भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 296

२८४ भक्तिसुधा व्यवहार है और वैदिक श्रृंखलासे बद्ध प्रवृत्तिका नाम धर्म है। किंतु नियम-निर्माणका कार्य अभिज्ञ पुरुष ही कर सकते हैं; अतः यहाँ फिर वही लक्षण लागू हो जाता है कि जो जिस धर्म, जिस जाति और जिस कुलमें उत्पन्न हुए हैं, उन्हें उसीमें उत्पन्न हुए आप्त पुरुषोंके मार्गका अवलम्बन करना चाहिये। विद्यार्थीको यदि कोई अक्षर दिखलाकर कहा जाय कि यह 'क' है और इसपर वह कहने लगे कि इसे 'क' क्यों कहते हैं तो उसे इसका हेतु किसी प्रकार नहीं समझाया जा सकता और उसे कोरा ही रहना पड़ेगा। इसका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये तो पहले-पहल उसे आचार्यके कथनमें अन्ध-श्रद्धा ही करनी होगी। पीछे जब उसकी बुद्धि विकसित होगी और उसे व्याकरणशास्त्रके सूक्ष्म रहस्यका पता चलेगा तो उसे स्वयं ही सब बात मालूम हो जायगी। जब वैद्य रोगीको ओषधि देता है तो वह क्यों नहीं कहता कि मैं इसे क्यों सेवन करूँ। उस समय उसे वैद्यमें श्रद्धा करनी ही पड़ती है। श्रुतिने भी 'श्रद्धत्स्व तात श्रद्धत्स्व' इस अजातशत्रुकी उक्तिद्वारा श्रद्धाका ही विशेष महत्त्व प्रतिपादन किया है। अतः आस्तिकोंको यह तर्क करनेकी आवश्यकता नहीं है कि वेद अपौरुषेय क्यों हैं? जो आर्यावर्तमें उत्पन्न हुए हैं और आर्यधर्मावलम्बी हैं, उन्हें पहले- पहल ऐसा मानना ही चाहिये। पीछे जब समझनेकी योग्यता होगी, तब वे इस तथ्यको समझ भी सकेंगे। पहले योग्यता प्राप्त करो; 'श्लोकवार्तिक', 'तन्त्रवार्तिक' और 'पञ्चपादिकाविवरण' आदि ग्रन्थोंको देखो; तब समझ सकोगे कि वेद अपौरुषेय क्यों हैं। उस समय तुम यह जान लोगे कि वेद ही सच्छास्त्र क्यों हैं और उनसे भिन्न किसी अन्य ग्रन्थको यह सम्मान क्यों प्राप्त नहीं है? उन्हींके अनुमोदित धर्मकी रक्षा करनेके लिये भगवान् कह रहे हैं— परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥ (गीता ४।८) कर्तव्याकर्तव्यके निर्णयके लिये शास्त्रका ही प्रामाण्य है अबतक जो कुछ कहा गया है, वह हमारी ही कल्पना हो—ऐसी बात नहीं है। भगवान्ने भी कर्तव्याकर्तव्यका विवेचन करनेके लिये शास्त्रकी ही शरण लेनेकी आज्ञा दी है। इसीसे वे कहते हैं— 'तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।' (गीता १६।२४) वह शास्त्र क्या है? इसका भगवान् स्पष्टतया खुले शब्दोंमें उत्तर देते हैं कि 'वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो' (गीता १५।१५)। अतः वेद ही सच्छास्त्र है। पूर्वमीमांसक 'शास्त्र' शब्दका अर्थ वेद ही करते हैं। उत्तरमीमांसाका सूत्र है—'शास्त्रयोनित्वात्' (वेदान्तदर्शन १।१।३); इसकी व्याख्या करते हुए आचार्य लोग कहते हैं 'शास्त्रम् ऋग्वेदादि'। सांख्यादिमें तो 'शास्त्र' शब्दका उपचारसे प्रयोग होता है। जैसे 'वेदान्त' शब्दका मुख्य अर्थ उपनिषद् है; ब्रह्मसूत्रादिमें उसका औपचारिक प्रयोग होता है, क्योंकि वे उन्हींका विचार करते हैं। 'शिष्यते हितमुपदिश्यतेऽनेन इति शास्त्रम्' इस व्युत्पत्तिके अनुसार भी वेद ही शास्त्र हैं, क्योंकि निरपेक्ष हितका उपदेश उन्हींमें किया गया है। अन्य शास्त्रोंमें जो हितोपदेश हैं, उसे श्रुति-प्रामाण्यकी अपेक्षा है। वैदिक लोग दर्शन, स्मृति और गीताका भी स्वतःप्रामाण्य नहीं मानते; उनका प्रामाण्य वेदमूलक होनेके ही कारण है। मनुस्मृति इसीलिये प्रामाणिक है; क्योंकि वह वेदानुमोदित धर्मका प्रतिपादन करती है और श्रुति उसके लिये कहती है कि 'यद्वै मनुरवदत्तद्भेषजम्'। श्रीमद्भगवद्गीता भी वेदानुसारिणी होनेके कारण ही प्रामाणिक है। यदि भगवदुक्ति होनेके कारण उसे स्वतःप्रमाण कहा जाय तो बौद्ध दर्शन भी प्रामाणिक माना जायगा। किंतु वेद-विरुद्ध होनेके कारण बौद्ध दर्शन भगवदवतार भगवान् बुद्धकी उक्ति होनेपर भी प्रामाणिक नहीं है। प्रमाणोंका किसी अर्थमें सांकर्य होता है और