भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 278

२६६ भक्तिसुधा इससे यही सिद्ध हुआ कि वृत्तियोंकी आवश्यकता चाहे आवरणाभिभवके लिये मानें चाहे जीवके साथ विषयका सम्बन्ध करानेके लिये मानें और चाहे अन्तःकरणावच्छिन्न चेतन और विषयावच्छिन्न चेतनके अभेदके लिये मानें, सुखके प्रकाशके लिये वृत्तियोंकी आवश्यकता नहीं है; क्योंकि सुख तो अन्तःकरणके समान स्वच्छ ही है। घटादि तो अस्वच्छ थे, इसलिये उन्हें चैतन्य सम्बन्धके लिये वृत्तिकी आवश्यकता थी। किंतु सुख तो स्वतः स्वच्छ है; इसलिये जीवचैतन्यके साथ उसके सम्बन्धके लिये वृत्तिकी आवश्यकता नहीं है। यहाँ अन्तःकरणावच्छिन्न चेतनके साथ सुखावच्छिन्न चेतनके अभेद-सम्पादनके लिये भी वृत्तिकी आवश्यकता नहीं है; क्योंकि सुखका आश्रय तो अन्तःकरण ही है, अतः वहाँ आवरणभंगके लिये वृत्तिकी अपेक्षा नहीं है; क्योंकि आवरण वहाँ होता है, जहाँ पदार्थकी सत्ता ज्ञात नहीं होती। सुख अज्ञातसत्ताक है ही नहीं। इसलिये आवरण न होनेके कारण आवरणाभिभवात्मिका वृत्तिकी भी आवश्यकता नहीं है। इसीसे सुखको केवल साक्षीभास्य मानते हैं। यदि ऐसा न मानेंगे तो वृत्तिके प्रकाशके लिये भी वृत्ति माननी पड़ेगी। यदि वृत्तिके प्रकाशके लिये वृत्ति नहीं मानते तो सुखके प्रकाशके लिये ही क्यों मानते हो ? यहाँ किन्हीं-किन्हींका ऐसा मत है कि सुखका स्मरण होता है, इसलिये सुखाकाराकारिता वृत्ति माननी चाहिये; क्योंकि उसका नाश होनेपर ही सुखका संस्कार होगा और संस्कारसे ही स्मृति होगी। किंतु विशेष विचार करनेपर इसकी आवश्यकता प्रतीत न होगी। सुखज्ञान क्या है ? साक्षीका जो सुखके साथ सम्बन्ध है, वही सुखज्ञान है। सुखका नाश होनेसे साक्षीगत सुखसंश्लिष्टत्वका नाश हो जायगा। इस प्रकार सुखके नाशसे ही उसका संस्कार बन जायगा और उसीसे स्मृति भी बन जायगी। अतः सुखज्ञानके लिये वृत्तिकी आवश्यकता नहीं है। नैयायिकोंके मतमें सुख और सुखज्ञानका कारण आत्ममनःसंयोग है, किंतु सुखकी उत्पत्ति भी आत्ममनःसंयोगसे ही होती है। अतः एक आत्ममनः- संयोग तो सुखकी उत्पत्तिके लिये मानना होगा और दूसरा सुखज्ञानके लिये। ये दोनों एक समय हो नहीं सकते। इसलिये जिस समय सुखज्ञानका हेतुभूत आत्ममनःसंयोग होगा, उस समय सुखका हेतुभूत आत्ममनःसंयोग नष्ट हो जायगा और उसका नाश हो जानेसे सुख भी नहीं रहेगा; क्योंकि असमवायि कारणका नाश होनेपर कार्यका भी नाश हो जाता है, जैसे तन्तुसंयोगका नाश होनेपर पटका भी नाश हो जाता है। इस प्रकार सुखके रहते हुए तो सुखज्ञान न हो सकेगा और सुखज्ञानके समय सुख न रहेगा। यद्यपि यहाँ नैयायिकोंका कथन है कि असमवायि कारणका नाश होनेपर उसके कार्यभूत द्रव्यका ही नाश होता है, गुणका नाश नहीं होता और सुख गुण है; इसलिये इसका भी नाश नहीं हो सकता तथापि इस संकोचमें कोई कारण नहीं दीख पड़ता। यहाँ हमें इतना ही विचार करना है कि जिस प्रकार जाग्रत्में सुखज्ञान आत्मस्वरूप है, उसी प्रकार स्वप्नमें शब्दादिज्ञानरूप जो दृष्टि, श्रुति एवं मति आदि हैं, वे भी आत्मस्वरूप दर्शन ही हैं। अतः यह दर्शन ही आत्मदर्शन है। अतः 'दीर्घं पौरुषेयं चैतन्यात्मकं अबाध्यं दर्शनं यस्य असौ दीर्घदर्शनः' अर्थात् जिसका दीर्घ यानी पौरुषेय चैतन्यात्मक अबाध्य दर्शन है, उसे दीर्घदर्शन कहते हैं। ऐसे भगवान् श्रीकृष्ण दीर्घदर्शन हैं। उनका चैतन्यात्मक दर्शन अलुप्त है। अतः जिन- जिन गोपांगनाओंके अन्तःकरणमें जितने प्रीति आदि भाव थे, उन सभीके अलुप्तदृक् साक्षी श्रीभगवान् उनकी अभिरुचिकी पूर्तिके लिये विहार-स्थलमें प्रकट हुए। अथवा 'दीर्घं सर्वविषयं दर्शनं यस्य असौ