भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७० भक्तिसुधा श्रीभगवान्की परमभास्वती अचिन्त्य कृपा अपार है। किंतु जिसने उसका प्राकट्य कर लिया है, उसे ही उसकी उपलब्धि होती है। इसका उपाय यही है कि उस परम प्रेमास्पद तत्त्वको स्वकीय रूपसे वरण करे, उसकी प्रार्थना करे और उसे आत्मसमर्पण करे। बस, इसीसे वह भगवत्कृपा प्रकट हो जायगी। इस प्रकार परमकरुण और कृपालु श्रीहरि हम-जैसे कुत्सितोंकी मनोरथपूर्तिके लिये भी सब प्रकार कृपा करते हैं। दूसरे श्लोककी एक अन्य प्रकारकी व्याख्या अब एक दूसरी दृष्टिसे इस श्लोकके अर्थका विचार करते हैं। प्रथम श्लोककी व्याख्यामें एक स्थानपर कहा गया था—शरदोत्फुल्लमल्लिकाके समान आपातरमणीय सुखोंमें ही आसक्त 'ता रात्रीः' अज्ञानरूप अन्धकारसे व्याप्त उस प्राकृत प्रजाको देखकर भगवान्ने रमण करनेकी इच्छा की। जिस समय भगवान्ने अज्ञानियोंके हृदयारण्यमें रमण करनेकी इच्छा की, उस समय उसे रमणार्ह बनानेके लिये उनके हृदयाकाशमें वैदिक श्रौत-स्मार्तधर्मरूप चन्द्रमाका उदय हुआ; क्योंकि जबतक वर्णाश्रमधर्मका आचरण करके मन शुद्ध नहीं होगा, तबतक वह भगवत्- क्रीड़ाका क्षेत्र बननेयोग्य नहीं हो सकता। हृदयकी शुद्धिका प्रधान हेतु वैदिक श्रौत-स्मार्तकर्मोंका आचरण ही है। जैसे चन्द्रोदयसे वृन्दारण्य भगवत्क्रीड़ाके योग्य होता है, उसी प्रकार वैदिक श्रौत-स्मार्त कर्मोंका अनुष्ठान करनेसे मनुष्यका हृदय भगवान्की विहारभूमि बन सकता है। इसमें 'उडुराजः' का अर्थ एक तो चन्द्रमा ही ठीक है, दूसरे 'रलयोः डलयोश्चैव' इत्यादि नियमके अनुसार पहले 'ड' और 'ल' का सावर्ण्य होनेसे 'उलुराजः' और फिर 'ल' और 'र' का सावर्ण्य होनेने 'उरुराजः' माना जाय तो 'उरुधा राजत इति उरुराजः' ऐसा विग्रह करके यह अर्थ करेंगे कि यजमान, ऋत्विक्, द्रव्य एवं देवतारूपसे अनेक प्रकार सुशोभित होनेवाला यज्ञ ही उरुराज है। धर्मके स्वरूप ये ही हैं। पहले हम कह चुके हैं कि अवयवी अवयवोंसे अभिन्न होता है। अतः धर्मके अंग होनेके कारण ये यजमानादि धर्मरूप ही हैं। 'अष्टादशोक्तमवरं येषु कर्म।' (मुण्डक० १।२।७) इस वाक्यके अनुसार कर्म अनेकविध साधनसाध्य ही हैं। इनमें द्रव्य और देवता तो कर्मके आन्तरिक साधन हैं और ऋत्विक्-यजमानादि उसके सम्पादक होनेके कारण बहिरंग हैं। इस प्रकार यह वैदिक श्रौत-स्मार्तकर्म ही चन्द्र है। वह जिस हृदयमें उदित होता है, उसे ही शुद्ध करके भगवान्की क्रीड़ाभूमि बना देता है। वह उडुराज कैसा है? 'ककुभः—के स्वर्गे कौ पृथिव्यां भातीति ककुभः' अर्थात् यह धर्म स्वर्ग और पृथिवीमें समानरूपसे भासता है। यह सारा प्रपंच धर्मका ही कार्य है, यदि धर्म न हो तो यह सब उच्छिन्न हो जाय। धर्मके बिना न यह लोक है और न परलोक ही। 'नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम॥' (गीता ४।३१) अतः धर्म ही देवताओंका रक्षक है और धर्म ही मनुष्योंका। इसीसे भगवान्ने कहा है— देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः। परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ॥ (गीता ३।११) अर्थात् 'इस वैदिक श्रौत-स्मार्तकर्मसे तुम देवताओंको सन्तुष्ट करो और देवता तुम्हारा पालन करें। इस प्रकार परस्पर परितुष्ट करते हुए ही तुम परम श्रेय अर्थात् मोक्ष प्राप्त कर सकोगे।' इस प्रकार साधारण स्वर्गादि ही नहीं, मोक्ष-प्राप्तिमें भी यह वर्णाश्रमधर्म ही मुख्य हेतु है; क्योंकि बिना वर्णाश्रमधर्मका यथावत् आचरण किये चित्तशुद्धि नहीं हो सकती, बिना चित्तशुद्धिके जिज्ञासा नहीं होगी, बिना जिज्ञासाके ज्ञान नहीं होगा और ज्ञानके बिना मोक्ष नहीं हो सकता। इसीसे यह भी बतलाया है कि 'यतोऽभ्युदयनिः- श्रेयससिद्धिः स धर्मः' अर्थात् जिससे अभ्युदय