भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
श्रीरासलीलारहस्य २५५ द्रवीभूत करके उसमें भगवत्स्वरूपरूपी रंग भर देता है। इससे वह बुद्धिसत्त्व भगवन्मय हो जाता है और फिर किसी समय उसे भगवान्की विस्मृति नहीं होती। तथा वह भजनानन्दचन्द्र है कैसा?—‘ककुभः —कं सुखं तद्रूपतया कुषु कुत्सितेष्वपि भाति शोभत इति ककुभः।’ ‘क’ सुखको कहते हैं। वह सुखरूपसे कुत्सितोंमें भी भासमान है, इसलिये ‘ककुभ’ है। उस भजनानन्द- चन्द्रका आलोक पड़नेपर तो चाण्डाल भी कृतकृत्य हो सकता है, यथा— अहो बत श्वपचोऽतो गरीयान् यज्जिह्वाग्रे वर्तते नाम तुभ्यम्। तेपुस्तपस्ते जुहुवुः सस्नुरार्या ब्रह्मानूचुर्नाम गृणन्ति ये ते॥ (श्रीमद्भा० ३।३३।७) अर्थात् हे प्रभो! जिसकी जिह्वापर आपका नाम विराजमान है, वह श्वपच भी इन (भक्तिहीन द्विजों)- की अपेक्षा श्रेष्ठ है। जो आपका नामोच्चारण करते हैं, उन महानुभावोंने तो सब प्रकारके तप, होम, स्नान और वेदपाठ कर लिये। यही नहीं, आपके नामोंका श्रवण या कीर्तन करनेसे तथा कभी आपको प्रणाम या स्मरण कर लेनेसे चाण्डाल भी शीघ्र ही सवन- कर्मका अधिकारी हो सकता है; फिर हे भगवन्! जिन्हें साक्षात् आपका दर्शन हुआ हो उनके विषयमें तो कहना ही क्या है? यन्नामधेयश्रवणानुकीर्तनाद् यत्प्रह्वणाद्यत्स्मरणादपि क्वचित्। श्वादोऽपि सद्यः सवनाय कल्पते कुतः पुनस्ते भगवन्नु दर्शनात्॥ (श्रीमद्भा० ३।३३।६) सवनकर्मका अधिकार केवल द्विजोंको ही है। अतः इस श्लोकमें जो ‘सद्यः’ शब्द है, उसका ‘तत्काल’ अर्थ करके कोई-कोई ऐसा कहने लगते हैं कि भगवत्स्मरणके प्रभावसे चाण्डाल भी उसी जन्ममें सवनाधिकारी यानी द्विज हो सकता है। परंतु ऐसी बात नहीं है। ‘सद्यः’ का अर्थ शीघ्र है और शीघ्रता सापेक्ष हुआ करती है। शास्त्रसिद्धान्त तो ऐसा है कि पशु एवं तिर्यक् योनियोंको भोग चुकनेपर जब जीवको मनुष्य-शरीर प्राप्त होता है तो सबसे पहले उसे पुल्कसयोनि मिलती है। उससे उत्तरोत्तर कई जन्मोंमें स्वधर्म-पालन करते-करते वह वैश्य होता है; और तभी उसे द्विजोचित कृत्योंका अधिकार प्राप्त होता है। अतः यहाँ ‘सद्यः’ शब्दसे यही तात्पर्य है कि यदि चाण्डाल स्वधर्मनिष्ठ रहकर भगवच्चिन्तन करेगा तो उसे एक-दो जन्मके पश्चात् ही द्विजत्वकी प्राप्ति हो जायगी; अनेकों जन्मोंमें नहीं भटकना पड़ेगा। यह क्रम स्वधर्मनिष्ठोंके ही लिये है। स्वधर्मका आचरण न करनेपर तो शूद्रको भी पुनः चाण्डाल- योनि प्राप्त होती है। जैसे कहा है— कपिलाक्षीरपानेन ब्राह्मणीगमनेन च। वेदाक्षरविचारेण शूद्रश्चाण्डालतामियात्॥ अर्थात् कपिला गौका दूध पीनेसे, ब्राह्मणीके साथ मैथुन करनेसे और वेदाक्षरका विचार करनेसे शूद्र चाण्डालत्वको प्राप्त हो जाता है और यदि शूद्र स्वधर्ममें ही तत्पर रहे तो उसी जन्ममें देहपातके अनन्तर स्वर्ग भी प्राप्त कर सकता है। ‘स्वधर्मे संस्थितः सम्यक् शूद्रोऽपि स्वर्गमश्नुते।’ अतः स्वधर्मका अतिक्रमण कभी न करना चाहिये। यदि कहो कि तत्क्षण ही क्यों न माना जाय? तो ऐसा हो नहीं सकता; क्योंकि जाति नित्य है, वह नामस्मरणमात्रसे परिवर्तित नहीं हो सकती। यदि नामस्मरणमात्रसे जाति-परिवर्तन हो सकता तो गर्दभीको भी नाम सुनाकर कामधेनु बनाया जा सकता था। परंतु ऐसा नहीं होता। जाति जन्मसे होती है, अतः उसका परिवर्तन जन्मान्तरमें ही हो सकता है। जिस प्रकार गौ एवं गर्दभादि योनियाँ हैं, उसी प्रकार ब्राह्मण और चाण्डालादि भी योनियाँ हैं। श्रुति कहती है— ‘ब्राह्मणयोनिं वा चाण्डालयोनिं वा।’ तात्पर्य यह है कि चाहे जाति-परिवर्तन हो या
२५६ भक्तिसुधा न हो, परंतु नामस्मरणसे चाण्डाल भी परम पवित्र अवश्य हो सकता है। इसका यह अभिप्राय नहीं है कि उसकी अस्पृश्यता निवृत्त हो जाती है। अपवित्रता दो प्रकारकी है; जातिनिमित्तक और कर्मनिमित्तक। कर्मनिमित्तक पातित्य पुण्य-कर्मसे निवृत्त हो सकता है; किंतु जातिनिमित्तक पातित्य कर्मसे निवृत्त नहीं हो सकता। चाण्डालका पातित्य जातिनिमित्तक है। अतः चाण्डाल शरीर रहते हुए उसकी अव्यवहार्यताका प्रयोजक पातित्य निवृत्त नहीं हो सकता। किंतु भगवत्स्मरणसे वह कर्मजनित पातित्यसे मुक्त होकर शुद्धान्तःकरण हो जाता है और उसके द्वारा वह भगवत्प्राप्ति भी कर सकता है; उसका कुल पवित्र हो जाता है और उसे परलोकमें वह गति प्राप्त होती है, जो भक्तिहीन ब्राह्मणके लिये भी दुर्लभ है। इसीसे भगवान्ने भी कहा है— मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः। स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्॥ (गीता ९।३२) अतः सिद्ध हुआ कि वह भजनानन्दचन्द्र कुत्सितोंको भी सुख प्रदान करता है, इसलिये ककुभ है। 'प्रियः' भी उस भजनानन्दचन्द्रका ही विशेषण है। वह भजनानन्दचन्द्र मानो विषयी, मुमुक्षु और मुक्त सभी प्राणियोंके परम प्रेमका आस्पद है। वह लोकमनोऽभिराम होनेके कारण विषयी पुरुषोंको और भवौषध होनेके कारण मुमुक्षुओंको प्रिय है तथा जीवन्मुक्तोंको भी वह अत्यन्त प्रिय है; क्योंकि इसीके कारण उन्हें भगवत्सान्निध्यरूप परमोत्कृष्ट वैभव प्राप्त हुआ है। इसीसे श्रीगोसाईंजी महाराज कहते हैं— अस बिचारि हरि भगत सयाने। मुक्ति निरादर भगति लुभाने॥ (रा०च०मा० ७।११९।७) अतः बहुतसे अद्वैतनिष्ठ तत्त्वज्ञजन भी कल्पित भेदको स्वीकारकर निश्छलभावसे अति तत्परतापूर्वक भगवान्की भक्ति किया करते हैं, जैसा कि कहा है— यत्सुभक्तैरतिशयप्रीत्या कैतववर्जनात्॥ स्वभावस्य स्वरसतो ज्ञात्वापि स्वाद्वयं पदम्। विभेदभावमाहृत्य सेव्यतेऽत्यन्ततत्परैः॥ अर्थात् पूर्ण अद्वैतपद सुभक्तोंद्वारा फलाभिसन्धिरूप कैतव (कपट)-से रहित होकर उपासित होता है; क्योंकि जो लोग लौकिक या पारलौकिक अभिलाषाओंसे पूर्ण होंगे, उनकी उपासना कैतवशून्य नहीं हो सकती। हाँ, जो मुक्त हो गया है उसे अवश्य किसी वस्तुकी आकांक्षा नहीं रहती; अतः वही निष्कपट उपासना भी कर सकता है। इससे निश्चय हुआ कि सुभक्त जो ज्ञानी लोग हैं, उनके द्वारा वह अद्वयतत्त्व अत्यन्त प्रीतिपूर्वक उपासित होता है। जिन लोगोंने समस्त प्रपंचका मिथ्यात्व निश्चय कर लिया है, वे ही किसी पदार्थमें आसक्ति और प्राप्तव्य-बुद्धि न होनेके कारण अद्वयभावसे उसकी अकैटव उपासना कर सकते हैं, परंतु यहाँ शंका होती है कि यदि उन जीवन्मुक्तोंको कोई प्रयोजन ही नहीं होता तो वे भजनमें प्रवृत्त ही क्यों होंगे? इस सम्बन्धमें हमारा कथन है कि जीवन्मुक्त महात्माओंपर शास्त्रका शासन नहीं होता; क्योंकि वे कृतकृत्य हो जाते हैं, जैसा कि कहा है— गुणातीतः स्थितप्रज्ञो विष्णुभक्तश्च कथ्यते। एतस्य कृतकृत्यत्वाच्छास्त्रमस्मान्निवर्तते॥ अर्थात् प्रथम कोटिमें साधक यथाविधि वैदिक और स्मार्त कर्मोंका अनुष्ठान करके उपासनाद्वारा चित्तके दोषोंको निवृत्त करता है; फिर श्रवण, मनन और निदिध्यासनद्वारा भगवान्का साक्षात्कार करनेपर वह गुणातीत, जीवन्मुक्त या स्थितप्रज्ञ कहा जाता है। इसी क्रमसे कर्म और उपासनामें पूर्वमीमांसा, श्रवणमें उत्तरमीमांसा, मननमें न्याय और वैशेषिक तथा निदिध्यासनमें सांख्य और योगदर्शनका कार्य समाप्त हो जाता है। इस प्रकार कृतकृत्य हो जानेके कारण फिर अपना कोई प्रयोजन न रहनेके कारण शास्त्र यद्यपि उस महापुरुषसे निवृत्त हो जाता है तथापि अपने पूर्वाभ्यासके कारण उससे कर्म और उपासना स्वभावतः होते रहते हैं। श्रीमद्मधुसूदन स्वामी कहते
श्रीरासलीलारहस्य २५७ हैं—‘अद्वेष्टृत्वादिवत्तेषां स्वभावो भजनं हरेः।' अर्थात् जिस प्रकार उनमें स्वभावसे ही अद्वेष्टृत्वादि गुण रहते हैं, उसी प्रकार भगवान्का भजन करना भी उनका स्वभाव ही है। यहाँ एक शंका यह भी होती है कि भक्ति तो भेदमें होती है और तत्त्वज्ञोंकी अभेददृष्टि रहा करती है, फिर वे भक्तिभावमें कैसे प्रवृत्त हो सकते हैं? इसपर वे कहते हैं—‘विभेदभावमाहृत्य' अर्थात् वे भेदभावका अध्याहार करके भगवान्का भजन करते हैं। इस प्रकारका काल्पनिक भेद सब प्रकार मंगलमय ही है। इसीसे कहा है— द्वैतं मोहाय बोधात्प्राक् प्राप्ते बोधे मनीषिणा। भक्त्यर्थं कल्पितं द्वैतमद्वैतादपि सुन्दरम् ॥ अद्वैतं परमार्थो हि द्वैतं भजनहेतवे। तादृशी यदि भक्तिश्चेत्सा तु मुक्तिशताधिका ॥ अर्थात् द्वैत तभीतक मोहजनक होता है, जबतक ज्ञान नहीं होता; जिस समय विचारद्वारा बोधकी प्राप्ति हो जाती है, उस समय तो भक्तिके लिये कल्पना किया हुआ द्वैत अद्वैतकी भी अपेक्षा सुन्दर है। यदि पारमार्थिक अद्वैतबुद्धि रहते हुए भजनके लिये द्वैतबुद्धि रखी जाय तो ऐसी भक्ति तो सैकड़ों मुक्तियोंसे भी बढ़कर है। भाष्यकार भगवान् श्रीशंकराचार्यजीकी भक्ति भी ऐसी ही थी; इसीसे वे कहते हैं— सत्यपि भेदापगमे नाथ तवाहं न मामकीनस्त्वम्। सामुद्रो हि तरङ्गः क्वचन समुद्रो न तारङ्गः॥ अर्थात् हे नाथ! यद्यपि आपका और मेरा भेद नहीं है तथापि मैं आपका ही हूँ, आप मेरे नहीं हैं; क्योंकि तरंग ही समुद्रका होता है, समुद्र तरंगका कभी नहीं होता। इसी विषयमें किसी भावुकका कथन है— प्रियतमहृदये वा खेलतु प्रेमरीत्या पदयुगपरिचर्यां प्रेयसी वा विधत्ताम्। विहरतु विदितार्थो निर्विकल्पे समाधौ ननु भजनविधौ वा तुल्यमेतद्द्वयं स्यात्॥ अर्थात् प्रियतमा चाहे तो प्रणयविधिसे प्रियतमके वक्षःस्थलपर विहार करे और चाहे उसके चरणयुगलकी परिचर्यामें लगी रहे—बात एक ही है। इसी प्रकार जिसे परमार्थबोध प्राप्त हो गया है, वह चाहे तो निर्विकल्प समाधिमें स्थित रहे और चाहे भगवान्के भजन-पूजनमें लगा रहे—कोई भेद नहीं है। जो लोग विचारशून्य हैं, उन्हींकी दृष्टिमें भगवान्का आत्मत्वेन साक्षात्कार उनका अपमान है। यदि विचार करके देखा जाय तो इस प्रकारका अभेद तो प्रेमातिशयकी रीति ही है। प्रेमका अतिरेक होनेपर तो भेदभावकी तिलांजलि हो ही जाती है। जो अरसिक हैं, उत्कृष्ट प्रेमातिशयके रहस्यको जाननेवाले नहीं हैं, उनकी दृष्टिमें प्रियतमाका प्रियतमके वक्षःस्थलमें विहार करना अयुक्त हो सकता है; किंतु रसिकजन तो जानते हैं कि प्रेमातिरेकमें ऐसा ही हुआ करता है। अतः अभेदरूपसे स्वरूप-साक्षात्कार हो जानेपर भी काल्पनिक भेद स्वीकार करके निष्कपट भावसे भक्ति हो ही सकती है। तत्त्वज्ञोंके यहाँ ऐसी ही भक्ति स्वीकार है। इस प्रकार यह भजनानन्दचन्द्र विषयी, मुमुक्षु और मुक्त सभीके लिये प्रिय है। इसके सिवा और भी वह भजनानन्दचन्द्र कैसा है?–'दीर्घदर्शनः–दीर्घं अनपबाध्यं दर्शनं यस्य' अर्थात् जिसका दर्शन-ज्ञान किसीसे बाधित नहीं होता। जो ज्ञान भ्रमात्मक होता है, वह तो ज्ञानान्तरसे बाधित हो जाता है; किंतु यह भजनानन्दचन्द्र ज्ञानान्तरसे बाधित होनेवाला नहीं है, यह ज्ञानान्तराबाध्य भजनानन्दचन्द्र चर्षणियोंके शोकका मार्जन करता तथा प्राग्भवा तमोव्याप्ता बुद्धिके सत्त्वात्मक प्रधान भागको अनुरागात्मक कुंकुमसे लेपन करता हुआ उदित हुआ, जिस प्रकार कोई चिरप्रोषित प्रियतम प्रवाससे लौटकर अपनी प्रियतमाके शोकाश्रुओंका मार्जन करते हुए करधृत कुंकुमसे उसके मुखका लेपन करता है। अथवा यों समझिये कि जिस समय भगवान्ने रमण करनेकी इच्छा की, उसी समय प्राची— नित्यप्रिया श्रीवृषभानुनन्दिनीका मुख विलेपन करते
२५८ भक्तिसुधा हुए उडुराज ( श्रीकृष्णचन्द्र) उस विहारस्थलमें उदित हो गये। यहाँ ‘उडुराज’ शब्दमें उपमालंकार है अर्थात् श्रीकृष्णरूप चन्द्र जो कि चन्द्रमाके समान हैं, वे प्रियतमा श्रीराधिकाजीका मुखविलिम्पन करते हुए उस विहारस्थलमें इसी प्रकार प्रकट हुए, जैसे चन्द्रमा प्राची दिशाको अनुरंजित करते हुए उदित होते हैं। उडुराज जिस प्रकार प्राची दिशाके मुख यानी प्रधान भागको करों (किरणों)-से अनुरंजित करते हैं, उसी प्रकार यहाँ क्रीड़ाभूमिमें श्रीकृष्णचन्द्र करकमलोंमें ली हुई होलिका-रोलिका (होलीके गुलाल)-से श्रीराधिकाजीका मुखमण्डल अनुरंजित करते हैं। जिस प्रकार उदयकालीन चन्द्रमा उदयरागसे प्राची दिशा और समस्त आकाशको अरुण कर देता है, ठीक उसी प्रकार भगवान् कृष्णने प्रकट होकर अपने शन्तम-कर अर्थात् मंगलमय कर-व्यापारोंसे समस्त व्रजांगनाओंके मुखमण्डलको अरुण कर दिया। यहाँ ‘शन्तमैः करैः’ यह भगवान्के समस्त मंगलमय अंगोंका उपलक्षण है। वे अंग मंगलमय हैं और मंगलकारक भी हैं; क्योंकि भगवान् ‘आनन्दमात्रकरपाद- मुखोदरादि’ तथा— नमो विज्ञानरूपाय परमानन्दमूर्तये । सच्चिदानन्दरूपाय कृष्णायाक्लिष्टकारिणे ॥ —आदि वाक्योंके अनुसार शुद्ध सन्मात्र, चिन्मात्र और आनन्दमात्र तत्त्व हैं तथा ‘एष ह्येवानन्दयति’ इस श्रुतिके अनुसार वे ही सब प्राणियोंको आनन्दित भी करते हैं, अतः वे आनन्दप्रद भी हैं। उन्होंने नित्यप्रिया श्रीवृषभानुनन्दिनीके समान अन्य व्रजांगनाओंके मुखमण्डलको भी सुखमय और सुखावह कर- व्यापारोंसे अरुण किया तथा उनके कर्णरन्ध्रोंको वेणुरागसे और हृदयाकाशोंको प्रेमरागसे रंजित कर दिया। इस प्रकार वे उदित हुए। यहाँ ‘करैः’ में जो बहुवचन है, वह स्वरूपोंकी बहुलताके अभिप्रायसे भी हो सकता है; क्योंकि यहाँ रासलीलामें भगवान्को अनेक रूपसे आविर्भूत होना है। अतः भगवान्के अनेक रूपोंकी अपेक्षासे बहुवचनका प्रयोग उचित ही है। व्रजांगनाओंको जो भगवान्के साथ विहारावसर प्राप्त न होनेका शोक था, उसे भी अपने शन्तम-कर यानी सुखप्रद लीलामय विहारविशेषोंसे ही निवृत्त करते हुए भगवान् प्रकट हुए। यहाँ ‘वर्तमानसामीप्ये वर्तमानवद्वा’ इस सूत्रके अनुसार ‘मृजन्’ में भविष्यदर्थमें वर्तमानका प्रयोग हुआ है अर्थात् भगवान् अपने साथ विहार करनेका सुअवसर न मिलनेके कारण जो गोपांगनाओंको शोक था, उसकी निवृत्ति करेंगे, इसीलिये उदित हुए हैं। यहाँ— रलयोर्डलयोश्चैव सषयोर्बवयोस्तथा। वदन्त्येषां च सावर्ण्यमलङ्कारविदो जनाः ॥* इस वचनके अनुसार ‘उडुराजः’ की जगह ‘उरुराजः’ भी समझा जाता है अर्थात् जिस समय भगवान् वृन्दारण्यमें पधारे, उस समय श्रीयशोदा और नन्दबाबाको विकलता होनेकी सम्भावना हुई; क्योंकि जिस प्रकार फणि मणिको नहीं छोड़ सकता, उसी प्रकार वे भगवान्से विलग नहीं रह सकते थे। अतः भगवान् अनेक रूपसे प्रकट हुए अर्थात् वृन्दारण्यमें प्रकट होनेपर भी वे एक रूपसे श्रीयशोदाजीके शयनागारमें ही रहे। इसीसे उन्हें ‘उरुधा—बहुधा राजते यः स उरुराजः’ इस व्युत्पत्तिके अनुसार उरुराज—अनेक रूपसे सुशोभित होनेवाले कहा है। यहाँ ‘प्रियः’ यह उडुराजका विशेषण है। जिस प्रकार रसिक और भक्त पुरुष दोनोंको ही चन्द्रमा प्रिय है, उसी प्रकार भगवान् भी सबके परम-प्रेमास्पद हैं। चन्द्रमामें रसिकोंका प्रेम तो शृंगाररसका उद्दीपन विभाव होनेके कारण है; किंतु साथ ही वह भक्तोंको भी अत्यन्त प्रिय है; क्योंकि उसके मध्यमें जो श्यामता है, वह उन्हें हृदयाकाशमें स्थित ध्यानाभिव्यक्त भगवत्स्वरूपका स्मरण दिलाती है तथा उसके दर्शनमात्रसे भी अपने प्रियतमके प्रति प्रेमियोंके अनुरागकी वृद्धि होती है। देखो, चन्द्रमा अत्यन्त दूर देशमें है तो भी वह समुद्रकी अभिवृद्धिका हेतु होता है। जान पड़ता
- अर्थात् अलंकाररहस्यज्ञ महानुभाव र और ल, ड और ल, स और ष तथा ब और व इनकी सवर्णता बतलाते हैं।
है कि मानो समुद्र अपनी उत्ताल तरंगोंद्वारा चन्द्रमासे मिलना चाहता है। इससे यह सूचित होता है कि प्रिय वस्तु चाहे कितनी ही दूर रहे; किंतु प्रेमीको उसके प्रति अनुरागकी वृद्धि होती है। इसीसे जब-जब पूर्णचन्द्रका उदय होता है, तभी-तभी समुद्र अत्यन्त उत्सुकतासे उससे मिलनेके लिये उत्ताल तरंगोंसे उछलने लगता है। यह सब देखकर प्रेमियोंकी ऐसी भावना हो जाती है कि जिस प्रकार यह समुद्र अपने प्रियतमतक पहुँचनेके प्रयत्नमें बारम्बार असफल होते रहनेपर भी हताश नहीं होता, उसी प्रकार हमें भी अपने प्रियतमसे निराश या निरपेक्ष नहीं होना चाहिये। इस प्रकार प्रेमियोंको प्रेमरीति सिखानेवाला, भगवान् कृष्णमें रमणेच्छा उत्पन्न करानेवाला तथा समस्त जीवोंको आनन्दित करनेवाला होनेके कारण चन्द्रमा सब प्रकारसे प्रेमास्पद ही है। इसी प्रकार सर्वान्तरात्मा श्रीभगवान् भी सभीके परम-प्रेमास्पद हैं; क्योंकि कोई पुरुष कैसा ही नास्तिक या देहाभिमानी क्यों न हो, उसे भी अपनी आत्मामें ही निरतिशय प्रेम होता है। यह चन्द्रमा कैसा है? 'दीर्घदर्शनः—दीर्घ- कालान्तरे अनेकरात्र्यवसाने दर्शनं यस्य स दीर्घदर्शनः' अर्थात् जिसका दर्शन बहुत-सी रात्रियोंके पीछे होता है; क्योंकि पूर्णचन्द्र एक मासके अनन्तर ही उदित होता है। यदि इसे भगवान्का विशेषण माना जाय तो इस प्रकार अर्थ होगा—'दीर्घमबाध्यं दर्शनं यस्य स दीर्घदर्शनः' अर्थात् जिनका दर्शन दीर्घ यानी अबाध्य है; क्योंकि 'न हि द्रष्टुर्दृष्टे- र्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वात्' इस सूत्रके अनुसार सर्वसाक्षी भगवान्की दर्शनशक्तिका लोप कभी नहीं होता। भगवान् कृष्ण प्रत्यगात्मा होनेके कारण ही 'प्रियः'—परप्रेमास्पद हैं तथा सर्वान्तरतम प्रत्यगात्मा होनेके कारण ही सर्वद्रष्टा हैं। जो सर्वद्रष्टा है, वह किसीका दृश्य नहीं हो सकता; क्योंकि वह जिसका दृश्य होगा, उसका द्रष्टा नहीं हो सकता और ऐसा होनेपर उसका सर्वद्रष्टृत्व बाधित हो जायगा। अतः सर्वद्रष्टा श्रीभगवान्की दर्शनशक्तिका किसी समय लोप नहीं होता। दर्शन दो प्रकारका है—बौद्धदर्शन और पौरुषेय- दर्शन। भिन्न-भिन्न इन्द्रियोंद्वारा अन्तःकरणका उन इन्द्रियोंके विषयोंसे संश्लिष्ट होकर तदाकार हो जाना बौद्धदर्शन है। यह बुद्धिका परिणाम है। यहाँ बुद्धि ही इन्द्रियोंद्वारा विषयोंको व्याप्तकर उनके आकारमें परिणत हो जाती है। इसीको कहीं-कहीं पौरुषेयदर्शन भी कहा है। बुद्धिमें जो पुरुषत्वका आरोप होता है, उसीके कारण बुद्धिनिष्ठ दर्शन पुरुषनिष्ठ-सा जान पड़ता है। तात्पर्य यह है कि बुद्धिमें जो विवेक-ज्ञान और शब्दादि- ज्ञान है, इनका अपनेमें आरोप करके यह पुरुष 'अहं विवेकवान्' और 'अहं शब्दज्ञानवान्' प्रतीत होता है। वस्तुतः तो यह आरोप भी बुद्धिमें ही है। पुरुषसे इसका कोई सम्बन्ध नहीं है। यहाँ यह सन्देह होता है कि यदि यह आरोप बुद्धिनिष्ठ है तो इसकी पुरुषनिष्ठता प्रतीत नहीं होनी चाहिये, बुद्धिनिष्ठता ही अनुभूत होनी चाहिये। किंतु बुद्धि प्रकृतिका विकार होनेके कारण जड़ है, अतः यह आरोप अनुभवका विषय (दृश्य) ही होना चाहिये, अनुभवरूप नहीं होना चाहिये। परंतु ऐसी बात तो है नहीं; इसलिये इसे बुद्धिनिष्ठ ही क्यों माना जाय? इसका उत्तर यह है कि यह बुद्धिनिष्ठ आरोप बुद्धिमें पुरुषत्वकी भ्रान्ति करानेके कारण बुद्धिनिष्ठ होनेपर भी पुरुषनिष्ठ-सा जान पड़ता है; इसीसे वस्तुतः वह आरोप अनुभवका विषय होनेपर भी अनुभवरूप-सा प्रतीत होता है। इस प्रकार सिद्धान्ततः यही निश्चय हुआ कि बौद्ध बोध ही पौरुषेय बोध-सा प्रतीत होता है। पौरुषेय बोध बुद्धिबोधसे भिन्न नहीं है। इसीसे कहा है—'एकमेव दर्शनं ख्यातिरेव दर्शनम्'। यहाँ तत्तदाकारवृत्ति ही 'ख्याति' कही गयी है। व्युत्थान- अवस्थामें पुरुष ख्यात्याकार हो जाता है—'वृत्ति- सारूप्यमितरत्र'। वृत्तियाँ शान्त, घोर और मूढ़भेदसे
