त महात्माओंपर शास्त्रका शासन नहीं होता; क्योंकि वे कृतकृत्य हो जाते हैं, जैसा कि कहा है— गुणातीतः स्थितप्रज्ञो विष्णुभक्तश्च कथ्यते। एतस्य कृतकृत्यत्वाच्छास्त्रमस्मान्निवर्तते॥ अर्थात् प्रथम कोटिमें साधक यथाविधि वैदिक और स्मार्त कर्मोंका अनुष्ठान करके उपासनाद्वारा चित्तके दोषोंको निवृत्त करता है; फिर श्रवण, मनन और निदिध्यासनद्वारा भगवान्का साक्षात्कार करनेपर वह गुणातीत, जीवन्मुक्त या स्थितप्रज्ञ कहा जाता है। इसी क्रमसे कर्म और उपासनामें पूर्वमीमांसा, श्रवणमें उत्तरमीमांसा, मननमें न्याय और वैशेषिक तथा निदिध्यासनमें सांख्य और योगदर्शनका कार्य समाप्त हो जाता है। इस प्रकार कृतकृत्य हो जानेके कारण फिर अपना कोई प्रयोजन न रहनेके कारण शास्त्र यद्यपि उस महापुरुषसे निवृत्त हो जाता है तथापि अपने पूर्वाभ्यासके कारण उससे कर्म और उपासना स्वभावतः होते रहते हैं। श्रीमद्मधुसूदन स्वामी कहते