भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीरासलीलारहस्य २६१ रोमांचित हो रही हो।' यहाँ पृथिवीकी ओरसे यह कहा जा सकता था कि पृथिवीका यह तरुलतारूप रोमांच तो अनादिकालसे है, इसे तुम श्रीकृष्णचन्द्रके चरणस्पर्शसे हुआ कैसे मानती हो? इसपर कहती हैं—'यह तो निश्चय है कि इस प्रकारकी रोमोद्गति भगवच्चरणोंके स्पर्शसे ही हो सकती है; चाहे यह श्रीकृष्णचन्द्रके चरणस्पर्शसे हुई हो अथवा भगवान् उरुक्रमके पादविक्षेपके समय उनके पदस्पर्शसे हुई हो या जिस समय भगवान्ने वाराह-अवतार लेकर तुम्हारा आलिंगन किया था, उस समय उस आलिंगनजनित आनन्दोद्रेकसे यह रोमांच हुआ हो। तुम्हें भगवच्चरणोंका स्पर्श अवश्य हुआ है और तुम हमारे प्राणाधार श्रीनन्दनन्दनका पता भी अवश्य जानती हो; अतः हमपर दयादृष्टि करके हमें उनका पता बतला दो।' पृथिवीका इस प्रकारका सौभाग्य तो परम्परासे है अर्थात् यह सौभाग्य पृथिवीके समस्त देशको प्राप्त नहीं है, बल्कि उसके एक देशको ही है। किंतु जिस प्रकार भगवान् रामके चित्रकूटपर निवास करनेसे 'बिंधि मुदित मन सुख न समाई। श्रम बिनु बिपुल बड़ाई पाई॥' सारा विन्ध्याचल ही सौभाग्यशाली समझा गया, उसी प्रकार यहाँ भी यद्यपि केवल व्रजभूमिको ही भगवान्के चरणस्पर्शका सौभाग्य प्राप्त था; क्योंकि अन्यत्र रथादि या पादत्राणादिका व्यवधान अवश्य रहता था तथापि उसीके कारण सारी पृथिवीकी सौभाग्यश्रीकी सराहना की गयी। व्रजको तो यह सौभाग्य प्राप्त था ही। इसीसे कहा है— 'जयति तेऽधिकं जन्मना व्रजः श्रयत इन्दिरा शश्वदत्र हि।' (श्रीमद्भा० १०।३१।१) अर्थात् आपके प्रादुर्भूत होनेसे व्रज बहुत ही धन्य-धन्य हो रहा है; क्योंकि यहाँ निरन्तर ही लक्ष्मीजीका निवास रहने लगा है। वैकुण्ठकी अधिष्ठात्री महालक्ष्मी वैकुण्ठलोककी सेव्या हैं; किंतु यहाँ तो वे 'श्रयते'—'सेवते' अर्थात् सेवा करती हैं—सेविका हैं। यही नहीं—'वृन्दारण्यं स्वपदरमणं प्राविशद् गीतकीर्तिः॥' (श्रीमद्भा० १०।२१।५) कहकर तो स्पष्ट ही वृन्दारण्यकी शोभामें भगवच्चरणोंका ही कारणत्व निर्देश किया गया। अतः सिद्ध हुआ कि जिसके कारण अर्थात् जिनका चरणस्पर्श पाकर 'कु'—पृथिवी भी परमानन्दमयी हो रही है, वे श्रीभगवान् ही ककुभ हैं। अथवा 'कः ब्रह्मापि कुत्सितो भाति यस्मात् असौ ककुभः' अर्थात् जिनकी अपेक्षा ब्रह्मा भी कुत्सित ही प्रतीत होता है, वे भगवान् ही ककुभ हैं। ऐसी स्थितिमें उनकी सर्वज्ञता और अलुप्तदृक्ततामें तो सन्देह ही क्या है? ऐसे अचिन्त्यानन्दैश्वर्यशाली श्रीभगवान् व्रजांगनाओंके रमणके लिये वृन्दारण्यमें कैसे आये? इसपर कहते हैं—'के ब्रह्मणि कौ कुत्सिते अस्मदादा- वपि समान एव भातीति ककुभः' अर्थात् वे भगवान् ब्रह्मा और हम-जैसे कुत्सितोंमें भी समान रूपसे ही विराजमान हैं, इसलिये ककुभ कहे जाते हैं; क्योंकि भगवान्की दृष्टिमें उत्कृष्ट-अपकृष्टका भेद नहीं है। भला जबकि भगवान्के स्वरूपका अपरोक्ष साक्षात्कार करनेवाले मुनियोंकी भी ऐसी स्थिति होती है कि 'साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते॥' (गीता ६।९) तो फिर स्वयं भगवान्में विषमदृष्टि क्यों होने लगी? भगवान् तो समस्वरूप हैं—'निर्दोषं हि समं ब्रह्म' (गीता ५।१९) वे केवल वरणमात्रसे ही भेददृष्टिवालेसे जान पड़ते हैं। जिसने परप्रेमास्पदरूपसे उनका वरण किया है, उसीको—'ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।' (गीता ४।११) इस नियमके अनुसार वे आत्मीयरूपसे स्वीकार करते हैं। श्रीगोसाईंजी महाराज कहते हैं— जद्यपि सम नहिं राग न रोषू। गहहिं न पाप पूनु गुन दोषू॥ तदपि करहिं सम बिषम बिहारा। भगत अभगत हृदय अनुसारा॥ (रा०च०मा० २।२१९।३,५) तात्पर्य यह है कि भगवान्के सम-विषम व्यवहारमें भक्तका हृदय ही हेतु है। परम करुणामय