२६० भक्तिसुधा
तीन प्रकारकी हैं, अतः व्युत्थानावस्थामें पुरुष भी शान्त, घोर और मूढ़रूप हो जाता है। यह कथन लोकव्यवहारोपयुक्त दर्शनकी दृष्टिसे है। वास्तवमें तो इस बौद्धबोधसे व्यतिरिक्त पुरुषका स्वभावभूत चैतन्य ही पौरुषेयदर्शन है। यदि बौद्धबोधको ही पुरुषका स्वभाव माना जाय तो यह प्रश्न होता है कि समाधि-अवस्थामें समस्त चित्तवृत्तियोंका निरोध हो जानेपर पुरुषका क्या स्वभाव रहता है ? तात्पर्य यह है कि यदि उसका स्वभाव बौद्धबोध ही है तो उस अवस्थामें समस्त बुद्धिवृत्तियोंका निरोध हो जानेके कारण वह स्वभावशून्य होकर कैसे रहेगा ? कारण, ऐसा कोई समय नहीं है, जबकि पुरुष शब्दादि वृत्तियोंमेंसे किसीके साथ तादात्म्यापन्न न हो। समस्त वृत्तियाँ पाँच विभागोंमें विभक्त की गयी हैं—प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति; इनमेंसे किसी-न-किसीके साथ पुरुषका सारूप्य रहता ही है। जिस प्रकार अग्नि दाहकत्व- प्रकाशकत्वशून्य नहीं रहता, उसी प्रकार पुरुष शान्त, घोर या मूढ़वृत्तियोंसे शून्य कभी नहीं रहता। अतः ये उसके स्वभाव ही हैं। यदि कहें कि समाधिकालमें वृत्तियोंका निरोध हो जानेपर भी वह उस निर्वृत्तिक अन्तःकरणका ही भोक्ता रहता है तो ठीक नहीं; क्योंकि निर्वृत्तिक अन्तःकरण भोगोपयोगी नहीं है; क्योंकि भोग और सत्त्व-पुरुषान्यताख्यातिरूप पुरुषार्थ- सम्पादन करनेवाली अन्तःकरणरूपमें परिणत हुई ही प्रकृति पुरुषकी भोग्य हो सकती है। निर्वृत्तिक चित्तमें तो ये दोनों ही बातें नहीं हैं। अतः समाधि-अवस्थामें पुरुषका कोई स्वभाव ही नहीं रहता। कोई भी भावरूप पदार्थ अपने स्वभावको छोड़कर नहीं रह सकता। पुरुष भावरूप है, अतः समाधि-अवस्थामें भी उसका सद्भाव रहनेके कारण क्या हो सकता है ? इसपर सिद्धान्ती कहता है—'तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्' अर्थात् समस्त वृत्तियोंका निरोध हो जानेपर द्रष्टाकी अपने स्वरूपमें स्थिति हो जाती है। तात्पर्य यह है कि भावके दो रूप हैं—औपाधिक और अनौपाधिक। बौद्धबोध पुरुषका औपाधिक रूप है, अतः समाधिमें उसका अभाव हो जानेपर भी पुरुषका निरुपाधिक अर्थात् स्वाभाविक स्वरूप तो रहता ही है। यही मुख्य पौरुषेय-बोध है। यह पुरुषका स्वाभाविक चैतन्य ही वास्तविक दर्शन है। दृष्टि दो हैं—नित्या और अनित्या। ख्याति अनित्या दृष्टि है, यह उदयास्तमयशालिनी है। इसकी साक्षीभूता जो नित्या दृष्टि है, उसीके विषयमें श्रुति कहती है— 'न हि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते।' (बृहदारण्यक० ४।३।२३) अर्थात् द्रष्टाकी दृष्टिका लोप कभी नहीं होता। यही दीर्घा दृष्टि है और यही मुख्य भी है। इसीसे भगवान्को अविलुप्तदृक् कहा है। यह दृष्टि समस्त अनित्य दृष्टियोंकी दृष्टि (साक्षिणी) है; अर्थात् अनित्य दृष्टियोंकी दृष्टि और उनका द्रष्टा एक ही बात है। यहाँ 'द्रष्टुः दृष्टिः' यह कथन ऐसा ही है, जैसे 'राहोः शिरः' अर्थात् जिस प्रकार सिर राहुसे तनिक भी भिन्न नहीं है, उसी प्रकार यह दृष्टि भी द्रष्टासे भिन्न नहीं है, अतः 'द्रष्टुः' इस पदमें जो षष्ठी है, वह समानाधिकरण्यमें है; अर्थात् जो दृष्टि द्रष्टासे अभिन्न है, वही द्रष्टाकी दृष्टि है और यदि व्यधिकरण—षष्ठी मानकर अर्थ किया जाय तो इसके दो तात्पर्य होंगे— द्रष्टुजन्या दृष्टि या द्रष्टृ-प्रकाशिका अर्थात् द्रष्टृविषयिणी दृष्टि। इनमें पहली द्रष्टाके आश्रित है और दूसरी द्रष्टाका आश्रय है तथा पहली अनित्या है और दूसरी नित्या। इससे सिद्ध हुआ कि घटादि-दर्शनका आश्रय तो द्रष्टा है तथा उस द्रष्टाका जो दर्शन है, जिस दर्शनका विषय वह द्रष्टा है, वही शुद्ध आत्मा है। वह दृष्टि क्या है? वह द्रष्टाकी स्वरूपभूता है। यहाँ 'द्रष्टा' शब्दसे काल्पनिक द्रष्टा अभिप्रेत है। उस (काल्पनिक द्रष्टा)—का आश्रय ही उसका पारमार्थिक स्वरूप है, जैसे रज्जुमें अध्यस्त सर्पका रज्जु। वह दृष्टि कौन-सी है? इसका परिचय श्रुति इस प्रकार देती है— 'सा द्रष्टुर्दृष्टैर्यया स्वप्ने पश्यति' इत्यादि।
इस प्रकार जिसके द्वारा स्वाप्निक पदार्थोंकी प्रतीति होती है, वह दृष्टि आत्मस्वरूपा ही है। यहाँ शंका होती है कि उसके भी तो उत्पत्ति और नाश देखे जाते हैं; अतः वह भी अनित्या ही है। इसपर हमारा कथन यह है कि ऐसा मानना उचित नहीं; क्योंकि उस समय चक्षु आदि इन्द्रियाँ तो अज्ञानमें लीन हो जाती हैं और अन्तःकरण विषयरूप हो जाता है। जाग्रदवस्थाके हेतुभूत अविद्या, काम और कर्मोंका क्षय तथा स्वप्नावस्थाके हेतुभूत अविद्या, काम और कर्मोंका उदय होनेपर, जाग्रदवस्थामें अपने-अपने अधिष्ठातृदेवतासे अनुगृहीत भिन्न-भिन्न इन्द्रियोंद्वारा उत्पन्न हुए भिन्न-भिन्न ज्ञानोंके संस्कारोंसे संस्कृत हुआ अन्तःकरण ही स्वाप्निक पदार्थोंके रूपमें परिणत हो जाता है, जिस प्रकार सिनेमामें अनेक प्रकारके चित्रोंसे चित्रित पट ही विशेष प्रकारके प्रकाश, गति और काँचसे संयुक्त होकर नाना प्रकारकी गतियाँ करता प्रतीत होता है। किंतु उस समय (स्वप्नमें) इन सबका दर्शन किसके द्वारा होता है ? यदि कहो कि जिस प्रकार अनिर्वचनीय रूपादि उत्पन्न हुए हैं, उसी प्रकार अनिर्वचनीय दृष्टि भी उत्पन्न हो जाती है तो यह हो नहीं सकता; क्योंकि प्रातिभासिक अनिर्वचनीय पदार्थ सदा ज्ञातसत्ताक ही होते हैं। उनका सर्वदा अपरोक्ष- ज्ञान हुआ करता है। किंतु इन्द्रियाँ अज्ञातसत्ताक भी होती हैं; क्योंकि वे स्वयं अज्ञात रहकर भी वस्तुका प्रकाशन करनेमें समर्थ हैं। अतः अज्ञातसत्ताक होनेके कारण उसका आरोप नहीं हो सकता; अतः स्वाप्निक रूपकी दृष्टि शुद्ध आत्मा ही है। यहाँ यह प्रश्न होता है कि यदि स्वाप्निक रूपकी दृष्टि शुद्ध आत्मा ही है तो उसमें दृष्टि, श्रुति, विज्ञाति आदि भेद नहीं हो सकते; क्योंकि वह तो निर्विशेष अर्थात् सामान्यरूप है। उसमें यह नामरूपात्मक भेद कैसे हो गया ? इसका उत्तर यह है कि इन अनिर्वचनीय शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्धका अनिर्वचनीय सम्बन्ध स्वप्रकाश आत्मामें अनिर्वचनीय श्रुति, अनिर्वचनीय मति एवं अनिर्वचनीय विज्ञाति आदि उत्पन्न कर देता है, जिस प्रकार एकरस प्रकाश भी नील-पीत, हरित काँचोंके साथ संश्लिष्ट होनेपर तत्तद्रूपवान् प्रतीत होता है। किन्हीं-किन्हीं लैम्पोंमें देखा जाता है कि उसके भिन्न-भिन्न पार्श्वोंमें भिन्न- भिन्न वर्णके काँच लगे रहते हैं। उनके कारण उसकी दीपशिखा एकरूप होनेपर भी भिन्न-भिन्न ओरसे विभिन्न वर्णकी दिखलायी पड़ती है। इसी प्रकार एक ही शुद्ध ब्रह्म विविध उपाधियोंके कारण विविध रूपोंमें प्रतीत होता है। यहाँ दृष्टान्तमें दीपशिखाके सन्निहित होनेवाले नील, पीत, हरित काँच समान- सत्तावाले हैं अर्थात् उन सभीकी व्यावहारिक सत्ता है; इसलिये उसका वैवर्ण्य पारमार्थिक भी कहा जा सकता है। परंतु आत्मासे संश्लिष्टसे शब्दादि तो अतात्त्विक हैं; अतः अतात्त्विक शब्दादिके सम्बन्धसे होनेवाला तात्त्विक-आत्माका भेद भी अतात्त्विक ही है। यहाँ एक बात यह समझ लेनी चाहिये कि चक्षुरादिजन्य रूपाद्याकाराकारितवृत्तिरूप जो दृष्टि आदि हैं, उनके संस्कारोंसे संस्कृत अन्तःकरण ही शब्दादिरूपसे परिणत होता है। अतः दर्शन-श्रवण आदिके संस्कारोंसे संस्कृत जो अन्तःकरण है, उसके सम्बन्धसे ही शुद्ध चैतन्यमें दृष्टि-श्रुति आदि अनेक भेद प्रतीत होते हैं; जिस प्रकार सुषुप्तिमें यद्यपि अहंकार नहीं रहता तथापि जागनेपर यही अनुभव होता है कि ‘मैं सुखपूर्वक सोया’। इस प्रकारकी स्मृतिसे उस समय भी अहंकारकी सत्ता सिद्ध होती है। परंतु वस्तुतः उस समय अहंकार नहीं रहता; क्योंकि उस अवस्थामें इच्छा, द्वेष, प्रयत्नादि अहंकारके धर्म नहीं देखे जाते और धर्मके बिना धर्मीकी स्थिति सम्भावित नहीं है; तथापि अहंकार न रहनेपर भी अहं संस्कार-संस्कृत अज्ञान तो रहता ही है; इसीसे जागृतिमें उसका परामर्श होता है। रासपञ्चाध्यायीके दूसरे श्लोककी एक अन्य व्याख्या अब हम इस श्लोकके तात्पर्यका एक अन्य
