भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रपंचसे विरत हो जाता है और धीरे-धीरे उसे भगवत्तत्त्व ही परप्रेमास्पद प्रतीत होने लगता है। फिर उसे भगवान्का एक क्षणका वियोग भी असह्य हो जाता है। इस प्रकारके विरहानलसे सन्तप्त होकर उसका अन्तःकरण सर्वथा शुद्ध हो जाता है और जिन दोषोंके कारण वह अपने प्रियतमकी उपेक्षाका भाजन बना हुआ था, वे सर्वथा निवृत्त हो जाते हैं। इस विरहावस्थामें उसका मुख पीला पड़ जाता है। भक्तशिरोमणि श्रीभरतजीकी इसी अवस्थाका वर्णन करते हुए श्रीगोसाईंजी महाराज कहते हैं— बैठे देखि कुसासन जटा मुकुट कृस गात। राम राम रघुपति जपत स्रवत नयन जलजात॥ (रा०च०मा० ७।१ (ख)) इस प्रकार प्रियतमके विप्रयोगमें प्रियतमके प्रेमास्पदत्वकी अनुभूति हो जाती है। जबतक प्रेमास्पद प्रेमास्परूपसे अनुभूत नहीं होता, तभीतक प्रमाद रहता है। उसमें प्रेमास्पदत्वकी अनुभूति होनेपर तो उसके बिना एक पलके लिये भी चैन नहीं पड़ता। फिर तो उसकी वियोगाग्निमें झुलसकर शरीर दुर्बल हो जाता है तथा मुख पीला पड़ जाता है। इसी प्रकार गोपांगनाओंके मुख भी भगवद्विप्रयोगमें पीले पड़ गये थे। अतः आज जो चन्द्रमा उदित हुए हैं, वे एक विलक्षण चन्द्र हैं। आज इनके उदयसे उद्दीपनविधया जो भगवान्के संगमकी सम्भावनासे एक उत्साहविशेष होगा, उससे उनकी वह पीतिमा अरुणिमामें परिणत हो जायगी। जब कुछ प्रतीक्षाके बाद विलम्बसे प्रेमीका दर्शन होता है, तब कुछ विलक्षण ही रस आता है। अतएव उडुराजको दीर्घदर्शन कहा है, दीर्घकालमें दर्शन हुआ है जिसका, उसे वह दीर्घदर्शन है। इधर श्रीकृष्णका भी बहुत प्रतीक्षाके बाद विलम्बमें ही दर्शन होता है, अतः वे भी दीर्घदर्शन ही हैं अथवा अनुरागजन्य विह्वलतासे दीर्घकालतक प्रियामुखका दर्शन करनेवाले श्रीकृष्ण दीर्घदर्शन हैं अथवा दीर्घ अर्थात् नित्य है दर्शनस्वरूपभूता दृष्टि जिसकी वे श्रीकृष्ण दीर्घदर्शन हैं। यहाँ समझ लेना चाहिये कि दृष्टि दो प्रकारकी है—एक अन्तःकरणवृत्तिरूपा अनित्य दृष्टि श्रुति आदि और दूसरी आत्मस्वरूपभूता नित्य दृष्टि। उसी नित्य दृष्टिको ही स्वप्नकी दृष्टि, श्रुति, मति, विज्ञाति कहा जाता है— 'सा द्रष्टुर्दृष्टेर्या स्वप्ने पश्यति।' यहाँ यह सन्देह होता है कि यदि स्वप्नकी दृष्टि, श्रुति, मति एवं विज्ञाति आदि तो आत्मस्वरूपा होनेके कारण नित्य हैं; नित्य होनेसे उनका नाश नहीं हो सकता और नाश न होनेसे संस्कार नहीं बन सकता; क्योंकि संस्कार ज्ञानादिका नाश होनेपर ही उत्पन्न होता है, जिस प्रकार घटज्ञानका नाश होनेपर ही घटसंस्कारकी उत्पत्ति होती है। इसीसे ज्ञानकालमें स्मृति नहीं हुआ करती। अतः यदि स्वप्नकी दृष्टि, श्रुति आदि नित्य हैं तो उनकी स्मृति नहीं होनी चाहिये। परंतु स्मृति होती ही है। इसका क्या समाधान होगा? इसका उत्तर यह है कि स्वप्नके समय दृष्टि, श्रुति आदि तो आत्मस्वरूप ही हैं तथापि उनके विषयोंका नाश तो होता ही है। उनके नाशसे ही संस्कार बनता है। इसीसे उनके ज्ञानका भी नाश कहा जा सकता है। यहाँ विलक्षणता यही है कि नित्य होनेपर भी उसका नाश कहा जा सकता है। इसमें कारण यही है कि विशेष्यके नित्य बने रहनेपर भी विशेषणके नाशवान् होनेके कारण विशिष्टके नाशका व्यवहार होता है; जैसे आकाशके बने रहनेपर भी घटरूप विशेषणका नाश होनेपर घटाकाशका नाश कहा जाता है। विशिष्ट पदार्थका अभाव तीन प्रकार माना जाता है—विशेषणाभावप्रयुक्त विशिष्टाभाव, विशेष्याभावप्रयुक्त विशिष्टाभाव तथा उभयाभावप्रयुक्त विशिष्टाभाव; जैसे कोई दण्डधारी पुरुष है, उसके दण्डित्वका अभाव तीन प्रकारसे हो सकता है—(१) दण्डरूप विशेषणका अभाव होनेपर, (२) पुरुषरूप