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भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

श्रीरासलीलारहस्य २८७ रूपसे प्रतिफलित हो रहे हैं अथवा भावनाभेद या अवतारभेदके कारण यह बहुवचन हो सकता है; क्योंकि एक ही भगवान्—राम, कृष्ण, शिव आदि अनेकों रूपोंमें प्रकट हुए हैं। गोपांगनाओंके लिये तो यह प्रयोग आदरार्थ भी हो सकता है; क्योंकि उनके लिये तो एकमात्र भगवान् ही आराध्यदेव, रक्षक, पति और गुरु हैं तथा गुरुजन आदि आदरणीय व्यक्तियोंके लिये बहुवचनका प्रयोग किया जाता है। इसके सिवा इस प्रकरणमें रासलीलाके समय एक ही भगवान् अनेकरूप होनेवाले हैं। अतः भावी भेदके कारण भी कथन हो सकता है। यदि तुम पतिशुश्रूषणकी रीति न जानती हो, तुम्हें इस बातका पता न हो कि पतिदेवको किस प्रकार अपने अनुकूल बनाया जाता है तो 'शुश्रूषध्वं...सतीः'—पतिव्रताओंकी सेवा करो। इससे तुम सेवाकी विधि जान जाओगी। जैसे श्रीसीताजीको श्रीअनसूयाजी और कौसल्याजी आदिने उपदेश किया था, उसी प्रकार जीव अपने परमपति सर्वेश्वर भगवान्‌को कैसे अपने अनुकूल करे, यदि यह जानना हो तो उसे वैसा आचरण जाननेके लिये सत्पुरुषोंकी सेवा करनी चाहिये। जो लोग भगवान्‌को प्रसन्न करना जानते हैं और जो शास्त्रानुमोदित मार्गसे चलते हैं, वे ही इस मार्गमें सत्पुरुष हैं। उनकी कृपासे भगवान्‌की प्राप्ति हो जानेपर फिर कुछ भी दुर्लभ नहीं रहता। भगवान्‌के संकल्पसे ही बन्ध-मोक्षकी प्रवृत्ति है। जबतक भगवान्‌में अनुराग नहीं है, तबतक तुम कैसे ही विद्वान् या मेधावी हो, यों ही भटकते रह जाओगे। सारा शास्त्रज्ञान भी भगवद्भक्ति-विमुखोंके लिये केवल भारमात्र रह जाता है— मद्भक्तिविमुखानां हि शास्त्रगर्तेषु मुह्यताम्। न ज्ञानं न च मोक्षः स्यात् तेषां जन्मशतैरपि ॥ शास्त्रानुमोदित आचरणके बिना शास्त्रज्ञान निष्फल है यह बात भगवद्भक्ति-विमुख शास्त्रज्ञोंके लिये है। इससे हम शास्त्रकी अवहेलना नहीं करते। ऐसा शास्त्रज्ञ दूसरोंका कल्याण तो कर सकता है, किंतु स्वयं कोरा ही रह जाता है; जैसे दीपक औरोंको तो प्रकाशित करता है, किंतु उसके नीचे अँधेरा ही रहता है। इस विषयमें विद्वानोंकी भी ऐसी ही सम्मति है कि विद्वान् रागी होनेपर भी दूसरोंका कल्याण कर सकता है, किंतु शास्त्रानभिज्ञ पुरुष विरक्त रहनेपर भी दूसरोंको पथप्रदर्शन नहीं कर सकता। जिसके हाथमें दीपक है, वह स्वयं भले ही अँधेरेमें रहे, परंतु दूसरोंको तो प्रकाश प्रदान कर ही सकता है। इसी प्रकार एक विद्वान् भी जो सब प्रकारके अधिकारियोंके लिये तदनुकूल साधनोंका ज्ञान रखता है, यदि स्वयं आचरण न भी करे तो भी दूसरोंको तो ठीक-ठीक उपदेश कर ही सकता है। ऐसी गाथा भी है कि कहीं कथा होती थी। उसे सुन-सुनकर श्रोता तो कितने ही मुक्त हो गये, परंतु पण्डितजी कथा ही बाँचते रह गये; क्योंकि जबतक शास्त्रानुमोदित आचरण न होगा, तबतक केवल शास्त्रज्ञानसे कोई कल्याणका पात्र नहीं हो सकता। 'आचारहीनं न पुनन्ति वेदाः' मरणकालमें सारे शास्त्र इसी प्रकार छोड़कर चले जाते हैं, जैसे पत्रहीन वृक्षको पक्षीगण। अतः आत्मकल्याणमें आचरणकी ही प्रधानता है। इसीसे कहा है— पण्डिता बहवो राजन्बहुज्ञाः संशयच्छिदः। सदसस्पतयोऽप्येके असन्तोषात् पतन्त्यधः ॥ (श्रीमद्भा० ७।१५।२१) अतः साधन-सम्पन्न प्राणी ही आत्मकल्याण कर सकता है। इसलिये जो शास्त्रज्ञ है, परंतु शास्त्रोक्त धर्मोंमें निष्ठा नहीं रखता, उसके लिये शास्त्र अकिंचित्कर हैं। वह दूसरेके लिये अवश्य आदरणीय है, परंतु उसे स्वयं अपनेपर जुगुप्सा ही करनी चाहिये। उसके प्रति श्रद्धा और सद्भाव रखनेसे दूसरोंका कल्याण अवश्य हो सकता है; भले ही वह स्वयं नरकगामी ही हो। कई पदार्थ ऐसे हैं, जो स्वतः स्वरूपतः पतित हैं, परंतु यदि उनकी विधिवत् सेवा- पूजा की जाय तो अपने उपासकका कल्याण कर सकते हैं। गौ स्वयं पशु है, परंतु अपने भक्तको

गोलोक ले जाती है। अश्वत्थ वृक्ष स्वयं स्थावर है, किंतु अपनी पूजा करनेवालेका कल्याण कर सकता है। इसी प्रकार ब्राह्मण यद्यपि शरीरदृष्टिसे अस्थिमांस एवं चर्मरूप ही है तो भी अपनेमें श्रद्धा रखनेवालेके लिये तो सब प्रकारके मंगलका ही कारण होता है। ब्राह्मण यदि दुराचारी भी हो तो भी पूजनीय है। श्रीगोसांईजी महाराज कहते हैं— पूजिअ बिप्र सील गुन हीना। सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना॥ (रा०च०मा० ३।३४।२) ऐसी ही बात एक स्मृतिमें भी कही गयी है— दुःशीलोऽपि द्विजः पूज्यः न तु शूद्रो जितेन्द्रियः। कः परित्यज्य गां दुष्टां दुहेच्छीलवतीं खरीम् ॥ भगवान् कृष्ण कहते हैं— न ब्राह्मणान्मे दयितं रूपमेतच्चतुर्भुजम्। सर्ववेदमयो विप्रः सर्वदेवमयो ह्यहम् ॥ (श्रीमद्भा० १०।८६।५४) यह बात सुशिक्षित और सदाचारसम्पन्न ब्राह्मणोंके लिये ही कही गयी हो, ऐसी बात नहीं है। भगवान्‌का तो यह कथन है कि— ब्राह्मणो जन्मना श्रेयान् सर्वेषां प्राणिनामिह। तपसा विद्यया तुष्ट्या किमु मत्कलया युतः ॥ (श्रीमद्भा० १०।८६।५३) किंतु इससे यह नहीं समझना चाहिये कि गुणहीन ब्राह्मण स्वयं भी कल्याणका पात्र हो सकता है। उसे स्वयं तो नरक ही भोगना पड़ेगा। उसकी अपेक्षा तो स्वधर्मनिष्ठ शूद्रकी ही सद्गति होनी अधिक सम्भव है। इसी भावको लक्ष्यमें रखकर श्रीमद्भागवत (७।९।१०)-में कहा है— 'विप्राद् द्विषड्गुणयुतादरविन्दनाभपादारविन्द- विमुखाच्छ्वपचं वरिष्ठम्। मन्ये....॥' इस प्रकार श्रीमद्भागवतमें कहीं तो गुणहीन ब्राह्मणको भी सर्वथा पूजनीय बतलाया गया है और कहीं भगवद्भक्तिहीन द्वादश-गुण-विशिष्ट ब्राह्मणकी अपेक्षा भगवच्चरणानुरागी श्वपचकी उत्कृष्टता दिखलायी गयी है। आजकल ब्राह्मण लोग तो प्रशंसापरक वाक्योंको लेकर अपनी पूजनीयताका दावा करते हैं और अब्राह्मण लोग निन्दापरक वाक्योंको लेकर उन्हें नीचा दिखानेका प्रयत्न करते हैं। परंतु बात बिलकुल उल्टी है। वस्तुतः ब्राह्मणोंको तो यह चाहिये कि अपने ब्राह्मणत्वका अभिमान छोड़कर निन्दापरक वाक्योंके अभिप्रायानुसार भगवद्भक्ति और शास्त्रानुमोदित आचरणको ग्रहण करें तथा अब्राह्मणोंको यह उचित है कि ब्राह्मणोंके गुणदोषकी ओर न देखकर ब्राह्मणमात्रमें श्रद्धा रखें; क्योंकि शास्त्रमें जहाँ आचारहीन ब्राह्मणकी निन्दा की गयी है, वह उनके कल्याणकी दृष्टिसे है और जहाँ उनकी प्रशंसा की गयी है, वह ब्राह्मणेतर वर्णोंकी ब्राह्मणमात्रके प्रति श्रद्धा परिपक्व करनेके लिये है। संसारमें शास्त्रज्ञ होना सरल है, परंतु अपने परम प्रेमास्पद प्रभुको स्वानुकूल कर लेना परम दुर्लभ है। किंतु भूषण यही है। पत्नी बड़ी रूपवती हो और तरह-तरहके वस्त्रालंकारोंसे सुसज्जिता हो, परंतु यह उसका भूषण नहीं है। उसकी वास्तविक शोभा तो इसीमें है कि वह अपने प्राणाधार प्रियतमको अपने अनुकूल बना ले। इसी प्रकार शास्त्रज्ञोंका भूषण भी यही है कि वे परम प्रभु श्रीपरमात्माको अपने अनुकूल कर लें। जहाँ भगवान् रहते हैं, वहीं सारे गुण रहते हैं; अतः यदि भगवान् प्रसन्न हो गये तो मानो सर्वगुणसम्पन्नता प्राप्त हो गयी। इसीसे 'पतीन् शुश्रूषध्वम्' ऐसा कहा है और इस पतिशुश्रूषाका प्रकार समझनेके लिये 'शुश्रूषध्वं सतीः' यह कहा है। यहाँ व्रजांगनाओंके लिये 'सतीः' शब्दसे क्या विवक्षित होगा ? उनके लिये जो भिन्न यूथेश्वरियाँ हैं, वे ही सती हैं। उनकी शुश्रूषा करनेसे ही वे अचिन्त्यानन्दसुधासिन्धु भगवान्‌के सौन्दर्य एवं माधुर्य रसका समास्वादन कर सकेंगी; क्योंकि वे यूथेश्वरियाँ भगवान्‌को स्वाधीन करना जानती हैं। भगवान्‌का यह उपदेश पहले भी है कि यहाँ जो आह्लादिनीशक्तिस्वरूपा श्रीराधेश्वरी हैं, उनके कृपाकटाक्षसे ही यूथेश्वरी व्रजबालाओंको भगवान्‌को स्वाधीन करनेका सामर्थ्य