प्रकारसे विचार करते हैं—'उडुराजः, उडुषु उडुसदृशर्तुषु राजत इति उडुराजः—वसन्तः। यदैव भगवान् रन्तुं मनश्चक्रे तदैव उडुराजो—वसन्त उदगात्।' अर्थात् जो उडुस्थानीय अन्य ऋतुओंमें शोभायमान है, वह वसन्त ही उडुराज है। जिस समय भगवान्ने रमण करनेकी इच्छा की, उसी समय वह वसन्तरूप उडुराज उदित हो गया। वह वसन्त-ऋतु कैसा है ? 'दीर्घदर्शनः—दीर्घकाले दर्शनं यस्य।' अर्थात् वर्तमान जो शरद्-ऋतु है, उसकी अपेक्षा जिसका दर्शन दीर्घकालमें होना सम्भव है। ऐसा वसन्त-ऋतु भी कालका अतिक्रमण करके उदित हुआ। उसीका विशेषण है 'ककुभः—के स्वर्गे कौ पृथिव्यां भातीति ककुभः' अर्थात् जो क—स्वर्ग और कु—पृथिवीमें भासित होता है। इससे वसन्तोपलक्षित होलिकामें होनेवाले उत्सवादि भी सूचित होते हैं। 'प्रिय' भी उसीका विशेषण है; क्योंकि सबके प्रेमका आस्पद होनेके कारण वह सबका प्रिय भी है। वह वसन्तरूप ककुभ और प्रिय उडुराज उदित हुआ। क्या करता हुआ उदित हुआ ? 'प्रियसङ्गमाभावजनितविषादान् मृजन् शान्तमैः करैश्च स्वोद्दीपनविभावजनितेन अरुणेन प्रिय- सङ्गमसम्भावनाजनितेनानुरागेण प्राच्या नित्य- प्रियायाः श्रीवृषभानुनन्दिन्या इव चर्षणीनां श्रीकृष्णेन सह रन्तुं गमनशीलानामन्यासां व्रजाङ्गनानां विरहाग्निना पीतं मुखं विलिम्पन्'। अर्थात् वह प्रियसंगमाभावके कारण उत्पन्न हुए विषादको अपनी शान्त किरणोंसे (अथवा सुखस्वरूप एवं सुखप्रद किरणोंसे) निवृत्त करते हुए तथा अपने उद्दीपनविभावरूप चन्द्रमासे उत्पन्न हुए अरुण यानी प्रियतमके समागमकी सम्भावनासे प्रकट हुए अनुरागद्वारा प्राची—नित्यप्रिया श्रीवृषभानुसुताके समान, अन्य सब चर्षणीगण भगवान् श्रीकृष्णके साथ रमण करनेके लिये अभिसरण करनेवाली समस्त गोपांगनाओंके विरहाग्निजनित पीड़ासे पीले पड़े हुए मुखोंका लेपन करते हुए उदित हुए। यहाँ 'प्राच्या मुखम् अरुणेन विलिम्पन्' इसका अर्थ यह भी हो सकता है— 'प्राच्याः नित्यप्रियायाः व्रजभुवः मुखं मुख्यं भागं श्रीवृन्दारण्यम् अरुणेन किंशुकादिपुष्प- विकासेन विलिम्पन्।' अर्थात् नित्यप्रिया व्रजभूमिके मुख (मुख्य भाग) श्रीवृन्दारण्यको अरुण-किंशुकादि रक्तपुष्पोंके विकासद्वारा रंजित करते हुए उदित हुए। उस समय वसन्तके उदयसे यों तो सभी जीव और भूमियोंकी ग्लानि निवृत्त हो गयी थी; किंतु उसने प्रधानतया वृन्दारण्यको तो किंशुककुसुमादिकी अरुणिमासे और भी अनुरंजित कर दिया था। इस प्रकार जब समस्त जड़वर्ग भगवान्की लीलामें उपयुक्त होनेके लिये उद्यत हुआ तो विराट् भगवान्का मनरूप चन्द्रमा भी उस रमणलीलामें उद्दीपनरूपसे सहायक होकर उदित हुआ; क्योंकि विराट् तो भगवान्का परम भक्त है। उस चन्द्रमामें जो उदयकालीन लालिमा है, वह उसका भगवद्विषयक अनुराग है तथा उसमें जो श्यामता है, वह मानो ध्यानाभिव्यक्त भगवत्स्वरूप है। उस चन्द्रमाकी जो अरुण कान्ति है, वह मानो भगवल्लीलाकी सम्भावनासे प्रादुर्भूत हुए मानसिक उल्लासके कारण जो उसकी मन्द मुसकान है, उसीके कारण विकसित हुई दन्तावलीकी अधर-कान्तिमिश्रित आभा है तथा उस चन्द्रमाका जो निखिलव्योमव्यापी अमृतमय शीतल प्रकाश है, वह भगवद्दर्शनके अनन्तर विराट् भगवान्का उदार हास है। विराट्के ईषत्-हासमें उसकी देदीप्यमान दन्तपंक्तिकी आभा ओष्ठोंकी अरुणिमासे अरुण होकर प्रकट होती है; किंतु उसके उदार हासमें ओष्ठोंके दूर हो जानेसे उन ओष्ठोंकी अरुणिमाका सम्बन्ध बहुत कम रह जाता है, इसलिये उस समय उस दन्तपंक्तिकी दीप्ति बहुत स्फुट होती है। नक्षत्रमण्डल ही विराट् भगवान्की दन्तावली है। उस उल्लासके कारण जो
श्रीरासलीलारहस्य २६३ हर्षोत्कर्षसे उद्गत रोमावली है, वे ही ये वृक्ष हैं। इस प्रकार भगवल्लीला-दर्शनके लिये उल्लसित होकर विराट् भगवान्का मनरूप चन्द्रमा प्रकट हुआ। उस चन्द्रमाका विशेषण है— ‘ककुभः—के स्वर्गे मण्डलरूपेण कौ पृथिव्यां प्रकाशरूपेण च भातीति ककुभः।’ अर्थात् जो मण्डलरूपसे आकाशमें और प्रकाशरूपसे पृथिवीमें प्रकाशित होता है, वह चन्द्रमा ककुभ है। वह क्या करता हुआ उदित हुआ ? ‘शान्तैः करैश्चर्षणीनां श्रीकृष्णरसास्वादनाय वृन्दारण्यं प्रति अभिसरणशीलानां व्रजाङ्गनाजनानां शुचः तम आदिरूपान् प्रतिबन्धान् मृजन् उद्दीपन- विधया वा लोककुलमर्यादारूपान् प्रतिबन्धान् मृजन् उद्गात्।’ अर्थात् वह अपनी सुखस्वरूप एवं सुखप्रद किरणोंसे, श्रीकृष्णरसास्वादनके लिये वृन्दारण्यकी ओर जानेवाली व्रजांगनाओंके शोक अर्थात् अन्धकारादि- रूप प्रतिबन्धोंका अथवा उद्दीपनरूपसे उनके लोक एवं कुलमर्यादारूप प्रतिबन्धोंका निराकरण करता हुआ उदित हुआ। इसके सिवा अपनी नित्यप्रिया श्रीवृषभानुदुलारीके समान अन्य गोपांगनाओंके भी विरहतापसन्तप्त पीले मुखोंको प्रियतमके संगमकी सम्भावनासे होनेवाले अनुरागरूप उदयकालीन अरुणिमासे अनुरंजित करता हुआ उदित हुआ। भगवान्की परमाह्लादिनी शक्तिरूपा श्रीराधिकाजी तो नित्य ही भगवत्-संश्लिष्टा हैं, अतः उन्हें यह वियोगजनित ताप नहीं है और इसीसे उनके मुखमें पीतता भी नहीं है, प्रत्युत नित्य ही दीप्तियुक्त अरुणिमा है। किंतु अन्य व्रजांगनाओंको यह सौभाग्य उपासनाके पश्चात् प्राप्त होता है। अतः उपासनाकी परिपक्वतासे पूर्व, जब कि पूर्वरागका भी प्रादुर्भाव नहीं होता, वे भगवद्विरहसे व्यथित रहती हैं और उनका समस्त अंग पीला पड़ जाता है। इस समय इस चन्द्रमाने उदित होकर प्रियतमके समागमका सन्देश सुनाकर उस पीतिमाको अरुणिमामें परिणत कर दिया। परम प्रेमास्पद परमानन्दकन्द श्रीकृष्णचन्द्रसे तादात्म्य-प्राप्तिके लिये भला कौन उत्सुक न होगा ? परंतु अधिकांश उपासक तो उपासनाका परिपाक होनेके अनन्तर ही उन्हें प्राप्त कर पाते हैं। किंतु श्रीराधिकाजीका भगवान्के साथ शाश्वत सम्प्रयोग है। जिस प्रकार सुधासमुद्रमें मधुरिमा नित्य-निरन्तर और सर्वत्र है, उसी प्रकार भगवान् श्रीकृष्णमें उनकी आह्लादिनी शक्ति श्रीवृषभानुनन्दिनी हैं। अतः श्रीकृष्ण और राधिकाजीका नित्य संयोग है। उनके सिवा और किसीको यह सौभाग्य प्राप्त नहीं है। यद्यपि तत्त्वतः तो भगवान् सद्घन, चिद्घन और आनन्दघन ही हैं। अतः उनमें अन्य वस्तुके संयोगका अवकाश तभी हो सकता है, जब वह भगवद्रूप हो। विजातीय वस्तुका उसके साथ कभी योग नहीं हो सकता और वस्तुतः विजातीय कोई वस्तु है भी नहीं। विचारवानोंने तो जीवको भगवत्स्वरूप ही कहा है। श्रीगोसाईंजी महाराज कहते हैं— ईस्वर अंस जीव अबिनासी। चेतन अमल सहज सुखरासी॥ (रा०च०मा० ७।११७।२) जीवमें जो सुखित्व-दुःखित्वादि प्रतीत होते हैं, वे यदि स्वाभाविक होते तो उसमें भगवत्सम्प्रयोगकी योग्यता ही नहीं हो सकती थी। अतः उसके ये धर्म आरोपित हैं। आरोपकी निवृत्ति होते ही जीवका भी भगवान्से तादात्म्य हो जाता है। इसी प्रकार श्रीवृषभानुसुता तो भगवान्से नित्यसंश्लिष्टा हैं; किंतु इतर व्रजबालाओंका उनसे कल्पित भेद है। उस भेदकी निवृत्ति होते ही उनका भी भगवान्से अभेद हो जायगा। मायामोहित जीव प्रायः भगवान्की ओर प्रवृत्त नहीं होता; इसीसे वह बाह्य प्रपंचमें आसक्त रहता है। जिस समय किसी महान् पूर्वपुण्यके प्रभावसे उसकी प्रवृत्ति भगवान्की ओर होती है, उस समय वह बाह्य
प्रपंचसे विरत हो जाता है और धीरे-धीरे उसे भगवत्तत्त्व ही परप्रेमास्पद प्रतीत होने लगता है। फिर उसे भगवान्का एक क्षणका वियोग भी असह्य हो जाता है। इस प्रकारके विरहानलसे सन्तप्त होकर उसका अन्तःकरण सर्वथा शुद्ध हो जाता है और जिन दोषोंके कारण वह अपने प्रियतमकी उपेक्षाका भाजन बना हुआ था, वे सर्वथा निवृत्त हो जाते हैं। इस विरहावस्थामें उसका मुख पीला पड़ जाता है। भक्तशिरोमणि श्रीभरतजीकी इसी अवस्थाका वर्णन करते हुए श्रीगोसाईंजी महाराज कहते हैं— बैठे देखि कुसासन जटा मुकुट कृस गात। राम राम रघुपति जपत स्रवत नयन जलजात॥ (रा०च०मा० ७।१ (ख)) इस प्रकार प्रियतमके विप्रयोगमें प्रियतमके प्रेमास्पदत्वकी अनुभूति हो जाती है। जबतक प्रेमास्पद प्रेमास्परूपसे अनुभूत नहीं होता, तभीतक प्रमाद रहता है। उसमें प्रेमास्पदत्वकी अनुभूति होनेपर तो उसके बिना एक पलके लिये भी चैन नहीं पड़ता। फिर तो उसकी वियोगाग्निमें झुलसकर शरीर दुर्बल हो जाता है तथा मुख पीला पड़ जाता है। इसी प्रकार गोपांगनाओंके मुख भी भगवद्विप्रयोगमें पीले पड़ गये थे। अतः आज जो चन्द्रमा उदित हुए हैं, वे एक विलक्षण चन्द्र हैं। आज इनके उदयसे उद्दीपनविधया जो भगवान्के संगमकी सम्भावनासे एक उत्साहविशेष होगा, उससे उनकी वह पीतिमा अरुणिमामें परिणत हो जायगी। जब कुछ प्रतीक्षाके बाद विलम्बसे प्रेमीका दर्शन होता है, तब कुछ विलक्षण ही रस आता है। अतएव उडुराजको दीर्घदर्शन कहा है, दीर्घकालमें दर्शन हुआ है जिसका, उसे वह दीर्घदर्शन है। इधर श्रीकृष्णका भी बहुत प्रतीक्षाके बाद विलम्बमें ही दर्शन होता है, अतः वे भी दीर्घदर्शन ही हैं अथवा अनुरागजन्य विह्वलतासे दीर्घकालतक प्रियामुखका दर्शन करनेवाले श्रीकृष्ण दीर्घदर्शन हैं अथवा दीर्घ अर्थात् नित्य है दर्शनस्वरूपभूता दृष्टि जिसकी वे श्रीकृष्ण दीर्घदर्शन हैं। यहाँ समझ लेना चाहिये कि दृष्टि दो प्रकारकी है—एक अन्तःकरणवृत्तिरूपा अनित्य दृष्टि श्रुति आदि और दूसरी आत्मस्वरूपभूता नित्य दृष्टि। उसी नित्य दृष्टिको ही स्वप्नकी दृष्टि, श्रुति, मति, विज्ञाति कहा जाता है— 'सा द्रष्टुर्दृष्टेर्या स्वप्ने पश्यति।' यहाँ यह सन्देह होता है कि यदि स्वप्नकी दृष्टि, श्रुति, मति एवं विज्ञाति आदि तो आत्मस्वरूपा होनेके कारण नित्य हैं; नित्य होनेसे उनका नाश नहीं हो सकता और नाश न होनेसे संस्कार नहीं बन सकता; क्योंकि संस्कार ज्ञानादिका नाश होनेपर ही उत्पन्न होता है, जिस प्रकार घटज्ञानका नाश होनेपर ही घटसंस्कारकी उत्पत्ति होती है। इसीसे ज्ञानकालमें स्मृति नहीं हुआ करती। अतः यदि स्वप्नकी दृष्टि, श्रुति आदि नित्य हैं तो उनकी स्मृति नहीं होनी चाहिये। परंतु स्मृति होती ही है। इसका क्या समाधान होगा? इसका उत्तर यह है कि स्वप्नके समय दृष्टि, श्रुति आदि तो आत्मस्वरूप ही हैं तथापि उनके विषयोंका नाश तो होता ही है। उनके नाशसे ही संस्कार बनता है। इसीसे उनके ज्ञानका भी नाश कहा जा सकता है। यहाँ विलक्षणता यही है कि नित्य होनेपर भी उसका नाश कहा जा सकता है। इसमें कारण यही है कि विशेष्यके नित्य बने रहनेपर भी विशेषणके नाशवान् होनेके कारण विशिष्टके नाशका व्यवहार होता है; जैसे आकाशके बने रहनेपर भी घटरूप विशेषणका नाश होनेपर घटाकाशका नाश कहा जाता है। विशिष्ट पदार्थका अभाव तीन प्रकार माना जाता है—विशेषणाभावप्रयुक्त विशिष्टाभाव, विशेष्याभावप्रयुक्त विशिष्टाभाव तथा उभयाभावप्रयुक्त विशिष्टाभाव; जैसे कोई दण्डधारी पुरुष है, उसके दण्डित्वका अभाव तीन प्रकारसे हो सकता है—(१) दण्डरूप विशेषणका अभाव होनेपर, (२) पुरुषरूप
