भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीरासलीलारहस्य २८७ रूपसे प्रतिफलित हो रहे हैं अथवा भावनाभेद या अवतारभेदके कारण यह बहुवचन हो सकता है; क्योंकि एक ही भगवान्—राम, कृष्ण, शिव आदि अनेकों रूपोंमें प्रकट हुए हैं। गोपांगनाओंके लिये तो यह प्रयोग आदरार्थ भी हो सकता है; क्योंकि उनके लिये तो एकमात्र भगवान् ही आराध्यदेव, रक्षक, पति और गुरु हैं तथा गुरुजन आदि आदरणीय व्यक्तियोंके लिये बहुवचनका प्रयोग किया जाता है। इसके सिवा इस प्रकरणमें रासलीलाके समय एक ही भगवान् अनेकरूप होनेवाले हैं। अतः भावी भेदके कारण भी कथन हो सकता है। यदि तुम पतिशुश्रूषणकी रीति न जानती हो, तुम्हें इस बातका पता न हो कि पतिदेवको किस प्रकार अपने अनुकूल बनाया जाता है तो 'शुश्रूषध्वं...सतीः'—पतिव्रताओंकी सेवा करो। इससे तुम सेवाकी विधि जान जाओगी। जैसे श्रीसीताजीको श्रीअनसूयाजी और कौसल्याजी आदिने उपदेश किया था, उसी प्रकार जीव अपने परमपति सर्वेश्वर भगवान्को कैसे अपने अनुकूल करे, यदि यह जानना हो तो उसे वैसा आचरण जाननेके लिये सत्पुरुषोंकी सेवा करनी चाहिये। जो लोग भगवान्को प्रसन्न करना जानते हैं और जो शास्त्रानुमोदित मार्गसे चलते हैं, वे ही इस मार्गमें सत्पुरुष हैं। उनकी कृपासे भगवान्की प्राप्ति हो जानेपर फिर कुछ भी दुर्लभ नहीं रहता। भगवान्के संकल्पसे ही बन्ध-मोक्षकी प्रवृत्ति है। जबतक भगवान्में अनुराग नहीं है, तबतक तुम कैसे ही विद्वान् या मेधावी हो, यों ही भटकते रह जाओगे। सारा शास्त्रज्ञान भी भगवद्भक्ति-विमुखोंके लिये केवल भारमात्र रह जाता है— मद्भक्तिविमुखानां हि शास्त्रगर्तेषु मुह्यताम्। न ज्ञानं न च मोक्षः स्यात् तेषां जन्मशतैरपि ॥ शास्त्रानुमोदित आचरणके बिना शास्त्रज्ञान निष्फल है यह बात भगवद्भक्ति-विमुख शास्त्रज्ञोंके लिये है। इससे हम शास्त्रकी अवहेलना नहीं करते। ऐसा शास्त्रज्ञ दूसरोंका कल्याण तो कर सकता है, किंतु स्वयं कोरा ही रह जाता है; जैसे दीपक औरोंको तो प्रकाशित करता है, किंतु उसके नीचे अँधेरा ही रहता है। इस विषयमें विद्वानोंकी भी ऐसी ही सम्मति है कि विद्वान् रागी होनेपर भी दूसरोंका कल्याण कर सकता है, किंतु शास्त्रानभिज्ञ पुरुष विरक्त रहनेपर भी दूसरोंको पथप्रदर्शन नहीं कर सकता। जिसके हाथमें दीपक है, वह स्वयं भले ही अँधेरेमें रहे, परंतु दूसरोंको तो प्रकाश प्रदान कर ही सकता है। इसी प्रकार एक विद्वान् भी जो सब प्रकारके अधिकारियोंके लिये तदनुकूल साधनोंका ज्ञान रखता है, यदि स्वयं आचरण न भी करे तो भी दूसरोंको तो ठीक-ठीक उपदेश कर ही सकता है। ऐसी गाथा भी है कि कहीं कथा होती थी। उसे सुन-सुनकर श्रोता तो कितने ही मुक्त हो गये, परंतु पण्डितजी कथा ही बाँचते रह गये; क्योंकि जबतक शास्त्रानुमोदित आचरण न होगा, तबतक केवल शास्त्रज्ञानसे कोई कल्याणका पात्र नहीं हो सकता। 'आचारहीनं न पुनन्ति वेदाः' मरणकालमें सारे शास्त्र इसी प्रकार छोड़कर चले जाते हैं, जैसे पत्रहीन वृक्षको पक्षीगण। अतः आत्मकल्याणमें आचरणकी ही प्रधानता है। इसीसे कहा है— पण्डिता बहवो राजन्बहुज्ञाः संशयच्छिदः। सदसस्पतयोऽप्येके असन्तोषात् पतन्त्यधः ॥ (श्रीमद्भा० ७।१५।२१) अतः साधन-सम्पन्न प्राणी ही आत्मकल्याण कर सकता है। इसलिये जो शास्त्रज्ञ है, परंतु शास्त्रोक्त धर्मोंमें निष्ठा नहीं रखता, उसके लिये शास्त्र अकिंचित्कर हैं। वह दूसरेके लिये अवश्य आदरणीय है, परंतु उसे स्वयं अपनेपर जुगुप्सा ही करनी चाहिये। उसके प्रति श्रद्धा और सद्भाव रखनेसे दूसरोंका कल्याण अवश्य हो सकता है; भले ही वह स्वयं नरकगामी ही हो। कई पदार्थ ऐसे हैं, जो स्वतः स्वरूपतः पतित हैं, परंतु यदि उनकी विधिवत् सेवा- पूजा की जाय तो अपने उपासकका कल्याण कर सकते हैं। गौ स्वयं पशु है, परंतु अपने भक्तको