भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयानी जड़ताको अपनेसे उत्पन्न हुए नित्यानित्यविवेकसे तिरस्कृत करता हुआ प्रकट हुआ; क्योंकि वैदिक श्रौत-स्मार्तकर्मोंका अनुष्ठान करनेसे चित्त शुद्ध होता है। इससे नित्यानित्यवस्तु विवेक होता है और विवेकसे बुद्धिकी जड़ता निवृत्त होती है। प्रथम श्लोकमें जहाँ 'ताः' पदसे मुमुक्षुरूपा प्रजा ग्रहण की गयी है, वहाँ इस श्लोकका तात्पर्य इस प्रकार लगाना चाहिये कि जिस समय भगवान्ने मुमुक्षुरूपा प्रजाओंके हृदयारण्यमें श्रुतिरूपा व्रजांगनाओंका आवाहनकर उनके साथ रमण करनेका विचार किया, उसी समय उस हृदयारण्यको अतिशय सुशोभित करनेके लिये 'उडुराजः विवेकचन्द्रः उदगात्'— उडुराज यानी विवेकरूप चन्द्रमा उदित हुआ। उस विवेकरूप चन्द्रको उडुराज क्यों कहा है ? इसपर कहते हैं—उडुस्थानीयासु किञ्चित्प्रकाशनशीला- स्वन्तःकरणवृत्तिषु शमदमादिरूपासु वा राजते अतिशयेन दीप्यते इति उडुराजः'—क्योंकि वह उडुस्थानीया मन्द प्रकाशमयी अथवा शमदमादिरूपा अन्तःकरणकी वृत्तियोंमें राजमान—अतिशय देदीप्यमान है, इसलिये उडुराज है। यह विवेकचन्द्र उन सबकी अपेक्षा अधिक शोभाशाली है; क्योंकि यह सर्ववृत्तिवेद्य परमतत्त्वका अवद्योतक है अथवा यों समझो कि जिसके अन्तर्गत समस्त वृत्तिवेद्य वस्त्वन्तर है, यह विवेकचन्द्र उसका ज्ञान कराता है; अथवा समस्त वृत्तियाँ, उनके विषय तथा आश्रय अर्थात् प्रमाता, प्रमेय और प्रमाण—इन सबका अवभासक जो परमतत्त्व है—उसका इस विवेकचन्द्रसे ही बोध होता है, इसलिये यह उडुराज है अथवा शान्तिदान्तिरूपा जो चित्तवृत्तियाँ हैं वे उडुस्थानीया हैं, उनकी शोभा इस विवेकचन्द्रके पूर्णतया उदित होनेपर ही होती है, बिना विवेकके उनमें भी पूर्णता नहीं आती, इसलिये यह उडुराज है। अथवा 'रलयोः डलयोश्चैव' इत्यादि नियमके अनुसार 'उरुधा राजते शोभते इति उरुराजः'— जो अनेक प्रकारसे सुशोभित होता है, वह उरुराज ही उडुराज है। विवेकके चार भेद हैं—साध्यालम्बन, साधनालम्बन, ऐक्यालम्बन और निर्विकल्पालम्बन। इस प्रकार अनेकों तरहसे सुशोभित होनेके कारण वह उरुराज है। 'त्वं' पदार्थके यथार्थ स्वरूपका साक्षात्कार करना साधनालम्बन विवेक है। पंचभूत- विवेकपूर्वक 'तत्' पदार्थके वास्तविक स्वरूपका साक्षात् रूपसे अनुभव करना साध्यालम्बन विवेक है। 'तत्' और 'त्वं' पदार्थोंका ऐक्य निश्चय करना ऐक्यालम्बन विवेक है तथा त्वं पदार्थकी उपाधि देहादि तथा तत् पदार्थकी उपाधि स्थूल, सूक्ष्म एवं कारण प्रपंचादि—इन दोनों प्रकारके विकल्पोंको सबके अधिष्ठानभूत स्वप्रकाश परब्रह्ममें लीन करके जो निर्विकल्प वस्तुका ज्ञान होता है, वह निर्विकल्पालम्बन विवेक है। यहाँ कोई कह सकता है कि विवेक तो दो मिश्रित वस्तुओंके पार्थक्यकरणका नाम है; किंतु यहाँ निर्विकल्पावस्थामें तो समस्त प्रपंचका अस्तित्व ही नहीं रहता। ऐसी अवस्थामें किससे किसका विवेक किया जायगा ? इस विषयमें ऐसा समझना चाहिये कि सम्मिश्रण सर्वदा सत्य पदार्थोंका ही नहीं हुआ करता, सत्य और मिथ्या पदार्थोंका भी हो सकता है। यदि सत्य पदार्थोंका ही सम्मिश्रण होता तो वे विवेकके पश्चात् भी बने ही रहते; किंतु जहाँ सत्य और असत्य पदार्थोंका मेल है, वहाँ तो विवेकके अनन्तर असत्यका निवृत्त हो जाना ही भूषण है। इस प्रकार निर्विकल्पालम्बन विवेक भी सम्भव है ही। अथवा 'उरुतया विस्तीर्णतया राजते शोभते इति उरुराजः' क्योंकि पूर्णरूपसे राजमान तत्त्व- विवेक ही है। जो अन्तःकरण विवेकरहित है, वह पूर्णतया अनर्थशून्य नहीं हो सकता। सभी प्रकारके अनर्थोंकी निवृत्ति विवेक होनेपर ही तो की जाती है; जैसा कि कहा है— सर्पान् कुशाग्राणि तथोदकानि ज्ञात्वा मनुष्याः परिवर्जयन्ति।