श्रीरासलीलारहस्य २६५
विशेष्यका अभाव होनेपर अथवा (३) दण्ड और पुरुष दोनोंहीका अभाव होनेपर। इसी प्रकार यहाँ विशेष्यस्थानीय आत्मचैतन्य तो बना हुआ है, केवल शब्दादि विशेषणोंके नाशसे ही दृष्टि, श्रुति, मति आदि विशिष्ट ज्ञानोंका नाश कहा जाता है; क्योंकि केवल आत्मचैतन्य ही दृष्टि, श्रुति आदि नहीं है; अपितु अनिर्वचनीय-रूपादिसे सम्बन्धित चैतन्य ही दृष्टि-श्रुति आदि है। अतः केवल चैतन्यके बने रहनेपर भी रूपादिविशेषके नाशमात्रसे रूपादिविशिष्ट चैतन्यका नाश कहा जा सकता है। इस प्रकार दृष्टि, श्रुति आदिका नाश हो जानेसे उनके संस्कार और स्मृति दोनों ही बन सकते हैं। इसीसे कई आचार्योंने सुखकी स्मृति भी सुखका नाश होनेपर ही मानी है; क्योंकि घटादि-वृत्तियोंके समान वे सुखकी वृत्तिको सुखसे पृथक् नहीं मानते। वे कहते हैं कि वृत्ति तो आवरणकी निवृत्तिके लिये है। जो वस्तु अज्ञातसत्ताक होती है, उसीका आवरण हटानेके लिये वृत्ति होती है। सुख-दुःखादि तो अज्ञातसत्ताक हुआ ही नहीं करते। यदि कहो कि वृत्ति चैतन्यसे सम्बन्ध करानेके लिये है; क्योंकि भिन्न-भिन्न आचार्योंके मतानुसार वृत्ति दो प्रकारकी है—आवरणाभिभवात्मिका और चैतन्य-सम्बन्धार्था। सिद्धान्त यह है कि घटादिका प्रकाश घटाद्यवच्छिन्न चैतन्यसे ही होता है; किंतु जबतक वह आवृत रहता है, तबतक उसका प्रकाश नहीं होता; क्योंकि ज्ञान अनावृत चैतन्यसे ही होता है। अतः वृत्तिका काम यही है कि आवरणकी निवृत्तिकर अनावृत चैतन्यसे सम्बन्धित घटादिका ज्ञान कराये। दूसरे आचार्य वृत्तिको चैतन्य-सम्बन्धार्था मानते हैं। वे कहते हैं कि सबका परमकारण होनेसे ब्रह्मका घटादिसे सम्बन्ध तो है ही, अतः घटादिका ज्ञान होना ही चाहिये; परंतु ऐसा होता नहीं। अतः एक विलक्षण सम्बन्ध माननेकी आवश्यकता है। उसे अभिव्यंग्य-अभिव्यंजक सम्बन्ध कहते हैं। चैतन्यका वस्तुपर अभिव्यंजक कैसे होता है ? जैसे दर्पणादिमें सूर्यादिका प्रतिबिम्ब पड़ता है, उसी प्रकार जिस पदार्थमें चैतन्यका प्रतिबिम्ब पड़ता है—उसीका प्रकाश हुआ करता है। लोकमें यह देखा जाता है कि दर्पणादि स्वच्छ वस्तुएँ ही प्रतिबिम्बको ग्रहण करनेवाली हुआ करती हैं, घटादि अस्वच्छ वस्तुओंमें उसका प्रतिबिम्ब नहीं पड़ता, उसी प्रकार चेतनका प्रतिबिम्ब भी अन्तःकरणमें ही पड़ता है, कुड्यादि अस्वच्छ वस्तुओंमें नहीं पड़ता। किंतु जिस प्रकार स्वच्छ जलादिका योग होनेपर अस्वच्छ कुड्यादिमें प्रतिबिम्ब-ग्रहणकी योग्यता आ जाती है, उसी प्रकार स्वच्छ अन्तःकरणका योग होनेपर घटादि भी चेतनका प्रतिबिम्ब ग्रहण करनेमें समर्थ हो जाते हैं। अन्तःकरणकी घटाद्याकाराकारिता वृत्ति चैतन्यके साथ घटादिका सम्बन्ध करानेके लिये ही होती है। जिस समय अन्तःकरणकी वृत्ति घटाद्याकारा होती है, उस समय अन्तःकरणवृत्तिसंश्लिष्ट घट चैतन्यका प्रतिबिम्ब ग्रहण कर लेता है; इसीसे घटकी स्फूर्ति होती है। इसी प्रकार कोई-कोई आचार्य अन्तःकरणकी वृत्तिका प्रधान प्रयोजन जीव-चैतन्यके साथ विषयावच्छिन्न चैतन्यका ऐक्य कराना मानते हैं। उनका मत ऐसा है कि जो वस्तु जिस चैतन्यमें अध्यस्त होती है, वही उसका प्रकाशक होता है; अतः घटाद्यवच्छिन्न चैतन्यको अपनेमें अध्यस्त घटादिका ज्ञान हो सकता है। तथापि प्रमाता जो जीव है, उसे उसका ज्ञान किस प्रकार हो ? अतः इन्द्रियमार्गसे विषयतक गयी हुई अन्तःकरणकी वृत्ति उस विषयावच्छिन्न चेतनके साथ जीवचेतनका अभेद कर देती है। उस समय वह विषयावच्छिन्न चेतनमें अध्यस्त विषय अन्तःकरणावच्छिन्न चेतन यानी जीवचेतनमें अध्यस्त कहा जा सकता है। अतः इस प्रकार अन्तःकरणावच्छिन्न चेतनके साथ विषयका आध्यासिक सम्बन्ध होनेसे उसके द्वारा उस विषयका स्फुरण हो जाता है।
२६६ भक्तिसुधा इससे यही सिद्ध हुआ कि वृत्तियोंकी आवश्यकता चाहे आवरणाभिभवके लिये मानें चाहे जीवके साथ विषयका सम्बन्ध करानेके लिये मानें और चाहे अन्तःकरणावच्छिन्न चेतन और विषयावच्छिन्न चेतनके अभेदके लिये मानें, सुखके प्रकाशके लिये वृत्तियोंकी आवश्यकता नहीं है; क्योंकि सुख तो अन्तःकरणके समान स्वच्छ ही है। घटादि तो अस्वच्छ थे, इसलिये उन्हें चैतन्य सम्बन्धके लिये वृत्तिकी आवश्यकता थी। किंतु सुख तो स्वतः स्वच्छ है; इसलिये जीवचैतन्यके साथ उसके सम्बन्धके लिये वृत्तिकी आवश्यकता नहीं है। यहाँ अन्तःकरणावच्छिन्न चेतनके साथ सुखावच्छिन्न चेतनके अभेद-सम्पादनके लिये भी वृत्तिकी आवश्यकता नहीं है; क्योंकि सुखका आश्रय तो अन्तःकरण ही है, अतः वहाँ आवरणभंगके लिये वृत्तिकी अपेक्षा नहीं है; क्योंकि आवरण वहाँ होता है, जहाँ पदार्थकी सत्ता ज्ञात नहीं होती। सुख अज्ञातसत्ताक है ही नहीं। इसलिये आवरण न होनेके कारण आवरणाभिभवात्मिका वृत्तिकी भी आवश्यकता नहीं है। इसीसे सुखको केवल साक्षीभास्य मानते हैं। यदि ऐसा न मानेंगे तो वृत्तिके प्रकाशके लिये भी वृत्ति माननी पड़ेगी। यदि वृत्तिके प्रकाशके लिये वृत्ति नहीं मानते तो सुखके प्रकाशके लिये ही क्यों मानते हो ? यहाँ किन्हीं-किन्हींका ऐसा मत है कि सुखका स्मरण होता है, इसलिये सुखाकाराकारिता वृत्ति माननी चाहिये; क्योंकि उसका नाश होनेपर ही सुखका संस्कार होगा और संस्कारसे ही स्मृति होगी। किंतु विशेष विचार करनेपर इसकी आवश्यकता प्रतीत न होगी। सुखज्ञान क्या है ? साक्षीका जो सुखके साथ सम्बन्ध है, वही सुखज्ञान है। सुखका नाश होनेसे साक्षीगत सुखसंश्लिष्टत्वका नाश हो जायगा। इस प्रकार सुखके नाशसे ही उसका संस्कार बन जायगा और उसीसे स्मृति भी बन जायगी। अतः सुखज्ञानके लिये वृत्तिकी आवश्यकता नहीं है। नैयायिकोंके मतमें सुख और सुखज्ञानका कारण आत्ममनःसंयोग है, किंतु सुखकी उत्पत्ति भी आत्ममनःसंयोगसे ही होती है। अतः एक आत्ममनः- संयोग तो सुखकी उत्पत्तिके लिये मानना होगा और दूसरा सुखज्ञानके लिये। ये दोनों एक समय हो नहीं सकते। इसलिये जिस समय सुखज्ञानका हेतुभूत आत्ममनःसंयोग होगा, उस समय सुखका हेतुभूत आत्ममनःसंयोग नष्ट हो जायगा और उसका नाश हो जानेसे सुख भी नहीं रहेगा; क्योंकि असमवायि कारणका नाश होनेपर कार्यका भी नाश हो जाता है, जैसे तन्तुसंयोगका नाश होनेपर पटका भी नाश हो जाता है। इस प्रकार सुखके रहते हुए तो सुखज्ञान न हो सकेगा और सुखज्ञानके समय सुख न रहेगा। यद्यपि यहाँ नैयायिकोंका कथन है कि असमवायि कारणका नाश होनेपर उसके कार्यभूत द्रव्यका ही नाश होता है, गुणका नाश नहीं होता और सुख गुण है; इसलिये इसका भी नाश नहीं हो सकता तथापि इस संकोचमें कोई कारण नहीं दीख पड़ता। यहाँ हमें इतना ही विचार करना है कि जिस प्रकार जाग्रत्में सुखज्ञान आत्मस्वरूप है, उसी प्रकार स्वप्नमें शब्दादिज्ञानरूप जो दृष्टि, श्रुति एवं मति आदि हैं, वे भी आत्मस्वरूप दर्शन ही हैं। अतः यह दर्शन ही आत्मदर्शन है। अतः 'दीर्घं पौरुषेयं चैतन्यात्मकं अबाध्यं दर्शनं यस्य असौ दीर्घदर्शनः' अर्थात् जिसका दीर्घ यानी पौरुषेय चैतन्यात्मक अबाध्य दर्शन है, उसे दीर्घदर्शन कहते हैं। ऐसे भगवान् श्रीकृष्ण दीर्घदर्शन हैं। उनका चैतन्यात्मक दर्शन अलुप्त है। अतः जिन- जिन गोपांगनाओंके अन्तःकरणमें जितने प्रीति आदि भाव थे, उन सभीके अलुप्तदृक् साक्षी श्रीभगवान् उनकी अभिरुचिकी पूर्तिके लिये विहार-स्थलमें प्रकट हुए। अथवा 'दीर्घं सर्वविषयं दर्शनं यस्य असौ
दीर्घदर्शनः' अर्थात् जिसका दर्शन (दृष्टि) दीर्घ— सर्ववस्तुविषयक है, उसे दीर्घदर्शन कहते हैं। 'यः सर्वज्ञः सर्ववित्' इत्यादि श्रुतिके अनुसार भगवान् दीर्घदर्शन हैं। अतः सामान्य और विशेष रूपसे वात्सल्य-माधुर्यादि अनेकविध भावोंवाली व्रजांगनाओंको देखकर केवल माधुर्यभाववती व्रजांगनाओंकी अभिलाषा- पूर्तिके लिये भगवान् प्रकट हुए। इसपर यदि कोई कहे कि इस प्रकार अलुप्तदृक् अथवा सर्वज्ञ सर्ववित् रूपसे भी सभीके अभिप्रायको जाननेवाले श्रीहरि सभीकी अभिलाषापूर्तिके लिये प्रादुर्भूत क्यों नहीं हुए? तो इसका कारण यह है कि भगवान्का यह दर्शन दीर्घ—बहुमूल्य है। उनका जो केवल चैतन्यात्मक सामान्य दर्शन है, वह तो सभी भावोंका भासक और अधिष्ठान होनेके कारण किसीका साधक या बाधक नहीं है। किंतु यहाँका यह दर्शन अमूल्य है। यह कृपाशक्तिसे उपहित है। अतः यहाँ केवल दृष्टि ही नहीं, कृपाका आधिक्य है। अतः यह बहुमूल्य है। इसीसे कहा है— यश्च रामं न पश्येत्तु यं च रामो न पश्यति। निन्दितः सर्वलोकेषु स्वात्माप्येनं विगर्हते॥ (वा०रा० २।१७।१४) अर्थात् जो रामको नहीं देखता और जिसे राम नहीं देखते—वह समस्त लोकोंमें निन्दनीय है तथा उसका आत्मा भी उसका तिरस्कार करता है। राम प्राकृत राजकुमार नहीं हैं, बल्कि वे सबके अन्तरात्मा हैं। अतः आत्मस्वरूप श्रीरामका दर्शन न करनेवाले आत्मघाती हैं ही। यदि राम आत्मस्वरूप न होते तो उनका दर्शन न करनेमें इतनी विगर्हा नहीं थी; क्योंकि इतना निन्दनीय तो आत्माका ही अदर्शन है, जैसा कि श्रुति कहती है— असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसावृताः। ताँस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः॥ (ईशावास्य० ३) अर्थात् जो कोई (ऐसे) आत्मघाती* लोग हैं, वे उन असुर्य नामक (अनात्मज्ञोंके आत्मभूत देहात्मक) लोकोंको जाते हैं, जो अदर्शनात्मक अन्धकारसे आवृत्त हैं। इस दृष्टिसे श्रीरामभद्र समस्त प्राणियोंके अन्तरात्मा हैं। अतः जिसने उन्हें नहीं देखा और जिसे उन्होंने नहीं देखा, वह निन्दनीय है ही। इसलिये इस निन्दासे छूटनेके लिये उन अपने स्वरूपभूत श्रीरघुनाथजीका साक्षात्कार करना ही चाहिये। किंतु यदि राम आत्मस्वरूप हैं तो सर्वावभासक होनेके कारण सर्वदृक् हैं ही। उनका न देखना बन ही नहीं सकता। फिर जब ऐसा नियम है कि— 'तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति॥' (कठ० २।२।१५) तो घटादि विषयोंके भानसे पूर्व भी श्रीरामका भान होना अनिवार्य है ही; क्योंकि जैसे प्रतिबिम्बका ग्रहण दर्पण-ग्रहणके अनन्तर ही होता है, उसी प्रकार चितिरूप दर्पणके ग्रहणके अनन्तर ही चैत्यरूप प्रतिबिम्बका ग्रहण होता है। अतः ऐसा कोई पुरुष नहीं है, जो घटादिको देखे और चैतन्यात्मक श्रीरामभद्रको न देखे। तो फिर यह दर्शन कैसा है? यहाँ रामभद्रका दर्शन उनके कृपाकोणसे देखना है तथा विशुद्ध भगवदाकाराकारित मनोवृत्तिपर अभिव्यक्त भगवत्स्व- रूपका साक्षात्कार करना जीवका भगवद्दर्शन है। इसी प्रकार यहाँ भगवान्का जो अनुग्रहोपेत दर्शन है, वही व्रजांगनाओंकी अभिलाषापूर्तिका हेतु होनेके कारण दीर्घदर्शन है। यद्यपि भगवान्का अनुग्रह भी समस्त जीवोंपर समान ही है तथापि उसकी
- जो आत्मतत्त्व नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वभाव है, उसको कर्तृत्वभोक्तृत्वादि अनर्थोंसे संयुक्त मानना उसका अपमान करना है और 'सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते' इस भगवदुक्तिके अनुसार यह अपमान उस आत्मदेवकी मृत्यु ही है, अतः अनात्मक आत्मघाती ही है।
२६८ भक्तिसुधा विशेष अभिव्यक्ति तो भक्तकी भावनापर ही अवलम्बित है। श्रुति कहती है— 'यमेवैष वृणुते तेन लभ्य- स्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम् ॥' (कठ० १।२।२३) अर्थात् यह आत्मा जिसको चाहता है, उसीके द्वारा प्राप्त किया जा सकता है, उसीके प्रति यह अपने स्वरूपकी अभिव्यक्ति करता है। श्रीभगवान् कहते हैं— 'ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।' अर्थात् जो लोग जिस प्रकार मुझे प्राप्त होते हैं, उसी प्रकार मैं भी उनकी कामना पूर्ण करता हूँ। यहाँ यह सन्देह हो सकता है कि पृथिवीमें नरदारकरूपसे प्रकट हुए श्रीकृष्णचन्द्रमें अलुप्तदृक्त्वादि कैसे हो सकते हैं? इसका उत्तर देते हैं— 'ककुभः—कं सुखं तद्रूपतयैव कौ पृथिव्यामपि भातीति ककुभः।' अर्थात् 'क' सुखको कहते हैं, भगवान् 'कु' अर्थात् पृथिवीमें भी सुखरूपसे भासमान हैं, इसलिये ककुभ हैं। तात्पर्य यह है कि परमानन्दसिन्धु श्रीभगवान् पृथिवीपर अवतीर्ण होकर भी परमानन्दरूपसे ही अभिव्यक्त हैं अर्थात् जो अलुप्तदृक् विशुद्ध परमानन्दघन तत्त्व है, वही पृथिवीमें श्रीनन्दनन्दनरूपसे सुशोभित है; अतः इस रूपमें भी उसका अलुप्तदृक्त्व अक्षुण्ण ही है। अथवा— कं सुखं तद्रूपा कुः पृथिवी भाति यस्मात् असौ ककुभः। अर्थात् 'क' सुखको कहते हैं, अतः जिनके कारण 'कु'—पृथिवी भी सुखस्वरूपा जान पड़ती है, वे भगवान् ककुभ हैं। तात्पर्य यह है कि भगवान्के अलुप्तदृक्त्व और परमानन्दसिन्धुत्वमें तो सन्देह ही क्या है, उसकी सन्निधिसे तो 'कु' शब्दवाच्या पृथिवी भी आनन्दरूपा होकर भास रही है। जिस समय रासलीलासे भगवान् अन्तर्हित हो गये, उस समय श्रीकृष्ण-सौन्दर्यसमास्वादनसे प्रमत्त हुई गोपांगनाएँ वृक्षादिसे उनका पता पूछती हुई अन्तमें पृथिवीसे कहती हैं— किं ते कृतं क्षिति तपो बत केशवाङ्घ्रि- स्पर्शोत्सवोत्पुलकिताङ्गरुहैर्र्विभासि । अप्यङ्घ्रिसम्भव उरुक्रमविक्रमाद् वा आहो वराहवपुषः परिरम्भणेन ॥ (श्रीमद्भा० १०।३०।१०) अर्थात् 'अरी पृथिवी ! तूने ऐसा क्या तप किया है कि जिसके कारण तू श्रीकृष्णचन्द्रके स्पर्शजनित आह्लादसे हुए रोमाँचोंसे सुशोभित है? अथवा श्रीउरुक्रमभगवान्के पादविक्षेपजनित चरणस्पर्शसे या श्रीवराहभगवान्के आलिंगनसे तुझे यह रोमांच हुआ है?' यहाँ सन्देह हो सकता है कि पृथिवी तो जड़ है, उससे ऐसा प्रश्न करना किस प्रकार सार्थक होगा? तो इस सम्बन्धमें मेघदूतके यक्षका दृष्टान्त स्मरण रखना चाहिये। वह भी तो मेघद्वारा अपनी प्रियतमाके पास अपना सन्देश भेज रहा था। बात यह है कि जो विरही होते हैं, उन्हें चेतनाचेतनका विवेक नहीं रहता। प्रियाकी वियोगव्यथासे पीड़ित भगवान् राम भी मानो विरहियोंकी दशाका दिग्दर्शन कराते हुए कहते हैं—'हे चन्द्र ! तुम पहले श्रीजानकीजीका स्पर्शकर उनके अंग-संगसे शीतल हुई किरणोंद्वारा फिर हमारा स्पर्श करो।' इसी प्रकार यहाँ भी पृथिवीसे प्रश्न हो सकता है। विरहिणी व्रजांगनाओंकी दृष्टिमें तो पृथिवी भगवत्सम्बन्धिनी होनेके कारण चेतन ही है। अतः वे पृथिवीसे पूछती हैं—'हे क्षिति ! तुमने ऐसा कौन-सा तप किया है? यदि कहो कि हम तो जड़ हैं, हमारेमें तुम्हें तपका क्या चिह्न दिखायी देता है? तो हमें तो मालूम होता है कि तुमने अवश्य ही कोई बड़ा तप किया है। इसीसे तो तुम्हें भगवान्के चरणस्पर्शका सौभाग्य प्राप्त हुआ है। इससे तुम्हारा आनन्दोद्रेक स्पष्ट प्रकट होता है; क्योंकि बिना आनन्दोद्रेकके रोमांच नहीं होता। अतः परमानन्दकन्द श्रीकृष्णचन्द्रके चरण-स्पर्शजनित उल्लाससे ही तुम
श्रीरासलीलारहस्य २६१ रोमांचित हो रही हो।' यहाँ पृथिवीकी ओरसे यह कहा जा सकता था कि पृथिवीका यह तरुलतारूप रोमांच तो अनादिकालसे है, इसे तुम श्रीकृष्णचन्द्रके चरणस्पर्शसे हुआ कैसे मानती हो? इसपर कहती हैं—'यह तो निश्चय है कि इस प्रकारकी रोमोद्गति भगवच्चरणोंके स्पर्शसे ही हो सकती है; चाहे यह श्रीकृष्णचन्द्रके चरणस्पर्शसे हुई हो अथवा भगवान् उरुक्रमके पादविक्षेपके समय उनके पदस्पर्शसे हुई हो या जिस समय भगवान्ने वाराह-अवतार लेकर तुम्हारा आलिंगन किया था, उस समय उस आलिंगनजनित आनन्दोद्रेकसे यह रोमांच हुआ हो। तुम्हें भगवच्चरणोंका स्पर्श अवश्य हुआ है और तुम हमारे प्राणाधार श्रीनन्दनन्दनका पता भी अवश्य जानती हो; अतः हमपर दयादृष्टि करके हमें उनका पता बतला दो।' पृथिवीका इस प्रकारका सौभाग्य तो परम्परासे है अर्थात् यह सौभाग्य पृथिवीके समस्त देशको प्राप्त नहीं है, बल्कि उसके एक देशको ही है। किंतु जिस प्रकार भगवान् रामके चित्रकूटपर निवास करनेसे 'बिंधि मुदित मन सुख न समाई। श्रम बिनु बिपुल बड़ाई पाई॥' सारा विन्ध्याचल ही सौभाग्यशाली समझा गया, उसी प्रकार यहाँ भी यद्यपि केवल व्रजभूमिको ही भगवान्के चरणस्पर्शका सौभाग्य प्राप्त था; क्योंकि अन्यत्र रथादि या पादत्राणादिका व्यवधान अवश्य रहता था तथापि उसीके कारण सारी पृथिवीकी सौभाग्यश्रीकी सराहना की गयी। व्रजको तो यह सौभाग्य प्राप्त था ही। इसीसे कहा है— 'जयति तेऽधिकं जन्मना व्रजः श्रयत इन्दिरा शश्वदत्र हि।' (श्रीमद्भा० १०।३१।१) अर्थात् आपके प्रादुर्भूत होनेसे व्रज बहुत ही धन्य-धन्य हो रहा है; क्योंकि यहाँ निरन्तर ही लक्ष्मीजीका निवास रहने लगा है। वैकुण्ठकी अधिष्ठात्री महालक्ष्मी वैकुण्ठलोककी सेव्या हैं; किंतु यहाँ तो वे 'श्रयते'—'सेवते' अर्थात् सेवा करती हैं—सेविका हैं। यही नहीं—'वृन्दारण्यं स्वपदरमणं प्राविशद् गीतकीर्तिः॥' (श्रीमद्भा० १०।२१।५) कहकर तो स्पष्ट ही वृन्दारण्यकी शोभामें भगवच्चरणोंका ही कारणत्व निर्देश किया गया। अतः सिद्ध हुआ कि जिसके कारण अर्थात् जिनका चरणस्पर्श पाकर 'कु'—पृथिवी भी परमानन्दमयी हो रही है, वे श्रीभगवान् ही ककुभ हैं। अथवा 'कः ब्रह्मापि कुत्सितो भाति यस्मात् असौ ककुभः' अर्थात् जिनकी अपेक्षा ब्रह्मा भी कुत्सित ही प्रतीत होता है, वे भगवान् ही ककुभ हैं। ऐसी स्थितिमें उनकी सर्वज्ञता और अलुप्तदृक्ततामें तो सन्देह ही क्या है? ऐसे अचिन्त्यानन्दैश्वर्यशाली श्रीभगवान् व्रजांगनाओंके रमणके लिये वृन्दारण्यमें कैसे आये? इसपर कहते हैं—'के ब्रह्मणि कौ कुत्सिते अस्मदादा- वपि समान एव भातीति ककुभः' अर्थात् वे भगवान् ब्रह्मा और हम-जैसे कुत्सितोंमें भी समान रूपसे ही विराजमान हैं, इसलिये ककुभ कहे जाते हैं; क्योंकि भगवान्की दृष्टिमें उत्कृष्ट-अपकृष्टका भेद नहीं है। भला जबकि भगवान्के स्वरूपका अपरोक्ष साक्षात्कार करनेवाले मुनियोंकी भी ऐसी स्थिति होती है कि 'साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते॥' (गीता ६।९) तो फिर स्वयं भगवान्में विषमदृष्टि क्यों होने लगी? भगवान् तो समस्वरूप हैं—'निर्दोषं हि समं ब्रह्म' (गीता ५।१९) वे केवल वरणमात्रसे ही भेददृष्टिवालेसे जान पड़ते हैं। जिसने परप्रेमास्पदरूपसे उनका वरण किया है, उसीको—'ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।' (गीता ४।११) इस नियमके अनुसार वे आत्मीयरूपसे स्वीकार करते हैं। श्रीगोसाईंजी महाराज कहते हैं— जद्यपि सम नहिं राग न रोषू। गहहिं न पाप पूनु गुन दोषू॥ तदपि करहिं सम बिषम बिहारा। भगत अभगत हृदय अनुसारा॥ (रा०च०मा० २।२१९।३,५) तात्पर्य यह है कि भगवान्के सम-विषम व्यवहारमें भक्तका हृदय ही हेतु है। परम करुणामय