प्राप्त हुआ है। इसी प्रकार अन्य गोपांगनाओंको उन यूथेश्वरियोंकी सेवा करनेसे ही उसकी प्राप्ति हो सकती है। अतः उन्हें उन्हींका आश्रय लेना चाहिये। किंतु इसके लिये ब्रजमें जानेकी क्या आवश्यकता थी? इसका कारण बतलाते हैं— 'क्रन्दन्ति वत्सा बालाश्च तान् पाययत दुह्यत।' (श्रीमद्भा० १०।२९।२२) यह ऐसी ही बात है जैसे 'मामनुस्मर युध्य च।' (गीता ८।७) इधर अपनी प्राप्तिके लिये भगवान् उन्हें यूथेश्वरियोंकी सेवा करनेका आदेश देते हैं और उधर इसके साथ ही बालकोंको दुग्धपान कराने और गोदोहन करनेकी भी आज्ञा दे रहे हैं। इससे सर्वसाधारणके लिये भगवान्का यही मत प्रतीत होता है कि उन्हें निरन्तर भगवत्स्मरण करते हुए अपने लौकिक और वैदिक कर्तव्योंका भी यथावत् पालन करते रहना चाहिये। स्त्रियोंके लिये बालकोंको दुग्धपान कराना आदि गृहकृत्य धर्म ही है। जिस प्रकार क्षत्रियोंके लिये युद्ध और वैश्योंके लिये व्यापार कर्तव्य है, उसी प्रकार स्त्रियोंको सब प्रकारके गृहकृत्योंको सुचारु रूपसे सम्पन्न करते रहना चाहिये। इधर 'क्रन्दन्ति वत्सा बालाश्च तान् पाययत दुह्यत' इस वाक्यसे अन्य जीवरूप स्त्रियोंके लिये भगवान्का यह उपदेश है कि जब तुम मेरी ओर आने लगते हो तो ये अज्ञानी इन्द्रियाधिष्ठाता देवगण अपने पशुको अपने अधिकारसे बाहर जाता देखकर 'क्रन्दन्ति'—चिल्लाने लगते हैं। ये विघ्न करनेमें समर्थ हैं, इसलिये उस साधकके मार्गमें तरह-तरहके विघ्न उपस्थित कर देते हैं। श्रीमद्भागवत (११।४।१०)-में कहा है— 'त्वां सेवतां सुरकृता बहवोऽन्तरायाः स्वौको विलङ्घ्य परमं व्रजतां पदं ते।' देवता लोग नहीं चाहते कि यह प्राणी उनके पंजेसे निकलकर भगवद्धाममें प्रवेश करे। श्रुति भगवती कहती है 'नैतद्देवानां प्रियं यदैतन्मनुष्या विद्युः' अतः ऐसी परिस्थिति होनेपर ये बालक और वत्सरूप देवगण क्रन्दन करने लगते हैं। बाल अज्ञको कहते हैं। देवता लोग भोगप्रधान हैं, अभोक्ता आत्मतत्त्वमें उनकी गति नहीं है, इसलिये वे 'बाल' हैं तथा ऐसी पाशविक प्रवृत्तिके कारण ही उन्हें 'वत्साः' कहा गया है। देवताओंको 'असुर' भी कहा गया है— 'असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसावृताः।' (ईशावास्य० ३) 'असु' शब्दका अर्थ प्राण है; 'असुषु रमन्त इति असुराः' इस व्युत्पत्तिके अनुसार देवताओंको असुर कहा गया है, क्योंकि उनकी प्रवृत्ति प्राणादि अनात्माके पोषणमें ही है। जिस समय देवासुर-संग्राममें देवताओंको विजय प्राप्त हुई तो वे भगवान्को भूलकर अभिमानवश उसे अपना ही पुरुषार्थ समझने लगे। वे इस बातको भूल गये कि हमारे देह, इन्द्रिय एवं अन्तःकरण आदि सभी जड़ हैं। सर्वान्तर्यामी श्रीहरिकी प्रेरणाके बिना उनमें कुछ भी गति नहीं हो सकती। ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति। भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया॥ (गीता १८।६१) इस प्रकार देवताओंको मोहवश असुरभावको प्राप्त होते देखकर भगवान्ने उनका मानमर्दन किया और तब उनकी आँखें खुलीं। परंतु देवताओंका यह असुरत्व सापेक्ष है। जो लोग जगन्मोहिनी मायाके अधिकारको पार कर गये हैं, जिनका बुद्ध्यादिमें आत्मत्वाभिनिवेश सर्वथा गलित हो गया है और जिन्हें निखिल प्रपंच अपने स्वरूपभूत चिदाकाशमें प्रतीत होते हुए तलमलिन्यके समान सर्वथा असत् अनुभव होता है, उन तत्त्वनिष्ठ जीवन्मुक्तोंकी अपेक्षासे ही वे 'असुर' हैं। अन्य मनुष्यों एवं असुरोंकी अपेक्षा तो वे 'सुर' ही हैं। वस्तुतः सारा विवाद व्यष्टि-अभिमानमें ही है। व्यष्टि-अभिमानके कारण ही जीव अपनेको पण्डित, बुद्धिमान्, ऐश्वर्यशाली, सुखी, दुःखी अथवा अशक्त समझता है। यदि इस परिच्छिन्नत्वाभिमानको छोड़कर समष्टिमें आत्मबुद्धि हो जाय तो फिर कोई विवाद

२९२ भक्तिसुधा हमें सृष्टि-प्रतिपादक वाक्योंका सीधा-सादा अर्थ छोड़कर ब्रह्ममें ही तात्पर्य मानना पड़ेगा। अतः हे श्रुतियो! तुम इधर परब्रह्मके प्रतिपादनका प्रयत्न क्यों करती हो? जाओ साध्यसाधनरूप प्रपंचका ही प्रतिपादन करो। इसमें विशेष प्रयास भी नहीं है। देखो, 'कदाचनस्तरीरसि नेन्द्र सश्चसि दाशुषे' यह श्रुति स्पष्टतया इन्द्रका ही प्रतिपादन करती है; इसी प्रकार कोई श्रुति पुरोडाशकी स्तुति करती है; जैसे—'स्योनं ते सदनं कृणोमि घृतस्य धारया सुशेवं कल्पयामि, तस्मिन् सीद अमृते प्रतितिष्ठ व्रीहीणां मेध सुमनस्यमानः।' श्रुतियोंका जो शब्दार्थ होता है, वह आपाततः ही प्रतीत हो जाता है—'औत्पत्तिकस्तु शब्दस्यार्थेन सम्बन्धः' इस वाक्यके अनुसार शब्द और अर्थका सम्बन्ध स्वाभाविक है। अतः जिन इन्द्र, वरुण, वायु आदि देवताओंका श्रुतियाँ आपाततः प्रतिपादन कर रही हैं, वे ही श्रुतियोंके पति हैं, उन्हींकी तुम सेवा करो; परपुरुषरूप निर्विशेष ब्रह्मका आश्रय मत लो। यहाँ जो 'सतीः' शब्दमें द्वितीया है, वह प्रथमाके अर्थमें है। इसका तात्पर्य यह है कि 'पतीन् शुश्रूषध्वं यस्माद्ययं सत्यः'—तुम पतियों (अपने प्रतिपाद्य देवताओं)-की सेवा करो; क्योंकि तुम सती हो और यदि 'सतीः' शब्दको द्वितीयान्त ही माना जाय तो इस वाक्यका अर्थ होगा—'सतियोंकी सेवा करो'। सतियाँ वे श्रुतियाँ हैं, जो अपने प्रतिपाद्य देवताओंका ही प्रतिपादन करती हैं, परब्रह्मतक नहीं दौड़तीं। तुम उन्हींका अनुगमन करो; क्योंकि मीमांसकोंका जबरदस्त आग्रह है कि 'आम्नायस्य क्रियार्थत्वादानर्थक्यमतदर्थानाम्' अर्थात् 'वेद क्रियार्थ है, इसलिये जो वाक्य क्रियार्थ नहीं हैं, उनका कोई प्रयोजन नहीं है।' मीमांसकोंका मत है कि विधि-निषेधरूपसे क्रियापरक होनेपर ही वाक्यकी सार्थकता है। विधि- वाक्य इष्टप्राप्तिका उपदेश करनेके कारण सार्थक है; जैसे—'ज्वरितः सन् पथ्यमश्नीयात्' (ज्वरग्रस्त होनेपर पथ्य भोजन करे), इसी प्रकार 'अग्निहोत्रं जुहुयात्', 'स्वर्गकामो यजेत्' आदि वाक्योंकी अर्थवत्ता है तथा निषेधवाक्य अनिष्ट-परिहारका उपाय उपदेश करनेके कारण सार्थक है, जैसे— 'सर्पाय अङ्गुलिं न दद्यात्' (सर्पको अंगुली मत पकड़ाओ)। इसी प्रकार 'ब्राह्मणो न हन्तव्यः' आदि वाक्य समझने चाहिये। परंतु 'यह राजा जाता है', 'पृथ्वी सात द्वीपोंवाली है' इत्यादि सिद्ध-वस्तु- प्रतिपादक वाक्य और 'वायुर्वे क्षेपिष्ठा देवता' (वायु शीघ्रगामी देवता है) इत्यादि अर्थवाद किसी क्रियामें उपयोगी न होनेके कारण व्यर्थ हैं। जो हितका उपदेश करे, वह शास्त्र है अब यहाँ सन्देह किया जा सकता है कि अर्थवादको सार्थक न माननेपर तो उसका शास्त्रत्व ही सिद्ध नहीं हो सकता, क्योंकि 'शिष्यते हितमुपदिश्यतेऽनेन इति शास्त्रम्' इस लक्षणके अनुसार शास्त्र उसीको कहते हैं, जो हितका उपदेश करता है; जिस उक्तिका कोई प्रयोजन नहीं होता, उसे शास्त्र नहीं कहा जा सकता, वह तो उन्मत्तप्रलापवत् उपेक्षणीय ही होती है। वाचस्पतिमिश्रका कथन है— 'प्रतिपित्सितं त्वर्थं प्रतिपादयन् प्रतिपाद- यितावधेयवचनो भवति। अप्रतिपित्सितन्तु प्रतिपाद- यन्नायं लौकिको नापि परीक्षक इत्युन्मत्तवदुपेक्ष्यः स्यात्।' किंतु वस्तुतः अर्थवादका अशास्त्रत्व माना नहीं गया; क्योंकि 'स्वाध्यायोऽध्येतव्यः' इस विधिसे स्वाध्यायपदवाच्य समस्त वेदराशिका [आचार्य- परम्परासे] अध्ययन करनेका विधान किया गया है। समस्त वेदराशिके अन्तर्गत तो अर्थवाद भी है ही और गुरुपरम्परापूर्वक वेदाध्ययनका 'घृतकुल्या पयःकुल्यादि' की प्राप्तिरूप अदृष्ट फल भी बतलाया गया है। इसके सिवा श्रौतसूत्रकार कर्काचार्यजी भी कहते हैं कि 'वेदे मात्रामार्त्रास्याप्यानर्थक्यं न वक्तुं शक्यम्' अर्थात् वेदमें एक मात्राकी व्यर्थता नहीं बतलायी जा सकती। अतः मीमांसकको अर्थवादकी सार्थकता अवश्य बतलानी चाहिये।

श्रीरासलीलारहस्य २९३

मीमांसक कह सकता है कि विधिके साथ एकवाक्यतापन्न होकर विधिविहित अर्थकी स्तुति करनेमें अर्थवादका उपयोग होता है; इसी तरह ये सार्थक हो सकते हैं। किंतु वेदाध्ययनसे घृतकुल्या, पयःकुल्या आदि अदृष्ट फलकी कल्पना करनेकी क्या आवश्यकता है ? इससे तो वेदार्थज्ञानरूप दृष्ट फल ही प्राप्त हो जाता है और दृष्ट फलके रहते हुए अदृष्ट फलकी कल्पना करना व्यर्थ है। इसपर शंका होती है कि यदि ऐसी बात है तो वेदार्थ-ज्ञान स्वतन्त्रतासे स्वयं वेदाध्ययन कर लेनेसे ही हो सकता है; उसके लिये ‘स्वाध्यायोऽध्येतव्यः’ इस वाक्यसे आचार्यपरम्परापूर्वक अध्ययन करनेकी ही विधि क्यों की गयी है ? उत्तरमें कहा जा सकता है कि गुरुपरम्परापूर्वक अध्ययन करनेसे वेद संस्कृत होता है और संस्कृत वेद ही यज्ञ-यागादिमें उपयोगी है। इसलिये यह विधि सार्थक है। वेदाध्ययनसे वेदार्थ-ज्ञानकी निष्पत्ति तो अन्वय-व्यतिरेकसे स्वतः सिद्ध है। जिस प्रकार भोजन करनेवाले पुरुषको तृप्ति हो ही जाती है, उसी प्रकार जो कोई वेदाध्ययन करेगा, उसे वेदार्थज्ञान होगा ही। इसमें विधि की आवश्यकता नहीं है। विधिकी सार्थकता अप्राप्त विषयका प्रतिपादन करनेमें ही होती है। जिस प्रकार तण्डुलनिष्पत्ति नखविदलनसे भी हो सकती है और मुसलावहननसे भी। किंतु यागादिमें मुसलावहनन ही करना चाहिये; इसीलिये ‘व्रीहीनवहन्ति’ यह विधि की गयी है। इसका फल अदृष्ट होता है। इसी प्रकार वेदार्थका ज्ञान गुरुसे अध्ययन करनेपर भी हो सकता है और व्युत्पन्नमति पुरुषोंको स्वयं अपने बुद्धिबलसे भी हो सकता है। इसीसे यह विधि की गयी है कि ‘स्वाध्यायोऽध्येतव्यः’ अर्थात् गुरुपरम्परासे ही अध्ययन करना चाहिये। इसीसे वेदाध्ययन सार्थक होगा। वेदाध्ययनसे वेदार्थका ज्ञान होगा, तब वेदार्थका अनुष्ठान किया जायगा और उससे स्वर्गादिकी प्राप्ति होगी। इस प्रकार दृष्ट फलके साथ वह अदृष्ट फलका भी जनक होगा। ‘आम्नायस्य क्रियार्थत्वादानर्थक्यमतदर्थनाम्’ इस सूत्रके अनुसार अर्थवादकी सार्थकता न होनेसे अर्थवाद उत्तप्त हो रहा है और इसी प्रकार विधि भी उत्तप्त है; क्योंकि स्वभावतः विधिमें लोगोंकी प्रवृत्ति नहीं होती। उसमें प्रवृत्ति होनेके लिये उसकी स्तुतिकी आवश्यकता है। पहले यह पद्धति थी कि बड़े-बड़े राजा लोग सभाएँ कराया करते थे। उनमें शास्त्रार्थ होता था। वहाँ जो विद्वान् विजयी होता था, उसका बहुत आदर-सत्कार किया जाता था। उस सम्मानके प्रलोभनसे ही विद्वान् लोग न्याय, मीमांसा आदि शुष्क विषयोंका भी अध्ययन करते थे। इस प्रकार जिस कर्मकी महत्ता सत्पुरुषोंमें प्रसिद्ध होती है, उसीमें लोगोंकी प्रवृत्ति हुआ करती है। वैदिक एवं स्मार्त कर्मोंमें भी लोगोंकी तभी प्रवृत्ति हो सकती है, जब लोग उन कर्मोंको करनेवालोंका आदर करें। ऐसा तो कोई विरला ही विद्वान् होता है, जो आदर आदिकी अपेक्षा न रखकर कर्तव्य-बुद्धिसे ही शास्त्र-रक्षा करे। यह बात अवश्य है कि ऐसे महानुभावोंका भी सर्वथा अभाव नहीं है। इस समय यद्यपि अश्वमेध, राजसूय एवं अग्निष्टोम आदि यज्ञोंको कोई नहीं पूछता तो भी ऐसे भी ब्राह्मण हैं, जिन्होंने शुष्क इष्टियोंद्वारा अश्वमेधादि कृत्योंका अभ्यास किया है और आवश्यकता पड़नेपर वे उनका अनुष्ठान करा सकते हैं। शास्त्र कह रहे हैं—‘अहरहः सन्ध्यामुपासीत’, ‘अग्निहोत्रं जुहुयात्’, ‘स्वाध्यायोऽध्येतव्यः।’ किंतु इन विधिवाक्योंसे प्रेरित होकर आज कितने आदमी उनका पालन करते हैं ? किंतु जनतामें हरिनाम- संकीर्तनकी थोड़ी-सी महिमा प्रसिद्ध होनेके कारण उसका प्रचार दिनों-दिन बढ़ रहा है। इससे सिद्ध हुआ कि विधिमें प्रवृत्ति होनेके लिये उसकी स्तुतिकी आवश्यकता है। अतः इधर अर्थवाद अपनी सार्थकताके लिये और विधि अपनेमें प्रवृत्ति होनेके लिये उत्तप्त

