भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
प्रपंचसे विरत हो जाता है और धीरे-धीरे उसे भगवत्तत्त्व ही परप्रेमास्पद प्रतीत होने लगता है। फिर उसे भगवान्का एक क्षणका वियोग भी असह्य हो जाता है। इस प्रकारके विरहानलसे सन्तप्त होकर उसका अन्तःकरण सर्वथा शुद्ध हो जाता है और जिन दोषोंके कारण वह अपने प्रियतमकी उपेक्षाका भाजन बना हुआ था, वे सर्वथा निवृत्त हो जाते हैं। इस विरहावस्थामें उसका मुख पीला पड़ जाता है। भक्तशिरोमणि श्रीभरतजीकी इसी अवस्थाका वर्णन करते हुए श्रीगोसाईंजी महाराज कहते हैं— बैठे देखि कुसासन जटा मुकुट कृस गात। राम राम रघुपति जपत स्रवत नयन जलजात॥ (रा०च०मा० ७।१ (ख)) इस प्रकार प्रियतमके विप्रयोगमें प्रियतमके प्रेमास्पदत्वकी अनुभूति हो जाती है। जबतक प्रेमास्पद प्रेमास्परूपसे अनुभूत नहीं होता, तभीतक प्रमाद रहता है। उसमें प्रेमास्पदत्वकी अनुभूति होनेपर तो उसके बिना एक पलके लिये भी चैन नहीं पड़ता। फिर तो उसकी वियोगाग्निमें झुलसकर शरीर दुर्बल हो जाता है तथा मुख पीला पड़ जाता है। इसी प्रकार गोपांगनाओंके मुख भी भगवद्विप्रयोगमें पीले पड़ गये थे। अतः आज जो चन्द्रमा उदित हुए हैं, वे एक विलक्षण चन्द्र हैं। आज इनके उदयसे उद्दीपनविधया जो भगवान्के संगमकी सम्भावनासे एक उत्साहविशेष होगा, उससे उनकी वह पीतिमा अरुणिमामें परिणत हो जायगी। जब कुछ प्रतीक्षाके बाद विलम्बसे प्रेमीका दर्शन होता है, तब कुछ विलक्षण ही रस आता है। अतएव उडुराजको दीर्घदर्शन कहा है, दीर्घकालमें दर्शन हुआ है जिसका, उसे वह दीर्घदर्शन है। इधर श्रीकृष्णका भी बहुत प्रतीक्षाके बाद विलम्बमें ही दर्शन होता है, अतः वे भी दीर्घदर्शन ही हैं अथवा अनुरागजन्य विह्वलतासे दीर्घकालतक प्रियामुखका दर्शन करनेवाले श्रीकृष्ण दीर्घदर्शन हैं अथवा दीर्घ अर्थात् नित्य है दर्शनस्वरूपभूता दृष्टि जिसकी वे श्रीकृष्ण दीर्घदर्शन हैं। यहाँ समझ लेना चाहिये कि दृष्टि दो प्रकारकी है—एक अन्तःकरणवृत्तिरूपा अनित्य दृष्टि श्रुति आदि और दूसरी आत्मस्वरूपभूता नित्य दृष्टि। उसी नित्य दृष्टिको ही स्वप्नकी दृष्टि, श्रुति, मति, विज्ञाति कहा जाता है— 'सा द्रष्टुर्दृष्टेर्या स्वप्ने पश्यति।' यहाँ यह सन्देह होता है कि यदि स्वप्नकी दृष्टि, श्रुति, मति एवं विज्ञाति आदि तो आत्मस्वरूपा होनेके कारण नित्य हैं; नित्य होनेसे उनका नाश नहीं हो सकता और नाश न होनेसे संस्कार नहीं बन सकता; क्योंकि संस्कार ज्ञानादिका नाश होनेपर ही उत्पन्न होता है, जिस प्रकार घटज्ञानका नाश होनेपर ही घटसंस्कारकी उत्पत्ति होती है। इसीसे ज्ञानकालमें स्मृति नहीं हुआ करती। अतः यदि स्वप्नकी दृष्टि, श्रुति आदि नित्य हैं तो उनकी स्मृति नहीं होनी चाहिये। परंतु स्मृति होती ही है। इसका क्या समाधान होगा? इसका उत्तर यह है कि स्वप्नके समय दृष्टि, श्रुति आदि तो आत्मस्वरूप ही हैं तथापि उनके विषयोंका नाश तो होता ही है। उनके नाशसे ही संस्कार बनता है। इसीसे उनके ज्ञानका भी नाश कहा जा सकता है। यहाँ विलक्षणता यही है कि नित्य होनेपर भी उसका नाश कहा जा सकता है। इसमें कारण यही है कि विशेष्यके नित्य बने रहनेपर भी विशेषणके नाशवान् होनेके कारण विशिष्टके नाशका व्यवहार होता है; जैसे आकाशके बने रहनेपर भी घटरूप विशेषणका नाश होनेपर घटाकाशका नाश कहा जाता है। विशिष्ट पदार्थका अभाव तीन प्रकार माना जाता है—विशेषणाभावप्रयुक्त विशिष्टाभाव, विशेष्याभावप्रयुक्त विशिष्टाभाव तथा उभयाभावप्रयुक्त विशिष्टाभाव; जैसे कोई दण्डधारी पुरुष है, उसके दण्डित्वका अभाव तीन प्रकारसे हो सकता है—(१) दण्डरूप विशेषणका अभाव होनेपर, (२) पुरुषरूप
श्रीरासलीलारहस्य २६५
विशेष्यका अभाव होनेपर अथवा (३) दण्ड और पुरुष दोनोंहीका अभाव होनेपर। इसी प्रकार यहाँ विशेष्यस्थानीय आत्मचैतन्य तो बना हुआ है, केवल शब्दादि विशेषणोंके नाशसे ही दृष्टि, श्रुति, मति आदि विशिष्ट ज्ञानोंका नाश कहा जाता है; क्योंकि केवल आत्मचैतन्य ही दृष्टि, श्रुति आदि नहीं है; अपितु अनिर्वचनीय-रूपादिसे सम्बन्धित चैतन्य ही दृष्टि-श्रुति आदि है। अतः केवल चैतन्यके बने रहनेपर भी रूपादिविशेषके नाशमात्रसे रूपादिविशिष्ट चैतन्यका नाश कहा जा सकता है। इस प्रकार दृष्टि, श्रुति आदिका नाश हो जानेसे उनके संस्कार और स्मृति दोनों ही बन सकते हैं। इसीसे कई आचार्योंने सुखकी स्मृति भी सुखका नाश होनेपर ही मानी है; क्योंकि घटादि-वृत्तियोंके समान वे सुखकी वृत्तिको सुखसे पृथक् नहीं मानते। वे कहते हैं कि वृत्ति तो आवरणकी निवृत्तिके लिये है। जो वस्तु अज्ञातसत्ताक होती है, उसीका आवरण हटानेके लिये वृत्ति होती है। सुख-दुःखादि तो अज्ञातसत्ताक हुआ ही नहीं करते। यदि कहो कि वृत्ति चैतन्यसे सम्बन्ध करानेके लिये है; क्योंकि भिन्न-भिन्न आचार्योंके मतानुसार वृत्ति दो प्रकारकी है—आवरणाभिभवात्मिका और चैतन्य-सम्बन्धार्था। सिद्धान्त यह है कि घटादिका प्रकाश घटाद्यवच्छिन्न चैतन्यसे ही होता है; किंतु जबतक वह आवृत रहता है, तबतक उसका प्रकाश नहीं होता; क्योंकि ज्ञान अनावृत चैतन्यसे ही होता है। अतः वृत्तिका काम यही है कि आवरणकी निवृत्तिकर अनावृत चैतन्यसे सम्बन्धित घटादिका ज्ञान कराये। दूसरे आचार्य वृत्तिको चैतन्य-सम्बन्धार्था मानते हैं। वे कहते हैं कि सबका परमकारण होनेसे ब्रह्मका घटादिसे सम्बन्ध तो है ही, अतः घटादिका ज्ञान होना ही चाहिये; परंतु ऐसा होता नहीं। अतः एक विलक्षण सम्बन्ध माननेकी आवश्यकता है। उसे अभिव्यंग्य-अभिव्यंजक सम्बन्ध कहते हैं। चैतन्यका वस्तुपर अभिव्यंजक कैसे होता है ? जैसे दर्पणादिमें सूर्यादिका प्रतिबिम्ब पड़ता है, उसी प्रकार जिस पदार्थमें चैतन्यका प्रतिबिम्ब पड़ता है—उसीका प्रकाश हुआ करता है। लोकमें यह देखा जाता है कि दर्पणादि स्वच्छ वस्तुएँ ही प्रतिबिम्बको ग्रहण करनेवाली हुआ करती हैं, घटादि अस्वच्छ वस्तुओंमें उसका प्रतिबिम्ब नहीं पड़ता, उसी प्रकार चेतनका प्रतिबिम्ब भी अन्तःकरणमें ही पड़ता है, कुड्यादि अस्वच्छ वस्तुओंमें नहीं पड़ता। किंतु जिस प्रकार स्वच्छ जलादिका योग होनेपर अस्वच्छ कुड्यादिमें प्रतिबिम्ब-ग्रहणकी योग्यता आ जाती है, उसी प्रकार स्वच्छ अन्तःकरणका योग होनेपर घटादि भी चेतनका प्रतिबिम्ब ग्रहण करनेमें समर्थ हो जाते हैं। अन्तःकरणकी घटाद्याकाराकारिता वृत्ति चैतन्यके साथ घटादिका सम्बन्ध करानेके लिये ही होती है। जिस समय अन्तःकरणकी वृत्ति घटाद्याकारा होती है, उस समय अन्तःकरणवृत्तिसंश्लिष्ट घट चैतन्यका प्रतिबिम्ब ग्रहण कर लेता है; इसीसे घटकी स्फूर्ति होती है। इसी प्रकार कोई-कोई आचार्य अन्तःकरणकी वृत्तिका प्रधान प्रयोजन जीव-चैतन्यके साथ विषयावच्छिन्न चैतन्यका ऐक्य कराना मानते हैं। उनका मत ऐसा है कि जो वस्तु जिस चैतन्यमें अध्यस्त होती है, वही उसका प्रकाशक होता है; अतः घटाद्यवच्छिन्न चैतन्यको अपनेमें अध्यस्त घटादिका ज्ञान हो सकता है। तथापि प्रमाता जो जीव है, उसे उसका ज्ञान किस प्रकार हो ? अतः इन्द्रियमार्गसे विषयतक गयी हुई अन्तःकरणकी वृत्ति उस विषयावच्छिन्न चेतनके साथ जीवचेतनका अभेद कर देती है। उस समय वह विषयावच्छिन्न चेतनमें अध्यस्त विषय अन्तःकरणावच्छिन्न चेतन यानी जीवचेतनमें अध्यस्त कहा जा सकता है। अतः इस प्रकार अन्तःकरणावच्छिन्न चेतनके साथ विषयका आध्यासिक सम्बन्ध होनेसे उसके द्वारा उस विषयका स्फुरण हो जाता है।
२६६ भक्तिसुधा इससे यही सिद्ध हुआ कि वृत्तियोंकी आवश्यकता चाहे आवरणाभिभवके लिये मानें चाहे जीवके साथ विषयका सम्बन्ध करानेके लिये मानें और चाहे अन्तःकरणावच्छिन्न चेतन और विषयावच्छिन्न चेतनके अभेदके लिये मानें, सुखके प्रकाशके लिये वृत्तियोंकी आवश्यकता नहीं है; क्योंकि सुख तो अन्तःकरणके समान स्वच्छ ही है। घटादि तो अस्वच्छ थे, इसलिये उन्हें चैतन्य सम्बन्धके लिये वृत्तिकी आवश्यकता थी। किंतु सुख तो स्वतः स्वच्छ है; इसलिये जीवचैतन्यके साथ उसके सम्बन्धके लिये वृत्तिकी आवश्यकता नहीं है। यहाँ अन्तःकरणावच्छिन्न चेतनके साथ सुखावच्छिन्न चेतनके अभेद-सम्पादनके लिये भी वृत्तिकी आवश्यकता नहीं है; क्योंकि सुखका आश्रय तो अन्तःकरण ही है, अतः वहाँ आवरणभंगके लिये वृत्तिकी अपेक्षा नहीं है; क्योंकि आवरण वहाँ होता है, जहाँ पदार्थकी सत्ता ज्ञात नहीं होती। सुख अज्ञातसत्ताक है ही नहीं। इसलिये आवरण न होनेके कारण आवरणाभिभवात्मिका वृत्तिकी भी आवश्यकता नहीं है। इसीसे सुखको केवल साक्षीभास्य मानते हैं। यदि ऐसा न मानेंगे तो वृत्तिके प्रकाशके लिये भी वृत्ति माननी पड़ेगी। यदि वृत्तिके प्रकाशके लिये वृत्ति नहीं मानते तो सुखके प्रकाशके लिये ही क्यों मानते हो ? यहाँ किन्हीं-किन्हींका ऐसा मत है कि सुखका स्मरण होता है, इसलिये सुखाकाराकारिता वृत्ति माननी चाहिये; क्योंकि उसका नाश होनेपर ही सुखका संस्कार होगा और संस्कारसे ही स्मृति होगी। किंतु विशेष विचार करनेपर इसकी आवश्यकता प्रतीत न होगी। सुखज्ञान क्या है ? साक्षीका जो सुखके साथ सम्बन्ध है, वही सुखज्ञान है। सुखका नाश होनेसे साक्षीगत सुखसंश्लिष्टत्वका नाश हो जायगा। इस प्रकार सुखके नाशसे ही उसका संस्कार बन जायगा और उसीसे स्मृति भी बन जायगी। अतः सुखज्ञानके लिये वृत्तिकी आवश्यकता नहीं है। नैयायिकोंके मतमें सुख और सुखज्ञानका कारण आत्ममनःसंयोग है, किंतु