भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीरासलीलारहस्य २८५ किसीमें व्यवस्था होती है। शब्द केवल श्रोत्रेन्द्रियसे ही ग्रहण किया जा सकता है, उसका ज्ञान किसी अन्य इन्द्रियसे नहीं हो सकता। अतः श्रोत्र शब्दग्रहणमें इन्द्रियान्तर-निरपेक्ष प्रमाण है। यहाँ प्रमाणकी व्यवस्था है। किंतु दूरस्थ जल नेत्रसे भी ग्रहण किया जा सकता है। ऐसे ही और भी कितने ही पदार्थ हैं, जो कई प्रमाणोंसे ज्ञात हो सकते हैं। उनमें प्रमाणोंका सांकर्य है। वेद स्वतःप्रमाण हैं और गीतादिका प्रामाणिकत्व वेदमूलक होनेके कारण है—ऐसा कहकर हमने गीताका निरादर नहीं किया। जैसा हम पहले दिखा चुके हैं, हमारा यह कथन भगवदुक्तिके ही अनुसार है। अतः यह तो उसका सम्मान है। जो लोग ऐसा कुतर्क करते हैं कि गीताके वेदानुसारी होनेमें क्या प्रमाण है, उनकी यह चेष्टा साहसमात्र है। गीताके वेदानुसारित्वमें शंका करना बड़ी भारी धृष्टता है। एक बात बहुत ध्यान देनेयोग्य है। लोग चमत्कारोंसे बहुत आकर्षित होते हैं। शास्त्रानुयायियोंपर जनताकी ऐसी श्रद्धा नहीं होती, जैसी कि चमत्कारोंपर होती है। किंतु ऐसा कोई नियम नहीं है कि सिद्धि वैदिकोंमें ही होती हो। जैन आदि अन्य मतावलम्बियोंमें भी सिद्धियाँ और तितिक्षा आदि गुण देखे जाते हैं। परंतु उनका अनुगमन नहीं करना चाहिये। वैदिक मतावलम्बी यदि इन गुणोंसे शून्य हो तो भी उसीका अनुसरण करना चाहिये। यदि अहिंसा और दया आदि भी हमारे शास्त्रोंकी विधिसे विपरीत हों तो वे पाप हैं और शास्त्रानुमोदित हिंसा भी धर्म है। अर्जुनको दया और करुणा ही तो हो रही थी; परंतु भगवान् कहते हैं— कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्। अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन ॥ (गीता २।२) इस प्रकार भगवान्ने उस दया और करुणाको भी 'अनार्यजुष्ट', 'अस्वर्ग्य' और 'अकीर्तिकर', 'कश्मल' (पाप) कहकर त्याज्य बतलाया है। अतः पहले लकीरके फकीर बनो। जो कुछ शास्त्र कहता है, उसे आँख मूँदकर ग्रहण करो। पहले कुछ योग्यता प्राप्त कर लो तब निर्णय करना। यदि तुम्हें कोई अनुमान करना है तो पहले प्रतिज्ञा, व्याप्ति एवं निगमन आदि पंचावयव वाक्य एवं देवाभास आदिका ज्ञान प्राप्त करो। जबतक तुम्हें सत् और असत् हेतुका विवेक न होगा, तबतक ठीक- ठीक अनुमान कैसे कर सकोगे? हमें शान्ति, तितिक्षा और अहिंसा—ये कुछ भी अपेक्षित नहीं है, हमें केवल वैदिक विधिकी अपेक्षा है। जो ऐसा मानते हैं कि 'तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।' (गीता १६।२४) यह भगवद्वाक्य है और जो भगवद्वाक्यको अपना सर्वस्व माननेका दावा करते हैं, उन्हें तो यही कर्तव्य है, औरोंके लिये हमारा कुछ कहना नहीं है। आजकल लोगोंकी कुछ ऐसी प्रवृत्ति है कि जब वे दूसरोंके आचरणपर दृष्टि डालते हैं तो उन्हें निरी भूलें दिखायी देती हैं, किंतु अपनी भूल उन्हें कभी नहीं दीखती। श्रीगोसाईंजी महाराज कहते हैं— पर उपदेस कुसल बहुतेरे। जे आचरहिं ते नर न घनेरे॥ (रा०च०मा० ६।७८।२) अतः दूसरोंकी समीक्षामें न पड़कर हमें पहले अपनी ही ओर देखना चाहिये। शास्त्रकी आज्ञा है कि 'स्वधर्माचरणं शक्त्या विधर्माच्च निवर्तनम्।' (श्रीमद्भा० ३।२८।२) स्वधर्मका यथाशक्ति पालन करना चाहिये और विधर्मका त्याग, जो लोग यथाशक्ति स्वधर्मका पालन करते हैं, वे ही सत्पुरुष हैं। कुछ कर्म तो ऐसे हैं, जिनका न करना पाप है; जैसे सन्ध्या, अग्निहोत्र एवं बलिवैश्वदेव आदि। वे नित्यकर्म हैं। इसी प्रकार पार्वण श्राद्धादि नैमित्तिक कर्म भी अवश्यकर्तव्य हैं। उनका परित्याग करनेमें दोष माना गया है। आज थोड़े-से ब्राह्मण ही ऐसे दिखायी देते हैं, जो इन सब धर्मोंका यथायोग्य पालन करते हैं। परंतु उनके प्रति अन्य लोगोंकी विशेष आस्था नहीं देखी जाती; अतः