थे, उन्होंने 'नष्टाश्वरथदग्धन्याय'* से परस्पर एक- दूसरेकी कार्यसिद्धि की। अर्थवादने विधिकी स्तुति करके विधिमें रुचि उत्पन्न की और विधिने अर्थवादको अपने फलसे फलवान् बना दिया। इसी प्रकार मन्त्रोंकी सार्थकताके विषयमें भी प्रश्न होनेपर उनका उपयोग द्रव्य और देवताओंके स्मारक होनेमें है, यह समाधान किया जाता है। इस तरह विधि, निषेध, अर्थवाद और मन्त्र— इन सभीका प्रामाण्य क्रियापरत्वेन ही है। इसीसे भगवान् श्रुतिस्वरूपा व्रजांगनाओंसे कहते हैं कि अपने प्रामाण्यके लिये तुम अपने समुदायका ही अनुगमन करो। जिस प्रकार तुम्हारा समुदाय क्रियापरक है, उसी प्रकार तुम भी क्रियापरक हो जाओ, शुद्ध चैतन्यरूप सिद्ध वस्तुका प्रतिपादन मत करो। यदि कहा जाय कि हमारा अप्रामाण्य हो जाने दो तो ऐसा कथन भी ठीक नहीं; क्योंकि तुम सती— अपौरुषेय होनेसे सर्वदोष-विवर्जित हो, तुम्हें मीमांसकोंका संग छोड़ना उचित नहीं है। कुछ 'द्यावाभूमी जनयन् देव एकः' (यजु० १७।१९) इत्यादि श्रुतियाँ कह सकती हैं कि मीमांसक तो हमारे स्वार्थका ही अपलाप करते हैं, क्योंकि वे हमारे सर्वस्व परब्रह्मकी सत्ता ही स्वीकार नहीं करते, फिर हमीं उनकी अपेक्षा क्यों करें? परंतु यह विचार ठीक नहीं है। मीमांसक जो ईश्वरका खण्डन करते हैं, वे केवल वेदनिर्मातृत्वेन उसे स्वीकार नहीं करते; क्योंकि नैयायिकोंके मतानुसार अनुमानसिद्ध सर्वज्ञ ईश्वरकृत होनेके कारण वेदोंका प्रामाण्य है और इधर ईश्वरके सर्वज्ञत्वका ज्ञान भी वेदसे ही होता है। इस प्रकार वेद और ईश्वर इन दोनोंमें अन्योन्याश्रय दोषकी प्राप्ति होती है। इसके सिवा एक दोष यह भी है कि जिन युक्तियोंसे अनुमान करके नैयायिक वेदनिर्माता ईश्वरका सर्वज्ञत्व सिद्ध करते हैं, उन्हीं युक्तियोंसे बौद्ध, ईसाई और यवन लोग अपने धर्मग्रन्थोंके निर्माताओंको सर्वज्ञ सिद्ध कर सकते हैं। वेदान्त-दर्शनके मतमें भी ईश्वरकी सिद्धि अनुमानसे नहीं, बल्कि शास्त्रसे ही होती है; जैसा कि 'शास्त्रयोनित्वात्' (वेदान्त- दर्शन १।१।३), 'तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि', (बृहदारण्यक० ३।९।२६) एवं 'वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः' (गीता १५।१५) इत्यादि वाक्योंसे सिद्ध होता है। वेदोंकी अपौरुषेयता इसीसे शास्त्ररक्षकका आदर भगवान् भी करते हैं। वे कहते हैं—'विप्रप्रसादाद्धरणीधरोऽहम्।' अतः मीमांसक लोग वेदका प्रामाण्य ईश्वरकृत होनेके कारण नहीं मानते। बल्कि अपौरुषेय होनेके कारण मानते हैं। इसीसे उन्होंने जो ईश्वरका खण्डन किया है। वह इसीलिये है कि उन्हें ईश्वरनिर्मितत्वेन वेदका प्रामाण्य इष्ट नहीं है। वह स्वतःप्रमाण है। उत्तरमीमांसा और पूर्वमीमांसाका यह सिद्धान्त है कि प्रमाण स्वतःप्रमाण हुआ करता है; उसका अप्रामाण्य परतः होता है। यदि प्रमाणका प्रामाण्य परतः माना जायगा तो जिस प्रमाणसे उसका प्रामाण्य सिद्ध किया जायगा, उसके प्रामाण्यकी सिद्धिके लिये किसी तीसरे प्रमाणकी अपेक्षा होगी और उनके प्रामाण्यके लिये चौथे प्रमाणकी आवश्यकता होगी। इस प्रकार अनवस्थाका प्रसंग उपस्थित हो जायगा। वेदातिरिक्त अन्य ग्रन्थोंका भी प्रामाण्य तो स्वतः सिद्ध है, किंतु पौरुषेय और सादि होनेके कारण उनका अप्रामाण्य परतः है। उनका पौरुषेयत्व और सादित्व तो उन्हींसे सिद्ध होता है। कोई भी पुरुष सर्वज्ञ नहीं हो सकता; अन्यथा अनेक सर्वज्ञ मानने पड़ेंगे। यदि अनेक सर्वज्ञ माने जायँ तो उनके कथनमें विरोध नहीं होना चाहिये। परंतु ऐसी बात है नहीं; जीवमात्रमें अल्पज्ञत्व, सातिशयत्व और करणापाटव आदि दोष रहते ही हैं। इसलिये उनके रचे हुए ग्रन्थ भी प्रामाणिक नहीं हो सकते।

  • दो राजा वनमें गये हुए थे। उनमेंसे एकका घोड़ा मर गया और दूसरेका रथ नष्ट हो गया। वे आपसमें मिल गये। उनमेंसे एकने अपना रथ दिया और दूसरेने घोड़ा। इस प्रकार परस्पर मिलकर वे उस वनसे निकलकर सकुशल नगरमें पहुँच गये। इसे 'नष्टाश्वरथदग्धन्याय' कहते हैं।

जिस प्रकार अन्य ग्रन्थोंका पौरुषेयत्व प्रदर्शित किया जा सकता है, उस प्रकार वेदका पौरुषेयत्व सिद्ध नहीं किया जा सकता। यदि पूछा जाय कि इसमें प्रमाण क्या है ? तो परोक्ष वस्तुके अभावमें तो प्रमाणाभाव ही पर्याप्त प्रमाण होता है। हम तो वेदके कर्ताका अभाव बतला रहे हैं, अतः उसके लिये किसी प्रमाणकी आवश्यकता नहीं है। कहा जा सकता है कि ऐसे भी कितने ही ग्रन्थ हैं कि जिनके कर्ताका ज्ञान नहीं है; तो क्या उन्हें भी अपौरुषेय ही मानना चाहिये ? इसमें हमारा कथन यह है कि उन ग्रन्थोंकी सम्प्रदाय-परम्पराका विच्छेद देखा जाता है, इसलिये वे अपौरुषेय नहीं हो सकते। किंतु वेदोंकी सम्प्रदाय-परम्पराका विच्छेद नहीं हुआ; क्योंकि उसके विच्छेदमें कोई प्रमाण नहीं है। यदि कहा जाय कि कहीं-कहीं वेदोंकी उत्पत्ति भी तो सुनी जाती है; जैसे—'अस्य महतो भूतस्य निश्वसितमेतद्यदृग्वेदो यजुर्वेदः' (बृहदारण्यक० २।४।१०) इत्यादि वाक्योंसे ज्ञात होता है। यह कथन ठीक है, किंतु इसके साथ ही 'वाचा विरूप नित्यया', 'अनादिनिधना नित्या वागुत्सृष्टा स्वयंभुवा' आदि वाक्योंसे उनका नित्यत्व भी प्रमाणित होता है। अतः इन दोनों प्रकारके वाक्योंकी एकवाक्यता होनी चाहिये। इनका अभिप्राय केवल यही है कि पूर्व कल्पकी आनुपूर्वीके समान इस कल्पके आरम्भमें भी भगवान् स्वयम्भूसे उसी आनुपूर्वीके अनुस्मरणपूर्वक वेदोंका आविर्भाव हुआ। इसीसे भगवान् कहते हैं कि तुम अपने समुदायमें जाओ, क्योंकि मीमांसक भी परमब्रह्म परमात्माका खण्डन नहीं करते। वे केवल न्यायप्रतिपादित अनुमानसिद्ध सर्वज्ञ ईश्वरको स्वीकार नहीं करते, अपौरुषेय वेदप्रतिपादित सर्वज्ञ ईश्वरका खण्डन वे कभी नहीं करते। कर्मफल देनेवाला या कर्ममें देवतादिरूपसे ईश्वर उन्हें भी मान्य है ही, परंतु तुम स्वतन्त्र विधि निरपेक्ष अद्वैत ब्रह्ममें मत आसक्त हो। अतः तुम साध्यसाधनमय प्रपंचका ही प्रतिपादन करो, निर्विशेष परब्रह्मका प्रतिपादन करनेका प्रयत्न मत करो। इसमें 'मा चिरम्'—देरी भी नहीं होगी। इसलिये 'शुश्रूषध्वं पतीन्'—अपने-अपने प्रतिपाद्य देवताओंका ही प्रतिपादन करो। समस्त जीवोंके अधिष्ठान साक्षात् परब्रह्म भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र ही हैं यह सुनकर मानो श्रुतियोंको यह सन्देह हुआ कि यदि हम अनन्त परब्रह्मका ही प्रतिपादन करेंगी तो अन्य देवता तो उसीमें आ जायँगे; क्योंकि वे भी तो ब्रह्मसे अभिन्न ही हैं। यह नियम है कि कार्यगत सत्ता कारणमें ही रहती है, अतः समस्त कार्यका पर्यवसान कारणमें ही होता है। जिस प्रकार मृत्तिकाका प्रतिपादनकर देनेपर घटादिका भी प्रतिपादन हो ही जाता है, उसी प्रकार सबके अधिष्ठानभूत परब्रह्मका प्रतिपादन करनेपर अवान्तर देवताओंका प्रतिपादन भी हो ही जाता है। वास्तवमें तो सत्तामात्र शुद्ध ब्रह्म ही सम्पूर्ण शब्दोंका वाच्य है; क्योंकि यह निखिल प्रपंच उसीसे तो उत्पन्न हुआ है—'तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः । आकाशाद्वायुः।' (तैत्तिरीय० २।१) अतः यह ब्रह्मरूप ही है। इसलिये यदि व्रजांगनाएँ अपने प्राकृत पतियोंको छोड़कर भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रके पास गयीं तो उनका पातिव्रत भंग नहीं हुआ, क्योंकि— गोपीनां तत्पतीनां च सर्वेषामेव देहिनाम्। योऽन्तश्चरति सोऽध्यक्षः क्रीडनेनेह देहभाक् ॥ (श्रीमद्भा० १०।३३।३६) जिस प्रकार तरंग समुद्रसे भिन्न नहीं होती, इसलिये यदि एक तरंगके साथ दूसरी तरंगका सम्बन्ध है तो वस्तुतः वह सम्बन्ध समुद्रके ही साथ है; क्योंकि वही समस्त तरंगोंका अधिष्ठान है, इसी प्रकार समस्त जीवोंके अधिष्ठान साक्षात् परब्रह्म भगवान् कृष्णचन्द्र ही हैं। अतः श्रुतियोंको यह विचार हुआ कि यदि हम परब्रह्मका ही प्रतिपादन करेंगी तो भी हमारा पातिव्रत भंग नहीं होगा। इसपर भगवान् कहते हैं—'सच है, मेरे साथ