२७० भक्तिसुधा श्रीभगवान्की परमभास्वती अचिन्त्य कृपा अपार है। किंतु जिसने उसका प्राकट्य कर लिया है, उसे ही उसकी उपलब्धि होती है। इसका उपाय यही है कि उस परम प्रेमास्पद तत्त्वको स्वकीय रूपसे वरण करे, उसकी प्रार्थना करे और उसे आत्मसमर्पण करे। बस, इसीसे वह भगवत्कृपा प्रकट हो जायगी। इस प्रकार परमकरुण और कृपालु श्रीहरि हम-जैसे कुत्सितोंकी मनोरथपूर्तिके लिये भी सब प्रकार कृपा करते हैं। दूसरे श्लोककी एक अन्य प्रकारकी व्याख्या अब एक दूसरी दृष्टिसे इस श्लोकके अर्थका विचार करते हैं। प्रथम श्लोककी व्याख्यामें एक स्थानपर कहा गया था—शरदोत्फुल्लमल्लिकाके समान आपातरमणीय सुखोंमें ही आसक्त 'ता रात्रीः' अज्ञानरूप अन्धकारसे व्याप्त उस प्राकृत प्रजाको देखकर भगवान्ने रमण करनेकी इच्छा की। जिस समय भगवान्ने अज्ञानियोंके हृदयारण्यमें रमण करनेकी इच्छा की, उस समय उसे रमणार्ह बनानेके लिये उनके हृदयाकाशमें वैदिक श्रौत-स्मार्तधर्मरूप चन्द्रमाका उदय हुआ; क्योंकि जबतक वर्णाश्रमधर्मका आचरण करके मन शुद्ध नहीं होगा, तबतक वह भगवत्- क्रीड़ाका क्षेत्र बननेयोग्य नहीं हो सकता। हृदयकी शुद्धिका प्रधान हेतु वैदिक श्रौत-स्मार्तकर्मोंका आचरण ही है। जैसे चन्द्रोदयसे वृन्दारण्य भगवत्क्रीड़ाके योग्य होता है, उसी प्रकार वैदिक श्रौत-स्मार्त कर्मोंका अनुष्ठान करनेसे मनुष्यका हृदय भगवान्की विहारभूमि बन सकता है। इसमें 'उडुराजः' का अर्थ एक तो चन्द्रमा ही ठीक है, दूसरे 'रलयोः डलयोश्चैव' इत्यादि नियमके अनुसार पहले 'ड' और 'ल' का सावर्ण्य होनेसे 'उलुराजः' और फिर 'ल' और 'र' का सावर्ण्य होनेने 'उरुराजः' माना जाय तो 'उरुधा राजत इति उरुराजः' ऐसा विग्रह करके यह अर्थ करेंगे कि यजमान, ऋत्विक्, द्रव्य एवं देवतारूपसे अनेक प्रकार सुशोभित होनेवाला यज्ञ ही उरुराज है। धर्मके स्वरूप ये ही हैं। पहले हम कह चुके हैं कि अवयवी अवयवोंसे अभिन्न होता है। अतः धर्मके अंग होनेके कारण ये यजमानादि धर्मरूप ही हैं। 'अष्टादशोक्तमवरं येषु कर्म।' (मुण्डक० १।२।७) इस वाक्यके अनुसार कर्म अनेकविध साधनसाध्य ही हैं। इनमें द्रव्य और देवता तो कर्मके आन्तरिक साधन हैं और ऋत्विक्-यजमानादि उसके सम्पादक होनेके कारण बहिरंग हैं। इस प्रकार यह वैदिक श्रौत-स्मार्तकर्म ही चन्द्र है। वह जिस हृदयमें उदित होता है, उसे ही शुद्ध करके भगवान्की क्रीड़ाभूमि बना देता है। वह उडुराज कैसा है? 'ककुभः—के स्वर्गे कौ पृथिव्यां भातीति ककुभः' अर्थात् यह धर्म स्वर्ग और पृथिवीमें समानरूपसे भासता है। यह सारा प्रपंच धर्मका ही कार्य है, यदि धर्म न हो तो यह सब उच्छिन्न हो जाय। धर्मके बिना न यह लोक है और न परलोक ही। 'नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम॥' (गीता ४।३१) अतः धर्म ही देवताओंका रक्षक है और धर्म ही मनुष्योंका। इसीसे भगवान्ने कहा है— देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः। परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ॥ (गीता ३।११) अर्थात् 'इस वैदिक श्रौत-स्मार्तकर्मसे तुम देवताओंको सन्तुष्ट करो और देवता तुम्हारा पालन करें। इस प्रकार परस्पर परितुष्ट करते हुए ही तुम परम श्रेय अर्थात् मोक्ष प्राप्त कर सकोगे।' इस प्रकार साधारण स्वर्गादि ही नहीं, मोक्ष-प्राप्तिमें भी यह वर्णाश्रमधर्म ही मुख्य हेतु है; क्योंकि बिना वर्णाश्रमधर्मका यथावत् आचरण किये चित्तशुद्धि नहीं हो सकती, बिना चित्तशुद्धिके जिज्ञासा नहीं होगी, बिना जिज्ञासाके ज्ञान नहीं होगा और ज्ञानके बिना मोक्ष नहीं हो सकता। इसीसे यह भी बतलाया है कि 'यतोऽभ्युदयनिः- श्रेयससिद्धिः स धर्मः' अर्थात् जिससे अभ्युदय
श्रीरासलीलारहस्य २७१ (लौकिक उन्नति) और निःश्रेयस (पारलौकिक परमोन्नति)-की सिद्धि होती है, वही धर्म है तथा ‘ध्रियते अभ्युदयनिःश्रेयसौ अनेनेति धर्मः' इस व्युत्पत्तिके अनुसार भी धर्म ही अभ्युदय और निःश्रेयसका धारण करनेवाला है। वस्तुतः वैदिक श्रौत-स्मार्तकर्म ही सम्पूर्ण प्रपंचको धारण करनेवाला है; इसीसे कहा है—‘धारणाद्धर्ममित्याहुः’ अर्थात् धारण करनेके कारण ही इसे धर्म कहते हैं। अतः शास्त्रानुमोदित वर्णाश्रमधर्मका यथावत् आचरण करनेसे ही मनुष्य सब प्रकारकी सिद्धि प्राप्त कर सकता है और यही भगवत्पूजनका मुख्य प्रकार है—'स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ॥' (गीता १८।४६) इसीके द्वारा मनुष्य अन्तःकरणशुद्धिरूपा, भगवद्भक्तिरूपा और भगवज्ज्ञानलक्षणा सिद्धियाँ प्राप्त कर सकता है। अतः जिसके हृदयमें भगवान् रमण करना चाहते हैं, उसके हृदयमें पहले इस वर्णाश्रम-धर्मरूप चन्द्रका ही उदय होता है। इस उडुराजके ‘प्रियः’ और ‘दीर्घदर्शनः’—ये दोनों विशेषण हैं। वह उडुराज कैसा है ? 'प्रियः'—सबका प्रिय; क्योंकि सभी प्राणी सुख चाहते हैं और सुखका साधन धर्म है। जो लोग ऐहिक अथवा आमुष्मिक सुख चाहते हैं, उन्हें धर्मका आश्रय लेना चाहिये; क्योंकि उसकी प्राप्तिका साधन धर्म ही है। इसीसे बुद्धिमान् सुखकी परवाह न करके धर्मानुष्ठानपर ही जोर देते हैं; क्योंकि वे जानते हैं कि साधन होनेपर साध्यकी प्राप्ति हो ही जायगी। अतः जहाँ धर्म होगा, वहाँ सुख उपस्थित हो जायगा। श्रीगोसाईंजी महाराज कहते हैं— तिमि सुख संपति बिनहिं बोलाएँ। धरमसील पहिं जाहिं सुभाएँ॥ (रा०च०मा० १।२९४।३) अर्थात् जहाँ धर्म है, वहाँ सब प्रकारके सुख और वैभवको आज नहीं तो कल अवश्य जाना पड़ेगा। यही नहीं, भगवान्को भी धर्म ही प्रिय है, इसीसे वे स्वयं कहते हैं—‘धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥' (गीता ४।८) अर्थात् मैं युग-युगमें धर्मकी सम्यक् प्रकारसे स्थापना करनेके लिये जन्म ग्रहण करता हूँ। यद्यपि सर्वशक्तिमान् होनेके कारण वे बिना अवतीर्ण हुए भी धर्मकी स्थापना कर सकते थे तथापि अपनी इस परम प्रेमास्पद वस्तुकी रक्षाके लिये उनसे अवतीर्ण हुए बिना नहीं रहा जाता; वस्तुतः प्रेमावेश ऐसा ही होता है। इस विषयमें एक आख्यायिका भी प्रसिद्ध है। प्रेमी भक्तकी रक्षाके लिये भगवान् स्वयं ही अवतीर्ण होते हैं—एक दृष्टान्त कहते हैं—एक बार किसी सम्राट्ने किसी बुद्धिमान्से कहा कि ‘यदि भगवान् सर्वशक्तिमान् हैं तो धर्म और भक्तोंकी रक्षाके लिये अवतार क्यों लेते हैं; इस कार्यको वे अपने संकल्पमात्रसे ही क्यों नहीं कर डालते अथवा उनके बहुत-से सेवक भी हैं, उन्हींसे इसे पूरा क्यों नहीं करा देते?' इसपर उस बुद्धिमान्ने उत्तर देनेके लिये एक मासका अवकाश माँगा। सम्राट्का एक अति सुन्दर पुत्र था, उसके प्रति सम्राट्का अत्यन्त स्नेह था। बुद्धिमान्ने ठीक उसीके आकारकी एक मोमकी मूर्ति बनवायी और एक दिन, जिस समय सम्राट् अपने बहुत-से सेवक और साथियोंके सामने महलके तालाबमें स्नान कर रहे थे, उस समय उस पण्डितने उस मोमके पुतलेको दुलार करते हुए तालाबकी ओर ले जाकर उसे जलमें गिरा दिया। अपने लाड़ले लालको तालाबमें गिरा जान सम्राट् उसकी प्राणरक्षाके लिये तुरंत तालाबमें कूद पड़े और वहाँ अपने पुत्रकी आकृतिका एक पुतलामात्र देखकर पण्डितसे इस अशिष्टताका कारण पूछा। पण्डितने कहा—‘महाराज ! यह आपके प्रश्नका उत्तर है; जिस प्रकार आपने बहुत-से दरबारी और दास- दासियोंके रहते हुए भी राजकुमारके मोहवश आपके ध्यानमें इस कामके लिये किसीको आज्ञा देनेकी बात नहीं आयी, उसी प्रकार भगवान् भी अपने अत्यन्त प्रिय भक्त या धर्मको संकटमें पड़ा देखकर स्वयं अवतीर्ण हुए बिना नहीं रह सकते।' इस प्रकार यह धर्मचन्द्र प्रिय है। इसके सिवा यही भगवत्प्राप्तिका भी असाधारण हेतु है; क्योंकि
२७२ भक्तिसुधा यह वर्णाश्रम-धर्म ही भगवान्की आराधनाका प्रधान साधन है, इसके सिवा किसी और साधनसे उनकी प्रसन्नता नहीं हो सकती— वर्णाश्रमाचारवता पुरुषेण परः पुमान्। विष्णुराराध्यते पन्था नान्यस्तत्तोषकारकः॥ (श्रीविष्णुपुराण ३।८।९) तथा भगवद्भक्ति ही तत्त्वज्ञानका प्रधान हेतु है; अतः परम्परासे ज्ञानका साधन भी यह धर्मचन्द्र ही है। यह बात सर्वथा सुनिश्चित है कि निर्गुण परमात्माकी प्राप्ति मन, बुद्धि, प्राण और इन्द्रियोंकी निश्चलता होनेपर ही हो सकती है। इसीसे भगवती श्रुति कहती है— यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह। बुद्धिश्च न विचेष्टति तामाहुः परमां गतिम्॥ (कठ० २।३।१०) अर्थात् ‘जिस समय मनके सहित पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ स्थिर हो जाती हैं तथा बुद्धि भी चेष्टा नहीं करती, उसी अवस्थाको परमगति कहते हैं।' किंतु आरम्भमें यह इन्द्रियादिकी निश्चेष्टता अत्यन्त दुःसाध्य है। अतः पहले वैदिक श्रौत-स्मार्त कर्मोंका अनुष्ठान करके अपने देह और इन्द्रियादिकी उच्छृंखल चेष्टाओंको सुसंयत करना चाहिये, तभी उनका निरोध करना भी सम्भव होगा। इसके सिवा और भी यह चन्द्र कैसा है? 'दीर्घदर्शनः—दीर्घेण कालेन फलात्मना दर्शनं यस्य इति दीर्घदर्शनः'। अर्थात् जिसका दीर्घकाल पश्चात् फलरूपसे दर्शन होता है; क्योंकि कर्मफल होनेमें भी कुछ देरी अवश्य होती है; अथवा कीट- पतंगादि अनेक योनियोंके पश्चात् जब जीवको मनुष्ययोनि प्राप्त होती है और उनमें भी जब उसका जन्म ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य—इन तीन वर्णोंके अन्तर्गत होता है, तब उसे इस धर्मचन्द्रका दर्शन होता है; क्योंकि उसी समय उसे वैदिक श्रौत-स्मार्तधर्मोंका आचरण करनेका अधिकार प्राप्त होता है। इसलिये भी वह दीर्घदर्शन है। अथवा 'दीर्घमनपबाध्यं दर्शनं यस्य स दीर्घदर्शनः' अर्थात् जिसका दर्शन दीर्घ—अबाध्य है ऐसा यह धर्मचन्द्र है; क्योंकि धर्मका ज्ञान वेदोंसे होता है और उनका प्रामाण्य किसीसे बाधित नहीं है। वह धर्मचन्द्र किस प्रकार प्रकट हुआ? 