भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीरासलीलारहस्य २५५ द्रवीभूत करके उसमें भगवत्स्वरूपरूपी रंग भर देता है। इससे वह बुद्धिसत्त्व भगवन्मय हो जाता है और फिर किसी समय उसे भगवान्की विस्मृति नहीं होती। तथा वह भजनानन्दचन्द्र है कैसा?—‘ककुभः —कं सुखं तद्रूपतया कुषु कुत्सितेष्वपि भाति शोभत इति ककुभः।’ ‘क’ सुखको कहते हैं। वह सुखरूपसे कुत्सितोंमें भी भासमान है, इसलिये ‘ककुभ’ है। उस भजनानन्द- चन्द्रका आलोक पड़नेपर तो चाण्डाल भी कृतकृत्य हो सकता है, यथा— अहो बत श्वपचोऽतो गरीयान् यज्जिह्वाग्रे वर्तते नाम तुभ्यम्। तेपुस्तपस्ते जुहुवुः सस्नुरार्या ब्रह्मानूचुर्नाम गृणन्ति ये ते॥ (श्रीमद्भा० ३।३३।७) अर्थात् हे प्रभो! जिसकी जिह्वापर आपका नाम विराजमान है, वह श्वपच भी इन (भक्तिहीन द्विजों)- की अपेक्षा श्रेष्ठ है। जो आपका नामोच्चारण करते हैं, उन महानुभावोंने तो सब प्रकारके तप, होम, स्नान और वेदपाठ कर लिये। यही नहीं, आपके नामोंका श्रवण या कीर्तन करनेसे तथा कभी आपको प्रणाम या स्मरण कर लेनेसे चाण्डाल भी शीघ्र ही सवन- कर्मका अधिकारी हो सकता है; फिर हे भगवन्! जिन्हें साक्षात् आपका दर्शन हुआ हो उनके विषयमें तो कहना ही क्या है? यन्नामधेयश्रवणानुकीर्तनाद् यत्प्रह्वणाद्यत्स्मरणादपि क्वचित्। श्वादोऽपि सद्यः सवनाय कल्पते कुतः पुनस्ते भगवन्नु दर्शनात्॥ (श्रीमद्भा० ३।३३।६) सवनकर्मका अधिकार केवल द्विजोंको ही है। अतः इस श्लोकमें जो ‘सद्यः’ शब्द है, उसका ‘तत्काल’ अर्थ करके कोई-कोई ऐसा कहने लगते हैं कि भगवत्स्मरणके प्रभावसे चाण्डाल भी उसी जन्ममें सवनाधिकारी यानी द्विज हो सकता है। परंतु ऐसी बात नहीं है। ‘सद्यः’ का अर्थ शीघ्र है और शीघ्रता सापेक्ष हुआ करती है। शास्त्रसिद्धान्त तो ऐसा है कि पशु एवं तिर्यक् योनियोंको भोग चुकनेपर जब जीवको मनुष्य-शरीर प्राप्त होता है तो सबसे पहले उसे पुल्कसयोनि मिलती है। उससे उत्तरोत्तर कई जन्मोंमें स्वधर्म-पालन करते-करते वह वैश्य होता है; और तभी उसे द्विजोचित कृत्योंका अधिकार प्राप्त होता है। अतः यहाँ ‘सद्यः’ शब्दसे यही तात्पर्य है कि यदि चाण्डाल स्वधर्मनिष्ठ रहकर भगवच्चिन्तन करेगा तो उसे एक-दो जन्मके पश्चात् ही द्विजत्वकी प्राप्ति हो जायगी; अनेकों जन्मोंमें नहीं भटकना पड़ेगा। यह क्रम स्वधर्मनिष्ठोंके ही लिये है। स्वधर्मका आचरण न करनेपर तो शूद्रको भी पुनः चाण्डाल- योनि प्राप्त होती है। जैसे कहा है— कपिलाक्षीरपानेन ब्राह्मणीगमनेन च। वेदाक्षरविचारेण शूद्रश्चाण्डालतामियात्॥ अर्थात् कपिला गौका दूध पीनेसे, ब्राह्मणीके साथ मैथुन करनेसे और वेदाक्षरका विचार करनेसे शूद्र चाण्डालत्वको प्राप्त हो जाता है और यदि शूद्र स्वधर्ममें ही तत्पर रहे तो उसी जन्ममें देहपातके अनन्तर स्वर्ग भी प्राप्त कर सकता है। ‘स्वधर्मे संस्थितः सम्यक् शूद्रोऽपि स्वर्गमश्नुते।’ अतः स्वधर्मका अतिक्रमण कभी न करना चाहिये। यदि कहो कि तत्क्षण ही क्यों न माना जाय? तो ऐसा हो नहीं सकता; क्योंकि जाति नित्य है, वह नामस्मरणमात्रसे परिवर्तित नहीं हो सकती। यदि नामस्मरणमात्रसे जाति-परिवर्तन हो सकता तो गर्दभीको भी नाम सुनाकर कामधेनु बनाया जा सकता था। परंतु ऐसा नहीं होता। जाति जन्मसे होती है, अतः उसका परिवर्तन जन्मान्तरमें ही हो सकता है। जिस प्रकार गौ एवं गर्दभादि योनियाँ हैं, उसी प्रकार ब्राह्मण और चाण्डालादि भी योनियाँ हैं। श्रुति कहती है— ‘ब्राह्मणयोनिं वा चाण्डालयोनिं वा।’ तात्पर्य यह है कि चाहे जाति-परिवर्तन हो या