सम्बन्ध करनेसे तुम्हारा पातिव्रत तो भंग नहीं होगा तथापि 'क्रन्दन्ति वत्सा बालाश्च' (श्रीमद्भा० १०।२९।२२)—ये बालक और बछड़े तो रो रहे हैं। इसपर दया करनी चाहिये। ये अज्ञानी हैं, अपने अधिष्ठानभूत मुझ परब्रह्मको नहीं जानते, इसलिये बाल हैं तथा इनकी प्रवृत्ति अनात्म पदार्थोंमें है, इस पाशविक प्रवृत्तिके ही कारण ये वत्स हैं। तुम्हें चाहिये कि इनपर दया करके इन्हें इनके इष्ट पदार्थ सोमादिका प्रदान करो।' यदि विचार किया जाय तो उपास्य-उपासनाका पर्यवसान तो प्रेमातिशयमें होता है। उसके लिये उपासना साधन है। 'भक्ति' शब्दके भी दो अर्थ हैं—'भज्यते सेव्यते भगवदाकारमन्तःकरणं क्रियतेऽनया सा भक्तिः' अर्थात् जिसके द्वारा भगवदाकार वृत्ति की जाय उसे भक्ति कहते हैं और दूसरा 'भजनं भक्तिः' भगवदाकार वृत्ति ही भक्ति है। इस प्रकार भक्ति साध्य भी है और साधन भी। इस प्रकार 'उपासना' शब्दका भी तात्पर्य यह है—'लक्ष्यमुपेत्य यद्दीर्घकालं नैरन्तर्येणादरपूर्वकमासनं तदुपासनम्' अर्थात् अपने लक्ष्यतक पहुँचकर जो दीर्घ कालतक अव्यवहित रूपसे उसकी सन्निधिमें रहता है, उसका नाम उपासना है। इस तरह यदि हम अपने ध्येयका दीर्घकालतक सेवन करेंगे तो उसके प्रति हमारे हृदयमें राग उत्पन्न होगा। 'ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।' (गीता २।६२) भगवान्‌की इस उक्ति के अनुसार यदि हम विषय-चिन्तन करते-करते विषयासक्त हो जाते हैं तो दीर्घकालतक भगवच्चिन्तन करनेपर उनमें भी हमारा राग हो ही जाना चाहिये। प्रेम आरम्भमें ही नहीं होता; वह तो दीर्घकालतक सत्कारपूर्वक अपने प्रियतमका निरन्तर चिन्तन करते रहनेपर ही होता है। जिस समय भगवान्‌में हमारा प्रेम होगा, उस समय हमें उनकी प्राप्तिकी उत्कट अभिलाषा हो जायगी। प्रेमकी अभिवृद्धि प्रेमास्पदमें ही होती है एक बात और ध्यान देनेकी है, प्रेमकी अभिवृद्धि प्रेमास्पदमें ही हुआ करती है। जो प्रेम करनेयोग्य नहीं होता, उसका दीर्घकालतक चिन्तन किया जाय, तब भी उसमें प्रेम नहीं हो सकता। व्याघ्र और सर्पादिका जन्मभर चिन्तन करते रहो, उनमें प्रेम कभी नहीं होगा। उनमें तो द्वेषकी ही वृद्धि होगी, प्रेम तो प्रेमास्पदमें ही हो सकता है। चिन्तनसे केवल योग्यता मिलती है। प्रेमास्पदका चिन्तन करनेसे प्रेम बढ़ता है और द्वेषका चिन्तन करनेसे द्वेषकी वृद्धि होती है। विषय भी सुखके साधन हैं, इसलिये उनमें भी प्रेम हो जाया करता है। प्रेम दोमें ही होता है—सुखमें तथा सुखके साधनमें। सुखके साधनमें जो प्रेम होता है वह स्थायी नहीं होता, जबतक वह पदार्थ सुखप्रद रहता है, तभीतक उसमें प्रेम रहता है। देखो, जल तभीतक प्रिय लगता है, जबतक हमें तृषा रहती है। परंतु सुख तो सदा ही प्रेमास्पद है। अतः निरतिशय प्रेम सुखमें ही हो सकता। केवल सुखस्वरूप तो एकमात्र श्रीभगवान् ही हैं, इसलिये हमें उन्हींमें प्रेम करना चाहिये। प्रेमके इन दो भेदोंको शास्त्रमें सोपाधिक और निरुपाधिक प्रेम भी कहा है। प्रेमके विषयमें यह नियम है कि अत्यन्त नीच परिस्थितिमें रहनेवाला पुरुष भी उसीको अधिकाधिक प्रेमास्पद समझता है, जो जितना उसका अधिक आन्तरिक होता है। जो देहात्मवादी हैं, जिन्हें विविध प्रकारके सौख्योपभोग ही इष्ट हैं, उनका प्रेम भी आधिकाधिक अन्तरंगमें ही होता है। देखिये, पुत्रादिकी अपेक्षा शरीर अधिक प्रिय है, शरीरकी अपेक्षा मन अधिक प्रिय है; इसीसे मन उद्विग्न होनेपर उसे शान्त करनेके लिये आत्महत्यातक कर लेते हैं। मन भी जब चंचलताके कारण अशान्तिका हेतु दिखायी देने लगता है तो उसके भी नाशका प्रयत्न किया जाता है। यहाँतक कि अन्तमें अभ्यासी लोग बुद्धिका भी निरोध करते हैं। इससे ज्ञात होता है कि जो बुद्धिसे लेकर स्थूल प्रपंचपर्यन्त सम्पूर्ण दृश्यवर्गका प्रकाशक है, वह सर्वान्तरतम आत्मा ही निरुपाधिक परमप्रेमका आस्पद है। हमारा परमाराध्य प्रभु बहिरंग नहीं है। वेद-शास्त्र

श्रीरासलीलारहस्य २९७ उसे सबका अन्तरात्मा कहकर प्रतिपादन करते हैं, अतः जो लोग भगवान्को बहिरंग समझते हैं, वे वस्तुतः उपासनाका रहस्य नहीं जानते। वह तो सर्वान्तरतम है। संसारके सारे पदार्थोंका वियोग हो सकता है, किंतु भगवान्का वियोग कभी नहीं हो सकता; वह तो हमारा परम सखा है। श्रुति कहती है— द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते। तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्य- नश्नन्नन्यो अभिचाकशीति॥ (मुण्डक० ३।१।१) वैष्णव आचार्योंका मत है कि जिस समय जीव ब्रह्मलोकको जाता है—जिन्हें कि वे वैकुण्ठ, गोलोक, साकेत तथा नित्य वृन्दावन आदि नामोंसे पुकारते हैं—उस समय उसे लिंग शरीर छोड़ देना पड़ता है। ब्रह्मलोकको वे शबल ब्रह्मका धाम नहीं मानते। वे उसे शुद्ध चिदानन्दघन भगवान्का चिन्मय धाम मानते हैं। अतः वहाँ जो जीव जाते हैं, वे विरजा नदीमें स्नान करनेपर अपना लिंग शरीर त्याग देते हैं। इस प्रकार लिंग शरीरका तो हमसे वियोग हो जाता है, किंतु भगवान्का वियोग कभी नहीं होता। अतः भगवान् हमारे नित्य सखा हैं। किंतु मैत्री सर्वदा समान और सजातीय व्यक्तियोंमें ही हुआ करती है। अतः जिस प्रकार भगवान् 'सच्चिदानन्द दिनेश' हैं, उसी प्रकार जीव भी 'चेतन अमल सहज सुखरासी' (रा०च०मा० ७।११७।२) है। इसलिये जो उनके स्वभावमें भेद मानते हैं, वे ठीक-ठीक नहीं जानते। भगवान् तभी जीवके परमप्रेमास्पद हो सकते हैं, जब कि जीवको उनका नित्य सम्बन्धी माना जाय। अतः उपासनाका ठीक रहस्य वही जानता है, जिसे उपास्य और उपासकके अभेदका निश्चय है। अन्यथा— 'अन्योऽसावन्योऽहमस्मि न स वेद यथा पशुः।' जो ऐसे अनभिज्ञ लोग हैं, वे ही सर्वमिथ्यात्व निश्चयको सुनकर 'क्रन्दति'—रोते हैं। वे अनभिज्ञ कर्मठ कहे जाते हैं। जो भगवत्प्राप्तिके लिये भगवदर्थ कर्म करते हैं, वे परम विवेकी हैं। ऐसा कर्म करनेके लिये तो भगवान् स्वयं आज्ञा दे रहे हैं— मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः। निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव॥ यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्। [L42

२९८ भक्तिसुधा

उन्हें ही तृप्त करो और उनके लिये अभीष्ट फलरूप दुग्ध दुहो। यह उनके प्रति तुम्हारी करुणा होगी। यद्यपि परब्रह्मकी ही उपासना करनेसे तुम्हारा पातिव्रत भग्न नहीं होगा; क्योंकि—'तमेतं···ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसानाशकेन' (बृहदारण्यक० ४।४।२२)इस श्रुतिके अनुसार विचारवानोंके सारे जप-तपका परम लाभ ब्रह्मज्ञान ही है; तथापि दया तो करनी ही चाहिये। महानुभाव तो सर्वदा 'सर्वभूतहिते रताः' (गीता ५।२५; १२।४) ही हुआ करते हैं; अतः तुम भी उन्हें अभीष्ट वस्तु देकर उनका आप्यायन करो। परमात्मप्रभुका आश्रय लेनेसे प्रपंचकी सहज ही निवृत्ति हो जाती है इस श्लोकका तात्पर्य यह भी हो सकता है कि समस्त प्राणियोंकी बुद्धियाँ ही व्रजांगनाएँ हैं और भगवान् कृष्ण उनके साक्षी हैं। अतः 'तद्यात गोष्ठं मा' ऐसा पदच्छेद करके यह तात्पर्य समझना चाहिये कि अब तुम गोष्ठको मत जाओ अर्थात् साध्यसाधनात्मक प्रपंचका प्रतिपादन मत करो, बल्कि 'शुश्रूषध्वं पतीन्।' यहाँ 'पतीन्' इस पदमें बहुवचन गौरवार्थ है अर्थात् उपक्रम, उपसंहार, अपूर्वता आदि षड्विध लिंगोंसे मेरेमें ही अपना तात्पर्य निश्चय करो। 'त्रैगुण्यविषया वेदा' (गीता २।४५) यह भगवान्का कथन अविवेकियोंकी ही दृष्टिसे है। विचारवानोंका तो यही कथन है कि 'वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो····।' (गीता १५।१५) अतः त्रिगुणमय संसारके साथ संसर्ग करना ही अमंगल है। परब्रह्म परमात्माका अनुस्मरण ही एकमात्र कल्याणका मूल है। अतः श्रुति प्रपंचपरक है—ऐसा प्रसिद्ध होनेसे तुम कलंकित हो जाओगी और यदि त्रिगुणातीत शुद्ध परब्रह्मका प्रतिपादन करोगी तो तुम भी गुणातीत हो जाओगी और इससे तुम्हें महत्ता प्राप्त होगी। परंतु यह होगा कैसे ? इसके लिये तुम 'शुश्रूषध्वं सतीः' अर्थात् 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' (तैत्तिरीय० २।१) आदि जो श्रुतियाँ परब्रह्मका प्रतिपादन करती हैं, उन्हींके सिद्धान्तका अनुसरण करो। यहाँ अपनेमें बुद्धियोंका निश्चय दृढ़ करना है; इसलिये मानो बुद्धियोंके प्रति भगवान् कहते हैं कि 'पतीन् शुश्रूषध्वम्' यहाँ उपाधिभेदके कारण बुद्धियोंके अनेक पति उपपन्न हो सकते हैं। बुद्धि स्वभावसे ही नामरूपात्मक दृश्यकी ओर जाती है। इसीसे भगवान् कहते हैं—'तद्यात मा चिरं गोष्ठम्' अर्थात् अब तुम और अधिक काल दृश्यकी ओर मत जाओ। बल्कि दृश्यकी ओरसे निवृत्त होकर अपने अवभासक समस्त बुद्धियोंके साक्षी सर्वान्तर्यामी परब्रह्मका ही चिन्तन करो। परंतु ऐसा कोई-कोई ही कर पाता है; क्योंकि— पराञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयम्भू- स्तस्मात्पराङ्पश्यति नान्तरात्मन्। (कठ० २।१।१) इसलिये— कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्ष- दावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन् ॥ (कठ० २।१।१) अहा! भगवान्का वह सौन्दर्यसुधासिन्धु कितना महान् है। भगवत्पाद भगवान् शंकराचार्य प्रबोधसुधाकरमें लिखते हैं—'अरी बुद्धि, तू तराजूके एक पलड़ेमें सारे संसारका सुख और दूसरेमें परमानन्दकन्द भगवान् कृष्णके सौन्दर्यसुधाका एक कण रख, तब तू देखेगी कि भगवान्का सौन्दर्यकण ही भारी है। अतः तू सांसारिक विषयोंको छोड़कर भगवान् कृष्णकी सौन्दर्यसुधाका पान किया कर।' इसीसे भगवान् कहते हैं—'अरी बुद्धियो ! अब तुम गोष्ठप्रपंचमें मत जाओ, वहाँ बहुत रह चुकीं। उस स्थानमें तो पशु रहा करते हैं; तुम तो अपने परम प्रियतम मुझ परब्रह्मका ही आश्रय लो।' यदि कहो कि हम स्वतन्त्र नहीं हैं, हम कैसे आपकी ओर आयें! तो भगवान् कहते हैं—तुम अवश्य पराधीन हो, क्योंकि तुम करण हो और करण अपनी प्रवृत्तिके लिये कर्ताके अधीन हुआ करता है; अतः तुम प्रमाताको समझाओ। इसपर श्रुति कहती

