भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८६ भक्तिसुधा उनका उत्साह भी कितने दिन रह सकेगा ? प्रवृत्तिके लिये आस्थाकी भी अत्यन्त आवश्यकता है। इसीलिये प्रत्येक ग्रन्थके पहले उसका माहात्म्य दिया जाता है और उस ग्रन्थके पाठके समय उसका पाठ भी अनिवार्य होता है। वह अर्थवाद अभिरुचिकी वृद्धिके लिये है। किंतु उस कर्मके कर्ताको उसमें अर्थवाद- दृष्टि नहीं करनी चाहिये। इसीसे नाममें अर्थवाद- बुद्धि करना भी एक नामापराध माना गया है। नामोच्चारण न करनेका दोष निवृत्त हो सकता है; परंतु नामापराधकी निवृत्ति नहीं हो सकती। अतः यदि वैदिक कर्मोंकी प्रवृत्ति करनी है तो उसका माहात्म्य भी सत्पुरुषोंमें प्रख्यात होना चाहिये। कर्मयोगकी आज भी बहुत महिमा है। परंतु इस समय इसके अनेक अर्थ हो रहे हैं। 'योगः कर्मसु कौशलम्' (गीता २।५०) इस भगवदुक्तिका आश्रय लेकर महात्मा तिलकने तो कर्म करनेकी कुशलताको ही कर्मयोग कहा है। किंतु भगवान्का तो यही कथन है कि 'कर्म ब्रह्म''''प्रतिष्ठितम् ॥' (गीता ३।१५) अर्थात् कर्म ब्रह्ममें स्थित है। यहाँ 'ब्रह्म' शब्दका अर्थ करते हुए वे कहते हैं कि 'ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्' (गीता ३।१५) अर्थात् ब्रह्म अक्षर परमात्मासे उत्पन्न हुआ है। अतः वेद ही ब्रह्म है और वेदोक्त कर्म ही कर्मयोग है। आज भक्तशिरोमणि श्रीगोसाईंजी महाराजकी 'नहिं कलि करम न भगति बिबेकू। राम नाम अवलंबन एकू॥' (रा०च०मा० १।२७।७)—इस उक्तिका अवलम्बन करके सारे धर्म-कर्मोंको तिलांजलि देकर केवल हरिनाम-संकीर्तनमें लगनेकी ही प्रवृत्ति हो रही है। हम भगवन्नाम-संकीर्तनको हेय-दृष्टिसे नहीं देखते। वह तो परम मंगलमय है, परंतु गोसाईंजीके तात्पर्यको न समझकर उनकी उक्तिका आश्रय लेकर कर्तव्य कर्मकी अवहेलना करना कदापि क्षम्य नहीं हो सकता। जबतक कर्मके करनेमें परम लाभ सुनिश्चित न होगा और उसके परित्यागमें परम हानिका निश्चय न होगा, तबतक उसमें प्रवृत्ति नहीं हो सकती। जिस प्रकार आत्मज्ञानके लिये श्रुति कहती है कि 'इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति न चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः।' (केन० २।५) उसी प्रकार कर्मके अकरणमें भी प्रत्यवाय-प्राप्तिका पूर्ण निश्चय होना चाहिये। इसीसे अग्निहोत्रादि नित्यकर्मोंके लिये तो शास्त्रकी जबरदस्त आज्ञा है, किंतु सोमादि नित्य- कर्मोंके लिये यथाशक्ति पदका अध्याहार किया गया है। नित्यकर्मोंमें भी यथाशक्ति पदका अध्याहार हो सकता है; जैसे रोगके समय सन्ध्योपासन न कर सके तो केवल मानसिक संध्या ही कर ले अथवा केवल अर्घ्यदान कर ले। किंतु अधर्म तो कभी कर्तव्य नहीं हो सकता। अतः क्षत्रिय, वैश्यको ब्राह्मणके धर्मका आश्रय करना अथवा शूद्रको वेदाध्ययन करना कभी विहित नहीं हो सकता। इसलिये यदि तुम परम कल्याण चाहते हो तो ऐसे ब्राह्मणोंका समाश्रयण करो, जो पापसे सर्वथा बचा हुआ हो और धर्मका यथाशक्ति पालन करता हो, वही सत्पुरुष है। उसकी सेवा करनेसे ही परमात्माकी प्राप्ति कर सकोगे। भगवान्ने 'शुश्रूषध्वं'''' सतीः' (श्रीमद्भा० १०।२९।२२) ऐसा कहकर सर्वसाधारणको यही उपदेश किया है। पहले कह चुके हैं कि जीवमात्र परतन्त्र होनेके कारण केवल परब्रह्म परमात्मा ही पूर्ण पुरुष है। 'पतीन् शुश्रूषध्वम्' इस कथनसे भी स्त्रीमात्रके परमपति सच्चिदानन्दघन परमपुरुष परमात्मा ही विवक्षित हैं। अतः जिस प्रकार स्त्रियोंको पतियोंका शुश्रूषण आवश्यक है, उसी प्रकार जीवमात्रको पूर्ण परब्रह्म परमेश्वरकी आराधना करना परम कर्तव्य है। इसमें किसी प्रकारकी शंका नहीं करनी चाहिये। परंतु एक ही परमात्माकी आराधना विवक्षित होनेपर भी यहाँ 'पतीन्' ऐसा बहुवचन क्यों है ? यह कथन जीवभेदकी दृष्टिसे है। जिस प्रकार गगनस्थ सूर्य एक ही है तथापि जलपात्रोंके भेदसे उसके अनेकों प्रतिबिम्ब पड़ते हैं, उसी प्रकार एक ही सच्चिदानन्दघन परमात्मा विभिन्न अन्तःकरणोंमें विभिन्न