भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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२८२ भक्तिसुधा अज्ञानियोंको मोहवश अपने निष्क्रिय शुद्ध स्वरूपमें कर्मकी प्रतीति होती है। इसी बातको भगवान्ने इन शब्दोंमें व्यक्त किया है— कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः। स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत्॥ (गीता ४।१८) वास्तवमें अकर्म तो स्वरूपस्थिति है, वह कर्तव्य नहीं है। जो अकर्मको कर्तव्य समझकर देहेन्द्रियव्यापारकी निवृत्तिका प्रयत्न करते हैं, वे अकर्मके रहस्यसे सर्वथा अनभिज्ञ हैं। इस प्रकारका प्रयत्न भी तो एक व्यापार ही है; अतः वह निवृत्ति नहीं, उसे व्यापारशान्ति ही कहा जा सकता है। वस्तुतः ‘संन्यासस्तु पूर्णब्रह्मणि सम्यङ्न्यासः' इस लक्षणके अनुसार पूर्ण ब्रह्ममें सर्वथा आत्मसमर्पण करनेका नाम ही संन्यास है। वह उपेय या साध्य है, उपाय या साधन नहीं है। इसीसे भगवान् गोपिकाओंको उपदेश करते हैं कि मैं तो उपेय हूँ, तुम मुझे प्राप्त करनेके लिये पतिशुश्रूषण-रूप उपायका अवलम्बन करो। स्वधर्ममें निष्ठा होनेका उपाय यदि मोह या दुर्दैववश तुम्हारी स्वधर्ममें निष्ठा नहीं है तो अहंकार छोड़ो और शास्त्रज्ञोंका सत्संग करो। इससे स्वधर्ममें तुम्हारी अभिरुचि होगी। इसी बातको लक्षित करनेके लिये भगवान्ने व्रजांगनाओंसे कहा है—‘शुश्रूषध्वं···· सतीः' (श्रीमद्भा० १०। २९। २२) (सत्पुरुषोंकी सेवा करो), स्त्रियोंके लिये पतिव्रता ही सत्पुरुष हैं। जिस प्रकार स्त्रियोंके लिये भगवान्ने पतिव्रताओंका संग करनेकी आज्ञा दी है, उसी प्रकार पुरुषोंको शास्त्रज्ञ और निःस्पृह ब्राह्मणोंका सहवास करना चाहिये। मनु भगवान्ने भी ब्राह्मणोंसे ही उपदेश ग्रहण करनेकी आज्ञा दी है। वे कहते हैं— अध्येतव्यमिदं शास्त्रं ब्राह्मणेन प्रयत्नतः। शिष्येभ्यश्चोपदेष्टव्यं सम्यक् नान्येन केनचित्॥ जो लोग देखा-देखी दूसरोंको उपदेश करने लगते हैं, वे उनके पतनके ही कारण होते हैं। वास्तविक कल्याण तो शास्त्रज्ञ ब्राह्मणके ही उपदेशसे हो सकता है। जिस प्रकार कोई साधारण पुरुष किसी वैद्यराजके थोड़ेसे ओषधिप्रयोगोंको देखकर यदि स्वयं भी वैद्यराज होनेका दावा करके ओषधि देने लगे तो वह रोगियोंकी मृत्युका ही कारण होता है, उसी प्रकार अनधिकारी उपदेशक जनताके अमंगलके ही हेतु होते हैं। अज्ञजन केवल श्रवणके ही अधिकारी हैं। शास्त्रज्ञ ब्राह्मणोंसे श्रवण करके वे अपना कल्याण अवश्य कर सकते हैं; इसीसे भगवान्ने कहा है कि— अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते। तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः॥ (गीता १३।२५) अतः उन्हें आत्मकल्याणके लिये श्रवण तो अवश्य करना चाहिये, किंतु दूसरोंको उपदेश करनेका प्रयत्न न करना चाहिये। इस प्रकार जिस तरह स्त्रियोंको पतिव्रताओंकी सेवा करनी आवश्यक है, उसी प्रकार पुरुषोंको ब्राह्मणोंकी शुश्रूषा करनी चाहिये। यदि उनकी सेवामें रहते-रहते जल्दी लाभ न भी हुआ तो ‘तबहिं होइ सब संसय भंगा। जब बहु काल करिअ सतसंगा॥' (रा०च०मा० ७।६१।४) कुछ दिन धैर्य रखकर उनकी सेवामें तत्पर रहो। अधिक मलकी निवृत्तिके लिये अधिक कालतक मार्जनकी आवश्यकता होती है। इसी तरह जन्म-जन्मान्तरके पापोंकी निवृत्तिमें कुछ समय लगना स्वाभाविक ही है। यदि उनके कथनमें रुचि नहीं होती तो भी कुछ काल तो अरुचिसे भी उन्हींकी आज्ञामें रहो। वैद्य रोगीके लिये हितकर समझकर जो ओषधि देता है, रोगीको किसी प्रकारका ननु-नच न करके उसीको सेवन करना चाहिये; उसे अपनी रुचिकी अपेक्षा नहीं करनी चाहिये। संसारमें सत्संग बहुत दुर्लभ है। साधुजन कहीं साइनबोर्ड लगाकर नहीं बैठते। उनकी प्राप्ति सौभाग्यसे ही होती है। श्रीगोसाईंजी महाराज कहते हैं— पुन्य पुंज बिनु मिलहिं न संता। सतसंगति संसृति कर अंता॥ (रा०च०मा०७।४५।६)

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