श्रीरासलीलारहस्य २९९ हैं—हम तो उसे बहुत समझाती हैं; परंतु अब तो वह भी विवश है। जैसे दौड़नेवाला पुरुष यद्यपि पादसंचालनमें स्वतन्त्र होता है तथापि वेग बढ़ जानेपर वह भी उस वेगके अधीन हो जाता है; फिर उसकी गति उसके अधीन नहीं रहती। इसी प्रकार यद्यपि प्रमाता जीव स्वतन्त्र है तो भी बुद्धिसे विषय- चिन्तन करते रहनेके कारण अब उसे विवश होकर उसी प्रकारकी प्रवृत्तिमें प्रवृत्त होना पड़ता है। श्रीदुर्गासप्तशतीमें सुरथ नामक राजा और समाधि नामक वैश्यका प्रसंग आता है। सुरथ शत्रुओंसे पराजित होकर भागा था। उसका राज्य शत्रुओंके हाथमें चला गया था। अब उसमें उसका कोई स्वत्व नहीं रहा था तो भी उसे अपने सम्बन्धियों और हाथी-घोड़ोंकी स्मृति सताती थी। इसी प्रकार समाधिको उसके पुत्रादिने घरसे निकाल दिया था तो भी उसे घर और घरवालोंकी ही स्मृति बनी रहती थी। उन्होंने एक मुनिवरके पास जाकर इस अनभिमत चिन्ताका कारण पूछा। तब मुनिने कहा— ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा॥ बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति। (श्रीदुर्गासप्तशती १।५५-५६) अतः भगवान् कहते हैं—यदि तुम्हारी प्रवृत्ति नहीं होती तो 'शुश्रूषध्वं सतीः' भगवती शक्तिका समाश्रयण करो; क्योंकि— सैषा प्रसन्ना वरदा नृणां भवति मुक्तये। सा विद्या परमा मुक्तेर्हेतुभूता सनातनी॥ (श्रीदुर्गासप्तशती १।५७) क्योंकि वह सर्वात्मिका है—'या देवी सर्वभूतेषु भ्रान्तिरूपेण संस्थिता।' (श्रीदुर्गासप्तशती ५।७४) अपनेसे विमुख लोगोंके लिये वही भ्रान्तिरूपसे प्रकट होती है और अपने भक्तोंके लिये वही परम कल्याणी विद्यादेवी है। यच्च किंचित्क्वचिद्वस्तु सदसद्वाखिलात्मिके॥ तस्य सर्वस्य या शक्तिः सा त्वं किं स्तूयसे तदा। (श्रीदुर्गासप्तशती १।८२-८३) अथवा 'सती' शब्दसे सात्त्विकी वृत्ति भी विवक्षित हो सकती है। अतः इसका तात्पर्य यह है कि पहले सात्त्विक वृत्तियाँ जाग्रत् करो। भगवान्‌का नाम जप करो, प्रभुका गुणगान करो और राजस- तामस वृत्तियोंका त्याग करो। ऐसा करते-करते बादमें परब्रह्म परमात्मआकाराकारिता वृत्ति हो जायगी। इस प्रकार बुद्धियोंको भगवान्‌का यही उद्देश्य है कि तुम गोष्ठ यानी साध्यसाधनात्मक संसारकी ओर मत जाओ, बल्कि 'पतीन्'—सम्पूर्ण बुद्धियोंके साक्षी परब्रह्म परमात्माका ही आश्रय लो। बुद्धियाँ अपने चरम आश्रयभूत साक्षीका अवलम्बन न करके संसारमें प्रवृत्त होती हैं और फिर उसीमें फँस जाती हैं। अतः भगवान् उन्हें उपदेश करते हैं कि तुम संसारसे विरत होकर अधिष्ठान परमात्माकी ओर ही जाओ। वह आत्मा जाग्रदादि तीनों अवस्थाओंका साक्षी है, वह यह जानता है कि इस समय मेरी बुद्धि सात्त्विक है, इस समय राजस है और इस समय मोहग्रस्त है। इस प्रकार जो काम, संकल्प, विचिकित्सा, धी, ह्री आदि अन्तःकरणके धर्मोंको जानता है, जो जाग्रत् और स्वप्नमें प्रमाता, प्रमाण एवं प्रमेयरूप त्रिपुटीका अवभासक है और सुषुप्तिमें उनके अभावको प्रकाशित करता है, उस सर्वावभासक परमतत्त्वपर दृष्टि पहुँचनेपर यह निखिल प्रपंच सहजहीमें निवृत्त हो जाता है। किंतु यह है अत्यन्त दुर्लभ; इसीसे कहा है— कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्ष- दावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन्॥ (कठ० २।१।१) 'धीर' शब्दका अर्थ है—'धियम् ईरयति प्रेरयति इति धीरः' अर्थात् जो बुद्धि आदि कार्यकारण- संघातको अपने अधीन रखता है—स्वयं उसके अधीन नहीं होता। ऐसा कोई देहाभिमानी नहीं हो सकता। इसीलिये भगवान्‌ने कहा है— 'अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते॥' (गीता १२।५)

३०० भक्तिसुधा इन्द्रिय, मन, बुद्धि, अहंकार — सभीका अवभासक सर्वसाक्षी परमात्मा ही है वह बुद्धिका प्रेरक नील-पीतादि किसी रूपवाला नहीं है। वह तो अत्यन्त सूक्ष्म है। देखो—इन नील- पीतादिका प्रकाशक पहले तो सूर्यका प्रकाश देखा जाता है। जिस प्रकार नील-पीतादि रूपवान् हैं, उसी प्रकार उन्हें प्रकाशित करनेवाले सूर्य एवं अग्नि आदिके आलोक भी रूपवान् हैं; परंतु अपने प्रकाश्य नील-पीतादिकी अपेक्षा उनमें बहुत सूक्ष्म है। उस सौर आलोकका प्रकाशन चाक्षुष-ज्योतिसे होता है; वह रूपरहित है। इस प्रकार रूपरहित तत्त्व रूपवान्‌को प्रकाशित कर रहा है। यह भी अनुभवमें आता है कि जो नेत्रज्योति निर्दोष होती है, वह आलोकको ठीक- ठीक प्रकाशित कर सकती है और जो सदोष होती है, वह उसका ठीक-ठीक प्रकाशन नहीं कर सकती। किंतु यह कौन जानता है कि नेत्र सदोष है या निर्दोष? इस बातको मन जानता है; चक्षुके पाटवापाटवका ज्ञाता मन है। मनमें भी रूप नहीं है। इसी प्रकार मनके चांचल्यादिको जाननेवाली बुद्धि है और बुद्धि अपना कार्य अहंकारपूर्वक करती है; जैसे कि यह कहा जाता है कि 'मैं' अपनी बुद्धिद्वारा मनका निरोध करूँगा। इस प्रकार हम देखते हैं कि बुद्धि इस 'मैं' का कारण है। यह 'मैं' अत्यन्त सूक्ष्म है। यदि हम कुछ काल बुद्धि आदिसे रहित केवल 'मैं' का ही चिन्तन करें तो हमारे सामने 'मैं' और 'मैं' के साक्षीका भेद सुस्पष्ट हो जायगा। इस समय तो 'मैं' और चिदात्माका अन्योन्याध्यास हो रहा है। जिस प्रकार तपे हुए लोहपिण्डमें अग्निरहित लोहपिण्ड और लोहपिण्डरहित अग्निका भान नहीं हो सकता, उसी प्रकार इस समय हमें 'मैं' से रहित चेतन और चेतनरहित 'मैं' की प्रतीति नहीं हो सकती। सुषुप्तिमें 'मैं' का अभाव रहता है। उस समय चिदात्मा 'मैं' के अभावका प्रकाशक है। इस प्रकार वह स्पष्टतया 'मैं' के भाव और अभाव दोनोंहीका प्रकाशक प्रतीत हो रहा है। इसी क्रमसे हम उसे शब्द, स्पर्श, रस और गन्धके चरम अवभासकरूपसे भी निश्चय कर सकते हैं। अतः विषयोंकी अवभासक पंच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं, इन्द्रियोंका अवभासक मन है, मनकी प्रकाशिका बुद्धि है, बुद्धिका प्रेरक अहंकार है और इन मन, बुद्धि, अहंकार सभीका भासक चिदात्मा है। व्यवहारमें देखते हैं कि गन्धाकाराकारितवृत्ति, रूपाकाराकारितवृत्ति, रसाकाराकारितवृत्ति, स्पर्शाकारा- कारितवृत्ति और शब्दाकाराकारितवृत्ति — इन सबमें परस्पर भेद है। इसी प्रकार इनको ग्रहण करनेवाली इन्द्रियोंमें भी भेद है। इनके भेद और अभेदका विवेक करो। इनमें जो भेद है, वही प्रपंच है और जो अभेद है, वही परमार्थ है। उत्पन्न तथा नष्ट होनेवाली गन्धवृत्ति, रसवृत्ति, स्पर्शवृत्ति आदि पृथक् हैं, परंतु उन वृत्तियोंकी उत्पत्ति, स्थिति, नाश तथा उनके स्वरूपोंका भासन करनेवाला अखण्ड बोध या निर्विकार भान सदा एकरस तथा एक ही है। जिस प्रकार नील-पीत-रहित आदि रूपोंका अवभासक सौर आलोक एक ही है, किंतु उसके प्रकाश्य भिन्न हैं, उसी प्रकार दृश्य अनेक हैं और द्रष्टा एक ही है, किंतु नील-पीतादि दृश्योंको प्रकाशित करते समय उनका अवभासक सौर आलोक तद्रूप हो जाता है; उन नील-पीतादिकी सन्धिमें जो उसका निर्विशेष रूप रहता है, वही उसका शुद्ध स्वरूप है। इसी बातको पंचदशीकारने एक अन्य दृष्टान्तद्वारा इस प्रकार स्पष्ट किया है — खादित्यदीपिते कुड्ये दर्पणादित्यदीप्तिवत् । कूटस्थभासितो देहो धीस्थजीवेन भास्यते ॥ (पंचदशी ८।१) एक स्थानपर कई दर्पण रखे हुए हैं। उनमें सूर्यकी किरणें पड़कर फिर समीपस्थ भित्तिपर प्रतिफलित हो रही हैं। वे दर्पणालोक और उनकी सन्धियाँ ये दोनों ही सौर आलोकसे प्रकाशित हैं; किंतु सन्धियाँ केवल सौरलोकसे प्रकाशित हैं और दर्पणालोक दर्पणमें पड़े हुए सौरलोकके आभाससे भी प्रकाशित हैं। इसी प्रकार विषयोंकी स्फूर्ति तो चेतन तथा

श्रीरासलीलारहस्य ३०१

अन्तःकरणस्थ चिदाभास दोनोंके योगसे होती है, किंतु उन विषयोंकी सन्धि अर्थात् निर्विषय स्थिति केवल चेतनसे ही भासित होती है। अतः आत्मसाक्षात्कार करनेके लिये पहले हमें शब्द, स्पर्श, रूप, रस एवं गन्धादिकी वासनाओंसे वासित अन्तःकरणद्वारा विषयोंसे हटाकर इन्द्रियोंको स्वाधीन करना होगा। फिर बुद्धिसे मनका और अहंकारसे बुद्धिका संयम करना होगा। तत्पश्चात् अपने स्वरूपभूत साक्षीसे अहंकारको पृथक् निश्चय करनेपर हम अपने शुद्ध स्वरूपका बोध प्राप्त कर सकेंगे। सबसे पहले सम्पूर्ण प्रतीयमान प्रपंचको पृथिवीमात्र चिन्तन करो; घट, पट, गृह, उद्यान आदि सभी वस्तुओंको केवल पृथिवीतत्त्व ही अनुभव करो। फिर इस पृथिवीतत्त्वका जलतत्त्वमें लय करो और सर्वत्र केवल जलतत्त्वको ही व्याप्त देखो। तत्पश्चात् जलको अग्नितत्त्वमें लीन करो तथा सब पदार्थोंको तेजोमय ही देखो। इसी प्रकार फिर उन्हें क्रमशः वायुरूप और आकाशरूप देखो। इस चिन्तनके बढ़नेके साथ क्रमशः गन्धादि विषयोंकी निवृत्ति होती जायगी। वृत्ति प्रायः तेजसे आगे नहीं बढ़ती। वायु और आकाश रूपरहित पदार्थ हैं, इसलिये उनपर दृष्टि जमना बहुत कठिन है। यदि मन वायुतत्त्वमें स्थित हो गया तो उसे अन्धकार और प्रकाशकी भी प्रतीति नहीं होगी; क्योंकि ये दोनों तो तेजके अन्तर्गत हैं। रूपकी निवृत्ति होनेपर तो सारा ही विक्षेप निवृत्त हो जाता है। अब केवल स्पर्श और शब्द रह जाते हैं, स्पर्शकी निवृत्ति होनेपर केवल शब्द ही शेष रहता है। इससे आगे बढ़कर शब्दको देखनेवाले मनमें ही स्थित हो जाओ। फिर तटस्थवृत्तिसे मनकी गतिको देखो और तत्पश्चात् उसे देखनेवालेको देखो। इस प्रकार बुद्धि तुम्हारा दृश्य हो जायगी। बुद्धिका द्रष्टा अहंकार है। इससे आगे अहंकार भी भास्य कोटिमें आ जाना चाहिये। तत्पश्चात् उसकी भी प्रतीति नहीं होगी और केवल सर्वावभासक चिदात्मा ही रह जायगा। इस प्रकार बुद्धि सबके अधिष्ठानभूत केवल आत्मामें ही स्थित हो जाती है; उस समय उसके भास्य शब्द-स्पर्शादि प्रपंचमेंसे कुछ भी प्रतीत नहीं होता। अब हम प्रकृत विषयपर आते हैं। भगवान्‌का उपदेश है—'शुश्रूषध्वं पतीन्' अर्थात् जो सर्वावभासक चिदात्मा जाग्रत् और स्वप्न-अवस्थाओंमें प्रतीत होनेवाले द्वैतका तथा सुषुप्तिमें अनुभव हुए अज्ञानका साक्षी है, तुम उस परम पतिका ही आश्रय लो। अतः तुम नामरूपात्मक प्रपंचकी ओर मत जाओ, बल्कि उसके अवभासक सर्वसाक्षी परमात्माका चिन्तन करो। यदि कहो कि उसमें तो हमारी गति नहीं है, हम किस प्रकार ऐसा करें तो उसके लिये 'शुश्रूषध्वं सतीः।' 'सती' शब्दका अर्थ पहले ही कहा जा चुका है। तात्पर्य यह है कि इसके लिये तुम ब्रह्मविद्यारूपिणी भगवती महामायाकी उपासना करो। देखो, गोपियोंको भी श्रीकात्यायनीदेवीकी उपासना करनेसे ही परब्रह्मस्वरूप भगवान् कृष्णकी प्राप्ति हुई थी। ऐसी ही एक गाथा उपनिषदोंमें आती है। जिस समय देवासुर-संग्राममें परब्रह्म परमात्माके प्रसादसे देवताओंको विजय प्राप्त हुई तो वे भगवान्‌को भूल गये और उस विजयको अपने ही पुरुषार्थका फल मानने लगे। उस समय परम दयालु भगवान् अपने मोहग्रस्त अनुचरोंका व्यामोह दूर करनेके लिये एक विचित्र रूपसे उनके सामने प्रकट हुए। भगवान्‌के उस विचित्र अनन्त प्रकाशमय विग्रहको देखकर देवताओंको बड़ा कुतूहल हुआ और उन्हें यह जाननेके लिये बड़ी उत्सुकता हुई कि यह यक्ष कौन है? यह बात जाननेके लिये सबसे पहले अग्निदेव गये। भगवान्‌ने उनसे पूछा—'तुम कौन हो?' अग्निने बड़े गर्वसे कहा—'मैं अग्नि हूँ, लोग मुझे जातवेदा कहते हैं।' भगवान्‌ने कहा—'तुम क्या कर सकते हो?' अग्निदेवने कहा—'संसारमें जितने पदार्थ हैं, मैं उन सभीको जला सकता हूँ।' तब यक्षभगवान्‌ने उनके आगे एक तृण रखकर कहा—'भला इसे तो जलाओ।' अग्निदेव