सुखकी उत्पत्ति भी आत्ममनःसंयोगसे ही होती है। अतः एक आत्ममनः- संयोग तो सुखकी उत्पत्तिके लिये मानना होगा और दूसरा सुखज्ञानके लिये। ये दोनों एक समय हो नहीं सकते। इसलिये जिस समय सुखज्ञानका हेतुभूत आत्ममनःसंयोग होगा, उस समय सुखका हेतुभूत आत्ममनःसंयोग नष्ट हो जायगा और उसका नाश हो जानेसे सुख भी नहीं रहेगा; क्योंकि असमवायि कारणका नाश होनेपर कार्यका भी नाश हो जाता है, जैसे तन्तुसंयोगका नाश होनेपर पटका भी नाश हो जाता है। इस प्रकार सुखके रहते हुए तो सुखज्ञान न हो सकेगा और सुखज्ञानके समय सुख न रहेगा। यद्यपि यहाँ नैयायिकोंका कथन है कि असमवायि कारणका नाश होनेपर उसके कार्यभूत द्रव्यका ही नाश होता है, गुणका नाश नहीं होता और सुख गुण है; इसलिये इसका भी नाश नहीं हो सकता तथापि इस संकोचमें कोई कारण नहीं दीख पड़ता। यहाँ हमें इतना ही विचार करना है कि जिस प्रकार जाग्रत्में सुखज्ञान आत्मस्वरूप है, उसी प्रकार स्वप्नमें शब्दादिज्ञानरूप जो दृष्टि, श्रुति एवं मति आदि हैं, वे भी आत्मस्वरूप दर्शन ही हैं। अतः यह दर्शन ही आत्मदर्शन है। अतः 'दीर्घं पौरुषेयं चैतन्यात्मकं अबाध्यं दर्शनं यस्य असौ दीर्घदर्शनः' अर्थात् जिसका दीर्घ यानी पौरुषेय चैतन्यात्मक अबाध्य दर्शन है, उसे दीर्घदर्शन कहते हैं। ऐसे भगवान् श्रीकृष्ण दीर्घदर्शन हैं। उनका चैतन्यात्मक दर्शन अलुप्त है। अतः जिन- जिन गोपांगनाओंके अन्तःकरणमें जितने प्रीति आदि भाव थे, उन सभीके अलुप्तदृक् साक्षी श्रीभगवान् उनकी अभिरुचिकी पूर्तिके लिये विहार-स्थलमें प्रकट हुए। अथवा 'दीर्घं सर्वविषयं दर्शनं यस्य असौ
दीर्घदर्शनः' अर्थात् जिसका दर्शन (दृष्टि) दीर्घ— सर्ववस्तुविषयक है, उसे दीर्घदर्शन कहते हैं। 'यः सर्वज्ञः सर्ववित्' इत्यादि श्रुतिके अनुसार भगवान् दीर्घदर्शन हैं। अतः सामान्य और विशेष रूपसे वात्सल्य-माधुर्यादि अनेकविध भावोंवाली व्रजांगनाओंको देखकर केवल माधुर्यभाववती व्रजांगनाओंकी अभिलाषा- पूर्तिके लिये भगवान् प्रकट हुए। इसपर यदि कोई कहे कि इस प्रकार अलुप्तदृक् अथवा सर्वज्ञ सर्ववित् रूपसे भी सभीके अभिप्रायको जाननेवाले श्रीहरि सभीकी अभिलाषापूर्तिके लिये प्रादुर्भूत क्यों नहीं हुए? तो इसका कारण यह है कि भगवान्का यह दर्शन दीर्घ—बहुमूल्य है। उनका जो केवल चैतन्यात्मक सामान्य दर्शन है, वह तो सभी भावोंका भासक और अधिष्ठान होनेके कारण किसीका साधक या बाधक नहीं है। किंतु यहाँका यह दर्शन अमूल्य है। यह कृपाशक्तिसे उपहित है। अतः यहाँ केवल दृष्टि ही नहीं, कृपाका आधिक्य है। अतः यह बहुमूल्य है। इसीसे कहा है— यश्च रामं न पश्येत्तु यं च रामो न पश्यति। निन्दितः सर्वलोकेषु स्वात्माप्येनं विगर्हते॥ (वा०रा० २।१७।१४) अर्थात् जो रामको नहीं देखता और जिसे राम नहीं देखते—वह समस्त लोकोंमें निन्दनीय है तथा उसका आत्मा भी उसका तिरस्कार करता है। राम प्राकृत राजकुमार नहीं हैं, बल्कि वे सबके अन्तरात्मा हैं। अतः आत्मस्वरूप श्रीरामका दर्शन न करनेवाले आत्मघाती हैं ही। यदि राम आत्मस्वरूप न होते तो उनका दर्शन न करनेमें इतनी विगर्हा नहीं थी; क्योंकि इतना निन्दनीय तो आत्माका ही अदर्शन है, जैसा कि श्रुति कहती है— असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसावृताः। ताँस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः॥ (ईशावास्य० ३) अर्थात् जो कोई (ऐसे) आत्मघाती* लोग हैं, वे उन असुर्य नामक (अनात्मज्ञोंके आत्मभूत देहात्मक) लोकोंको जाते हैं, जो अदर्शनात्मक अन्धकारसे आवृत्त हैं। इस दृष्टिसे श्रीरामभद्र समस्त प्राणियोंके अन्तरात्मा हैं। अतः जिसने उन्हें नहीं देखा और जिसे उन्होंने नहीं देखा, वह निन्दनीय है ही। इसलिये इस निन्दासे छूटनेके लिये उन अपने स्वरूपभूत श्रीरघुनाथजीका साक्षात्कार करना ही चाहिये। किंतु यदि राम आत्मस्वरूप हैं तो सर्वावभासक होनेके कारण सर्वदृक् हैं ही। उनका न देखना बन ही नहीं सकता। फिर जब ऐसा नियम है कि— 'तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति॥' (कठ० २।२।१५) तो घटादि विषयोंके भानसे पूर्व भी श्रीरामका भान होना अनिवार्य है ही; क्योंकि जैसे प्रतिबिम्बका ग्रहण दर्पण-ग्रहणके अनन्तर ही होता है, उसी प्रकार चितिरूप दर्पणके ग्रहणके अनन्तर ही चैत्यरूप प्रतिबिम्बका ग्रहण होता है। अतः ऐसा कोई पुरुष नहीं है, जो घटादिको देखे और चैतन्यात्मक श्रीरामभद्रको न देखे। तो फिर यह दर्शन कैसा है? यहाँ रामभद्रका दर्शन उनके कृपाकोणसे देखना है तथा विशुद्ध भगवदाकाराकारित मनोवृत्तिपर अभिव्यक्त भगवत्स्व- रूपका साक्षात्कार करना जीवका भगवद्दर्शन है। इसी प्रकार यहाँ भगवान्का जो अनुग्रहोपेत दर्शन है, वही व्रजांगनाओंकी अभिलाषापूर्तिका हेतु होनेके कारण दीर्घदर्शन है। यद्यपि भगवान्का अनुग्रह भी समस्त जीवोंपर समान ही है तथापि उसकी
- जो आत्मतत्त्व नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वभाव है, उसको कर्तृत्वभोक्तृत्वादि अनर्थोंसे संयुक्त मानना उसका अपमान करना है और 'सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते' इस भगवदुक्तिके अनुसार यह अपमान उस आत्मदेवकी मृत्यु ही है, अतः अनात्मक आत्मघाती ही है।
२६८ भक्तिसुधा विशेष अभिव्यक्ति तो भक्तकी भावनापर ही अवलम्बित है। श्रुति कहती है— 'यमेवैष वृणुते तेन लभ्य- स्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम् ॥' (कठ० १।२।२३) अर्थात् यह आत्मा जिसको चाहता है, उसीके द्वारा प्राप्त किया जा सकता है, उसीके प्रति यह अपने स्वरूपकी अभिव्यक्ति करता है। श्रीभगवान् कहते हैं— 'ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।' अर्थात् जो लोग जिस प्रकार मुझे प्राप्त होते हैं, उसी प्रकार मैं भी उनकी कामना पूर्ण करता हूँ। यहाँ यह सन्देह हो सकता है कि पृथिवीमें नरदारकरूपसे प्रकट हुए श्रीकृष्णचन्द्रमें अलुप्तदृक्त्वादि कैसे हो सकते हैं? इसका उत्तर देते हैं— 'ककुभः—कं सुखं तद्रूपतयैव कौ पृथिव्यामपि भातीति ककुभः।' अर्थात् 'क' सुखको कहते हैं, भगवान् 'कु' अर्थात् पृथिवीमें भी सुखरूपसे भासमान हैं, इसलिये ककुभ हैं। तात्पर्य यह है कि परमानन्दसिन्धु श्रीभगवान् पृथिवीपर अवतीर्ण होकर भी परमानन्दरूपसे ही अभिव्यक्त हैं अर्थात् जो अलुप्तदृक् विशुद्ध परमानन्दघन तत्त्व है, वही पृथिवीमें श्रीनन्दनन्दनरूपसे सुशोभित है; अतः इस रूपमें भी उसका अलुप्तदृक्त्व अक्षुण्ण ही है। अथवा— कं सुखं तद्रूपा कुः पृथिवी भाति यस्मात् असौ ककुभः। अर्थात् 'क' सुखको कहते हैं, अतः जिनके कारण 'कु'—पृथिवी भी सुखस्वरूपा जान पड़ती है, वे भगवान् ककुभ हैं। तात्पर्य यह है कि भगवान्के अलुप्तदृक्त्व और परमानन्दसिन्धुत्वमें तो सन्देह ही क्या है, उसकी सन्निधिसे तो 'कु' शब्दवाच्या पृथिवी भी आनन्दरूपा होकर भास रही है। जिस समय रासलीलासे भगवान् अन्तर्हित हो गये, उस समय श्रीकृष्ण-सौन्दर्यसमास्वादनसे प्रमत्त हुई गोपांगनाएँ वृक्षादिसे उनका पता पूछती हुई अन्तमें पृथिवीसे कहती हैं— किं ते कृतं क्षिति तपो बत केशवाङ्घ्रि- स्पर्शोत्सवोत्पुलकिताङ्गरुहैर्र्विभासि । अप्यङ्घ्रिसम्भव उरुक्रमविक्रमाद् वा आहो वराहवपुषः परिरम्भणेन ॥ (श्रीमद्भा० १०।३०।१०) अर्थात् 'अरी पृथिवी ! तूने ऐसा क्या तप किया है कि जिसके कारण तू श्रीकृष्णचन्द्रके स्पर्शजनित आह्लादसे हुए रोमाँचोंसे सुशोभित है? अथवा श्रीउरुक्रमभगवान्के पादविक्षेपजनित चरणस्पर्शसे या श्रीवराहभगवान्के आलिंगनसे तुझे यह रोमांच हुआ है?' यहाँ सन्देह हो सकता है कि पृथिवी तो जड़ है, उससे ऐसा प्रश्न करना किस प्रकार सार्थक होगा? तो इस सम्बन्धमें मेघदूतके यक्षका दृष्टान्त स्मरण रखना चाहिये। वह भी तो मेघद्वारा अपनी प्रियतमाके पास अपना सन्देश भेज रहा था। बात यह है कि जो विरही होते हैं, उन्हें चेतनाचेतनका विवेक नहीं रहता। प्रियाकी वियोगव्यथासे पीड़ित भगवान् राम भी मानो विरहियोंकी दशाका दिग्दर्शन कराते हुए कहते हैं—'हे चन्द्र ! तुम पहले श्रीजानकीजीका स्पर्शकर उनके अंग-संगसे शीतल हुई किरणोंद्वारा फिर हमारा स्पर्श करो।' इसी प्रकार यहाँ भी पृथिवीसे प्रश्न हो सकता है। विरहिणी व्रजांगनाओंकी दृष्टिमें तो पृथिवी भगवत्सम्बन्धिनी होनेके कारण चेतन ही है। अतः वे पृथिवीसे पूछती हैं—'हे क्षिति ! तुमने ऐसा कौन-सा तप किया है? यदि कहो कि हम तो जड़ हैं, हमारेमें तुम्हें तपका क्या चिह्न दिखायी देता है? तो हमें तो मालूम होता है कि तुमने अवश्य ही कोई बड़ा तप किया है। इसीसे तो तुम्हें भगवान्के चरणस्पर्शका सौभाग्य प्राप्त हुआ है। इससे तुम्हारा आनन्दोद्रेक स्पष्ट प्रकट होता है; क्योंकि बिना आनन्दोद्रेकके रोमांच नहीं होता। अतः परमानन्दकन्द श्रीकृष्णचन्द्रके चरण-स्पर्शजनित उल्लाससे ही तुम
