भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 293, कुल 778 में से

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पृष्ठ 293

क्रमशः उन्हें परमेश्वरकी प्राप्ति हो जायगी। इससे सिद्ध हुआ कि जिन पुरुषोंके पाप-पुंजकी कर्म और उपासनाद्वारा निवृत्ति हो गयी है, वे ही भगवद्धाममें प्रवेश करनेके अधिकारी हो सकते हैं— 'नराणां क्षीणपापानां कृष्णे भक्तिः प्रजायते।' इसके सिवा यह भी प्रसिद्ध ही है कि— वर्णाश्रमाचारवता पुरुषेण परः पुमान्। विष्णुराराध्यते पन्था नान्यस्तत्तोषकारकः॥ (श्रीविष्णुपुराण ३।८।९) अतः यदि तुम वर्णाश्रम-धर्माचारके द्वारा इन लौकिक और वैदिक ईश्वरोंकी सेवा करोगे, तभी परमेश्वरकी प्राप्ति कर सकोगे। अनभिज्ञ पुरुषोंको ही मोहवश स्वधर्ममें अरुचि और परधर्ममें रुचि होती है। इसी प्रकार अर्जुनको भी जो परधर्ममें रुचि हुई थी, वह उसका मोह ही था। उसने जो क्षात्रधर्मका परित्यागकर ब्राह्मणधर्मका आश्रय लिया था और बन्धुवधसे विरत होकर कहा था कि 'गुरून्हत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके।' (गीता २।५) वह उसका भयंकर व्यामोह ही था। जिस प्रकार रुग्णावस्थामें पित्तादिके दूषित हो जानेसे लोगोंको निम्बादि कटु पदार्थोंमें रुचि होने लगती है और दुग्धादिमें अरुचि हो जाती है, उसी प्रकार मोहके कारण ही स्वधर्ममें अरुचि हुआ करती है। अतः रुचि हो या न हो, उचित यही है कि स्वधर्मका आश्रय लिया जाय और परधर्मका परित्याग किया जाय। इससे सिद्ध हुआ कि जिस प्रकार भगवान्ने व्रजांगनाओंसे कहा था कि मुझ परपुरुषका संग छोड़कर तुम अपने पतियोंकी सेवा करो, इसी प्रकार साधारण मनुष्योंको भी उनका यही आदेश है कि उन्हें स्वधर्मका ही आश्रय लेना चाहिये। जिस प्रकार छतपर जानेके लिये प्रत्येक सीढ़ीपर होकर जाना पड़ता है, उसी प्रकार परमात्मप्राप्तिमें भी क्रमिक साधनाका अवलम्बन करना होता है। जो लोग सोपानातिक्रम करके परमोच्च नैष्कर्म्यका आश्रय लेते हैं, उनका ऐसा पतन होता है कि फिर उत्थान होना दुर्लभ हो जाता है। इसीसे महापुरुष कर्मत्यागमें भय दिखलाया करते हैं। भगवान्ने भी इसी कारण कर्मानुष्ठानकी आवश्यकता प्रदर्शित करनेके लिये अर्जुनसे कहा था— सन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ। तयोस्तु कर्मसन्न्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते॥ (गीता ५।२) साधारण पुरुषोंके लिये तो यही क्रम है; हाँ, गुणातीतोंकी बात अलग है। गुणातीत तो कहते ही उसे हैं, जिसपर गुणोंका आक्रमण न हो। अतः अज्ञ पुरुषोंको उनका अनुकरण न करके स्वधर्मका ही आश्रय लेना चाहिये। यदि वे उसे छोड़कर नैष्कर्म्यपर आरूढ़ होना चाहेंगे तो सर्वथा पतित हो जायेंगे। यह बात भी सुनिश्चित है कि प्रयत्न केवल साधनमें ही होता है, फलमें प्रयत्न नहीं होता। साधनके पर्यवसानमें फल तो स्वतः प्राप्त हो जाता है। यदि किसी काष्ठको काटना है तो कुठारका उद्यमन और निपातन किया जाता है। वहाँ प्रयत्नकी आवश्यकता कुठारके उद्यमन-निपातनमें ही होती है; उसके परिणाममें द्वैधीभाव तो स्वयं हो जाता है। इसी प्रकार आवश्यकता इसी बातकी है कि हम सबसे पहले कर्मद्वारा अपनी उच्छृंखल प्रवृत्तियोंका निरोध करके फिर सात्त्विक प्रवृत्तियोंद्वारा अपनी राजस, तामस प्रवृत्तियोंका निरोध करें। उसके पश्चात् जब हमारी सात्त्विक प्रवृत्तिका भी निरोध हो जायगा तो स्वस्वरूपकी उपलब्धि स्वतः ही हो जायगी। ज्यों ही मानस व्यापारकी शान्ति हुई कि 'तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्॥' (योगदर्शन १।३) इस सूत्रके अनुसार द्रष्टाकी अपने स्वरूपमें स्थिति हो जाती है। वस्तुतः नैष्कर्म्य क्या है—इस बातको साधारण पुरुष समझ भी नहीं सकते, इसीलिये वे कर्मत्यागकी व्यर्थ चेष्टामें प्रवृत्त होते हैं। जिस प्रकार नौकारूढ़ व्यक्तिको भ्रमवश तटस्थ वृक्षादि चलते दिखायी देते हैं और अपनेमें स्थिरता प्रतीत होती है, उसी प्रकार

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