३०२ भक्तिसुधा अपना सारा पुरुषार्थ लगाकर हार गये, किंतु वे उसे जलानेमें समर्थ न हुए और इस प्रकार मान-मर्दन हो जानेसे चुपचाप लौट आये। उनके पीछे वायुदेवता गये। किंतु उनकी भी वही गति हुई। वे भी एक क्षुद्र तृणमात्रको उड़ानेमें समर्थ न हुए। इस प्रकार अग्नि और वायुके विफलमनोरथ होकर लौट आनेपर स्वयं देवराज इन्द्र उस यक्षका परिचय प्राप्त करनेके लिये चले। देवराजको देखते ही यक्षभगवान् अन्तर्धान हो गये। इससे इन्द्रको बड़ा परिताप हुआ। वे सोचने लगे—'अहो! मुझे सन्निधानसे उनके दर्शन और सम्भाषणका भी सौभाग्य प्राप्त न हो सका।' जिस समय जीवको भगवद्विरहके कारण परिताप होता है, उसी समय उसे भगवत्साक्षात्कारकी योग्यता प्राप्त होती है। वह क्षण बड़े सौभाग्यसे प्राप्त होता है, जिसमें प्राणी अपने प्रियतमकी विरह- वेदनासे तड़पने लगता है और उसका रोम-रोम भगवद्दर्शनके लिये उत्कण्ठित हो उठता है। देखिये, जिस समय भगवान्के साथ व्रजांगनाओंका संयोग था, उस समय उनकी उपासना उतनी प्रबल नहीं थी; किंतु जब उन्हें भगवान्का वियोग हुआ, तब उनकी लगन इतनी बढ़ी कि उस विरहाग्निने उन्हें केवल इसीलिये नहीं जलाया; क्योंकि उनके हृदयमें भगवान्की प्रेममयी मूर्ति विराजमान थी। उस आनन्द-सुधासिन्धुके कारण ही उनकी रक्षा हुई। इसी भावका वर्णन करते हुए श्रीवल्लभाचार्यजीने यह श्रुति कही है— 'को ह्येवान्यात्कः प्राण्याद् यदेष आकाश आनन्दो न स्यात्।' (तैत्तिरीय० २।७) अर्थात् यदि सहृदय प्रेमियोंके अन्तःकरणोंमें प्रेमानन्दरूप सुधा न होती तो अपने प्रियतमके वियोगमें उनमेंसे कौन चेष्टा करता और कौन प्राण धारण करता ? वे तो तत्काल उस विरहानलमें भस्म हो जाते। अतः यदि भगवान्के वियोगका सन्ताप न हुआ तो यह जीवन व्यर्थ है; भगवान् वाल्मीकि कहते हैं— यश्च रामं न पश्येत्तु यं च रामो न पश्यति। निन्दितः सर्वलोकेषु स्वात्माप्येनं विगर्हते ॥ (वा०रा० २।१७।१४) वस्तुतः यह भगवदर्थ सन्ताप ही परम तप है। इस प्रकार जब इन्द्रने इस सन्ताप-रूप तपसे अपना मनोमल भस्म कर दिया तो उमादेवीका आविर्भाव हुआ। उसीने उन्हें भगवान्का परिचय दिया। अतः स्मरण रखना चाहिये कि यह महावाक्यजनित ब्रह्माकारवृत्तिरूपा उमा ही प्रकट होकर जीवको परब्रह्मके पास ले जाती हैं। अतः हे बुद्धियो! यदि तुम मुझ परब्रह्मके पास आना चाहती हो तो 'शुश्रूषध्वं सतीः' भगवती शक्तिकी उपासना करो अथवा जैसा हम पहले कह चुके हैं, सात्त्विक वृत्तियाँ ही सतियाँ हैं, उन्हें उद्बुद्ध करो। उनके उद्बुद्ध होनेसे जब तुम्हारी राजस-तामस वृत्तियाँ नष्ट हो जायँगी, तभी तुम उन्हें प्राप्त कर सकोगी। अब यदि श्रुतियाँ कहें कि महाराज ठीक है, परंतु यदि हम संसारको छोड़कर अपने परम प्रियतम परब्रह्मका ही अवलम्बन करें, प्रपंचका आश्रयण करना छोड़ दें तो उस अस्पर्शयोगको सुनकर जो बाल-वत्सस्थानीय अज्ञजन हैं, वे रोने लगेंगे; क्योंकि उनके लिये तो संसार ही सब कुछ है। वे तो पुत्र- कलत्र और धन-धामादिको ही अपना सर्वस्व समझते हैं। इसपर भगवान् कहते हैं—'वत्सा बालाश्च क्रन्दन्ति मा' अर्थात् ये वत्स और बालक भी क्रन्दन नहीं करेंगे। क्यों नहीं करेंगे? क्योंकि विवेकीके लिये संसार असत् होनेपर भी उन अविवेकियोंकी दृष्टिमें तो वह सत्य ही रहेगा। 'नष्टमप्यनष्टं तदन्यसाधारणत्वात्' देखो—स्वप्नप्रपंच तो उसीका निवृत्त होगा, जो जागेगा। जो जगा नहीं है, उसके लिये तो स्वप्नका सारा व्यापार सत्य ही होता है। इसी प्रकार यह दृश्य-प्रपंच भी उसीके लिये मिथ्या होगा जो अपने शुद्ध स्वरूपमें जागेगा, उसे तो इसकी निवृत्ति इष्ट ही है। इसके विपरीत अप्रबुद्धके लिये इसकी निवृत्ति होगी नहीं।' भगवान्ने कहा है—

श्रीरासलीलारहस्य ३०३ यथा ह्यप्रतिबुद्धस्य प्रस्वापो बह्वनर्थभृत्। स एव प्रतिबुद्धस्य न वै मोहाय कल्पते॥ (श्रीमद्भा० ३।२७।२५; ११।२८।१४) इसलिये बाल-वत्सस्थानीय अज्ञजन भी क्रन्दन नहीं करेंगे। दूसरी बात यह है कि यदि वे रोयेंगे तो यह बतलाओ कि तत्त्वज्ञान होनेसे पहले रोयेंगे या पीछे? पीछे तो रो नहीं सकते; क्योंकि उस समय तो वे अचिन्त्यानन्द-महार्णव श्रीभगवान्में अभिन्नरूपसे स्थित हो जानेके कारण प्रपंचकी अपेक्षासे ही रहित हो जाते हैं। भला अमृतके समुद्रको पाकर क्षुद्र कूप-तड़ागादिके लिये कौन व्यग्र होता है? और पहले इसलिये नहीं रो सकते कि प्रपंचका मिथ्यात्व सुनकर भी उसपर उनकी निष्ठा नहीं होगी। देखो—यह मनुष्य-शरीर कितना घृणित है? इसके ऊपर यदि चर्म न होता तो इसपर मक्खियाँ भिनकतीं। इसमें क्षणभर भी रहनेकी इच्छा न होती। इस बातको समझनेके लिये विशेष विचारकी भी आवश्यकता नहीं है। इस शरीरमें अस्थि, मांस, रक्त आदि घृणित पदार्थ ही भरे हुए हैं। यह बात बहुत साधारण बुद्धिवाले पुरुषोंको भी सुगमतासे समझायी जा सकती है तो भी हमारे-जैसे अज्ञानियोंकी तो बात ही क्या है, बड़े-बड़े ऋषि-मुनि भी रम्भा-उर्वशी आदि अप्सराओंके उस अत्यन्त घृणित शरीरके ही लावण्यमें फँस गये थे। इस प्रकार सब कुछ जानकर भी उन्हें जो मोह हुआ, वह भगवती महामायाकी ही महिमा है— दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया। मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥ (गीता ७।१४) ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा॥ बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति। (श्रीदुर्गासप्तशती १।५५-५६) अतः भगवान् कहते हैं—यदि तुम संसारका मिथ्यात्व प्रतिपादन करोगी तो भी वे अज्ञजन नहीं रोयेंगे, क्योंकि उनकी तो उसमें गति ही नहीं होगी। अब यह भी सन्देह हो सकता है कि यदि अज्ञानियोंको परोक्षरूपसे भी यह निश्चय हो जायगा कि ऐन्द्रपद आदि अब मिथ्या हैं तो भी वे यज्ञ- यागादिमें प्रवृत्त नहीं होंगे। वस्तुतः ऐसे अनधिकारियोंने ही अद्वैतवादको कलंकित कर रखा है। उन्हें भले ही ब्रह्मका अपरोक्ष साक्षात्कार न हुआ हो तथापि यह तो निश्चय हो ही जाता है कि कर्म नहीं, धर्म नहीं, लोक नहीं और वर्णाश्रमाचार भी नहीं। अतः वे धर्म- कर्मादिको तिलांजलि दे देते हैं। इन अनधिकारियोंके कारण ही अद्वैतवादको कलंकित होना पड़ा है। ऊपरी दृष्टिसे देखा जाय तो अद्वैतवादी और नास्तिकोंमें कोई भेद दिखायी नहीं देगा। मुक्तावस्थामें दृश्यकी व्यर्थता तो नैयायिकोंके मतमें भी हो जाती है। यह ठीक है कि वे उसका मिथ्यात्व स्वीकार नहीं करते; तथापि मुक्त पुरुषको तो उसका विशेष ज्ञान निवृत्त हो जानेके कारण प्रपंचका भान नहीं होता। यही बात सांख्य मतके विषयमें कही जा सकती है। वस्तुतः संसारसे सम्बन्ध छूट जानेपर और प्रभुसे सम्बन्ध जुड़ जानेपर लोक-वेदकी विधि छूट ही जाती है। सब आचार्योंका ऐसा ही मत है। यदा यमनुगृह्णाति भगवान्आत्मभावितः। स जहाति मतिं लोके वेदे च परिनिष्ठिताम्॥ (श्रीमद्भा० ४।२९।४६) और यही नास्तिकोंका भी लक्षण है। देखा जाय तो तत्त्वज्ञ और व्रात्य—इन दोनोंका बाह्य रूप एक ही होता है। देखिये, जिस प्रकार यवनादि शिखा-सूत्रादिसे रहित होते हैं, उसी प्रकार एक परमहंस भी होता है। यही नहीं, भगवान् शंकरको भी 'व्रात्य' कहा गया है—'व्रात्यानां पतये नमः'। इस प्रकार देखा जाय तो एक तत्त्वज्ञका स्वरूप तो अवश्य व्रात्यके समान ही होता है; तथापि उनमें वस्तुतः बहुत अन्तर होता है। उनमेंसे एक तो साधनकोटिको पार कर गया है और दूसरेने उसमें प्रवेश भी नहीं किया। इस समय अवश्य दोनों ही साधनके संसर्गसे रहित हैं। इस प्रकार यज्ञ-यागादिका अनुष्ठान न करनेपर

