भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 279, कुल 778 में से
संदर्भ में पढ़ेंदीर्घदर्शनः' अर्थात् जिसका दर्शन (दृष्टि) दीर्घ— सर्ववस्तुविषयक है, उसे दीर्घदर्शन कहते हैं। 'यः सर्वज्ञः सर्ववित्' इत्यादि श्रुतिके अनुसार भगवान् दीर्घदर्शन हैं। अतः सामान्य और विशेष रूपसे वात्सल्य-माधुर्यादि अनेकविध भावोंवाली व्रजांगनाओंको देखकर केवल माधुर्यभाववती व्रजांगनाओंकी अभिलाषा- पूर्तिके लिये भगवान् प्रकट हुए। इसपर यदि कोई कहे कि इस प्रकार अलुप्तदृक् अथवा सर्वज्ञ सर्ववित् रूपसे भी सभीके अभिप्रायको जाननेवाले श्रीहरि सभीकी अभिलाषापूर्तिके लिये प्रादुर्भूत क्यों नहीं हुए? तो इसका कारण यह है कि भगवान्का यह दर्शन दीर्घ—बहुमूल्य है। उनका जो केवल चैतन्यात्मक सामान्य दर्शन है, वह तो सभी भावोंका भासक और अधिष्ठान होनेके कारण किसीका साधक या बाधक नहीं है। किंतु यहाँका यह दर्शन अमूल्य है। यह कृपाशक्तिसे उपहित है। अतः यहाँ केवल दृष्टि ही नहीं, कृपाका आधिक्य है। अतः यह बहुमूल्य है। इसीसे कहा है— यश्च रामं न पश्येत्तु यं च रामो न पश्यति। निन्दितः सर्वलोकेषु स्वात्माप्येनं विगर्हते॥ (वा०रा० २।१७।१४) अर्थात् जो रामको नहीं देखता और जिसे राम नहीं देखते—वह समस्त लोकोंमें निन्दनीय है तथा उसका आत्मा भी उसका तिरस्कार करता है। राम प्राकृत राजकुमार नहीं हैं, बल्कि वे सबके अन्तरात्मा हैं। अतः आत्मस्वरूप श्रीरामका दर्शन न करनेवाले आत्मघाती हैं ही। यदि राम आत्मस्वरूप न होते तो उनका दर्शन न करनेमें इतनी विगर्हा नहीं थी; क्योंकि इतना निन्दनीय तो आत्माका ही अदर्शन है, जैसा कि श्रुति कहती है— असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसावृताः। ताँस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः॥ (ईशावास्य० ३) अर्थात् जो कोई (ऐसे) आत्मघाती* लोग हैं, वे उन असुर्य नामक (अनात्मज्ञोंके आत्मभूत देहात्मक) लोकोंको जाते हैं, जो अदर्शनात्मक अन्धकारसे आवृत्त हैं। इस दृष्टिसे श्रीरामभद्र समस्त प्राणियोंके अन्तरात्मा हैं। अतः जिसने उन्हें नहीं देखा और जिसे उन्होंने नहीं देखा, वह निन्दनीय है ही। इसलिये इस निन्दासे छूटनेके लिये उन अपने स्वरूपभूत श्रीरघुनाथजीका साक्षात्कार करना ही चाहिये। किंतु यदि राम आत्मस्वरूप हैं तो सर्वावभासक होनेके कारण सर्वदृक् हैं ही। उनका न देखना बन ही नहीं सकता। फिर जब ऐसा नियम है कि— 'तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति॥' (कठ० २।२।१५) तो घटादि विषयोंके भानसे पूर्व भी श्रीरामका भान होना अनिवार्य है ही; क्योंकि जैसे प्रतिबिम्बका ग्रहण दर्पण-ग्रहणके अनन्तर ही होता है, उसी प्रकार चितिरूप दर्पणके ग्रहणके अनन्तर ही चैत्यरूप प्रतिबिम्बका ग्रहण होता है। अतः ऐसा कोई पुरुष नहीं है, जो घटादिको देखे और चैतन्यात्मक श्रीरामभद्रको न देखे। तो फिर यह दर्शन कैसा है? यहाँ रामभद्रका दर्शन उनके कृपाकोणसे देखना है तथा विशुद्ध भगवदाकाराकारित मनोवृत्तिपर अभिव्यक्त भगवत्स्व- रूपका साक्षात्कार करना जीवका भगवद्दर्शन है। इसी प्रकार यहाँ भगवान्का जो अनुग्रहोपेत दर्शन है, वही व्रजांगनाओंकी अभिलाषापूर्तिका हेतु होनेके कारण दीर्घदर्शन है। यद्यपि भगवान्का अनुग्रह भी समस्त जीवोंपर समान ही है तथापि उसकी
- जो आत्मतत्त्व नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वभाव है, उसको कर्तृत्वभोक्तृत्वादि अनर्थोंसे संयुक्त मानना उसका अपमान करना है और 'सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते' इस भगवदुक्तिके अनुसार यह अपमान उस आत्मदेवकी मृत्यु ही है, अतः अनात्मक आत्मघाती ही है।