श्रीरासलीलारहस्य २६१ रोमांचित हो रही हो।' यहाँ पृथिवीकी ओरसे यह कहा जा सकता था कि पृथिवीका यह तरुलतारूप रोमांच तो अनादिकालसे है, इसे तुम श्रीकृष्णचन्द्रके चरणस्पर्शसे हुआ कैसे मानती हो? इसपर कहती हैं—'यह तो निश्चय है कि इस प्रकारकी रोमोद्गति भगवच्चरणोंके स्पर्शसे ही हो सकती है; चाहे यह श्रीकृष्णचन्द्रके चरणस्पर्शसे हुई हो अथवा भगवान् उरुक्रमके पादविक्षेपके समय उनके पदस्पर्शसे हुई हो या जिस समय भगवान्ने वाराह-अवतार लेकर तुम्हारा आलिंगन किया था, उस समय उस आलिंगनजनित आनन्दोद्रेकसे यह रोमांच हुआ हो। तुम्हें भगवच्चरणोंका स्पर्श अवश्य हुआ है और तुम हमारे प्राणाधार श्रीनन्दनन्दनका पता भी अवश्य जानती हो; अतः हमपर दयादृष्टि करके हमें उनका पता बतला दो।' पृथिवीका इस प्रकारका सौभाग्य तो परम्परासे है अर्थात् यह सौभाग्य पृथिवीके समस्त देशको प्राप्त नहीं है, बल्कि उसके एक देशको ही है। किंतु जिस प्रकार भगवान् रामके चित्रकूटपर निवास करनेसे 'बिंधि मुदित मन सुख न समाई। श्रम बिनु बिपुल बड़ाई पाई॥' सारा विन्ध्याचल ही सौभाग्यशाली समझा गया, उसी प्रकार यहाँ भी यद्यपि केवल व्रजभूमिको ही भगवान्के चरणस्पर्शका सौभाग्य प्राप्त था; क्योंकि अन्यत्र रथादि या पादत्राणादिका व्यवधान अवश्य रहता था तथापि उसीके कारण सारी पृथिवीकी सौभाग्यश्रीकी सराहना की गयी। व्रजको तो यह सौभाग्य प्राप्त था ही। इसीसे कहा है— 'जयति तेऽधिकं जन्मना व्रजः श्रयत इन्दिरा शश्वदत्र हि।' (श्रीमद्भा० १०।३१।१) अर्थात् आपके प्रादुर्भूत होनेसे व्रज बहुत ही धन्य-धन्य हो रहा है; क्योंकि यहाँ निरन्तर ही लक्ष्मीजीका निवास रहने लगा है। वैकुण्ठकी अधिष्ठात्री महालक्ष्मी वैकुण्ठलोककी सेव्या हैं; किंतु यहाँ तो वे 'श्रयते'—'सेवते' अर्थात् सेवा करती हैं—सेविका हैं। यही नहीं—'वृन्दारण्यं स्वपदरमणं प्राविशद् गीतकीर्तिः॥' (श्रीमद्भा० १०।२१।५) कहकर तो स्पष्ट ही वृन्दारण्यकी शोभामें भगवच्चरणोंका ही कारणत्व निर्देश किया गया। अतः सिद्ध हुआ कि जिसके कारण अर्थात् जिनका चरणस्पर्श पाकर 'कु'—पृथिवी भी परमानन्दमयी हो रही है, वे श्रीभगवान् ही ककुभ हैं। अथवा 'कः ब्रह्मापि कुत्सितो भाति यस्मात् असौ ककुभः' अर्थात् जिनकी अपेक्षा ब्रह्मा भी कुत्सित ही प्रतीत होता है, वे भगवान् ही ककुभ हैं। ऐसी स्थितिमें उनकी सर्वज्ञता और अलुप्तदृक्ततामें तो सन्देह ही क्या है? ऐसे अचिन्त्यानन्दैश्वर्यशाली श्रीभगवान् व्रजांगनाओंके रमणके लिये वृन्दारण्यमें कैसे आये? इसपर कहते हैं—'के ब्रह्मणि कौ कुत्सिते अस्मदादा- वपि समान एव भातीति ककुभः' अर्थात् वे भगवान् ब्रह्मा और हम-जैसे कुत्सितोंमें भी समान रूपसे ही विराजमान हैं, इसलिये ककुभ कहे जाते हैं; क्योंकि भगवान्की दृष्टिमें उत्कृष्ट-अपकृष्टका भेद नहीं है। भला जबकि भगवान्के स्वरूपका अपरोक्ष साक्षात्कार करनेवाले मुनियोंकी भी ऐसी स्थिति होती है कि 'साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते॥' (गीता ६।९) तो फिर स्वयं भगवान्में विषमदृष्टि क्यों होने लगी? भगवान् तो समस्वरूप हैं—'निर्दोषं हि समं ब्रह्म' (गीता ५।१९) वे केवल वरणमात्रसे ही भेददृष्टिवालेसे जान पड़ते हैं। जिसने परप्रेमास्पदरूपसे उनका वरण किया है, उसीको—'ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।' (गीता ४।११) इस नियमके अनुसार वे आत्मीयरूपसे स्वीकार करते हैं। श्रीगोसाईंजी महाराज कहते हैं— जद्यपि सम नहिं राग न रोषू। गहहिं न पाप पूनु गुन दोषू॥ तदपि करहिं सम बिषम बिहारा। भगत अभगत हृदय अनुसारा॥ (रा०च०मा० २।२१९।३,५) तात्पर्य यह है कि भगवान्के सम-विषम व्यवहारमें भक्तका हृदय ही हेतु है। परम करुणामय
२७० भक्तिसुधा श्रीभगवान्की परमभास्वती अचिन्त्य कृपा अपार है। किंतु जिसने उसका प्राकट्य कर लिया है, उसे ही उसकी उपलब्धि होती है। इसका उपाय यही है कि उस परम प्रेमास्पद तत्त्वको स्वकीय रूपसे वरण करे, उसकी प्रार्थना करे और उसे आत्मसमर्पण करे। बस, इसीसे वह भगवत्कृपा प्रकट हो जायगी। इस प्रकार परमकरुण और कृपालु श्रीहरि हम-जैसे कुत्सितोंकी मनोरथपूर्तिके लिये भी सब प्रकार कृपा करते हैं। दूसरे श्लोककी एक अन्य प्रकारकी व्याख्या अब एक दूसरी दृष्टिसे इस श्लोकके अर्थका विचार करते हैं। प्रथम श्लोककी व्याख्यामें एक स्थानपर कहा गया था—शरदोत्फुल्लमल्लिकाके समान आपातरमणीय सुखोंमें ही आसक्त 'ता रात्रीः' अज्ञानरूप अन्धकारसे व्याप्त उस प्राकृत प्रजाको देखकर भगवान्ने रमण करनेकी इच्छा की। जिस समय भगवान्ने अज्ञानियोंके हृदयारण्यमें रमण करनेकी इच्छा की, उस समय उसे रमणार्ह बनानेके लिये उनके हृदयाकाशमें वैदिक श्रौत-स्मार्तधर्मरूप चन्द्रमाका उदय हुआ; क्योंकि जबतक वर्णाश्रमधर्मका आचरण करके मन शुद्ध नहीं होगा, तबतक वह भगवत्- क्रीड़ाका क्षेत्र बननेयोग्य नहीं हो सकता। हृदयकी शुद्धिका प्रधान हेतु वैदिक श्रौत-स्मार्तकर्मोंका आचरण ही है। जैसे चन्द्रोदयसे वृन्दारण्य भगवत्क्रीड़ाके योग्य होता है, उसी प्रकार वैदिक श्रौत-स्मार्त कर्मोंका अनुष्ठान करनेसे मनुष्यका हृदय भगवान्की विहारभूमि बन सकता है। इसमें 'उडुराजः' का अर्थ एक तो चन्द्रमा ही ठीक है, दूसरे 'रलयोः डलयोश्चैव' इत्यादि नियमके अनुसार पहले 'ड' और 'ल' का सावर्ण्य होनेसे 'उलुराजः' और फिर 'ल' और 'र' का सावर्ण्य होनेने 'उरुराजः' माना जाय तो 'उरुधा राजत इति उरुराजः' ऐसा विग्रह करके यह अर्थ करेंगे कि यजमान, ऋत्विक्, द्रव्य एवं देवतारूपसे अनेक प्रकार सुशोभित होनेवाला यज्ञ ही उरुराज है। धर्मके स्वरूप ये ही हैं। पहले हम कह चुके हैं कि अवयवी अवयवोंसे अभिन्न होता है। अतः धर्मके अंग होनेके कारण ये यजमानादि धर्मरूप ही हैं। 'अष्टादशोक्तमवरं येषु कर्म।' (मुण्डक० १।२।७) इस वाक्यके अनुसार कर्म अनेकविध साधनसाध्य ही हैं। इनमें द्रव्य और देवता तो कर्मके आन्तरिक साधन हैं और ऋत्विक्-यजमानादि उसके सम्पादक होनेके कारण बहिरंग हैं। इस प्रकार यह वैदिक श्रौत-स्मार्तकर्म ही चन्द्र है। वह जिस हृदयमें उदित होता है, उसे ही शुद्ध करके भगवान्की क्रीड़ाभूमि बना देता है। वह उडुराज कैसा है? 'ककुभः—के स्वर्गे कौ पृथिव्यां भातीति ककुभः' अर्थात् यह धर्म स्वर्ग और पृथिवीमें समानरूपसे भासता है। यह सारा प्रपंच धर्मका ही कार्य है, यदि धर्म न हो तो यह सब उच्छिन्न हो जाय। धर्मके बिना न यह लोक है और न परलोक ही। 'नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम॥' (गीता ४।३१) अतः धर्म ही देवताओंका रक्षक है और धर्म ही मनुष्योंका। इसीसे भगवान्ने कहा है— देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः। परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ॥ (गीता ३।११) अर्थात् 'इस वैदिक श्रौत-स्मार्तकर्मसे तुम देवताओंको सन्तुष्ट करो और देवता तुम्हारा पालन करें। इस प्रकार परस्पर परितुष्ट करते हुए ही तुम परम श्रेय अर्थात् मोक्ष प्राप्त कर सकोगे।' इस प्रकार साधारण स्वर्गादि ही नहीं, मोक्ष-प्राप्तिमें भी यह वर्णाश्रमधर्म ही मुख्य हेतु है; क्योंकि बिना वर्णाश्रमधर्मका यथावत् आचरण किये चित्तशुद्धि नहीं हो सकती, बिना चित्तशुद्धिके जिज्ञासा नहीं होगी, बिना जिज्ञासाके ज्ञान नहीं होगा और ज्ञानके बिना मोक्ष नहीं हो सकता। इसीसे यह भी बतलाया है कि 'यतोऽभ्युदयनिः- श्रेयससिद्धिः स धर्मः' अर्थात् जिससे अभ्युदय
श्रीरासलीलारहस्य २७१ (लौकिक उन्नति) और निःश्रेयस (पारलौकिक परमोन्नति)-की सिद्धि होती है, वही धर्म है तथा ‘ध्रियते अभ्युदयनिःश्रेयसौ अनेनेति धर्मः' इस व्युत्पत्तिके अनुसार भी धर्म ही अभ्युदय और निःश्रेयसका धारण करनेवाला है। वस्तुतः वैदिक श्रौत-स्मार्तकर्म ही सम्पूर्ण प्रपंचको धारण करनेवाला है; इसीसे कहा है—‘धारणाद्धर्ममित्याहुः’ अर्थात् धारण करनेके कारण ही इसे धर्म कहते हैं। अतः शास्त्रानुमोदित वर्णाश्रमधर्मका यथावत् आचरण करनेसे ही मनुष्य सब प्रकारकी सिद्धि प्राप्त कर सकता है और यही भगवत्पूजनका मुख्य प्रकार है—'स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ॥' (गीता १८।४६) इसीके द्वारा मनुष्य अन्तःकरणशुद्धिरूपा, भगवद्भक्तिरूपा और भगवज्ज्ञानलक्षणा सिद्धियाँ प्राप्त कर सकता है। अतः जिसके हृदयमें भगवान् रमण करना चाहते हैं, उसके हृदयमें पहले इस वर्णाश्रम-धर्मरूप चन्द्रका ही उदय होता है। इस उडुराजके ‘प्रियः’ और ‘दीर्घदर्शनः’—ये दोनों विशेषण हैं। वह उडुराज कैसा है ? 'प्रियः'—सबका प्रिय; क्योंकि सभी प्राणी सुख चाहते हैं और सुखका साधन धर्म है। जो लोग ऐहिक अथवा आमुष्मिक सुख चाहते हैं, उन्हें धर्मका आश्रय लेना चाहिये; क्योंकि उसकी प्राप्तिका साधन धर्म ही है। इसीसे बुद्धिमान् सुखकी परवाह न करके धर्मानुष्ठानपर ही जोर देते हैं; क्योंकि वे जानते हैं कि साधन होनेपर साध्यकी प्राप्ति हो ही जायगी। अतः जहाँ धर्म होगा, वहाँ सुख उपस्थित हो जायगा। श्रीगोसाईंजी महाराज कहते हैं— तिमि सुख संपति बिनहिं बोलाएँ। धरमसील पहिं जाहिं सुभाएँ॥ (रा०च०मा० १।२९४।३) अर्थात् जहाँ धर्म है, वहाँ सब प्रकारके सुख और वैभवको आज नहीं तो कल अवश्य जाना पड़ेगा। यही नहीं, भगवान्को भी धर्म ही प्रिय है, इसीसे वे स्वयं कहते हैं—‘धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥' (गीता ४।