भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२९२ भक्तिसुधा हमें सृष्टि-प्रतिपादक वाक्योंका सीधा-सादा अर्थ छोड़कर ब्रह्ममें ही तात्पर्य मानना पड़ेगा। अतः हे श्रुतियो! तुम इधर परब्रह्मके प्रतिपादनका प्रयत्न क्यों करती हो? जाओ साध्यसाधनरूप प्रपंचका ही प्रतिपादन करो। इसमें विशेष प्रयास भी नहीं है। देखो, 'कदाचनस्तरीरसि नेन्द्र सश्चसि दाशुषे' यह श्रुति स्पष्टतया इन्द्रका ही प्रतिपादन करती है; इसी प्रकार कोई श्रुति पुरोडाशकी स्तुति करती है; जैसे—'स्योनं ते सदनं कृणोमि घृतस्य धारया सुशेवं कल्पयामि, तस्मिन् सीद अमृते प्रतितिष्ठ व्रीहीणां मेध सुमनस्यमानः।' श्रुतियोंका जो शब्दार्थ होता है, वह आपाततः ही प्रतीत हो जाता है—'औत्पत्तिकस्तु शब्दस्यार्थेन सम्बन्धः' इस वाक्यके अनुसार शब्द और अर्थका सम्बन्ध स्वाभाविक है। अतः जिन इन्द्र, वरुण, वायु आदि देवताओंका श्रुतियाँ आपाततः प्रतिपादन कर रही हैं, वे ही श्रुतियोंके पति हैं, उन्हींकी तुम सेवा करो; परपुरुषरूप निर्विशेष ब्रह्मका आश्रय मत लो। यहाँ जो 'सतीः' शब्दमें द्वितीया है, वह प्रथमाके अर्थमें है। इसका तात्पर्य यह है कि 'पतीन् शुश्रूषध्वं यस्माद्ययं सत्यः'—तुम पतियों (अपने प्रतिपाद्य देवताओं)-की सेवा करो; क्योंकि तुम सती हो और यदि 'सतीः' शब्दको द्वितीयान्त ही माना जाय तो इस वाक्यका अर्थ होगा—'सतियोंकी सेवा करो'। सतियाँ वे श्रुतियाँ हैं, जो अपने प्रतिपाद्य देवताओंका ही प्रतिपादन करती हैं, परब्रह्मतक नहीं दौड़तीं। तुम उन्हींका अनुगमन करो; क्योंकि मीमांसकोंका जबरदस्त आग्रह है कि 'आम्नायस्य क्रियार्थत्वादानर्थक्यमतदर्थानाम्' अर्थात् 'वेद क्रियार्थ है, इसलिये जो वाक्य क्रियार्थ नहीं हैं, उनका कोई प्रयोजन नहीं है।' मीमांसकोंका मत है कि विधि-निषेधरूपसे क्रियापरक होनेपर ही वाक्यकी सार्थकता है। विधि- वाक्य इष्टप्राप्तिका उपदेश करनेके कारण सार्थक है; जैसे—'ज्वरितः सन् पथ्यमश्नीयात्' (ज्वरग्रस्त होनेपर पथ्य भोजन करे), इसी प्रकार 'अग्निहोत्रं जुहुयात्', 'स्वर्गकामो यजेत्' आदि वाक्योंकी अर्थवत्ता है तथा निषेधवाक्य अनिष्ट-परिहारका उपाय उपदेश करनेके कारण सार्थक है, जैसे— 'सर्पाय अङ्गुलिं न दद्यात्' (सर्पको अंगुली मत पकड़ाओ)। इसी प्रकार 'ब्राह्मणो न हन्तव्यः' आदि वाक्य समझने चाहिये। परंतु 'यह राजा जाता है', 'पृथ्वी सात द्वीपोंवाली है' इत्यादि सिद्ध-वस्तु- प्रतिपादक वाक्य और 'वायुर्वे क्षेपिष्ठा देवता' (वायु शीघ्रगामी देवता है) इत्यादि अर्थवाद किसी क्रियामें उपयोगी न होनेके कारण व्यर्थ हैं। जो हितका उपदेश करे, वह शास्त्र है अब यहाँ सन्देह किया जा सकता है कि अर्थवादको सार्थक न माननेपर तो उसका शास्त्रत्व ही सिद्ध नहीं हो सकता, क्योंकि 'शिष्यते हितमुपदिश्यतेऽनेन इति शास्त्रम्' इस लक्षणके अनुसार शास्त्र उसीको कहते हैं, जो हितका उपदेश करता है; जिस उक्तिका कोई प्रयोजन नहीं होता, उसे शास्त्र नहीं कहा जा सकता, वह तो उन्मत्तप्रलापवत् उपेक्षणीय ही होती है। वाचस्पतिमिश्रका कथन है— 'प्रतिपित्सितं त्वर्थं प्रतिपादयन् प्रतिपाद- यितावधेयवचनो भवति। अप्रतिपित्सितन्तु प्रतिपाद- यन्नायं लौकिको नापि परीक्षक इत्युन्मत्तवदुपेक्ष्यः स्यात्।' किंतु वस्तुतः अर्थवादका अशास्त्रत्व माना नहीं गया; क्योंकि 'स्वाध्यायोऽध्येतव्यः' इस विधिसे स्वाध्यायपदवाच्य समस्त वेदराशिका [आचार्य- परम्परासे] अध्ययन करनेका विधान किया गया है। समस्त वेदराशिके अन्तर्गत तो अर्थवाद भी है ही और गुरुपरम्परापूर्वक वेदाध्ययनका 'घृतकुल्या पयःकुल्यादि' की प्राप्तिरूप अदृष्ट फल भी बतलाया गया है। इसके सिवा श्रौतसूत्रकार कर्काचार्यजी भी कहते हैं कि 'वेदे मात्रामार्त्रास्याप्यानर्थक्यं न वक्तुं शक्यम्' अर्थात् वेदमें एक मात्राकी व्यर्थता नहीं बतलायी जा सकती। अतः मीमांसकको अर्थवादकी सार्थकता अवश्य बतलानी चाहिये।