भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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श्रीरासलीलारहस्य २८३

श्रीमद्भगवद्गीतामें आत्मकल्याणके लिये साधुसेवाकी आवश्यकता भगवान् कृष्णने इस प्रकार दिखलायी है— तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया। उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः॥ (गीता ४।३४) किंतु सेवामें धैर्यकी बहुत आवश्यकता है; जल्दबाजीसे काम नहीं चलता। देखो इन्द्रने दीर्घ कालतक सेवा की, तभी उसका अन्तःकरण शुद्ध हुआ और वह आत्मतत्त्वकी उपलब्धिमें समर्थ हो सका। गीतामें भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र कहते हैं— परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥ (गीता ४।८) इस प्रकार भगवान्ने 'साधुओंका परित्राण' अपने अवतारका प्रधान प्रयोजन बतलाया है। अब यह प्रश्न होता है कि साधु किसे कहते हैं? भाष्यकार भगवान् शंकराचार्यने 'साधूनाम्' इस पदका पर्याय 'सन्मार्गस्थानाम्' लिखा है। अपनी कुल-परम्पराका समादर आवश्यक है किंतु 'सन्मार्ग' क्या है? इसका निर्णय होना बहुत कठिन है। यदि कहा जाय कि शास्त्रानुमोदित मार्गका नाम सन्मार्ग है तो इसमें भी सन्देह होता है; क्योंकि यह निश्चय होना कठिन है कि सच्चास्त्र कौन है। लोग शंका करते हैं कि वेद ही सच्चास्त्र क्यों है, कुरान या बाइबिल आदिको ही प्रधान सच्चास्त्र क्यों न माना जाय? यद्यपि यह बात युक्तिसे भी सिद्ध की जा सकती है कि वेद ही सच्चास्त्र है तथापि यहाँ इसका प्रसंग नहीं है। इसलिये विशेष न कहकर थोड़ा-सा संकेत किया जाता है। मान लीजिये आपको कहीं जाना है। अपने ध्रुवकी ओर जाते-जाते आगे चलनेपर आपको चार मार्ग मिले। उस समय चारों मार्गोंसे यात्री आ-जा रहे हैं। आप उनसे पूछते हैं कि अमुक स्थानको कौन मार्ग जाता है तो वे सभी अपने-अपने मार्गको वहाँ जानेवाला और अधिक सुविधाजनक बतलाते हैं। वे अपने-अपने मार्गकी प्रशंसा करते हैं—इतना ही नहीं अपितु अपनेसे भिन्न मार्गोंको विघ्नबहुल और त्याज्य भी बतलाते हैं। ऐसी अवस्थामें आप क्या करेंगे? हमारे विचारसे तो आप यही देखेंगे कि इनमें कोई हमारा परिचित (आप्तपुरुष) भी है। तब उनमें जो आपके ग्रामके आस-पासका होगा, औरोंकी अपेक्षा उसीका विश्वास करोगे। अतः विचारवानोंका यही कर्तव्य है कि आप्तवाक्यका अवलम्बन करें। यह साधारण धर्म कहा जाता है कि जो आचार-विचार अपनी कुलपरम्परासे चला आया हो, उसीका आश्रय लिया जाय। आप जिस देश, जाति, सम्प्रदाय या कुलमें उत्पन्न हुए हैं; उसमें जो पुरुष या शास्त्र अधिक आदरणीय माने गये हों, उन्हींके मार्गका अवलम्बन करें, क्योंकि पिता अपने पुत्रका अहित कभी नहीं चाह सकता। अतः पिता-पितामह-प्रपितामह-क्रमसे जो मार्ग चला आया हो, उसीका आश्रय लेना चाहिये। धर्मके विषयमें यह व्यापक लक्षण है। यह जैसा हिन्दुओंके लिये है, वैसा ही ईसाई, मुसलमान, जैन, बौद्ध आदि अन्य मतावलम्बियोंके लिये भी है। उन्हें भी अपने-अपने आचार्य और धर्मग्रन्थोंका आश्रय लेना चाहिये। यदि आप आरम्भसे ही यह निश्चय करने लगेंगे कि कौन मार्ग श्रेष्ठ है तो इसका निर्णय कभी नहीं कर सकेंगे। यह तो बहुत लम्बा-चौड़ा क्रम है, इसका निर्णय तो कभी नहीं होगा। ऐसी अवस्थामें आप धर्ममार्गका अवलम्बन कैसे कर सकेंगे? राजाको सारी शक्तियाँ प्राप्त होती हैं; वह चाहे जिसे उजाड़ सकता है और चाहे जिसे बसा सकता है; उसे कोई रोकनेवाला नहीं होता। फिर भी वह अपने ही बनाये हुए नियमोंका अनुसरण करता है। वस्तुतः बिना नियमके कोई भी व्यवस्था हो नहीं सकती। इस प्रकारकी नियम-शृंखलाका नाम ही तो धर्म है। लौकिक श्रृंखलासे बद्ध प्रवृत्तिका नाम लौकिक