८) अर्थात् मैं युग-युगमें धर्मकी सम्यक् प्रकारसे स्थापना करनेके लिये जन्म ग्रहण करता हूँ। यद्यपि सर्वशक्तिमान् होनेके कारण वे बिना अवतीर्ण हुए भी धर्मकी स्थापना कर सकते थे तथापि अपनी इस परम प्रेमास्पद वस्तुकी रक्षाके लिये उनसे अवतीर्ण हुए बिना नहीं रहा जाता; वस्तुतः प्रेमावेश ऐसा ही होता है। इस विषयमें एक आख्यायिका भी प्रसिद्ध है। प्रेमी भक्तकी रक्षाके लिये भगवान् स्वयं ही अवतीर्ण होते हैं—एक दृष्टान्त कहते हैं—एक बार किसी सम्राट्ने किसी बुद्धिमान्से कहा कि ‘यदि भगवान् सर्वशक्तिमान् हैं तो धर्म और भक्तोंकी रक्षाके लिये अवतार क्यों लेते हैं; इस कार्यको वे अपने संकल्पमात्रसे ही क्यों नहीं कर डालते अथवा उनके बहुत-से सेवक भी हैं, उन्हींसे इसे पूरा क्यों नहीं करा देते?' इसपर उस बुद्धिमान्ने उत्तर देनेके लिये एक मासका अवकाश माँगा। सम्राट्का एक अति सुन्दर पुत्र था, उसके प्रति सम्राट्का अत्यन्त स्नेह था। बुद्धिमान्ने ठीक उसीके आकारकी एक मोमकी मूर्ति बनवायी और एक दिन, जिस समय सम्राट् अपने बहुत-से सेवक और साथियोंके सामने महलके तालाबमें स्नान कर रहे थे, उस समय उस पण्डितने उस मोमके पुतलेको दुलार करते हुए तालाबकी ओर ले जाकर उसे जलमें गिरा दिया। अपने लाड़ले लालको तालाबमें गिरा जान सम्राट् उसकी प्राणरक्षाके लिये तुरंत तालाबमें कूद पड़े और वहाँ अपने पुत्रकी आकृतिका एक पुतलामात्र देखकर पण्डितसे इस अशिष्टताका कारण पूछा। पण्डितने कहा—‘महाराज ! यह आपके प्रश्नका उत्तर है; जिस प्रकार आपने बहुत-से दरबारी और दास- दासियोंके रहते हुए भी राजकुमारके मोहवश आपके ध्यानमें इस कामके लिये किसीको आज्ञा देनेकी बात नहीं आयी, उसी प्रकार भगवान् भी अपने अत्यन्त प्रिय भक्त या धर्मको संकटमें पड़ा देखकर स्वयं अवतीर्ण हुए बिना नहीं रह सकते।' इस प्रकार यह धर्मचन्द्र प्रिय है। इसके सिवा यही भगवत्प्राप्तिका भी असाधारण हेतु है; क्योंकि
२७२ भक्तिसुधा यह वर्णाश्रम-धर्म ही भगवान्की आराधनाका प्रधान साधन है, इसके सिवा किसी और साधनसे उनकी प्रसन्नता नहीं हो सकती— वर्णाश्रमाचारवता पुरुषेण परः पुमान्। विष्णुराराध्यते पन्था नान्यस्तत्तोषकारकः॥ (श्रीविष्णुपुराण ३।८।९) तथा भगवद्भक्ति ही तत्त्वज्ञानका प्रधान हेतु है; अतः परम्परासे ज्ञानका साधन भी यह धर्मचन्द्र ही है। यह बात सर्वथा सुनिश्चित है कि निर्गुण परमात्माकी प्राप्ति मन, बुद्धि, प्राण और इन्द्रियोंकी निश्चलता होनेपर ही हो सकती है। इसीसे भगवती श्रुति कहती है— यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह। बुद्धिश्च न विचेष्टति तामाहुः परमां गतिम्॥ (कठ० २।३।१०) अर्थात् ‘जिस समय मनके सहित पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ स्थिर हो जाती हैं तथा बुद्धि भी चेष्टा नहीं करती, उसी अवस्थाको परमगति कहते हैं।' किंतु आरम्भमें यह इन्द्रियादिकी निश्चेष्टता अत्यन्त दुःसाध्य है। अतः पहले वैदिक श्रौत-स्मार्त कर्मोंका अनुष्ठान करके अपने देह और इन्द्रियादिकी उच्छृंखल चेष्टाओंको सुसंयत करना चाहिये, तभी उनका निरोध करना भी सम्भव होगा। इसके सिवा और भी यह चन्द्र कैसा है? 'दीर्घदर्शनः—दीर्घेण कालेन फलात्मना दर्शनं यस्य इति दीर्घदर्शनः'। अर्थात् जिसका दीर्घकाल पश्चात् फलरूपसे दर्शन होता है; क्योंकि कर्मफल होनेमें भी कुछ देरी अवश्य होती है; अथवा कीट- पतंगादि अनेक योनियोंके पश्चात् जब जीवको मनुष्ययोनि प्राप्त होती है और उनमें भी जब उसका जन्म ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य—इन तीन वर्णोंके अन्तर्गत होता है, तब उसे इस धर्मचन्द्रका दर्शन होता है; क्योंकि उसी समय उसे वैदिक श्रौत-स्मार्तधर्मोंका आचरण करनेका अधिकार प्राप्त होता है। इसलिये भी वह दीर्घदर्शन है। अथवा 'दीर्घमनपबाध्यं दर्शनं यस्य स दीर्घदर्शनः' अर्थात् जिसका दर्शन दीर्घ—अबाध्य है ऐसा यह धर्मचन्द्र है; क्योंकि धर्मका ज्ञान वेदोंसे होता है और उनका प्रामाण्य किसीसे बाधित नहीं है। वह धर्मचन्द्र किस प्रकार प्रकट हुआ? 'स उडुराजः चर्षणीनामधिकारिजनानां शुचः तत्तद- भिलषिताप्राप्तिजन्या आर्तीः शान्तमैः सुखमयैः करैः सुखप्रदैश्च स्वर्गादिफलैर्मृजन् दूरीकुर्वन्नुदगात्' अर्थात् वह चन्द्रमा अधिकारी पुरुषोंकी अपने अभिलषित पदार्थोंकी अप्राप्तिके कारण होनेवाली दीनताको स्वर्गादि सुखमय और सुखप्रद फलोंद्वारा निवृत्त करता हुआ प्रकट हुआ। साथ ही स्वाभाविक कामकर्मरूप आर्ति भी आर्तिकी जननी होनेके कारण आर्ति ही है। उसका मार्जन करता हुआ भी प्रकट हुआ। इस पक्षमें यह समझना चाहिये कि जो सुखरूप और सुखप्रद शास्त्रीय काम-कर्मादि हैं, उनसे स्वाभाविक काम- कर्मादिकी निवृत्ति होती है। और क्या करता हुआ प्रकट हुआ? 'यथा प्रियः श्रीकृष्णः प्रियायाः श्रीवृषभानु- नन्दिन्याः मुखमरुणेन विलिम्पन्नुदगात् एवमेवाय- मपि प्रियो दीर्घदर्शनञ्च उडुराजोऽरुणेन कर्मजन्येन सुखेन तद्रागेण वा प्राच्याः प्राचीनाया बुद्धेः मुखं सत्त्वात्मकं भागं विलिम्पन् तद्गतदुःखं दूरीकुर्वन्नु- दगात्।' जिस प्रकार प्रियतम भगवान् कृष्ण अपनी प्रियतमा श्रीवृषभानुनन्दिनीके मुखको अपने करधृत कुंकुमसे अनुरंजित करते प्रकट हुए थे, उसी प्रकार यह प्रिय और दीर्घदर्शन चन्द्र भी अरुण-कर्मजनित सुख अथवा उसके रागसे प्राची—प्राग्भवा बुद्धिके सत्त्वात्मक भागको लेपित करते हुए अर्थात् उसके दुःखको दूर करते हुए प्रकट हुए अथवा यों समझो कि 'प्राच्याः अविवेकदशायाः मुखं जाड्यं स्वजनितेन नित्यानित्यविवेकेन तिरस्कुर्वन्नुदगात्' अर्थात् बुद्धिकी जो अविवेकदशा है, उसके मुख
यानी जड़ताको अपनेसे उत्पन्न हुए नित्यानित्यविवेकसे तिरस्कृत करता हुआ प्रकट हुआ; क्योंकि वैदिक श्रौत-स्मार्तकर्मोंका अनुष्ठान करनेसे चित्त शुद्ध होता है। इससे नित्यानित्यवस्तु विवेक होता है और विवेकसे बुद्धिकी जड़ता निवृत्त होती है। प्रथम श्लोकमें जहाँ 'ताः' पदसे मुमुक्षुरूपा प्रजा ग्रहण की गयी है, वहाँ इस श्लोकका तात्पर्य इस प्रकार लगाना चाहिये कि जिस समय भगवान्ने मुमुक्षुरूपा प्रजाओंके हृदयारण्यमें श्रुतिरूपा व्रजांगनाओंका आवाहनकर उनके साथ रमण करनेका विचार किया, उसी समय उस हृदयारण्यको अतिशय सुशोभित करनेके लिये 'उडुराजः विवेकचन्द्रः उदगात्'— उडुराज यानी विवेकरूप चन्द्रमा उदित हुआ। उस विवेकरूप चन्द्रको उडुराज क्यों कहा है ? इसपर कहते हैं—उडुस्थानीयासु किञ्चित्प्रकाशनशीला- स्वन्तःकरणवृत्तिषु शमदमादिरूपासु वा राजते अतिशयेन दीप्यते इति उडुराजः'—क्योंकि वह उडुस्थानीया मन्द प्रकाशमयी अथवा शमदमादिरूपा अन्तःकरणकी वृत्तियोंमें राजमान—अतिशय देदीप्यमान है, इसलिये उडुराज है। यह विवेकचन्द्र उन सबकी अपेक्षा अधिक शोभाशाली है; क्योंकि यह सर्ववृत्तिवेद्य परमतत्त्वका अवद्योतक है अथवा यों समझो कि जिसके अन्तर्गत समस्त वृत्तिवेद्य वस्त्वन्तर है, यह विवेकचन्द्र उसका ज्ञान कराता है; अथवा समस्त वृत्तियाँ, उनके विषय तथा आश्रय अर्थात् प्रमाता, प्रमेय और प्रमाण—इन सबका अवभासक जो परमतत्त्व है—उसका इस विवेकचन्द्रसे ही बोध होता है, इसलिये यह उडुराज है अथवा शान्तिदान्तिरूपा जो चित्तवृत्तियाँ हैं वे उडुस्थानीया हैं, उनकी शोभा इस विवेकचन्द्रके पूर्णतया उदित होनेपर ही होती है, बिना विवेकके उनमें भी पूर्णता नहीं आती, इसलिये यह उडुराज है। अथवा 'रलयोः डलयोश्चैव' इत्यादि नियमके अनुसार 'उरुधा राजते शोभते इति उरुराजः'— जो अनेक प्रकारसे सुशोभित होता है, वह उरुराज ही उडुराज है। विवेकके चार भेद हैं—साध्यालम्बन, साधनालम्बन, ऐक्यालम्बन और निर्विकल्पालम्बन। इस प्रकार अनेकों तरहसे सुशोभित होनेके कारण वह उरुराज है। 'त्वं' पदार्थके यथार्थ स्वरूपका साक्षात्कार करना साधनालम्बन विवेक है। पंचभूत- विवेकपूर्वक 'तत्' पदार्थके वास्तविक स्वरूपका साक्षात् रूपसे अनुभव करना साध्यालम्बन विवेक है। 'तत्' और 'त्वं' पदार्थोंका ऐक्य निश्चय करना ऐक्यालम्बन विवेक है तथा त्वं पदार्थकी उपाधि देहादि तथा तत् पदार्थकी उपाधि स्थूल, सूक्ष्म एवं कारण प्रपंचादि—इन दोनों प्रकारके विकल्पोंको सबके अधिष्ठानभूत स्वप्रकाश परब्रह्ममें लीन करके जो निर्विकल्प वस्तुका ज्ञान होता है, वह निर्विकल्पालम्बन विवेक है। यहाँ कोई कह सकता है कि विवेक तो दो मिश्रित वस्तुओंके पार्थक्यकरणका नाम है; किंतु यहाँ निर्विकल्पावस्थामें तो समस्त प्रपंचका अस्तित्व ही नहीं रहता। ऐसी अवस्थामें किससे किसका विवेक किया जायगा ? इस विषयमें ऐसा समझना चाहिये कि सम्मिश्रण सर्वदा सत्य पदार्थोंका ही नहीं हुआ करता, सत्य और मिथ्या पदार्थोंका भी हो सकता है। यदि सत्य पदार्थोंका ही सम्मिश्रण होता तो वे विवेकके पश्चात् भी बने ही रहते; किंतु जहाँ सत्य और असत्य पदार्थोंका मेल है, वहाँ तो विवेकके अनन्तर असत्यका निवृत्त हो जाना ही भूषण है। इस प्रकार निर्विकल्पालम्बन विवेक भी सम्भव है ही। अथवा 'उरुतया विस्तीर्णतया राजते शोभते इति उरुराजः' क्योंकि पूर्णरूपसे राजमान तत्त्व- विवेक ही है। जो अन्तःकरण विवेकरहित है, वह पूर्णतया अनर्थशून्य नहीं हो सकता। सभी प्रकारके अनर्थोंकी निवृत्ति विवेक होनेपर ही तो की जाती है; जैसा कि कहा है— सर्पान् कुशाग्राणि तथोदकानि ज्ञात्वा मनुष्याः परिवर्जयन्ति।
२७४ भक्तिसुधा