भी अद्वैतनिष्ठ महात्माको अवैदिक नहीं कहा जा सकता। वस्तुतः वेदका प्रामाण्य माननेवाला तो वही है। वैदिक तो उसीको कहना चाहिये, जो वेदार्थको अबाधित रखे। वेद कहते हैं—'एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म' (पैंगलोपनिषद् १), 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' (तैत्तिरीय० २।१) इत्यादि। अतः जो ब्रह्मको सजातीय, विजातीय एवं स्वगतभेदसे रहित मानते हैं, वे तो ब्रह्मसे भिन्न वेदकी भी सत्ता नहीं मानते। वेदकी पृथक् सत्ता माननेपर तो वेदको सजातीयादि भेदसे रहित सिद्ध नहीं किया जा सकता। अतः ऐसी अवस्थामें वेद अप्रामाणिक हो जाता है। इसलिये अपने प्रामाण्यके लिये वेद स्वतः ही अपना अभाव प्रतिपादन करते हैं— 'अत्र वेदा अवेदा ब्राह्मणा अब्राह्मणाः पुल्कसा अपुल्कसाः।' कार्य जबतक अपने कारणसे भिन्न रहता है, तभीतक उसकी पृथक् उपलब्धि होती है। कारणसे अभिन्न होनेपर उसकी पृथक् प्रतीति नहीं होती। वेद भी ब्रह्मके कार्य हैं—'अस्य महतो भूतस्य निश्श्वसितमेतद्यदृग्वेदः' (बृहदारण्यक० २।४।१०) अतः वस्तुतः वे परब्रह्मसे व्यतिरिक्त नहीं हैं। घटादि तभीतक उपलब्ध होते हैं, जबतक वे अपने कारण मृत्तिकामें नहीं मिलते। उसमें मिल जानेपर उनकी पृथक् प्रतीति नहीं होती। अतः वेदको ब्रह्मसे व्यतिरिक्त न मानना उनका तिरस्कार नहीं है; यह तो उसका सम्मान ही है। जो पुरुष वेदको ब्रह्मसे भिन्न मानता है, उसपर तो वेद कुपित होते हैं और उसे स्वार्थसे भ्रष्ट कर देते हैं। श्रुति स्वयं कहती है— वेदास्तं परादुर्योऽन्यत्रात्मनो वेदान् वेद.... सर्वं तं परादाद् योऽन्यत्रात्मनः सर्वं वेद॥ (बृहदारण्यक० ४।५।७) क्योंकि ब्रह्मसे वियोग होना किसीको इष्ट नहीं है। तुम भी तो परब्रह्मसे वियुक्त होनेके कारण ही तड़प रहे हो। वेदोंको भी भगवान्‌का वियोग कैसे सह्य हो सकता है? फिर तुम उन्हें भगवान्‌से व्यतिरिक्त क्यों समझते हो ? तुम यज्ञयागादि कर्मोंको भगवान्‌से भिन्न क्यों मानते हो? यदि तुम एक अणुको भी ब्रह्मसे पृथक् समझोगे तो वह अवश्य तुम्हारे लिये भय उपस्थित कर देगा। प्रेमी तो अपना भी पृथक् अस्तित्व नहीं रखना चाहता। जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं। कबिरा नगरी एकमें राजा दो न समाहिं॥ यदि हम अपनी पृथक् सत्ता रखेंगे तो ब्रह्ममें वस्तु-परिच्छेद आ जायगा तथा जिस देशमें हम रहेंगे, उसमें ब्रह्म नहीं रहेगा। इसलिये ब्रह्ममें देशपरिच्छेद भी हो जायगा। इसीसे भावुक पुरुष अपनी सत्ता प्रभुको ही समर्पित कर देते हैं; वे प्रभुसे पृथक् रहकर उनके पूर्णत्वको खण्डित करना नहीं चाहते। अतः पहले अपने धन-धान्यादि प्रभुको समर्पण करो, फिर देह समर्पित कर दो और तदनन्तर मन, बुद्धि और प्राण भी प्रभुको ही अर्पण कर दो। परिणाममें तुम भी उन्हींमें समर्पित हो जाओगे। भगवान् कहते हैं— 'निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः ॥' (गीता १२।८) यदि घटाकाश अपनेको महाकाशसे पृथक् समझता है तो जिस देशमें वह अपनी सत्ता मानेगा, उस देशमें उसे महाकाशकी सत्ता अस्वीकार करनी पड़ेगी। इस प्रकार वह महाकाशकी पूर्णताको खण्डित कर देगा। इसीसे घटाकाश कहता है—'मैं अपनी सत्ता रखकर अपने प्रभुकी अपूर्णता नहीं करूँगा। मैं अपनेको भी उन्हें ही समर्पित कर दूँगा।' आत्मसमर्पणरूप अद्वैतदर्शन ही सच्ची पूजा और उत्कृष्टतम भक्ति है यही अद्वैतवादियोंका सिद्धान्त है। वे प्रभुको आत्मसमर्पण भी कर देते हैं। यही उनकी अद्भुत भक्ति है। वे अपने प्रियतमको अपने-आपको भी दे डालते हैं, क्योंकि आत्मा ही सबसे बढ़कर प्रिय है; इसीके लिये प्रत्येक वस्तु प्रिय हुआ करती है— 'आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति।' (बृहदारण्यक० २।४।५) अतः यदि तुम अपनेको परम प्रेमास्पदको

श्रीरासलीलारहस्य ३०५ समर्पण न करके केवल स्त्री, धन और मन आदि ही प्रभुको अर्पण करते हो तो तुम सच्चे प्रेमी नहीं कहे जा सकते। अतः आत्मसमर्पणरूप अद्वैत दर्शन ही सच्ची पूजा है और यही उत्कृष्टतम भक्ति है। हाँ, मूर्ख पुरुषोंके लिये यह सिद्धान्त अवश्य बहुत भयावह है। इस सिद्धान्तके ब्याजसे वे देहको भी ब्रह्म मान सकते हैं। परंतु वस्तुतः यह सिद्धान्त भक्तिका घातक नहीं है। यह तो उसकी चरमावस्था है। किन्हीं महानुभावोंने कहा है कि—‘पहले उपासनाकी भावना करते-करते ऊपर-नीचे सर्वत्र ब्रह्म ही दिखायी देता है। अतः पहले ‘ब्रह्मैवाधस्ताद्ब्रह्मैवोपरिष्टात्’ यह श्रुति ही चरितार्थ होती है। पीछे एक संचारी भावविशेषका अभ्युत्थान होनेपर ऐसा होता है कि जिससे वह अपनेको ही प्रियतमरूपसे देखने लगता है। उसी अवस्थाका प्रतिपादन ‘अहमेवाधस्तादहमुपरिष्टात्’ (छान्दोग्य० ७।२५।१) इस श्रुतिने किया है।’ श्रीगोस्वामी तुलसीदासजीका कथन है— सो अनन्य जाकें असि मति न टरइ हनुमंत। मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत॥ (रा०च०मा० ४।३) ‘श्रवन कथा, मुख नाम, हृदय हरि, ....नयननि निरखि कृपा-समुद्र हरि....।’ (विनय-पत्रिका २०५) इस प्रकार निरन्तर सर्वत्र भगवद्दर्शन ही करना चाहिये। श्रीमद्भागवत (११।२।३५)-में कहा है— यानास्थाय नरो राजन् न प्रमाद्येत कर्हिचित्। धावन् निमील्य वा नेत्रे न स्खलेन्न पतेदिह॥ यही निर्भय मार्ग है। इस मार्गमें चलनेवाला कभी किसी अन्तरायसे आक्रान्त नहीं होता। एष निष्कण्टकः पन्था यत्र सम्पूज्यते हरिः। कुपथं तं विजानीयाद् गोविन्दरहितागमम्॥ इस प्रकार सबको ब्रह्ममय देखते हुए जबतक तुम अपने आत्माको भी ब्रह्मसे अभिन्न न देखोगे, तबतक तुम अपने प्रियतम परब्रह्मकी पूर्णताकी रक्षा नहीं कर सकोगे। अतः तुम अपनेको भी प्रभुमें ही समर्पित कर दो। किंतु वह समर्पण किया कैसे जाय? उसका स्वरूप क्या है? क्या घड़ेमें बेर डालना बेरका समर्पण है? इसका नाम समर्पण नहीं है। समर्पणमें अपनी सत्ता पृथक् नहीं रहती, जिस प्रकार घटाकाशकी सत्ता महाकाशसे पृथक् नहीं है। जिस समय तरंग समुद्रमें लीन होती है, उस समय क्या समुद्रसे पृथक् उसकी उपलब्धि हो सकती है? अतः भगवान्‌से पृथक् अपनी सत्ता न रखना ही उनका सम्मान है। यदि तुम उनसे अपना भेद रखते हो तो तुम उनका अनादर करते हो। भला, जिस पत्नीने अपने पतिको त्याग दिया हो, उसकी कीर्ति हो सकती है? इसी प्रकार यदि जीव अपनेको परब्रह्मसे पृथक् समझे तो उसके लिये इससे बढ़कर और क्या कलंक हो सकता है? ऐसा कलंक तो उसके लिये आत्मघातके समान है; क्योंकि— ‘सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते॥’ (गीता २।३४) इसीलिये उपनिषद् पढ़नेवाले भगवान्‌से प्रार्थना करते हैं—‘माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोत्, अनिराकरणमस्तु’ (केनोपनिषद् शान्तिपाठ)। प्रभु दीर्घकालसे हमारा निराकरण करते आये हैं और हम प्रभुका निराकरण करते आये हैं। इसीसे हमें कीट-पतंगादि योनियोंमें भ्रमना पड़ा है। यह अनिराकरण तो प्रभुकी कृपासे ही होगा। वे ही हमें ऐसी बुद्धि प्रदान कर सकते हैं; क्योंकि ये चरण असत्पुरुषोंको अत्यन्त दुष्प्राप हैं। जिस समय पुरुषोंका संसरण समाप्त होनेको होता है, हे नाथ! तभी आपके श्रीचरणोंमें प्राणियोंको रति होती है। वस्तुतः मायामोहित जीव बरबस प्रभुको भूलकर प्रपंचमें फँसा हुआ है और प्रभुकी उपेक्षा करता है। अतएव ऋषि यही प्रार्थना करता है—हे दयामय! आप ही कृपा करें कि मैं आपका अनादर या उपेक्षा न करूँ। हे दयामय! मायामोहित होकर ही हमने आपका अनादर किया है। अपने अन्तरात्मा प्रियतम सर्वस्वका अपमान मोहसे ही हमने किया है, अतः आप मेरी उपेक्षा न

३०६ भक्तिसुधा करें। इस प्रार्थनाके साथ-साथ आपहीसे यह भी प्रार्थना है कि मैं आपका अनादर न करूँ। अक्रूरजी महाराज कहते हैं— सोऽहं तवाङ्घ्र्युपगतोऽस्म्यसतां दुरापं तच्चाप्यहं भवदनुग्रह ईश मन्ये। पुंसो भवेद् यर्हि संसरणापवर्ग- स्त्वय्यब्जनाभ सदुपासनया मतिः स्यात्॥ (श्रीमद्भा० १०।४०।२८) हे नाथ! आज मैं आपके चरणोंकी शरण आया हूँ, यह भी आपके अनुग्रहका फल है। जबतक प्रभु कृपा न करें, जबतक वे हाथ न लगायें, तबतक हमारी नैया किनारे नहीं लग सकती। श्रीगोसाईंजी महाराजका कथन है— ग्यान-भगति साधन अनेक, सब सत्य, झूठ कछु नाहीँ। (वि०प० ११६) प्रभुकृपाकी प्रतीक्षा करते रहना चाहिये अर्थात् ये सारे साधन हैं तथापि जबतक आपका करावलम्ब न हो, तबतक मेरे किये तो कुछ होना नहीं है। अतः ऐसी बुद्धि तो प्रभुकृपासाध्य है। हमें तो केवल प्रभुकृपाकी प्रतीक्षा करते रहना चाहिये। आखिर जाओगे कहाँ? दर-दर घूमते जन्म-जन्मान्तर बीत गये, कहीं कोई ठिकाना नहीं मिला। अब प्रभुके सिवा और आश्रय ही कहाँ है? तत्तेऽनुकम्पां सुसमीक्षमाणो भुञ्जान एवात्मकृतं विपाकम्। हृद्वाग्वपुर्भिर्विदधन्नमस्ते जीवेत यो मुक्तिपदे स दायभाक्॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।८) भगवान्‌की कृपा कब होती है, इसका कोई निश्चित समय नहीं है। इसलिये हर समय सावधान रहो। ऐसा न हो, तुम्हारी असावधानीमें प्रभुकृपाकी घड़ी यों ही निकल जाय और तुम उससे वंचित ही रह जाओ। मान लो, भगवान् कोई परदानशीन स्वामी हैं और तुम उनके द्वारपर बैठे हो। वे हर समय तो परदेसे बाहर आते नहीं हैं, परंतु जिस समय वे आये उस समय तुम सो गये तो इसमें प्रभुका क्या दोष है? इसलिये तुम सदा सावधान रहो। प्रभु अतिथिका अनादर कभी नहीं करते। वे दीनवत्सल हैं; उन्हें दीन बहुत प्यारे हैं। इसीसे श्रीगोसाईंजी कहते हैं— जाउँ कहाँ तजि चरन तुम्हारे। काको नाम पतित-पावन जग, केहि अति दीन पियारे॥ (वि०प० १०१) इसलिये हमें प्रभुको छोड़कर कहीं अन्यत्र नहीं जाना चाहिये। धनियोंके द्वारोंपर हम बहुत भटक लिये। अब उनका मुख मत देखो। वेदान्तदेशिकाचार्यजी कहते हैं— दुरीश्वरद्वारबहिर्वितर्दिका दुरासिकायै रचितोऽयमञ्जलिः। यदञ्जनाभं निरपायमस्ति मे धनञ्जयस्यन्दनभूषणं धनम्॥ दुरीश्वरोंके द्वारकी बहिर्वितर्दिकापर दुराशाको लेकर जो बैठना है, उसके लिये मैंने हाथ जोड़ दिया; क्योंकि हमारे पास तो धनंजयके रथका अति सुन्दर भूषण अंजनाभ श्रीकृष्ण ही अनपाय धन हैं। फिर हमें औरकी क्या आवश्यकता है? परंतु सो मत जाना; सदा सावधान रहकर प्रभुकी ओर टकटकी लगाये रहना। प्रभुका प्राकट्य बहुत जल्दी-जल्दी हुआ करता है। यहाँ अध्यात्म-प्रेमियोंको तनिक ध्यान देना चाहिये। देखिये, घटाकार वृत्तिकी निवृत्ति हुई और अभी पटाकार वृत्तिका उदय नहीं हुआ। इस सन्धिमें प्रभुकी झाँकी होती है। अज्ञान और उसके कार्य प्रभुके आवरक हैं। विषयको प्रकाशित करनेवाली वृत्तिका नाम प्रमाण है, विषयको प्रमेय कहते हैं और प्रमाणके आश्रयभूत चेतनका नाम प्रमाता है। इनमें एकके न रहनेपर तीनों ही नहीं रहते। किंतु इन तीनोंका और इन तीनोंके अभावका प्रकाशक आत्मा है। इसी भावको यह श्लोक व्यक्त करता है— एकमेकतराभावे यदा नोपलभामहे। त्रितयं तत्र यो वेद स आत्मा स्वाश्रयाश्रयः॥ (श्रीमद्भा० २।१०।९)

