भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 280, कुल 778 में से
संदर्भ में पढ़ें२६८ भक्तिसुधा विशेष अभिव्यक्ति तो भक्तकी भावनापर ही अवलम्बित है। श्रुति कहती है— 'यमेवैष वृणुते तेन लभ्य- स्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम् ॥' (कठ० १।२।२३) अर्थात् यह आत्मा जिसको चाहता है, उसीके द्वारा प्राप्त किया जा सकता है, उसीके प्रति यह अपने स्वरूपकी अभिव्यक्ति करता है। श्रीभगवान् कहते हैं— 'ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।' अर्थात् जो लोग जिस प्रकार मुझे प्राप्त होते हैं, उसी प्रकार मैं भी उनकी कामना पूर्ण करता हूँ। यहाँ यह सन्देह हो सकता है कि पृथिवीमें नरदारकरूपसे प्रकट हुए श्रीकृष्णचन्द्रमें अलुप्तदृक्त्वादि कैसे हो सकते हैं? इसका उत्तर देते हैं— 'ककुभः—कं सुखं तद्रूपतयैव कौ पृथिव्यामपि भातीति ककुभः।' अर्थात् 'क' सुखको कहते हैं, भगवान् 'कु' अर्थात् पृथिवीमें भी सुखरूपसे भासमान हैं, इसलिये ककुभ हैं। तात्पर्य यह है कि परमानन्दसिन्धु श्रीभगवान् पृथिवीपर अवतीर्ण होकर भी परमानन्दरूपसे ही अभिव्यक्त हैं अर्थात् जो अलुप्तदृक् विशुद्ध परमानन्दघन तत्त्व है, वही पृथिवीमें श्रीनन्दनन्दनरूपसे सुशोभित है; अतः इस रूपमें भी उसका अलुप्तदृक्त्व अक्षुण्ण ही है। अथवा— कं सुखं तद्रूपा कुः पृथिवी भाति यस्मात् असौ ककुभः। अर्थात् 'क' सुखको कहते हैं, अतः जिनके कारण 'कु'—पृथिवी भी सुखस्वरूपा जान पड़ती है, वे भगवान् ककुभ हैं। तात्पर्य यह है कि भगवान्के अलुप्तदृक्त्व और परमानन्दसिन्धुत्वमें तो सन्देह ही क्या है, उसकी सन्निधिसे तो 'कु' शब्दवाच्या पृथिवी भी आनन्दरूपा होकर भास रही है। जिस समय रासलीलासे भगवान् अन्तर्हित हो गये, उस समय श्रीकृष्ण-सौन्दर्यसमास्वादनसे प्रमत्त हुई गोपांगनाएँ वृक्षादिसे उनका पता पूछती हुई अन्तमें पृथिवीसे कहती हैं— किं ते कृतं क्षिति तपो बत केशवाङ्घ्रि- स्पर्शोत्सवोत्पुलकिताङ्गरुहैर्र्विभासि । अप्यङ्घ्रिसम्भव उरुक्रमविक्रमाद् वा आहो वराहवपुषः परिरम्भणेन ॥ (श्रीमद्भा० १०।३०।१०) अर्थात् 'अरी पृथिवी ! तूने ऐसा क्या तप किया है कि जिसके कारण तू श्रीकृष्णचन्द्रके स्पर्शजनित आह्लादसे हुए रोमाँचोंसे सुशोभित है? अथवा श्रीउरुक्रमभगवान्के पादविक्षेपजनित चरणस्पर्शसे या श्रीवराहभगवान्के आलिंगनसे तुझे यह रोमांच हुआ है?' यहाँ सन्देह हो सकता है कि पृथिवी तो जड़ है, उससे ऐसा प्रश्न करना किस प्रकार सार्थक होगा? तो इस सम्बन्धमें मेघदूतके यक्षका दृष्टान्त स्मरण रखना चाहिये। वह भी तो मेघद्वारा अपनी प्रियतमाके पास अपना सन्देश भेज रहा था। बात यह है कि जो विरही होते हैं, उन्हें चेतनाचेतनका विवेक नहीं रहता। प्रियाकी वियोगव्यथासे पीड़ित भगवान् राम भी मानो विरहियोंकी दशाका दिग्दर्शन कराते हुए कहते हैं—'हे चन्द्र ! तुम पहले श्रीजानकीजीका स्पर्शकर उनके अंग-संगसे शीतल हुई किरणोंद्वारा फिर हमारा स्पर्श करो।' इसी प्रकार यहाँ भी पृथिवीसे प्रश्न हो सकता है। विरहिणी व्रजांगनाओंकी दृष्टिमें तो पृथिवी भगवत्सम्बन्धिनी होनेके कारण चेतन ही है। अतः वे पृथिवीसे पूछती हैं—'हे क्षिति ! तुमने ऐसा कौन-सा तप किया है? यदि कहो कि हम तो जड़ हैं, हमारेमें तुम्हें तपका क्या चिह्न दिखायी देता है? तो हमें तो मालूम होता है कि तुमने अवश्य ही कोई बड़ा तप किया है। इसीसे तो तुम्हें भगवान्के चरणस्पर्शका सौभाग्य प्राप्त हुआ है। इससे तुम्हारा आनन्दोद्रेक स्पष्ट प्रकट होता है; क्योंकि बिना आनन्दोद्रेकके रोमांच नहीं होता। अतः परमानन्दकन्द श्रीकृष्णचन्द्रके चरण-स्पर्शजनित उल्लाससे ही तुम