अज्ञानतस्तत्र पतन्ति चान्ये ज्ञाने फलं पश्य यथा विशिष्टम्॥ अर्थात् ज्ञानमें किस प्रकार विशेष फल है, वह इसीसे समझ लो कि लोग सर्प, कुशा और जलाशय आदिका ज्ञान होनेपर ही उनसे बचते हैं, उनका पता न होनेपर तो वे उनके शिकार हो ही जाते हैं। इसी प्रकार विवेकसे ही मनुष्यकी प्रवृत्ति भगवत्तत्त्वमें होती है। यदि विवेक न हो तो कौन प्रेमास्पद है और कौन त्याज्य है—इसका ज्ञान ही कैसे हो? अतः जो हृदयारण्य विवेकचन्द्रकी शीतल और सुकोमल किरणोंसे अनुरंजित नहीं हुआ, उसमें भगवान्का प्राकट्य होना असम्भव है। इसलिये भगवत्साक्षात्कारके लिये अन्तःकरणमें विवेकरूप चन्द्रका प्रादुर्भाव अवश्य होना चाहिये। जो लोग इस विवेकचन्द्रको भगवद्भक्तिका बाधक समझते हैं, उनके विषयमें क्या कहा जाय? उनके सिद्धान्तानुसार यदि द्वैतस्थिति ही परमकल्याणका हेतु है तो वह तो कीट-पतंग सभीको प्राप्त ही है। अतः वे सभी परमकल्याणके भागी होने चाहिये। वस्तुतः प्रेमका कारण तो अपने परप्रेमास्पदत्वका ज्ञान ही है। यदि हमारी दृष्टिमें अपने प्रेमास्पदसे भिन्न अन्य पदार्थोंकी भी सत्ता रहेगी तो हमारा प्रेम उनमें भी बँटा रहेगा और यदि वे सब-के-सब अपने प्रेमास्पदमें ही लीन हो जायेंगे तो हमारा सारा प्रेम सिमटकर एकमात्र उस अपने आराध्यदेवमें ही पुंजीभूत हो जायगा। प्रेमका नाश तो होगा नहीं; क्योंकि वह आत्मस्वरूप है। अतः निर्विकल्पालम्बनविवेकसम्पन्न हुए बिना तो ठीक-ठीक भगवत्प्रेम हो ही नहीं सकता। एक बात ध्यान देनेकी और भी है। निरतिशय प्रेम सदा 'त्वं' पदार्थके लिये ही हुआ करता है; अपने आराध्यदेवमें भी जो प्रेम होता है, वह आत्मीय होनेके ही नाते होता है। इसीसे भगवती श्रुति कहती है— 'न वा अरे देवानां कामाय देवाः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय देवाः प्रिया भवन्ति।' (बृहदारण्यक० ४।५।६) अर्थात् हे मैत्रेयी! देवता लोग देवताओंके लिये प्रिय नहीं होते; बल्कि अपने ही लिये प्रिय होते हैं। जो उपासक अपनेको भगवान्से भिन्न समझते हैं, वे किसलिये उनमें प्रेम करते हैं? इसीलिये न कि ऐसा करनेसे हमारा कल्याण होगा अथवा ऐसा करनेमें ही हमें आनन्द आता है; अतः उनका वह भगवत्प्रेम भी आत्मतुष्टिके ही लिये होता है। जिन महानुभावोंका ऐसा कथन है कि हमारा सिद्धान्त तो तत्सुखित्व अर्थात् भगवान्के सुखमें सुखी रहना है; वे भी इसीलिये तो भगवत्सुखमें सुखी हैं, न कि उन्हें उसीमें सुख मिलता है। इस प्रकार यदि यह नियम है कि आत्माके लिये ही सब कुछ प्रिय होता है तो जो उपासक अपनेसे भिन्न मानकर किसी उपास्यकी उपासना करता है, वह भी वास्तवमें तो अपने सुखके लिये ही ऐसा करता है। इस प्रकार उसका उपास्य उसके सुखका शेषभूत हो जाता है, किंतु परप्रेमास्पद तो शेषी ही हुआ करता है, शेष नहीं होता। वह तो शेषीका शेष होनेके कारण आपेक्षिक प्रेमका ही आस्पद होता है। आत्यन्तिक प्रेमका आस्पद तो शेषी ही होता है। अतः हम जिस किसी भी तत्त्वको अपनेसे भिन्न मानेंगे, वह हमारे परप्रेमका आस्पद नहीं होगा। बल्कि जिसे हम अपनेसे भिन्न मानेंगे, वह हमें अपना शत्रु समझकर अपने परम स्वार्थसे च्युत कर देगा; क्योंकि अपनेसे भिन्न कोई भी पदार्थ माननेपर द्वैत हो जाता है और थोड़ेसे भी द्वैतको श्रुति भयका कारण बतलाती है—'उदरमन्तरं कुरुते। अथ तस्य भयं भवति।' (तैत्तिरीय० २।७) यदि कोई सभीको अपनेसे भिन्न समझता है तो सभी उसका तिरस्कार करने लगते हैं; जैसा कि श्रुति कहती है—'सर्वं तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनः सर्वं वेद।' (बृहदारण्यक० २।४।६) इसपर कोई-कोई महानुभाव कहा करते हैं कि अनुकूलोंमें भेद रहनेपर भी भय नहीं होता, किंतु अनुकूलता सदा बनी ही रहेगी, इसमें भी तो कोई प्रमाण नहीं है। आज अनुकूलता है तो कल
श्रीरासलीलारहस्य २७५ प्रतिकूलता हो सकती है, अतः अभय अभेदमें ही है। इसीसे कहा है—‘यदा ह्येवैष एतस्मिन्नदृश्येऽ- नात्म्येऽनिरुक्तेऽनिलयनेऽभयं प्रतिष्ठां विन्दते। अथ सोऽभयं गतो भवति।’ (तैत्तिरीय० २।७) अर्थात् जो कोई इस अदृश्य, अरूप, अनिर्वाच्य और अनिकेत ब्रह्ममें अभय स्थिति प्राप्त कर लेता है, वह अभय पदको प्राप्त हो जाता है। यदि हम प्राकृत क्षुद्र पदार्थोंको अपने आत्मा या आत्मीयोंसे भिन्न समझते हैं तो वह हमें स्वार्थसे भ्रष्ट कर देता है, तब यदि हम पूर्णपरब्रह्म परमात्माको अपने सर्वान्तरतम परप्रेमास्पद प्रत्यगात्मासे भिन्न मानेंगे तो वह हमें हमारे परम स्वार्थसे पतित क्यों न कर देगा ? इसीसे विवेकी वेद, शास्त्र, धर्म, ईश्वर इन सभीको अपना परप्रेमास्पद बनानेके लिये अपनेसे अभिन्न समझता है। वह एक अणुको भी अपने आत्मासे भिन्न नहीं समझता। इसलिये यह नास्तिकता नहीं परम आस्तिकता है। विवेकसे भगवत्तत्त्वके परातत्त्वज्ञानकी निवृत्ति हो जाती है। विवेकी भगवान्को कोई बाह्य वस्तु नहीं समझता, उसकी दृष्टिमें तो जिस अपने आत्माके लिये सारी वस्तुएँ प्रिय होती हैं, उसीका वास्तविक स्वरूप भगवान् हो जाते हैं। इसलिये उसका तो भगवान्के प्रति निरुपाधिक और निरतिशय प्रेम हो जाता है। इस प्रकार यह विवेकरूप चन्द्र भक्तितत्त्वका बाधक नहीं, परम साधक है। उस उडुराजका विशेषण है—‘ककुभः—कं ब्रह्मात्मकं कुं कुत्सितं प्रकृतिप्राकृतात्मकं जगत् भासयतीति ककुभः’ अर्थात् क—ब्रह्मस्वरूप सुख और कु—प्रकृति एवं प्राकृत पदार्थोंसे होनेवाला कुत्सित जगत्—इन दोनोंको ही भासित करनेवाला होनेसे यह ककुभ है। जिस समय जगत् और परमानन्दमय परब्रह्मका विवेक होता है, उस समय जागतिक सुख सर्वथा निःसार प्रतीत होने लगता है। ब्रह्मानन्द तो निरतिशय और त्रिकालाबाधित है, किंतु प्राकृत सुख सातिशय और अनित्य है; अतः ब्रह्मानन्दकी बाढ़में उस प्राकृत सुखका तो विलीन हो जाना ही परम मंगल है। अथवा ‘के ब्रह्मणि कुषु कुत्सितेष्वपि भाति दीप्यते इति ककुभः’ अर्थात् यह आत्मानात्मविवेक अथवा विवेकचतुष्टय चाहे ब्रह्मा हो और चाहे कुत्सित—निम्नकोटिके प्राणियोंमें हो, दोनोंकी ही शोभा बढ़ाता है। वस्तुतः न्यूनता तो वहीं है, जहाँ इसका अभाव है। ‘प्रियः’—यह भी ‘उडुराजः’ का ही विशेषण है; क्योंकि यह विवेकचन्द्र परप्रेमास्पद श्रीभगवान्की प्राप्ति करानेवाला होनेके कारण सभीको प्रिय है तथा समस्त अनर्थोंकी निवृत्ति करनेवाला होनेसे भी प्रिय है। इसीका विशेषण ‘दीर्घदर्शनः’ भी है। ‘दीर्घमन- पबाध्यं दर्शनं यस्य अपौरुषेयत्वेन समस्तपुंदोष- शङ्काकलङ्कराहित्येनाप्रामाण्यशङ्काशून्यवेदजनित- त्वाद असौ दीर्घदर्शनः’ अर्थात् अपौरुषेय होनेके कारण जो पुरुषोचित दोषोंके शंकारूप कलंकसे रहित है, अतः जिसके अप्रामाण्यकी कोई आशंका नहीं है, उस वेदसे उत्पन्न होनेके कारण जिसका दर्शन—ज्ञान दीर्घ यानी अबाध्य है, वह विवेकचन्द्र दीर्घदर्शन है; क्योंकि विवेक वेदसे होता है और वेद अपौरुषेय होनेके कारण सब प्रकारके पुरुषोचित दोषोंके शंकारूप कलंकसे रहित है अथवा इसका दर्शन दीर्घकालमें— अनेकों जन्मोंके पश्चात् होता है—इसलिये यह दीर्घदर्शन है; जैसा कि श्रीभगवान्ने भी कहा है— ‘बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।’ (गीता ७।१९) विवेककी महिमा ऐसा जो विवेकचन्द्र है, वह ‘चर्षणी’— अधिकारी पुरुषोंके ‘शुचः’—शोकोपलक्षित विविध दुःखोंको विचाररूप अपनी कल्याणमयी और सुखप्रद किरणोंसे मार्जन करता हुआ उदित हुआ; क्योंकि मनकी उच्छृंखल वृत्तियोंका शमन करनेके लिये लाखों उपाय एक ओर और विवेक एक ओर है। उन मानसिक सन्तापोंकी शान्तिके लिये जो अन्य साधन
२७६ भक्तिसुधा हैं, उनमेंसे बहुतोंका तो अनुष्ठान ही असम्भव है तथा बिना विवेकके उनसे पूर्ण शान्ति भी नहीं होती, किंतु यथार्थ विवेक तो एक क्षणमें ही सभी विक्षेपोंको शान्त कर देता है। हमारे चित्तमें हर समय ऐसे विचारोंका तुमुल युद्ध छिड़ा रहता है कि अमुक कार्य ठीक नहीं हुआ, अमुक पुरुषका व्यवहार उचित नहीं था, हमें अमुक समयतक अमुक कार्य अवश्य कर लेना चाहिये, हमें अमुक झंझट लगा ही हुआ है इत्यादि। यह विक्षेप किसी भी प्रकारकी बाह्य सुविधाओंसे निवृत्त नहीं हो सकता; किंतु जिस समय ठीक-ठीक विवेक होता है, उस समय इसका ढूँढ़नेपर भी पता नहीं लगता। आयुर्वेदमें भी कई जगह शारीरिक रोगोंके हेतु मानसिक रोग ही माने गये हैं। उन मानसिक रोगोंकी चिकित्सा तो ओषधि आदिसे हो ही नहीं सकती। कई स्थलोंमें तो कारणकी चिकित्सा करनेसे ही कार्यकी भी चिकित्सा हो जाती है; किंतु जहाँ कार्य बहुत उग्र हो जाता है, वहाँ पहले ओषधिप्रयोगद्वारा कार्यको निर्बल करके पीछे कारणकी चिकित्सा करते हैं। किंतु यहाँ आध्यात्मिक राज्यमें तो यदि शोक, मोह एवं ईर्ष्या आदि रोगोंकी चिकित्सा हो जाय तो बाह्य व्याधियोंका आश्रयभूत शरीर ही प्राप्त न हो। अतः पूर्ण स्वास्थ्य तो उन मूलभूत रोगोंकी चिकित्सा होनेसे ही प्राप्त हो सकता है। इसीसे पूर्वकालमें जब शत्रुओंसे पराजित होनेपर किसी राजाका राज्य छिन जाता था तो वह महर्षियोंकी ही शरण लेता था और वे उसे यही उपदेश करते थे— यत्किञ्चिन्मन्यसेऽस्तीति सर्वं नास्तीति विद्धि तत्। एवं न व्यथते प्राज्ञः कृच्छ्रामप्यापदं गतः॥ अर्थात् तुम जिस वस्तुको ऐसा मानते हो कि वह है, उसे यही समझो कि वह है ही नहीं। ऐसा निश्चय रहनेसे बुद्धिमान् पुरुष कड़ी-से-कड़ी आपत्ति प्राप्त होनेपर भी व्यथित नहीं होता। वस्तुतः आत्मासे भिन्न जितना भी प्रतीयमान जगत् है, उसमें अस्तित्व- बुद्धिपूर्वक जो भले-बुरेपनका निश्चय करना है, वही सारे दुःखोंका मूल है। यह प्रपंच तो अनन्त है। इसमें किसी भी समय अनुकूलता-प्रतिकूलताका अभाव हो जाय, यह सर्वथा असम्भव है। अतः जबतक इसमें सत्यत्वबुद्धि रहेगी, तबतक हृदयके तापोंकी शान्ति हो ही नहीं सकती। वस्तुतः अभिनिवेशपूर्वक निरर्थक एक ही वस्तुका बारम्बार अनुसन्धान करना ही पूरा रोग है। किंतु जिस समय विवेकचन्द्रका उदय होता है, उस समय सारी अनुकूलता-प्रतिकूलता बालूकी भीतके समान ढह जाती है। वह विवेकचन्द्र क्या करता हुआ उदित हुआ?