भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 304, कुल 778 में से
संदर्भ में पढ़ेंथे, उन्होंने 'नष्टाश्वरथदग्धन्याय'* से परस्पर एक- दूसरेकी कार्यसिद्धि की। अर्थवादने विधिकी स्तुति करके विधिमें रुचि उत्पन्न की और विधिने अर्थवादको अपने फलसे फलवान् बना दिया। इसी प्रकार मन्त्रोंकी सार्थकताके विषयमें भी प्रश्न होनेपर उनका उपयोग द्रव्य और देवताओंके स्मारक होनेमें है, यह समाधान किया जाता है। इस तरह विधि, निषेध, अर्थवाद और मन्त्र— इन सभीका प्रामाण्य क्रियापरत्वेन ही है। इसीसे भगवान् श्रुतिस्वरूपा व्रजांगनाओंसे कहते हैं कि अपने प्रामाण्यके लिये तुम अपने समुदायका ही अनुगमन करो। जिस प्रकार तुम्हारा समुदाय क्रियापरक है, उसी प्रकार तुम भी क्रियापरक हो जाओ, शुद्ध चैतन्यरूप सिद्ध वस्तुका प्रतिपादन मत करो। यदि कहा जाय कि हमारा अप्रामाण्य हो जाने दो तो ऐसा कथन भी ठीक नहीं; क्योंकि तुम सती— अपौरुषेय होनेसे सर्वदोष-विवर्जित हो, तुम्हें मीमांसकोंका संग छोड़ना उचित नहीं है। कुछ 'द्यावाभूमी जनयन् देव एकः' (यजु० १७।१९) इत्यादि श्रुतियाँ कह सकती हैं कि मीमांसक तो हमारे स्वार्थका ही अपलाप करते हैं, क्योंकि वे हमारे सर्वस्व परब्रह्मकी सत्ता ही स्वीकार नहीं करते, फिर हमीं उनकी अपेक्षा क्यों करें? परंतु यह विचार ठीक नहीं है। मीमांसक जो ईश्वरका खण्डन करते हैं, वे केवल वेदनिर्मातृत्वेन उसे स्वीकार नहीं करते; क्योंकि नैयायिकोंके मतानुसार अनुमानसिद्ध सर्वज्ञ ईश्वरकृत होनेके कारण वेदोंका प्रामाण्य है और इधर ईश्वरके सर्वज्ञत्वका ज्ञान भी वेदसे ही होता है। इस प्रकार वेद और ईश्वर इन दोनोंमें अन्योन्याश्रय दोषकी प्राप्ति होती है। इसके सिवा एक दोष यह भी है कि जिन युक्तियोंसे अनुमान करके नैयायिक वेदनिर्माता ईश्वरका सर्वज्ञत्व सिद्ध करते हैं, उन्हीं युक्तियोंसे बौद्ध, ईसाई और यवन लोग अपने धर्मग्रन्थोंके निर्माताओंको सर्वज्ञ सिद्ध कर सकते हैं। वेदान्त-दर्शनके मतमें भी ईश्वरकी सिद्धि अनुमानसे नहीं, बल्कि शास्त्रसे ही होती है; जैसा कि 'शास्त्रयोनित्वात्' (वेदान्त- दर्शन १।१।३), 'तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि', (बृहदारण्यक० ३।९।२६) एवं 'वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः' (गीता १५।१५) इत्यादि वाक्योंसे सिद्ध होता है। वेदोंकी अपौरुषेयता इसीसे शास्त्ररक्षकका आदर भगवान् भी करते हैं। वे कहते हैं—'विप्रप्रसादाद्धरणीधरोऽहम्।' अतः मीमांसक लोग वेदका प्रामाण्य ईश्वरकृत होनेके कारण नहीं मानते। बल्कि अपौरुषेय होनेके कारण मानते हैं। इसीसे उन्होंने जो ईश्वरका खण्डन किया है। वह इसीलिये है कि उन्हें ईश्वरनिर्मितत्वेन वेदका प्रामाण्य इष्ट नहीं है। वह स्वतःप्रमाण है। उत्तरमीमांसा और पूर्वमीमांसाका यह सिद्धान्त है कि प्रमाण स्वतःप्रमाण हुआ करता है; उसका अप्रामाण्य परतः होता है। यदि प्रमाणका प्रामाण्य परतः माना जायगा तो जिस प्रमाणसे उसका प्रामाण्य सिद्ध किया जायगा, उसके प्रामाण्यकी सिद्धिके लिये किसी तीसरे प्रमाणकी अपेक्षा होगी और उनके प्रामाण्यके लिये चौथे प्रमाणकी आवश्यकता होगी। इस प्रकार अनवस्थाका प्रसंग उपस्थित हो जायगा। वेदातिरिक्त अन्य ग्रन्थोंका भी प्रामाण्य तो स्वतः सिद्ध है, किंतु पौरुषेय और सादि होनेके कारण उनका अप्रामाण्य परतः है। उनका पौरुषेयत्व और सादित्व तो उन्हींसे सिद्ध होता है। कोई भी पुरुष सर्वज्ञ नहीं हो सकता; अन्यथा अनेक सर्वज्ञ मानने पड़ेंगे। यदि अनेक सर्वज्ञ माने जायँ तो उनके कथनमें विरोध नहीं होना चाहिये। परंतु ऐसी बात है नहीं; जीवमात्रमें अल्पज्ञत्व, सातिशयत्व और करणापाटव आदि दोष रहते ही हैं। इसलिये उनके रचे हुए ग्रन्थ भी प्रामाणिक नहीं हो सकते।
- दो राजा वनमें गये हुए थे। उनमेंसे एकका घोड़ा मर गया और दूसरेका रथ नष्ट हो गया। वे आपसमें मिल गये। उनमेंसे एकने अपना रथ दिया और दूसरेने घोड़ा। इस प्रकार परस्पर मिलकर वे उस वनसे निकलकर सकुशल नगरमें पहुँच गये। इसे 'नष्टाश्वरथदग्धन्याय' कहते हैं।