भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 283

श्रीरासलीलारहस्य २७१ (लौकिक उन्नति) और निःश्रेयस (पारलौकिक परमोन्नति)-की सिद्धि होती है, वही धर्म है तथा ‘ध्रियते अभ्युदयनिःश्रेयसौ अनेनेति धर्मः' इस व्युत्पत्तिके अनुसार भी धर्म ही अभ्युदय और निःश्रेयसका धारण करनेवाला है। वस्तुतः वैदिक श्रौत-स्मार्तकर्म ही सम्पूर्ण प्रपंचको धारण करनेवाला है; इसीसे कहा है—‘धारणाद्धर्ममित्याहुः’ अर्थात् धारण करनेके कारण ही इसे धर्म कहते हैं। अतः शास्त्रानुमोदित वर्णाश्रमधर्मका यथावत् आचरण करनेसे ही मनुष्य सब प्रकारकी सिद्धि प्राप्त कर सकता है और यही भगवत्पूजनका मुख्य प्रकार है—'स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ॥' (गीता १८।४६) इसीके द्वारा मनुष्य अन्तःकरणशुद्धिरूपा, भगवद्भक्तिरूपा और भगवज्ज्ञानलक्षणा सिद्धियाँ प्राप्त कर सकता है। अतः जिसके हृदयमें भगवान् रमण करना चाहते हैं, उसके हृदयमें पहले इस वर्णाश्रम-धर्मरूप चन्द्रका ही उदय होता है। इस उडुराजके ‘प्रियः’ और ‘दीर्घदर्शनः’—ये दोनों विशेषण हैं। वह उडुराज कैसा है ? 'प्रियः'—सबका प्रिय; क्योंकि सभी प्राणी सुख चाहते हैं और सुखका साधन धर्म है। जो लोग ऐहिक अथवा आमुष्मिक सुख चाहते हैं, उन्हें धर्मका आश्रय लेना चाहिये; क्योंकि उसकी प्राप्तिका साधन धर्म ही है। इसीसे बुद्धिमान् सुखकी परवाह न करके धर्मानुष्ठानपर ही जोर देते हैं; क्योंकि वे जानते हैं कि साधन होनेपर साध्यकी प्राप्ति हो ही जायगी। अतः जहाँ धर्म होगा, वहाँ सुख उपस्थित हो जायगा। श्रीगोसाईंजी महाराज कहते हैं— तिमि सुख संपति बिनहिं बोलाएँ। धरमसील पहिं जाहिं सुभाएँ॥ (रा०च०मा० १।२९४।३) अर्थात् जहाँ धर्म है, वहाँ सब प्रकारके सुख और वैभवको आज नहीं तो कल अवश्य जाना पड़ेगा। यही नहीं, भगवान्‌को भी धर्म ही प्रिय है, इसीसे वे स्वयं कहते हैं—‘धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥' (गीता ४।८) अर्थात् मैं युग-युगमें धर्मकी सम्यक् प्रकारसे स्थापना करनेके लिये जन्म ग्रहण करता हूँ। यद्यपि सर्वशक्तिमान् होनेके कारण वे बिना अवतीर्ण हुए भी धर्मकी स्थापना कर सकते थे तथापि अपनी इस परम प्रेमास्पद वस्तुकी रक्षाके लिये उनसे अवतीर्ण हुए बिना नहीं रहा जाता; वस्तुतः प्रेमावेश ऐसा ही होता है। इस विषयमें एक आख्यायिका भी प्रसिद्ध है। प्रेमी भक्तकी रक्षाके लिये भगवान् स्वयं ही अवतीर्ण होते हैं—एक दृष्टान्त कहते हैं—एक बार किसी सम्राट्ने किसी बुद्धिमान्‌से कहा कि ‘यदि भगवान् सर्वशक्तिमान् हैं तो धर्म और भक्तोंकी रक्षाके लिये अवतार क्यों लेते हैं; इस कार्यको वे अपने संकल्पमात्रसे ही क्यों नहीं कर डालते अथवा उनके बहुत-से सेवक भी हैं, उन्हींसे इसे पूरा क्यों नहीं करा देते?' इसपर उस बुद्धिमान्‌ने उत्तर देनेके लिये एक मासका अवकाश माँगा। सम्राट्का एक अति सुन्दर पुत्र था, उसके प्रति सम्राट्का अत्यन्त स्नेह था। बुद्धिमान्‌ने ठीक उसीके आकारकी एक मोमकी मूर्ति बनवायी और एक दिन, जिस समय सम्राट् अपने बहुत-से सेवक और साथियोंके सामने महलके तालाबमें स्नान कर रहे थे, उस समय उस पण्डितने उस मोमके पुतलेको दुलार करते हुए तालाबकी ओर ले जाकर उसे जलमें गिरा दिया। अपने लाड़ले लालको तालाबमें गिरा जान सम्राट् उसकी प्राणरक्षाके लिये तुरंत तालाबमें कूद पड़े और वहाँ अपने पुत्रकी आकृतिका एक पुतलामात्र देखकर पण्डितसे इस अशिष्टताका कारण पूछा। पण्डितने कहा—‘महाराज ! यह आपके प्रश्नका उत्तर है; जिस प्रकार आपने बहुत-से दरबारी और दास- दासियोंके रहते हुए भी राजकुमारके मोहवश आपके ध्यानमें इस कामके लिये किसीको आज्ञा देनेकी बात नहीं आयी, उसी प्रकार भगवान् भी अपने अत्यन्त प्रिय भक्त या धर्मको संकटमें पड़ा देखकर स्वयं अवतीर्ण हुए बिना नहीं रह सकते।' इस प्रकार यह धर्मचन्द्र प्रिय है। इसके सिवा यही भगवत्प्राप्तिका भी असाधारण हेतु है; क्योंकि

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