— 'अरुणेन ब्रह्मात्मना विषयेण प्राच्याः प्राचीनायाः धियः मुखं सत्त्वात्मकं भागं विलिम्पन्' अर्थात् अरुण यानी ब्रह्मरूप विषयसे प्राग्भवा बुद्धिके सत्त्वात्मक भागको विलेपित करता उदित हुआ। तात्पर्य यह है कि जिस समय विवेकरूप चन्द्रका प्रादुर्भाव होता है, उस समय बुद्धि पूर्ण परब्रह्मरूप रंगसे रँग जाती है। यह नियम है कि बुद्धि अपने विषयसे अनुरंजित हुआ करती है। विवेक होनेपर एकमात्र शुद्ध परब्रह्मकी ही सत्ता रह जाती है; इसलिये उस समय बुद्धि ब्रह्मरागसे ही अनुरंजित हो जाती है। प्रेम यानी रागका आस्पद होनेके कारण भी परमात्मा अरुण कहा जाता है अथवा यों समझो कि 'प्राच्याः अविवेकदशापन्नायाः बुद्धेः मुखं जाड्यात्मकं दुःखत्मकं वा भागम् अरुणेन ब्रह्मसाक्षात्कारजन्येन सुखेन विलिम्पन् तिरोहितं कुर्वन् उद्गात्'—प्राची यानी अविवेक दशाको प्राप्त हुई बुद्धिके मुख—जाड्यात्मक या दुःखात्मक भागको अरुण यानी ब्रह्मसाक्षात्कारजनित सुखसे विलेपित-तिरोहित करता हुआ उदित हुआ। किस प्रकार उदित हुआ, सो बतलाते हैं— 'यथा प्रियः श्रीकृष्णः प्रियायाः श्रीवृषभानुनन्दिन्या मुखम् अरुणेन कुङ्कुमेन विलिम्पन् उद्गात्।' अर्थात् जिस प्रकार प्रिय श्रीकृष्णचन्द्र अपनी प्रियतमा श्रीवृषभानुनन्दिनीके मुखको अरुण कुंकुमसे विलेपित करते हुए उदित हुए थे, उसी प्रकार यह विवेकचन्द्र उदित हुआ।
इसके सिवा प्रथम श्लोककी व्याख्या करते हुए जहाँ 'ताः' शब्दसे ज्ञानीरूपा प्रजा ग्रहण की गयी है, वहाँपर यह समझना चाहिये कि जिस समय भगवान् श्रीकृष्णने ज्ञानियोंके विवेकी अन्तःकरणरूप अरण्यमें रमण करनेकी इच्छा की 'तदैव'—उसी समय 'उडुराजः' परमात्मारूप चन्द्रका उनके विवेकी अन्तःकरणरूप वृन्दारण्यमें श्रुतिरूपा व्रजांगनाओंके साथ रमण करनेके लिये उदय हुआ। यहाँ 'उडुराजः' शब्दका तात्पर्य ऐसा समझना चाहिये—'उडुस्थानीयेषु परिमितज्ञानक्रियादिशक्तिशीलेषु जीवेषु राजते इति उडुराजः' अर्थात् परमात्मारूप चन्द्र उडुस्थानीय परिमित ज्ञानक्रियादिशील जीवोंमें राजमान हैं, इसलिये उडुराज हैं। जीवोंकी उपाधि मलिन है, इसीसे उनकी ज्ञान-शक्ति और क्रिया-शक्ति अभिभूत रहती है। उनकी शक्ति परिच्छिन्न है। अतः उन्हें विषयके साथ इन्द्रियोंका सन्निकर्ष होनेपर ही कुछ ज्ञान होता है। प्रमाण-निरपेक्ष ज्ञान नहीं होता; क्योंकि सारे प्रमाण आवरणके अभिभावक हैं। किंतु परमात्माकी ज्ञान- शक्ति और क्रिया-शक्ति अपरिच्छिन्न हैं, उनकी उपाधिभूता लीलाशक्ति भी परम विशुद्धा है। अतः वह अपने आश्रय परमात्माका आवरण नहीं करती; इसलिये परमात्माकी स्वाभाविकी ज्ञानशक्ति और क्रिया-शक्ति अपनी उपाधिसे अनभिभूता होनेके कारण किसी प्रकारके प्रमाणकी अपेक्षा नहीं रखती। इस प्रकार प्रमाणानपेक्ष ज्ञान क्रियावान् होनेके कारण ही परमात्मा अन्य जीवोंकी अपेक्षा अधिक राजमान (शोभाशाली) है और इसीसे जीवरूप उडुओंकी अपेक्षासे उसे उडुराज कहा है। अथवा यों समझो कि घटाकाशस्थानीय जीव उडुके समान हैं और महाकाशरूप परमात्मा नियन्तृत्वेन जीवोंमें विराजमान है। यह नियन्तृत्व ऐसा है कि जैसे घटाकाश महाकाशके अधीन है, उसी प्रकार अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य परमेश्वरके अधीन है। इसीसे अभेद होते हुए भी नियमन बन जाता है अथवा जैसे प्रतिबिम्ब बिम्बाधीन हैं, उसी प्रकार जीव ईश्वरके अधीन हैं। इस प्रकार भी वह उडुराज है। अथवा 'रलयोः डलयोश्चैव' आदि नियमके अनुसार 'उडुराजः' के स्थानमें 'उरुराजः' मानें तो यों समझना चाहिये—'उरुधा जीवेशादिरूपेण बहुधा राजत इति 'उरुराजः' अर्थात् जीव-ईश्वरादिरूपसे अनेक प्रकार राजमान है, इसलिये परमात्मा उरुराज है; जैसे कि कहा है—'इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते।' (बृहदारण्यक० २।५।१९) अथवा सगुण- निर्गुणरूपसे अनेक प्रकार राजमान है, इसलिये उरुराज है; या जायमान और अजायमानरूपसे राजमान है, इसलिये उरुराज है; जैसा कि श्रुति कहती है— 'अजायमानो बहुधा विजायते' (मुद्गलोपनिषद् २) अर्थात् अजन्मा होनेपर भी परमात्मा महदादिरूपसे अनेक प्रकार उत्पन्न हुआ है अथवा रासलीलामें वे अनेक रूपसे राजमान हुए थे, इसलिये उरुराज हैं। श्रुति भी कहती है—'स एकधा भवति दशधा भवति शतधा सहस्रधा भवति' इत्यादि। अथवा बहुतसे विभक्त पदार्थोंमें अविभक्तरूपसे अकेला ही विराजमान है, इसलिये परमात्मा उरुराज है। 'अविभक्तं विभक्तेषु' अर्थात् विभक्त जो कार्यवर्ग उसमें परमात्मा अविभक्त यानी कारणरूपसे स्थित है; अथवा विभक्त जो साक्ष्यवर्ग उसमें वह अविभक्त यानी साक्षीरूपसे स्थित है; या ऐसा समझो कि विभक्त जो काल्पनिक प्रपंच उसमें वह अधिष्ठानरूपसे ओतप्रोत है। इन्हीं सब कारणोंसे परमात्मा उरुराज यानी उडुराज है। वह स्वप्रकाश पूर्ण परब्रह्म परमात्मा, जो सबका महाकारण और स्वरूपतः कार्यकारणातीत है, ज्ञानियोंके विवेकी अन्तःकरणरूप अरण्यमें रमण करनेके लिये आविर्भूत हुआ। यहाँ 'रमण' का अर्थ है 'तत्' पदार्थके साथ 'त्वं' पदार्थका ऐक्य हो जाना। जो अन्तःकरण विवेकचन्द्रकी शीतल सुकोमल अमृतमय किरणोंसे सुशोभित है, उस अन्तःकरणरूप वृन्दारण्यमें यह 'तत्' पदार्थरूप भगवान् 'त्वं' पदके अर्थभूत अनन्त जीवरूप व्रजांगनाओंके साथ रमण करनेको अर्थात्
अपने साथ उनका तादात्म्य स्थापित करनेको प्रकट होता है, क्योंकि असली रमण तो यही है कि नायक और नायिकाका देश, काल और वस्तुरूप व्यवधानसे रहित सम्मिलन हो। यही पारमार्थिक रमण है। लौकिक रमणमें तो कुछ-न-कुछ व्यवधान रहता ही है; क्योंकि जबतक द्वैत बना हुआ है, तबतक उसमें विभाग भी रहता ही है। वे भगवान् रूप उडुराज सबके अभिलषित हैं, इसलिये ‘प्रियः’ हैं; क्योंकि वे सभीके अन्तरात्मा हैं। आत्मा नामकी वस्तु किसीको भी अप्रिय नहीं होती। संसारमें सुख-प्राप्ति और दुःख-निवृत्तिके लिये जितनी चेष्टाएँ होती हैं, सब आत्मार्थ ही हैं। ऐसी स्थितिमें अपने परप्रेमास्पद भगवान्के साथ कौन रमण करना न चाहेगा ? इसके सिवा और भी वे कैसे हैं ? ‘दीर्घदर्शनः’— ‘अनाद्यविद्याबीजनिवृत्त्यनन्तरं दीर्घेण कालेन दर्शनं यस्य स दीर्घदर्शनः’ अर्थात् अनादि अविद्यारूप बीजभावकी निवृत्तिके पश्चात् जिनका बहुत देरमें दर्शन होता है, ऐसे ये भगवान् दीर्घदर्शन हैं। इस संसारमें नाना प्रकारके कर्मजालमें फँसे हुए जीवको प्रथम तो नर-देह ही दुर्लभ है; उसमें भी पुंस्त्व-प्राप्ति कठिन है तथा पुरुषोंमें भी विशुद्ध निष्काम भावसे स्वधर्माचरण करना दुर्लभ है एवं स्वधर्मपरायणोंमें भी कोई विरले ही विवेक-वैराग्यनिष्ठ होते हैं। यह भगवद्दर्शन अनेकों सोपानातिक्रमणोंके पश्चात् प्राप्त होनेवाला है। इसलिये यह निश्चय ही अत्यन्त दीर्घकालसाध्य है। किंतु सबके अन्तरात्मा और परप्रेमास्पद होनेके कारण वे सबको सुलभ भी हैं। अतः ‘के ब्रह्मणि कुषु कुत्सितेषु सम एव भातीति ककुभः’—क अर्थात् ब्रह्मामें और कु—कुत्सित जीवोंमें समान रूपसे भासमान होनेके कारण ककुभ हैं। वे जिस प्रकार हमारे मन और अहंकारादि तथा उनके विकार, श्रद्धा, अश्रद्धा, धी, ह्री आदिके अवभासक हैं, उसी प्रकार ब्रह्मासे लेकर कीट-पतंगादिपर्यन्त सभी जीवोंके प्रमाता, प्रमाण और प्रमेयके प्रकाश हैं। इस प्रकार सबको सुलभ होनेके कारण वे ‘ककुभ’ हैं। अतः ‘के स्वर्गे कौ पृथिव्यां सर्वत्रैव भातीति ककुभः’ अथवा ‘कं स्वर्गः कुः पृथिवी भाति विभाति यस्मात् स ककुभः’ अर्थात् भगवान् स्वर्ग और पृथिवी सभी जगह भासमान हैं अथवा उन्हींसे स्वर्ग और पृथिवी भी भासमान हैं, इसलिये भी वे ‘ककुभ’ हैं। अतः सब कुछ उन्हींसे भासित है— ‘तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥’ (श्वेताश्वतर० ६।१४) इस प्रकार वे सभीको सुलभ हैं। इसीसे ज्ञानीरूप चर्षणियोंकी उपासनासे सन्तुष्ट होकर वे अपने साथ उनका तादात्म्य स्थापितकर उन्हें भगवदीय आनन्दका अनुभव कराना चाहते हैं। इसीलिये वे उनके विवेकी अन्तःकरणरूप आकाशमें उदित हुए। क्या करते हुए उदित हुए ?—‘करैः स्वांश- विशेषैर्वैषयिकसुखैश्चर्षणीनामज्ञजनानामपि तत् सुखप्राप्तिनिमित्तान् शुचः शोकान् सृजन् दूरीकुर्वन् उदगात्’ अर्थात् वे अपनी किरणोंसे अपने अंशभूत वैषयिकसुखोंद्वारा चर्षणी यानी अज्ञजनोंके भी उस सुखकी अप्राप्तिसे होनेवाले शोकोंको निवृत्त करते हुए उदित हुए। वास्तवमें विचारना चाहिये कि वैषयिक सुख भी क्या हैं? वे अनन्त अविकारी परमानन्दमूर्ति परब्रह्मके कण ही तो हैं। वे उस परमानन्द-सिन्धुकी बूँदें ही तो हैं। किंतु लोग भ्रमवश भगवान्को छोड़कर तुच्छ वैषयिक सुखोंकी अभिलाषा करके व्यर्थ दुःख पाते हैं। श्रीगोसाईंजी महाराज कहते हैं— अस प्रभु हृदयं अछत अविकारी। सकल जीव जग दीन दुखारी॥ (रा०च०मा० १।२३।७) इस प्रकार क्योंकि वैषयिक सुख परब्रह्म परमात्माके ही अंशभूत हैं, इसलिये वे उनके द्वारा उन अज्ञ पुरुषोंके जो कि अनन्त भगवत्स्वरूपानन्दसे अनभिज्ञ हैं, उन विषयोंकी अप्राप्तिके कारण होनेवाले शोकको