श्रीरामलीलारहस्य ३०७ अतः जिस समय प्रमाता एक वृत्ति उत्पादन करके शान्त होता है, उसके पश्चात् दूसरी वृत्ति उत्पन्न करनेसे पूर्व वह विश्राम लेता है। उस विश्रान्तिके समय ही उसके शुद्ध स्वरूपकी उपलब्धि होती है। इसलिये प्रति पल सावधान रहो। निमेषोन्मेष करना भी भूल जाओ। सदा निर्निमेष दृष्टिसे प्रभुकी बाट निहारते रहो। हमें प्रभुका निराकरण नहीं करना चाहिये और प्रभुसे प्रार्थना करनी चाहिये कि वे हमारा निराकरण न करें। इस प्रकार सारे लौकिक-वैदिक कर्मोंको प्रभुसे अभिन्न समझना ही प्रभुकी परमोत्कृष्ट भक्ति है। यह प्रभुका अनादर नहीं है। ब्रह्मज्ञानके अधिकारीका निर्णय किंतु दुराचारियोंने ब्रह्मज्ञानपर कलंक लगा दिया। जो बात सर्वोच्च कोटिकी थी, उसे वे श्रीगणेशमें ही करने लगे। जिसने भगवत्तत्त्वको प्राप्त कर लिया है, वह यदि वैदिक-स्मार्तकर्मोंको छोड़ता है तो ठीक ही है, किंतु जिसने अभी प्रभुकी ओर पदार्पण भी नहीं किया, वह यदि अपने कर्तव्य- कर्मोंको तिलांजलि देता है तो उसका कल्याण अनन्तकोटि जन्मोंमें भी नहीं होगा। जिसे सुधा- समुद्रकी प्राप्ति हो गयी है; वह यदि वापी, कूप, तड़ागादिकी अवहेलना करेगा तो प्यासा मर जायगा ! अतः पहले अपनेको भगवान्‌में समर्पित करो; पहले सबको ब्रह्मरूप देखो, पीछे अपनेको ब्रह्मरूप देखना। यह ठीक है कि अनभिज्ञ लोग ब्रह्मतत्त्वका साक्षात्कार किये बिना ही लौकिक-वैदिक कर्मोंका मिथ्यात्व मान बैठेंगे। किंतु यह उनकी अनधिकार- चेष्टा ही होगी। जिन्होंने श्रौत-स्मार्तकर्मोंका अनुष्ठान नहीं किया; जिन्हें इहामुत्रफलभोगसे वैराग्य नहीं हुआ, जो सदसद्वस्तुका विवेक करनेमें असमर्थ हैं, जिनके पास शमदमादि साधनोंका भी अभाव है और जिन्हें विषयी जनोंकी भोगेच्छाके समान तीव्र मुमुक्षा नहीं है, वे तो ब्रह्मजिज्ञासाके अधिकारी ही नहीं हैं। ऐसे लोगोंको ब्रह्मज्ञानमें प्रवृत्त होनेके लिये तो भगवान् शंकराचार्यने निषेध किया है। श्रीगोसाईंजी महाराज भी कहते हैं— 'बादि बिरति बिनु ब्रह्मबिचारू ॥' (रा०च०मा० २।१७८।४) ऐसे अनधिकारी लोग जब ब्रह्मविद्याकी ओर प्रवृत्त होते हैं, तब वे धर्म, कर्म और पाप-पुण्यादिका तो मिथ्यात्व निश्चय कर लेते हैं, किंतु भोगको सत्य ही मानते हैं। अतः निश्चय हुआ कि 'वत्सा बालाश्च क्रन्दन्ति' यह कथन ठीक ही है। इसीका उत्तर भगवान् देते हैं कि वे नहीं रोयेंगे, क्योंकि इसमें वेद-शास्त्रादिका दोष नहीं है। शास्त्रमें तो सभी प्रकारके साधनोंका निरूपण है। उसमें यह नियम नहीं है कि प्रत्येक व्यक्तिके लिये वे सभी साधन कर्तव्य हैं; उनमें जिसके लिये जो साधन उपयुक्त हो, उसे उसीका आश्रय लेना चाहिये। औषधालयमें सभी प्रकारकी ओषधियाँ रहती हैं। इस बातका निर्णय तो वैद्य ही कर सकता है कि किस रोगीको कौन-सी ओषधि देनी चाहिये। यदि वैद्यकी शरण न लेकर रोगी स्वयं ही मनमानी ओषधि लेने लगे तो इसमें वैद्य या औषधालयका क्या दोष ? यह तो उसीका अपराध है। इसी प्रकार शास्त्रोक्त कौन साधन किसके लिये उपयुक्त है, इसका निर्णय तो श्रोत्रिय और ब्रह्मनिष्ठ गुरु ही कर सकते हैं। अतः आत्मकल्याणकी इच्छा रखनेवाले साधकोंको उन्हींकी शरण लेनी चाहिये। कर्म और उपासनाका समुच्चय शास्त्रमें तो जहाँ कर्मका प्रकरण है, वहाँ ज्ञानकी निन्दा की गयी है और जहाँ ज्ञानका प्रकरण है, वहाँ कर्म और उपासनाकी तुच्छता दिखलायी है। ईशावास्योपनिषद् (९)-कहती है— अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते। ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायाꣳरताः ॥ अर्थात् जो केवल कर्ममें ही तत्पर रहते हैं, वे अदर्शनात्मक अज्ञानमें प्रवेश करते हैं और जो केवल उपासनामें ही लगे हुए हैं, वे तो उनसे भी अधिक अँधेरेमें जाते हैं। किंतु यहाँ जो कर्म और उपासनाकी

३०८ भक्तिसुधा निन्दा की गयी है, वह कर्म या उपासनाके त्यागके लिये नहीं है, बल्कि उनके समुच्चयानुष्ठानका विधान करनेके लिये है। मीमांसकोंका मत है— 'नहि निन्दा निन्द्यं निन्दितुं प्रवर्तते अपितु विधेयं स्तोतुम्।' यदि उपर्युक्त श्रुतिका अभिप्राय कर्म और उपासनाके त्यागमें ही होता तो श्रुत्यन्तरसे जो कर्म और उपासनाका विधान सुना जाता है, वह अप्रामाणिक हो जायगा और इस प्रकार श्रुतिविरोध भी होगा। इसीसे भगवान् शंकराचार्यजी कहते हैं— 'न शास्त्रविहितं किञ्चिदप्यकर्तव्यतामियात्।' अतः इस निन्दाका अभिप्राय कर्म और उपासनाके त्यागमें नहीं, बल्कि उसके समुच्चयकी स्तुतिमें है। इसलिये केवल कर्म या केवल उपासनामें प्रवृत्त न होकर उन दोनोंका साथ-साथ अनुष्ठान करना चाहिये। यदि कर्म और उपासनासे 'अन्धं तमः' की ही प्राप्ति हुआ करती तो 'विद्यया देवलोकः कर्मणा पितृलोकः' ऐसी विधि न होती। यद्यपि कहीं-कहीं त्यागके लिये भी निन्दा की जाती है; जैसे मिथ्या-भाषणादिकी। किंतु यहाँ ऐसा नहीं हो सकता; क्योंकि यहाँ इसकी विधि पायी जाती है। श्रुतिमें ऐसा बहुत देखा जाता है कि कहीं एक वस्तुका विधान और कहीं उसीका निषेध है। आपाततः इसमें बहुत विरोध मालूम होता है। विधि धर्मके लिये होती है और निषेध पापके लिये। एक ही कर्ममें पाप और पुण्य दोनों हो नहीं सकते। किंतु ऐसा देखा जाता है कि 'अग्नीषोमीयं पशुमालभेत' और 'मा हिंस्यात्सर्वभूतानि' इत्यादि वाक्योंमेंसे एक हिंसाका विधान और दूसरा उसका निषेध करता है। इसका तात्पर्य यही समझना चाहिये कि यागोपयुक्त हिंसाका निषेध नहीं है और यागानुपयुक्त हिंसाका निषेध किया गया है। अर्थवादका आपाततः प्रतीयमान अर्थ नहीं लिया जाता। पूर्वमीमांसक तो अर्थवादका स्वार्थमें तात्पर्य ही नहीं मानते। उत्तरमीमांसकोंका विचार दूसरा है। वे अर्थवादके तीन भेद मानते हैं—भूतवाद, गुणवाद और अनुवाद। जो मानान्तर सिद्ध अर्थका प्रतिपादन करता है, उसे अनुवाद कहते हैं; जैसे—'अग्निर्हिमस्य भेषजम्।' जो मानान्तरसे विरुद्ध अर्थका प्रतिपादन करता है, उसे गुणवाद कहा जाता है; जैसे 'आदित्यो यूपः' और जो मानान्तरसे अविरुद्ध और मानान्तरसे असिद्ध अर्थका प्रतिपादन करता है, उसे भूतवाद कहते हैं; जैसे 'वज्रहस्तः पुरन्दरः।' प्रस्तुत अर्थवाद गुणवाद है; क्योंकि वह श्रुत्यन्तरसे विहित कर्म और उपासनाकी निन्दा करता है अर्थात् मानान्तरसे विरुद्ध अर्थका प्रतिपादन करता है। किंतु यहाँ जो कर्म और उपासनाके फलको अन्धंतम कहा है, वह सापेक्ष है। इस प्रसंगमें महाभारतकी एक कथाका स्मरण होता है। एक ब्राह्मण गायत्रीका जप किया करता था। उसकी प्रौढ़ जपनिष्ठासे प्रसन्न होकर गायत्रीदेवी उसके सम्मुख प्रकट हुईं। देवीने उस ब्राह्मणदेवताको वर दिया कि जापकको जिस नरककी प्राप्ति होती है, वह तुम्हें न मिले। जापकको नरक मिलता है—यह बात बड़ी कुतूहलजनक मालूम होती है। परंतु इसका तात्पर्य दूसरा है। यहाँ ब्रह्मलोकको ही 'नरक' कहा गया है; क्योंकि विशुद्ध ब्रह्मकी अपेक्षा ब्रह्मलोक निकृष्ट ही है। अतः उसे नरक कहा जाय तो अनुचित न होगा। इसी प्रकार यहाँ जो अदर्शनात्मक तम कहा है, वह मोक्षपदकी अपेक्षासे ही है। उपासनासे और भी अधिक 'अन्धं तमः' की प्राप्ति बतलायी, इसका कारण यह है कि उपासना मानस कृत्य है; सर्वसाधारणके लिये यह भी सुगम नहीं है। भला, जिन लोगोंके हस्तपादादि देहावयव भी सुसंयत नहीं हैं, वे उस मानव-व्यापारको ठीक-ठीक कैसे निभा सकेंगे? कर्म करनेसे कर्मेन्द्रियाँ और ज्ञानेन्द्रियाँ सुसंयत होती हैं; क्योंकि कर्मकाण्डमें प्रत्येक चेष्टा नियमबद्ध है। खाना, पीना, सोना, बोलना सभी नियमित रूपसे ही करना पड़ता है। वैदिक कर्मोंका अनुष्ठान करते समय जिस कर्मके लिये जैसी विधि है, उससे तनिक भी इधर-उधर होनेपर प्रायश्चित्त करना पड़ता है।