'स उडुराजः चर्षणीनामधिकारिजनानां शुचः तत्तद- भिलषिताप्राप्तिजन्या आर्तीः शान्तमैः सुखमयैः करैः सुखप्रदैश्च स्वर्गादिफलैर्मृजन् दूरीकुर्वन्नुदगात्' अर्थात् वह चन्द्रमा अधिकारी पुरुषोंकी अपने अभिलषित पदार्थोंकी अप्राप्तिके कारण होनेवाली दीनताको स्वर्गादि सुखमय और सुखप्रद फलोंद्वारा निवृत्त करता हुआ प्रकट हुआ। साथ ही स्वाभाविक कामकर्मरूप आर्ति भी आर्तिकी जननी होनेके कारण आर्ति ही है। उसका मार्जन करता हुआ भी प्रकट हुआ। इस पक्षमें यह समझना चाहिये कि जो सुखरूप और सुखप्रद शास्त्रीय काम-कर्मादि हैं, उनसे स्वाभाविक काम- कर्मादिकी निवृत्ति होती है। और क्या करता हुआ प्रकट हुआ? 'यथा प्रियः श्रीकृष्णः प्रियायाः श्रीवृषभानु- नन्दिन्याः मुखमरुणेन विलिम्पन्नुदगात् एवमेवाय- मपि प्रियो दीर्घदर्शनञ्च उडुराजोऽरुणेन कर्मजन्येन सुखेन तद्रागेण वा प्राच्याः प्राचीनाया बुद्धेः मुखं सत्त्वात्मकं भागं विलिम्पन् तद्गतदुःखं दूरीकुर्वन्नु- दगात्।' जिस प्रकार प्रियतम भगवान् कृष्ण अपनी प्रियतमा श्रीवृषभानुनन्दिनीके मुखको अपने करधृत कुंकुमसे अनुरंजित करते प्रकट हुए थे, उसी प्रकार यह प्रिय और दीर्घदर्शन चन्द्र भी अरुण-कर्मजनित सुख अथवा उसके रागसे प्राची—प्राग्भवा बुद्धिके सत्त्वात्मक भागको लेपित करते हुए अर्थात् उसके दुःखको दूर करते हुए प्रकट हुए अथवा यों समझो कि 'प्राच्याः अविवेकदशायाः मुखं जाड्यं स्वजनितेन नित्यानित्यविवेकेन तिरस्कुर्वन्नुदगात्' अर्थात् बुद्धिकी जो अविवेकदशा है, उसके मुख
यानी जड़ताको अपनेसे उत्पन्न हुए नित्यानित्यविवेकसे तिरस्कृत करता हुआ प्रकट हुआ; क्योंकि वैदिक श्रौत-स्मार्तकर्मोंका अनुष्ठान करनेसे चित्त शुद्ध होता है। इससे नित्यानित्यवस्तु विवेक होता है और विवेकसे बुद्धिकी जड़ता निवृत्त होती है। प्रथम श्लोकमें जहाँ 'ताः' पदसे मुमुक्षुरूपा प्रजा ग्रहण की गयी है, वहाँ इस श्लोकका तात्पर्य इस प्रकार लगाना चाहिये कि जिस समय भगवान्ने मुमुक्षुरूपा प्रजाओंके हृदयारण्यमें श्रुतिरूपा व्रजांगनाओंका आवाहनकर उनके साथ रमण करनेका विचार किया, उसी समय उस हृदयारण्यको अतिशय सुशोभित करनेके लिये 'उडुराजः विवेकचन्द्रः उदगात्'— उडुराज यानी विवेकरूप चन्द्रमा उदित हुआ। उस विवेकरूप चन्द्रको उडुराज क्यों कहा है ? इसपर कहते हैं—उडुस्थानीयासु किञ्चित्प्रकाशनशीला- स्वन्तःकरणवृत्तिषु शमदमादिरूपासु वा राजते अतिशयेन दीप्यते इति उडुराजः'—क्योंकि वह उडुस्थानीया मन्द प्रकाशमयी अथवा शमदमादिरूपा अन्तःकरणकी वृत्तियोंमें राजमान—अतिशय देदीप्यमान है, इसलिये उडुराज है। यह विवेकचन्द्र उन सबकी अपेक्षा अधिक शोभाशाली है; क्योंकि यह सर्ववृत्तिवेद्य परमतत्त्वका अवद्योतक है अथवा यों समझो कि जिसके अन्तर्गत समस्त वृत्तिवेद्य वस्त्वन्तर है, यह विवेकचन्द्र उसका ज्ञान कराता है; अथवा समस्त वृत्तियाँ, उनके विषय तथा आश्रय अर्थात् प्रमाता, प्रमेय और प्रमाण—इन सबका अवभासक जो परमतत्त्व है—उसका इस विवेकचन्द्रसे ही बोध होता है, इसलिये यह उडुराज है अथवा शान्तिदान्तिरूपा जो चित्तवृत्तियाँ हैं वे उडुस्थानीया हैं, उनकी शोभा इस विवेकचन्द्रके पूर्णतया उदित होनेपर ही होती है, बिना विवेकके उनमें भी पूर्णता नहीं आती, इसलिये यह उडुराज है। अथवा 'रलयोः डलयोश्चैव' इत्यादि नियमके अनुसार 'उरुधा राजते शोभते इति उरुराजः'— जो अनेक प्रकारसे सुशोभित होता है, वह उरुराज ही उडुराज है। विवेकके चार भेद हैं—साध्यालम्बन, साधनालम्बन, ऐक्यालम्बन और निर्विकल्पालम्बन। इस प्रकार अनेकों तरहसे सुशोभित होनेके कारण वह उरुराज है। 'त्वं' पदार्थके यथार्थ स्वरूपका साक्षात्कार करना साधनालम्बन विवेक है। पंचभूत- विवेकपूर्वक 'तत्' पदार्थके वास्तविक स्वरूपका साक्षात् रूपसे अनुभव करना साध्यालम्बन विवेक है। 'तत्' और 'त्वं' पदार्थोंका ऐक्य निश्चय करना ऐक्यालम्बन विवेक है तथा त्वं पदार्थकी उपाधि देहादि तथा तत् पदार्थकी उपाधि स्थूल, सूक्ष्म एवं कारण प्रपंचादि—इन दोनों प्रकारके विकल्पोंको सबके अधिष्ठानभूत स्वप्रकाश परब्रह्ममें लीन करके जो निर्विकल्प वस्तुका ज्ञान होता है, वह निर्विकल्पालम्बन विवेक है। यहाँ कोई कह सकता है कि विवेक तो दो मिश्रित वस्तुओंके पार्थक्यकरणका नाम है; किंतु यहाँ निर्विकल्पावस्थामें तो समस्त प्रपंचका अस्तित्व ही नहीं रहता। ऐसी अवस्थामें किससे किसका विवेक किया जायगा ? इस विषयमें ऐसा समझना चाहिये कि सम्मिश्रण सर्वदा सत्य पदार्थोंका ही नहीं हुआ करता, सत्य और मिथ्या पदार्थोंका भी हो सकता है। यदि सत्य पदार्थोंका ही सम्मिश्रण होता तो वे विवेकके पश्चात् भी बने ही रहते; किंतु जहाँ सत्य और असत्य पदार्थोंका मेल है, वहाँ तो विवेकके अनन्तर असत्यका निवृत्त हो जाना ही भूषण है। इस प्रकार निर्विकल्पालम्बन विवेक भी सम्भव है ही। अथवा 'उरुतया विस्तीर्णतया राजते शोभते इति उरुराजः' क्योंकि पूर्णरूपसे राजमान तत्त्व- विवेक ही है। जो अन्तःकरण विवेकरहित है, वह पूर्णतया अनर्थशून्य नहीं हो सकता। सभी प्रकारके अनर्थोंकी निवृत्ति विवेक होनेपर ही तो की जाती है; जैसा कि कहा है— सर्पान् कुशाग्राणि तथोदकानि ज्ञात्वा मनुष्याः परिवर्जयन्ति।
२७४ भक्तिसुधा
अज्ञानतस्तत्र पतन्ति चान्ये ज्ञाने फलं पश्य यथा विशिष्टम्॥ अर्थात् ज्ञानमें किस प्रकार विशेष फल है, वह इसीसे समझ लो कि लोग सर्प, कुशा और जलाशय आदिका ज्ञान होनेपर ही उनसे बचते हैं, उनका पता न होनेपर तो वे उनके शिकार हो ही जाते हैं। इसी प्रकार विवेकसे ही मनुष्यकी प्रवृत्ति भगवत्तत्त्वमें होती है। यदि विवेक न हो तो कौन प्रेमास्पद है और कौन त्याज्य है—इसका ज्ञान ही कैसे हो? अतः जो हृदयारण्य विवेकचन्द्रकी शीतल और सुकोमल किरणोंसे अनुरंजित नहीं हुआ, उसमें भगवान्का प्राकट्य होना असम्भव है। इसलिये भगवत्साक्षात्कारके लिये अन्तःकरणमें विवेकरूप चन्द्रका प्रादुर्भाव अवश्य होना चाहिये। जो लोग इस विवेकचन्द्रको भगवद्भक्तिका बाधक समझते हैं, उनके विषयमें क्या कहा जाय? उनके सिद्धान्तानुसार यदि द्वैतस्थिति ही परमकल्याणका हेतु है तो वह तो कीट-पतंग सभीको प्राप्त ही है। अतः वे सभी परमकल्याणके भागी होने चाहिये। वस्तुतः प्रेमका कारण तो अपने परप्रेमास्पदत्वका ज्ञान ही है। यदि हमारी दृष्टिमें अपने प्रेमास्पदसे भिन्न अन्य पदार्थोंकी भी सत्ता रहेगी तो हमारा प्रेम उनमें भी बँटा रहेगा और यदि वे सब-के-सब अपने प्रेमास्पदमें ही लीन हो जायेंगे तो हमारा सारा प्रेम सिमटकर एकमात्र उस अपने आराध्यदेवमें ही पुंजीभूत हो जायगा। प्रेमका नाश तो होगा नहीं; क्योंकि वह आत्मस्वरूप है। अतः निर्विकल्पालम्बनविवेकसम्पन्न हुए बिना तो ठीक-ठीक भगवत्प्रेम हो ही नहीं सकता। एक बात ध्यान देनेकी और भी है। निरतिशय प्रेम सदा 'त्वं' पदार्थके लिये ही हुआ करता है; अपने आराध्यदेवमें भी जो प्रेम होता है, वह आत्मीय होनेके ही नाते होता है। इसीसे भगवती श्रुति कहती है— 'न वा अरे देवानां कामाय देवाः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय देवाः प्रिया भवन्ति।' (बृहदारण्यक० ४।५।६) अर्थात् हे मैत्रेयी! देवता लोग देवताओंके लिये प्रिय नहीं होते; बल्कि अपने ही लिये प्रिय होते हैं। जो उपासक अपनेको भगवान्से भिन्न समझते हैं, वे किसलिये उनमें प्रेम करते हैं? इसीलिये न कि ऐसा करनेसे हमारा कल्याण होगा अथवा ऐसा करनेमें ही हमें आनन्द आता है; अतः उनका वह भगवत्प्रेम भी आत्मतुष्टिके ही लिये होता है। जिन महानुभावोंका ऐसा कथन है कि हमारा सिद्धान्त तो तत्सुखित्व अर्थात् भगवान्के सुखमें सुखी रहना है; वे भी इसीलिये तो भगवत्सुखमें सुखी हैं, न कि उन्हें उसीमें सुख मिलता है। इस प्रकार यदि यह नियम है कि आत्माके लिये ही सब कुछ प्रिय होता है तो जो उपासक अपनेसे भिन्न मानकर किसी उपास्यकी उपासना करता है, वह भी वास्तवमें तो अपने सुखके लिये ही ऐसा करता है। इस प्रकार उसका उपास्य उसके सुखका शेषभूत हो जाता है, किंतु परप्रेमास्पद तो शेषी ही हुआ करता है, शेष नहीं होता। वह तो शेषीका शेष होनेके कारण आपेक्षिक प्रेमका ही आस्पद होता है। आत्यन्तिक प्रेमका आस्पद तो शेषी ही होता है। अतः हम जिस किसी भी तत्त्वको अपनेसे भिन्न मानेंगे, वह हमारे परप्रेमका आस्पद नहीं होगा। बल्कि जिसे हम अपनेसे भिन्न मानेंगे, वह हमें अपना शत्रु समझकर अपने परम स्वार्थसे च्युत कर देगा; क्योंकि अपनेसे भिन्न कोई भी पदार्थ माननेपर द्वैत हो जाता है और थोड़ेसे भी द्वैतको श्रुति भयका कारण बतलाती है—'उदरमन्तरं कुरुते। अथ तस्य भयं भवति।' (तैत्तिरीय० २।७) यदि कोई सभीको अपनेसे भिन्न समझता है तो सभी उसका तिरस्कार करने लगते हैं; जैसा कि श्रुति कहती है—'सर्वं तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनः सर्वं वेद।' (बृहदारण्यक० २।४।६) इसपर कोई-कोई महानुभाव कहा करते हैं कि अनुकूलोंमें भेद रहनेपर भी भय नहीं होता, किंतु अनुकूलता सदा बनी ही रहेगी, इसमें भी तो कोई प्रमाण नहीं है। आज अनुकूलता है तो कल