निवृत्त करते हुए प्रकट हुए और क्या करते हुए प्रकट हुए ? 'प्राच्याः प्राचीनायाः निर्वृत्तिकायाः बुद्धेर्मुखं प्रधानं सत्त्वात्मकं भागम् अरुणेन स्वाभिव्यक्ति- जनितेन सुखेन विलिम्पन् उदगात्' अर्थात् वे प्राचीना यानी निवृत्तिकामिनी बुद्धिके मुख यानी प्रधान सात्त्विक भागको अपनी अभिव्यक्तिसे उत्पन्न हुए सुखके द्वारा विलेपित करते हुए उदित हुए। भगवत्सुखका बुद्धिपर ही लेप करना युक्तियुक्त भी है; क्योंकि वही उसे ग्रहण कर सकती है—'स्वयं तदन्तःकरणेन गृह्यते' अर्थात् ब्रह्माभिव्यक्तिजनित जो सुख है, उसकी अभिव्यक्ति निश्चयात्मिका बुद्धिपर ही होती है। वे परब्रह्मरूप उडुराज किस प्रकार उदित हुए, सो बतलाते हैं—'यथा कश्चित् दीर्घदर्शनः दीर्घेण कालेन दर्शनं यस्य एवंभूतः प्रियः प्रियायाः विप्रोषित- भर्तृकायाः शुचः विभागसम्भूतानि शोकाश्रूणि शान्तमैः करैः करव्यापारैः मृजन् करधृतेन अरुणेन कुङ्कुमेन मुखं विलिम्पन् च स्यात्तथा' अर्थात् जिस प्रकार कोई दीर्घकालके अनन्तर आनेवाला प्रवासी पति अपनी वियोगसन्तप्ता प्रियतमाके शोकाश्रुओंको अपने सुशीतल कर-व्यापारोंसे पोंछता है तथा उसके मुखको अपने हाथमें लिये हुए कुंकुमसे लाल कर देता है, उसी प्रकार ये उडुराज उदित हुए। अथवा यों समझो कि जिस समय भगवान्ने रमण करनेकी इच्छा की और गोपांगनाओंके सौन्दर्य- माधुर्य एवं तपका स्मरणकर उनको वृन्दावनमें आह्वान करनेका संकल्प किया, उसी समय उडुराज- प्रेमाम्बुराशिकी वृद्धि करनेवाला चन्द्रमा सस्यरूप चर्षणियोंके शोकसूर्यकी तीक्ष्णतर किरणोंसे उत्पन्न हुई म्लानताको अपनी सुशीतल किरणोंसे निवृत्त करता हुआ उदित हो गया। इसके सिवा 'उडुराजः' इस शब्दसे भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र भी अभिप्रेत हो सकते हैं; क्योंकि यौवनकी अतिशयता १ के कारण उडुओ-नक्षत्रोंके समान स्वच्छ हैं और रंजन यानी अनुरागजनक होनेके कारण राजा हैं अथवा यदि 'उरुराजः' ही 'उडुराजः' है—ऐसा मानें तो इस प्रकार अर्थ करना चाहिये— 'स्वकीयप्रेमातिशयेन उरुधा रञ्जयतीति उरुराजः' अथवा 'उरून् महतस्तत्त्वदर्शिनोऽपि महामुनीन् रञ्जयति स्वानुरागयुक्तान् करोतीति उरुराजः' अर्थात् अपनी प्रेमातिशयताके कारण अनेक प्रकारसे रंजन करते हैं अथवा जो महान् तत्त्वदर्शी भी हैं, उन महामुनियोंका भी अपने अनुराग-विशेषके द्वारा अनुरंजन करते हैं; इसलिये श्रीकृष्णचन्द्र उरुराज हैं। वे प्रिय अर्थात् धन, धाम और सुहृद्वर्गसे भी प्रियतर २ यानी सबके सर्वस्वभूत और दीर्घदर्शन—जिनका दर्शन दीर्घ यानी अत्यन्त मूल्यवान् है, ऐसे श्रीकृष्णचन्द्र चर्षणी यानी गोपीजनोंके शोक—प्रियतमके विरहजनित सन्तापको निवृत्त करने तथा 'ककुभः'३ सौन्दर्यातिशयके कारण मन्दगामिनी प्राची पूजनीया प्रियतमा श्रीवृषभानु- नन्दिनीके मानादिजनित आँसुओंको अपने कर-व्यापारोंसे निवृत्त करते एवं अरुण कुंकुमादिसे उनका मुख विलेपित करते विहारस्थलमें आविर्भूत हुए। श्रीवृषभानुनन्दिनी भगवान्की नित्य सहचरी हैं। जिस प्रकार शक्तिके बिना शिव, मधुरिमाके बिना मिश्री और दाहिका शक्तिके बिना अग्नि नहीं रह सकते, उसी प्रकार श्रीराधिकाजीके बिना श्यामसुन्दर नहीं देखे जाते। वे उनकी स्वरूपभूता आह्लादिनीशक्ति हैं। उन्हींके कारण श्रीकृष्णचन्द्रकी सारी शोभा है; अतः उन्हें छोड़कर वे एक पल भी नहीं रह सकते। वे निरन्तर उनकी सन्निधिमें रहते हैं और एक-दूसरेसे तादात्म्यको प्राप्त हो परस्पर एक-दूसरेकी शोभा बढ़ाते हैं। माधुर्य भावसे उपासना करनेवाले बहुत- १. यों तो भगवान्की अवस्था इस समय केवल ८-१० वर्षकी थी; किंतु रासक्रीड़ाके लिये वे इस समय अपनी योगमायासे युवावस्थासम्पन्न हो गये थे। २. 'यद्दारमार्थसुहृत्प्रियात्मतनयप्राणाशयास्त्वत्कृते ॥' (श्रीमद्भा० १०।१४।३५) अर्थात् गोपांगनाओंके गृह, धन, सुहृद्, प्रिय, आत्मा (शरीर), पुत्र, प्राण और मन—ये सभी जिनके लिये थे। ३. 'कुम्भ मन्दायां गतौ' इस धातुसे 'ककुभः' शब्द सिद्ध होता है।
२८० भक्तिसुधा से भावुकोंके मतमें तो श्रीकृष्णकृपाकी प्राप्तिके लिये श्रीप्रियाजीकी उपासना ही कर्तव्य है। उनका मत है कि श्रीराधिकाजी स्वाधीनभर्तृका हैं, भगवान् उनके अधीन हैं, वे नित्य निकुंजमें निरन्तर श्रीप्रियाजीके सौन्दर्यसमास्वादनके लिये उन्हें अपने माधुर्यरसका नैवेद्य समर्पण करते हैं। इस प्रकार भगवान्से आराधित होनेके कारण ही वे 'श्रीराधा' कहलाती हैं। अतः उनका आह्वान करनेके लिये भगवान्को वेणुनाद करनेकी आवश्यकता नहीं थी। वे तो उनकी सन्निधिमें ही थीं और उनकी प्रसन्नताके लिये ही यह लीला भी की गयी थी। ऐसी अवस्थामें यह प्रश्न होता है कि फिर भगवान्के वेणुनादका और क्या प्रयोजन था ? यहाँ यही समझना चाहिये कि भगवान्ने अन्य यूथेश्वरी और साधनसिद्धा व्रजांगनाओंको बुलानेके लिये ही वंशीध्वनि की थी। वे चिरकालसे भगवत्संगके लिये उत्सुक थीं और तरह-तरहके व्रत-उपवास भी कर रही थीं, अतः उन्हें उनकी उपासनाका फल देनेके लिये ही भगवान्ने वंशीध्वनि की। × × × इस तरह अखण्डमण्डल श्रीवृषभानुनन्दिनीके मुखके समान चन्द्रमाको तथा उसकी शीतल सुकोमल रश्मियोंसे रंजित मनोहर वनको देखकर श्रीव्रजांगनाओंका मन हरण करनेवाले वेणुगीत-पीयूषको प्रवाहित किया। उस प्रेमानन्द-समुद्रको बढ़ानेवाले गीतको सुनकर उनका मन मोहित होकर कृष्णकी ओर आकर्षित हो उठा, मानो कृष्णने हठात् उनके मनको हर लिया। बस फिर क्या था, जैसे नदियाँ समुद्रकी ओर दौड़ती हैं, वैसे ही समस्त व्रजांगनाएँ संभ्रमसे श्रीकृष्णकी ओर चल पड़ीं। मानो जब प्रेमानन्दमें मन बह चला, तब मनके परतन्त्र शरीर भी उसी वेगमें बह चला। यह गीत पीयूषप्रवाहक इतर प्रवाहोंकी तरह अपने संसर्गी पदार्थोंको गन्तव्यकी ओर न ले जाकर उद्गम-स्थान श्रीकृष्णकी ओर ही ले जाता है। किंवा जब श्रीकृष्णके वेणुगीतरूप चौरने व्रजांगनाओंके धैर्य, विवेक आदि रत्नोंसे भरपूर मनोमंजूषाको हर लिया तो वे व्याकुल होकर उसीके अन्वेषणके लिये दौड़ पड़ीं। कोई दोहन, कोई परिवेषण, कोई लेपन, मार्जन, अंजन, पति-शुश्रूषण छोड़कर उलटे-पलटे भूषण- वसन धारणकर श्रीकृष्णके पास चल पड़ीं। पति, पिता, भ्राता आदिके रोकनेपर भी वे न रुकीं। जब कुछ व्रजांगनाओंको उनके पति आदिने गृहके भीतर रोक लिया तो वे वहीं नेत्र मींचकर श्रीकृष्णका ध्यान करने लगीं। प्रियतमके दुःसह विरहजन्य तीव्र तापसे समस्त पाप कम्पित हो उठे और ध्यानप्राप्त प्रियतमके परिरम्भणजन्य अनन्त आनन्दसे पुण्य भी दुर्बल हो गये। इस तरह व्रजांगनाएँ सद्यः क्षीणबन्धन होकर गुणमय देहको त्याग जारबुद्धिसे भी उन्हीं भगवान्को प्राप्त हो गयीं। भगवान्का गोपांगनाओंको उपदेश समीपमें आयी हुई व्रजांगनाओंको देखकर भगवान् अपनी वचन-चातुरीसे मोहित करते हुए बोले—'हे महाभागाओ! आपका स्वागत है। हम आपलोगोंका क्या प्रिय करें? व्रजमें कुशल तो है? आपलोग अपने आगमनका कारण कहो। यह घोररूपा रजनी घोर व्याघ्रादि जन्तुओंसे निषेवित है। आपलोग व्रजमें जाओ। हे सुमध्यमाओ! यहाँ स्त्रियोंको नहीं ठहरना चाहिये। आपलोगोंके माता, पिता, भ्राता, पति आपलोगोंको घरमें न देखकर ढूँढ़ते होंगे। बन्धुओंको संकट न पहुँचाओ। बहुत हो चुका, अब आपलोग विलम्ब मत करो। व्रजको चली जाओ।' आनन्दकन्द भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रने व्रजांगनाओंको यही आदेश दिया कि तुमलोग गोष्ठमें रहकर अपने पतियोंकी शुश्रूषा करो। हमारी प्राप्तिका यही उपाय है। यदि पातिव्रत्यमें तुम्हारी गति न हो तो 'शुश्रूषध्वं सतीः' पतिव्रताओंकी सेवा करो। इस व्याजसे भगवान्ने समस्त पुरुषोंको यही उपदेश किया है कि जिनकी गति परब्रह्मकी उपासनामें न हो, वे देवता और माता- पितादिरूप वैदिक और लौकिक ईश्वरोंकी उपासना करें। यदि वे पहले इन ईश्वरोंकी सेवा करेंगे तो
क्रमशः उन्हें परमेश्वरकी प्राप्ति हो जायगी। इससे सिद्ध हुआ कि जिन पुरुषोंके पाप-पुंजकी कर्म और उपासनाद्वारा निवृत्ति हो गयी है, वे ही भगवद्धाममें प्रवेश करनेके अधिकारी हो सकते हैं— 'नराणां क्षीणपापानां कृष्णे भक्तिः प्रजायते।' इसके सिवा यह भी प्रसिद्ध ही है कि— वर्णाश्रमाचारवता पुरुषेण परः पुमान्। विष्णुराराध्यते पन्था नान्यस्तत्तोषकारकः॥ (श्रीविष्णुपुराण ३।८।९) अतः यदि तुम वर्णाश्रम-धर्माचारके द्वारा इन लौकिक और वैदिक ईश्वरोंकी सेवा करोगे, तभी परमेश्वरकी प्राप्ति कर सकोगे। अनभिज्ञ पुरुषोंको ही मोहवश स्वधर्ममें अरुचि और परधर्ममें रुचि होती है। इसी प्रकार अर्जुनको भी जो परधर्ममें रुचि हुई थी, वह उसका मोह ही था। उसने जो क्षात्रधर्मका परित्यागकर ब्राह्मणधर्मका आश्रय लिया था और बन्धुवधसे विरत होकर कहा था कि 'गुरून्हत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके।' (गीता २।५) वह उसका भयंकर व्यामोह ही था। जिस प्रकार रुग्णावस्थामें पित्तादिके दूषित हो जानेसे लोगोंको निम्बादि कटु पदार्थोंमें रुचि होने लगती है और दुग्धादिमें अरुचि हो जाती है, उसी प्रकार मोहके कारण ही स्वधर्ममें अरुचि हुआ करती है। अतः रुचि हो या न हो, उचित यही है कि स्वधर्मका आश्रय लिया जाय और परधर्मका परित्याग किया जाय। इससे सिद्ध हुआ कि जिस प्रकार भगवान्ने व्रजांगनाओंसे कहा था कि मुझ परपुरुषका संग छोड़कर तुम अपने पतियोंकी सेवा करो, इसी प्रकार साधारण मनुष्योंको भी उनका यही आदेश है कि उन्हें स्वधर्मका ही आश्रय लेना चाहिये। जिस प्रकार छतपर जानेके लिये प्रत्येक सीढ़ीपर होकर जाना पड़ता है, उसी प्रकार परमात्मप्राप्तिमें भी क्रमिक साधनाका अवलम्बन करना होता है। जो लोग सोपानातिक्रम करके परमोच्च नैष्कर्म्यका आश्रय लेते हैं, उनका ऐसा पतन होता है कि फिर उत्थान होना दुर्लभ हो जाता है। इसीसे महापुरुष कर्मत्यागमें भय दिखलाया करते हैं। भगवान्ने भी इसी कारण कर्मानुष्ठानकी आवश्यकता प्रदर्शित करनेके लिये अर्जुनसे कहा था— सन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ। तयोस्तु कर्मसन्न्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते॥ (गीता ५।२) साधारण पुरुषोंके लिये तो यही क्रम है; हाँ, गुणातीतोंकी बात अलग है। गुणातीत तो कहते ही उसे हैं, जिसपर गुणोंका आक्रमण न हो। अतः अज्ञ पुरुषोंको उनका अनुकरण न करके स्वधर्मका ही आश्रय लेना चाहिये। यदि वे उसे छोड़कर नैष्कर्म्यपर आरूढ़ होना चाहेंगे तो सर्वथा पतित हो जायेंगे। यह बात भी सुनिश्चित है कि प्रयत्न केवल साधनमें ही होता है, फलमें प्रयत्न नहीं होता। साधनके पर्यवसानमें फल तो स्वतः प्राप्त हो जाता है। यदि किसी काष्ठको काटना है तो कुठारका उद्यमन और निपातन किया जाता है। वहाँ प्रयत्नकी आवश्यकता कुठारके उद्यमन-निपातनमें ही होती है; उसके परिणाममें द्वैधीभाव तो स्वयं हो जाता है। इसी प्रकार आवश्यकता इसी बातकी है कि हम सबसे पहले कर्मद्वारा अपनी उच्छृंखल प्रवृत्तियोंका निरोध करके फिर सात्त्विक प्रवृत्तियोंद्वारा अपनी राजस, तामस प्रवृत्तियोंका निरोध करें। उसके पश्चात् जब हमारी सात्त्विक प्रवृत्तिका भी निरोध हो जायगा तो स्वस्वरूपकी उपलब्धि स्वतः ही हो जायगी। ज्यों ही मानस व्यापारकी शान्ति हुई कि 'तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्॥' (योगदर्शन १।३) इस सूत्रके अनुसार द्रष्टाकी अपने स्वरूपमें स्थिति हो जाती है। वस्तुतः नैष्कर्म्य क्या है—इस बातको साधारण पुरुष समझ भी नहीं सकते, इसीलिये वे कर्मत्यागकी व्यर्थ चेष्टामें प्रवृत्त होते हैं। जिस प्रकार नौकारूढ़ व्यक्तिको भ्रमवश तटस्थ वृक्षादि चलते दिखायी देते हैं और अपनेमें स्थिरता प्रतीत होती है, उसी प्रकार
२८२ भक्तिसुधा अज्ञानियोंको मोहवश अपने निष्क्रिय शुद्ध स्वरूपमें कर्मकी प्रतीति होती है। इसी बातको भगवान्ने इन शब्दोंमें व्यक्त किया है— कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः। स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत्॥ (गीता ४।१८) वास्तवमें अकर्म तो स्वरूपस्थिति है, वह कर्तव्य नहीं है। जो अकर्मको कर्तव्य समझकर देहेन्द्रियव्यापारकी निवृत्तिका प्रयत्न करते हैं, वे अकर्मके रहस्यसे सर्वथा अनभिज्ञ हैं। इस प्रकारका प्रयत्न भी तो एक व्यापार ही है; अतः वह निवृत्ति नहीं, उसे व्यापारशान्ति ही कहा जा सकता है। वस्तुतः ‘संन्यासस्तु पूर्णब्रह्मणि सम्यङ्न्यासः' इस लक्षणके अनुसार पूर्ण ब्रह्ममें सर्वथा आत्मसमर्पण करनेका नाम ही संन्यास है। वह उपेय या साध्य है, उपाय या साधन नहीं है। इसीसे भगवान् गोपिकाओंको उपदेश करते हैं कि मैं तो उपेय हूँ, तुम मुझे प्राप्त करनेके लिये पतिशुश्रूषण-रूप उपायका अवलम्बन करो। स्वधर्ममें निष्ठा होनेका उपाय यदि मोह या दुर्दैववश तुम्हारी स्वधर्ममें निष्ठा नहीं है तो अहंकार छोड़ो और शास्त्रज्ञोंका सत्संग करो। इससे स्वधर्ममें तुम्हारी अभिरुचि होगी। इसी बातको लक्षित करनेके लिये भगवान्ने व्रजांगनाओंसे कहा है—‘शुश्रूषध्वं···· सतीः' (श्रीमद्भा० १०। २९। २२) (सत्पुरुषोंकी सेवा करो), स्त्रियोंके लिये पतिव्रता ही सत्पुरुष हैं। जिस प्रकार स्त्रियोंके लिये भगवान्ने पतिव्रताओंका संग करनेकी आज्ञा दी है, उसी प्रकार पुरुषोंको शास्त्रज्ञ और निःस्पृह ब्राह्मणोंका सहवास करना चाहिये। मनु भगवान्ने भी ब्राह्मणोंसे ही उपदेश ग्रहण करनेकी आज्ञा दी है। वे कहते हैं— अध्येतव्यमिदं शास्त्रं ब्राह्मणेन प्रयत्नतः। शिष्येभ्यश्चोपदेष्टव्यं सम्यक् नान्येन केनचित्॥ जो लोग देखा-देखी दूसरोंको उपदेश करने लगते हैं, वे उनके पतनके ही कारण होते हैं। वास्तविक कल्याण तो शास्त्रज्ञ ब्राह्मणके ही उपदेशसे हो सकता है। जिस प्रकार कोई साधारण पुरुष किसी वैद्यराजके थोड़ेसे ओषधिप्रयोगोंको देखकर यदि स्वयं भी वैद्यराज होनेका दावा करके ओषधि देने लगे तो वह रोगियोंकी मृत्युका ही कारण होता है, उसी प्रकार अनधिकारी उपदेशक जनताके अमंगलके ही हेतु होते हैं। अज्ञजन केवल श्रवणके ही अधिकारी हैं। शास्त्रज्ञ ब्राह्मणोंसे श्रवण करके वे अपना कल्याण अवश्य कर सकते हैं; इसीसे भगवान्ने कहा है कि— अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते। तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः॥ (गीता १३।२५) अतः उन्हें आत्मकल्याणके लिये श्रवण तो अवश्य करना चाहिये, किंतु दूसरोंको उपदेश करनेका प्रयत्न न करना चाहिये। इस प्रकार जिस तरह स्त्रियोंको पतिव्रताओंकी सेवा करनी आवश्यक है, उसी प्रकार पुरुषोंको ब्राह्मणोंकी शुश्रूषा करनी चाहिये। यदि उनकी सेवामें रहते-रहते जल्दी लाभ न भी हुआ तो ‘तबहिं होइ सब संसय भंगा। जब बहु काल करिअ सतसंगा॥' (रा०च०मा० ७।६१।४) कुछ दिन धैर्य रखकर उनकी सेवामें तत्पर रहो। अधिक मलकी निवृत्तिके लिये अधिक कालतक मार्जनकी आवश्यकता होती है। इसी तरह जन्म-जन्मान्तरके पापोंकी निवृत्तिमें कुछ समय लगना स्वाभाविक ही है। यदि उनके कथनमें रुचि नहीं होती तो भी कुछ काल तो अरुचिसे भी उन्हींकी आज्ञामें रहो। वैद्य रोगीके लिये हितकर समझकर जो ओषधि देता है, रोगीको किसी प्रकारका ननु-नच न करके उसीको सेवन करना चाहिये; उसे अपनी रुचिकी अपेक्षा नहीं करनी चाहिये। संसारमें सत्संग बहुत दुर्लभ है। साधुजन कहीं साइनबोर्ड लगाकर नहीं बैठते। उनकी प्राप्ति सौभाग्यसे ही होती है। श्रीगोसाईंजी महाराज कहते हैं— पुन्य पुंज बिनु मिलहिं न संता। सतसंगति संसृति कर अंता॥ (रा०च०मा०७।४५।६)
श्रीरासलीलारहस्य २८३
श्रीमद्भगवद्गीतामें आत्मकल्याणके लिये साधुसेवाकी आवश्यकता भगवान् कृष्णने इस प्रकार दिखलायी है— तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया। उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः॥ (गीता ४।३४) किंतु सेवामें धैर्यकी बहुत आवश्यकता है; जल्दबाजीसे काम नहीं चलता। देखो इन्द्रने दीर्घ कालतक सेवा की, तभी उसका अन्तःकरण शुद्ध हुआ और वह आत्मतत्त्वकी उपलब्धिमें समर्थ हो सका। गीतामें भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र कहते हैं— परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥ (गीता ४।८) इस प्रकार भगवान्ने 'साधुओंका परित्राण' अपने अवतारका प्रधान प्रयोजन बतलाया है। अब यह प्रश्न होता है कि साधु किसे कहते हैं? भाष्यकार भगवान् शंकराचार्यने 'साधूनाम्' इस पदका पर्याय 'सन्मार्गस्थानाम्' लिखा है। अपनी कुल-परम्पराका समादर आवश्यक है किंतु 'सन्मार्ग' क्या है? इसका निर्णय होना बहुत कठिन है। यदि कहा जाय कि शास्त्रानुमोदित मार्गका नाम सन्मार्ग है तो इसमें भी सन्देह होता है; क्योंकि यह निश्चय होना कठिन है कि सच्चास्त्र कौन है। लोग शंका करते हैं कि वेद ही सच्चास्त्र क्यों है, कुरान या बाइबिल आदिको ही प्रधान सच्चास्त्र क्यों न माना जाय? यद्यपि यह बात युक्तिसे भी सिद्ध की जा सकती है कि वेद ही सच्चास्त्र है तथापि यहाँ इसका प्रसंग नहीं है। इसलिये विशेष न कहकर थोड़ा-सा संकेत किया जाता है। मान लीजिये आपको कहीं जाना है। अपने ध्रुवकी ओर जाते-जाते आगे चलनेपर आपको चार मार्ग मिले। उस समय चारों मार्गोंसे यात्री आ-जा रहे हैं। आप उनसे पूछते हैं कि अमुक स्थानको कौन मार्ग जाता है तो वे सभी अपने-अपने मार्गको वहाँ जानेवाला और अधिक सुविधाजनक बतलाते हैं। वे अपने-अपने मार्गकी प्रशंसा करते हैं—इतना ही नहीं अपितु अपनेसे भिन्न मार्गोंको विघ्नबहुल और त्याज्य भी बतलाते हैं। ऐसी अवस्थामें आप क्या करेंगे? हमारे विचारसे तो आप यही देखेंगे कि इनमें कोई हमारा परिचित (आप्तपुरुष) भी है। तब उनमें जो आपके ग्रामके आस-पासका होगा, औरोंकी अपेक्षा उसीका विश्वास करोगे। अतः विचारवानोंका यही कर्तव्य है कि आप्तवाक्यका अवलम्बन करें। यह साधारण धर्म कहा जाता है कि जो आचार-विचार अपनी कुलपरम्परासे चला आया हो, उसीका आश्रय लिया जाय। आप जिस देश, जाति, सम्प्रदाय या कुलमें उत्पन्न हुए हैं; उसमें जो पुरुष या शास्त्र अधिक आदरणीय माने गये हों, उन्हींके मार्गका अवलम्बन करें, क्योंकि पिता अपने पुत्रका अहित कभी नहीं चाह सकता। अतः पिता-पितामह-प्रपितामह-क्रमसे जो मार्ग चला आया हो, उसीका आश्रय लेना चाहिये। धर्मके विषयमें यह व्यापक लक्षण है। यह जैसा हिन्दुओंके लिये है, वैसा ही ईसाई, मुसलमान, जैन, बौद्ध आदि अन्य मतावलम्बियोंके लिये भी है। उन्हें भी अपने-अपने आचार्य और धर्मग्रन्थोंका आश्रय लेना चाहिये। यदि आप आरम्भसे ही यह निश्चय करने लगेंगे कि कौन मार्ग श्रेष्ठ है तो इसका निर्णय कभी नहीं कर सकेंगे। यह तो बहुत लम्बा-चौड़ा क्रम है, इसका निर्णय तो कभी नहीं होगा। ऐसी अवस्थामें आप धर्ममार्गका अवलम्बन कैसे कर सकेंगे? राजाको सारी शक्तियाँ प्राप्त होती हैं; वह चाहे जिसे उजाड़ सकता है और चाहे जिसे बसा सकता है; उसे कोई रोकनेवाला नहीं होता। फिर भी वह अपने ही बनाये हुए नियमोंका अनुसरण करता है। वस्तुतः बिना नियमके कोई भी व्यवस्था हो नहीं सकती। इस प्रकारकी नियम-शृंखलाका नाम ही तो धर्म है। लौकिक श्रृंखलासे बद्ध प्रवृत्तिका नाम लौकिक