भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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श्रीरासलीलारहस्य २६५

विशेष्यका अभाव होनेपर अथवा (३) दण्ड और पुरुष दोनोंहीका अभाव होनेपर। इसी प्रकार यहाँ विशेष्यस्थानीय आत्मचैतन्य तो बना हुआ है, केवल शब्दादि विशेषणोंके नाशसे ही दृष्टि, श्रुति, मति आदि विशिष्ट ज्ञानोंका नाश कहा जाता है; क्योंकि केवल आत्मचैतन्य ही दृष्टि, श्रुति आदि नहीं है; अपितु अनिर्वचनीय-रूपादिसे सम्बन्धित चैतन्य ही दृष्टि-श्रुति आदि है। अतः केवल चैतन्यके बने रहनेपर भी रूपादिविशेषके नाशमात्रसे रूपादिविशिष्ट चैतन्यका नाश कहा जा सकता है। इस प्रकार दृष्टि, श्रुति आदिका नाश हो जानेसे उनके संस्कार और स्मृति दोनों ही बन सकते हैं। इसीसे कई आचार्योंने सुखकी स्मृति भी सुखका नाश होनेपर ही मानी है; क्योंकि घटादि-वृत्तियोंके समान वे सुखकी वृत्तिको सुखसे पृथक् नहीं मानते। वे कहते हैं कि वृत्ति तो आवरणकी निवृत्तिके लिये है। जो वस्तु अज्ञातसत्ताक होती है, उसीका आवरण हटानेके लिये वृत्ति होती है। सुख-दुःखादि तो अज्ञातसत्ताक हुआ ही नहीं करते। यदि कहो कि वृत्ति चैतन्यसे सम्बन्ध करानेके लिये है; क्योंकि भिन्न-भिन्न आचार्योंके मतानुसार वृत्ति दो प्रकारकी है—आवरणाभिभवात्मिका और चैतन्य-सम्बन्धार्था। सिद्धान्त यह है कि घटादिका प्रकाश घटाद्यवच्छिन्न चैतन्यसे ही होता है; किंतु जबतक वह आवृत रहता है, तबतक उसका प्रकाश नहीं होता; क्योंकि ज्ञान अनावृत चैतन्यसे ही होता है। अतः वृत्तिका काम यही है कि आवरणकी निवृत्तिकर अनावृत चैतन्यसे सम्बन्धित घटादिका ज्ञान कराये। दूसरे आचार्य वृत्तिको चैतन्य-सम्बन्धार्था मानते हैं। वे कहते हैं कि सबका परमकारण होनेसे ब्रह्मका घटादिसे सम्बन्ध तो है ही, अतः घटादिका ज्ञान होना ही चाहिये; परंतु ऐसा होता नहीं। अतः एक विलक्षण सम्बन्ध माननेकी आवश्यकता है। उसे अभिव्यंग्य-अभिव्यंजक सम्बन्ध कहते हैं। चैतन्यका वस्तुपर अभिव्यंजक कैसे होता है ? जैसे दर्पणादिमें सूर्यादिका प्रतिबिम्ब पड़ता है, उसी प्रकार जिस पदार्थमें चैतन्यका प्रतिबिम्ब पड़ता है—उसीका प्रकाश हुआ करता है। लोकमें यह देखा जाता है कि दर्पणादि स्वच्छ वस्तुएँ ही प्रतिबिम्बको ग्रहण करनेवाली हुआ करती हैं, घटादि अस्वच्छ वस्तुओंमें उसका प्रतिबिम्ब नहीं पड़ता, उसी प्रकार चेतनका प्रतिबिम्ब भी अन्तःकरणमें ही पड़ता है, कुड्यादि अस्वच्छ वस्तुओंमें नहीं पड़ता। किंतु जिस प्रकार स्वच्छ जलादिका योग होनेपर अस्वच्छ कुड्यादिमें प्रतिबिम्ब-ग्रहणकी योग्यता आ जाती है, उसी प्रकार स्वच्छ अन्तःकरणका योग होनेपर घटादि भी चेतनका प्रतिबिम्ब ग्रहण करनेमें समर्थ हो जाते हैं। अन्तःकरणकी घटाद्याकाराकारिता वृत्ति चैतन्यके साथ घटादिका सम्बन्ध करानेके लिये ही होती है। जिस समय अन्तःकरणकी वृत्ति घटाद्याकारा होती है, उस समय अन्तःकरणवृत्तिसंश्लिष्ट घट चैतन्यका प्रतिबिम्ब ग्रहण कर लेता है; इसीसे घटकी स्फूर्ति होती है। इसी प्रकार कोई-कोई आचार्य अन्तःकरणकी वृत्तिका प्रधान प्रयोजन जीव-चैतन्यके साथ विषयावच्छिन्न चैतन्यका ऐक्य कराना मानते हैं। उनका मत ऐसा है कि जो वस्तु जिस चैतन्यमें अध्यस्त होती है, वही उसका प्रकाशक होता है; अतः घटाद्यवच्छिन्न चैतन्यको अपनेमें अध्यस्त घटादिका ज्ञान हो सकता है। तथापि प्रमाता जो जीव है, उसे उसका ज्ञान किस प्रकार हो ? अतः इन्द्रियमार्गसे विषयतक गयी हुई अन्तःकरणकी वृत्ति उस विषयावच्छिन्न चेतनके साथ जीवचेतनका अभेद कर देती है। उस समय वह विषयावच्छिन्न चेतनमें अध्यस्त विषय अन्तःकरणावच्छिन्न चेतन यानी जीवचेतनमें अध्यस्त कहा जा सकता है। अतः इस प्रकार अन्तःकरणावच्छिन्न चेतनके साथ विषयका आध्यासिक सम्बन्ध होनेसे उसके द्वारा उस विषयका स्फुरण हो जाता है।