भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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श्रीरासलीलारहस्य २९३

मीमांसक कह सकता है कि विधिके साथ एकवाक्यतापन्न होकर विधिविहित अर्थकी स्तुति करनेमें अर्थवादका उपयोग होता है; इसी तरह ये सार्थक हो सकते हैं। किंतु वेदाध्ययनसे घृतकुल्या, पयःकुल्या आदि अदृष्ट फलकी कल्पना करनेकी क्या आवश्यकता है ? इससे तो वेदार्थज्ञानरूप दृष्ट फल ही प्राप्त हो जाता है और दृष्ट फलके रहते हुए अदृष्ट फलकी कल्पना करना व्यर्थ है। इसपर शंका होती है कि यदि ऐसी बात है तो वेदार्थ-ज्ञान स्वतन्त्रतासे स्वयं वेदाध्ययन कर लेनेसे ही हो सकता है; उसके लिये ‘स्वाध्यायोऽध्येतव्यः’ इस वाक्यसे आचार्यपरम्परापूर्वक अध्ययन करनेकी ही विधि क्यों की गयी है ? उत्तरमें कहा जा सकता है कि गुरुपरम्परापूर्वक अध्ययन करनेसे वेद संस्कृत होता है और संस्कृत वेद ही यज्ञ-यागादिमें उपयोगी है। इसलिये यह विधि सार्थक है। वेदाध्ययनसे वेदार्थ-ज्ञानकी निष्पत्ति तो अन्वय-व्यतिरेकसे स्वतः सिद्ध है। जिस प्रकार भोजन करनेवाले पुरुषको तृप्ति हो ही जाती है, उसी प्रकार जो कोई वेदाध्ययन करेगा, उसे वेदार्थज्ञान होगा ही। इसमें विधि की आवश्यकता नहीं है। विधिकी सार्थकता अप्राप्त विषयका प्रतिपादन करनेमें ही होती है। जिस प्रकार तण्डुलनिष्पत्ति नखविदलनसे भी हो सकती है और मुसलावहननसे भी। किंतु यागादिमें मुसलावहनन ही करना चाहिये; इसीलिये ‘व्रीहीनवहन्ति’ यह विधि की गयी है। इसका फल अदृष्ट होता है। इसी प्रकार वेदार्थका ज्ञान गुरुसे अध्ययन करनेपर भी हो सकता है और व्युत्पन्नमति पुरुषोंको स्वयं अपने बुद्धिबलसे भी हो सकता है। इसीसे यह विधि की गयी है कि ‘स्वाध्यायोऽध्येतव्यः’ अर्थात् गुरुपरम्परासे ही अध्ययन करना चाहिये। इसीसे वेदाध्ययन सार्थक होगा। वेदाध्ययनसे वेदार्थका ज्ञान होगा, तब वेदार्थका अनुष्ठान किया जायगा और उससे स्वर्गादिकी प्राप्ति होगी। इस प्रकार दृष्ट फलके साथ वह अदृष्ट फलका भी जनक होगा। ‘आम्नायस्य क्रियार्थत्वादानर्थक्यमतदर्थनाम्’ इस सूत्रके अनुसार अर्थवादकी सार्थकता न होनेसे अर्थवाद उत्तप्त हो रहा है और इसी प्रकार विधि भी उत्तप्त है; क्योंकि स्वभावतः विधिमें लोगोंकी प्रवृत्ति नहीं होती। उसमें प्रवृत्ति होनेके लिये उसकी स्तुतिकी आवश्यकता है। पहले यह पद्धति थी कि बड़े-बड़े राजा लोग सभाएँ कराया करते थे। उनमें शास्त्रार्थ होता था। वहाँ जो विद्वान् विजयी होता था, उसका बहुत आदर-सत्कार किया जाता था। उस सम्मानके प्रलोभनसे ही विद्वान् लोग न्याय, मीमांसा आदि शुष्क विषयोंका भी अध्ययन करते थे। इस प्रकार जिस कर्मकी महत्ता सत्पुरुषोंमें प्रसिद्ध होती है, उसीमें लोगोंकी प्रवृत्ति हुआ करती है। वैदिक एवं स्मार्त कर्मोंमें भी लोगोंकी तभी प्रवृत्ति हो सकती है, जब लोग उन कर्मोंको करनेवालोंका आदर करें। ऐसा तो कोई विरला ही विद्वान् होता है, जो आदर आदिकी अपेक्षा न रखकर कर्तव्य-बुद्धिसे ही शास्त्र-रक्षा करे। यह बात अवश्य है कि ऐसे महानुभावोंका भी सर्वथा अभाव नहीं है। इस समय यद्यपि अश्वमेध, राजसूय एवं अग्निष्टोम आदि यज्ञोंको कोई नहीं पूछता तो भी ऐसे भी ब्राह्मण हैं, जिन्होंने शुष्क इष्टियोंद्वारा अश्वमेधादि कृत्योंका अभ्यास किया है और आवश्यकता पड़नेपर वे उनका अनुष्ठान करा सकते हैं। शास्त्र कह रहे हैं—‘अहरहः सन्ध्यामुपासीत’, ‘अग्निहोत्रं जुहुयात्’, ‘स्वाध्यायोऽध्येतव्यः।’ किंतु इन विधिवाक्योंसे प्रेरित होकर आज कितने आदमी उनका पालन करते हैं ? किंतु जनतामें हरिनाम- संकीर्तनकी थोड़ी-सी महिमा प्रसिद्ध होनेके कारण उसका प्रचार दिनों-दिन बढ़ रहा है। इससे सिद्ध हुआ कि विधिमें प्रवृत्ति होनेके लिये उसकी स्तुतिकी आवश्यकता है। अतः इधर अर्थवाद अपनी सार्थकताके लिये और विधि अपनेमें प्रवृत्ति होनेके लिये उत्तप्त