भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७२ भक्तिसुधा यह वर्णाश्रम-धर्म ही भगवान्की आराधनाका प्रधान साधन है, इसके सिवा किसी और साधनसे उनकी प्रसन्नता नहीं हो सकती— वर्णाश्रमाचारवता पुरुषेण परः पुमान्। विष्णुराराध्यते पन्था नान्यस्तत्तोषकारकः॥ (श्रीविष्णुपुराण ३।८।९) तथा भगवद्भक्ति ही तत्त्वज्ञानका प्रधान हेतु है; अतः परम्परासे ज्ञानका साधन भी यह धर्मचन्द्र ही है। यह बात सर्वथा सुनिश्चित है कि निर्गुण परमात्माकी प्राप्ति मन, बुद्धि, प्राण और इन्द्रियोंकी निश्चलता होनेपर ही हो सकती है। इसीसे भगवती श्रुति कहती है— यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह। बुद्धिश्च न विचेष्टति तामाहुः परमां गतिम्॥ (कठ० २।३।१०) अर्थात् ‘जिस समय मनके सहित पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ स्थिर हो जाती हैं तथा बुद्धि भी चेष्टा नहीं करती, उसी अवस्थाको परमगति कहते हैं।' किंतु आरम्भमें यह इन्द्रियादिकी निश्चेष्टता अत्यन्त दुःसाध्य है। अतः पहले वैदिक श्रौत-स्मार्त कर्मोंका अनुष्ठान करके अपने देह और इन्द्रियादिकी उच्छृंखल चेष्टाओंको सुसंयत करना चाहिये, तभी उनका निरोध करना भी सम्भव होगा। इसके सिवा और भी यह चन्द्र कैसा है? 'दीर्घदर्शनः—दीर्घेण कालेन फलात्मना दर्शनं यस्य इति दीर्घदर्शनः'। अर्थात् जिसका दीर्घकाल पश्चात् फलरूपसे दर्शन होता है; क्योंकि कर्मफल होनेमें भी कुछ देरी अवश्य होती है; अथवा कीट- पतंगादि अनेक योनियोंके पश्चात् जब जीवको मनुष्ययोनि प्राप्त होती है और उनमें भी जब उसका जन्म ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य—इन तीन वर्णोंके अन्तर्गत होता है, तब उसे इस धर्मचन्द्रका दर्शन होता है; क्योंकि उसी समय उसे वैदिक श्रौत-स्मार्तधर्मोंका आचरण करनेका अधिकार प्राप्त होता है। इसलिये भी वह दीर्घदर्शन है। अथवा 'दीर्घमनपबाध्यं दर्शनं यस्य स दीर्घदर्शनः' अर्थात् जिसका दर्शन दीर्घ—अबाध्य है ऐसा यह धर्मचन्द्र है; क्योंकि धर्मका ज्ञान वेदोंसे होता है और उनका प्रामाण्य किसीसे बाधित नहीं है। वह धर्मचन्द्र किस प्रकार प्रकट हुआ? 'स उडुराजः चर्षणीनामधिकारिजनानां शुचः तत्तद- भिलषिताप्राप्तिजन्या आर्तीः शान्तमैः सुखमयैः करैः सुखप्रदैश्च स्वर्गादिफलैर्मृजन् दूरीकुर्वन्नुदगात्' अर्थात् वह चन्द्रमा अधिकारी पुरुषोंकी अपने अभिलषित पदार्थोंकी अप्राप्तिके कारण होनेवाली दीनताको स्वर्गादि सुखमय और सुखप्रद फलोंद्वारा निवृत्त करता हुआ प्रकट हुआ। साथ ही स्वाभाविक कामकर्मरूप आर्ति भी आर्तिकी जननी होनेके कारण आर्ति ही है। उसका मार्जन करता हुआ भी प्रकट हुआ। इस पक्षमें यह समझना चाहिये कि जो सुखरूप और सुखप्रद शास्त्रीय काम-कर्मादि हैं, उनसे स्वाभाविक काम- कर्मादिकी निवृत्ति होती है। और क्या करता हुआ प्रकट हुआ? 'यथा प्रियः श्रीकृष्णः प्रियायाः श्रीवृषभानु- नन्दिन्याः मुखमरुणेन विलिम्पन्नुदगात् एवमेवाय- मपि प्रियो दीर्घदर्शनञ्च उडुराजोऽरुणेन कर्मजन्येन सुखेन तद्रागेण वा प्राच्याः प्राचीनाया बुद्धेः मुखं सत्त्वात्मकं भागं विलिम्पन् तद्गतदुःखं दूरीकुर्वन्नु- दगात्।' जिस प्रकार प्रियतम भगवान् कृष्ण अपनी प्रियतमा श्रीवृषभानुनन्दिनीके मुखको अपने करधृत कुंकुमसे अनुरंजित करते प्रकट हुए थे, उसी प्रकार यह प्रिय और दीर्घदर्शन चन्द्र भी अरुण-कर्मजनित सुख अथवा उसके रागसे प्राची—प्राग्भवा बुद्धिके सत्त्वात्मक भागको लेपित करते हुए अर्थात् उसके दुःखको दूर करते हुए प्रकट हुए अथवा यों समझो कि 'प्राच्याः अविवेकदशायाः मुखं जाड्यं स्वजनितेन नित्यानित्यविवेकेन तिरस्कुर्वन्नुदगात्' अर्थात् बुद्धिकी जो अविवेकदशा है, उसके मुख