भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 301, कुल 778 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्राप्त हुआ है। इसी प्रकार अन्य गोपांगनाओंको उन यूथेश्वरियोंकी सेवा करनेसे ही उसकी प्राप्ति हो सकती है। अतः उन्हें उन्हींका आश्रय लेना चाहिये। किंतु इसके लिये ब्रजमें जानेकी क्या आवश्यकता थी? इसका कारण बतलाते हैं— 'क्रन्दन्ति वत्सा बालाश्च तान् पाययत दुह्यत।' (श्रीमद्भा० १०।२९।२२) यह ऐसी ही बात है जैसे 'मामनुस्मर युध्य च।' (गीता ८।७) इधर अपनी प्राप्तिके लिये भगवान् उन्हें यूथेश्वरियोंकी सेवा करनेका आदेश देते हैं और उधर इसके साथ ही बालकोंको दुग्धपान कराने और गोदोहन करनेकी भी आज्ञा दे रहे हैं। इससे सर्वसाधारणके लिये भगवान्का यही मत प्रतीत होता है कि उन्हें निरन्तर भगवत्स्मरण करते हुए अपने लौकिक और वैदिक कर्तव्योंका भी यथावत् पालन करते रहना चाहिये। स्त्रियोंके लिये बालकोंको दुग्धपान कराना आदि गृहकृत्य धर्म ही है। जिस प्रकार क्षत्रियोंके लिये युद्ध और वैश्योंके लिये व्यापार कर्तव्य है, उसी प्रकार स्त्रियोंको सब प्रकारके गृहकृत्योंको सुचारु रूपसे सम्पन्न करते रहना चाहिये। इधर 'क्रन्दन्ति वत्सा बालाश्च तान् पाययत दुह्यत' इस वाक्यसे अन्य जीवरूप स्त्रियोंके लिये भगवान्का यह उपदेश है कि जब तुम मेरी ओर आने लगते हो तो ये अज्ञानी इन्द्रियाधिष्ठाता देवगण अपने पशुको अपने अधिकारसे बाहर जाता देखकर 'क्रन्दन्ति'—चिल्लाने लगते हैं। ये विघ्न करनेमें समर्थ हैं, इसलिये उस साधकके मार्गमें तरह-तरहके विघ्न उपस्थित कर देते हैं। श्रीमद्भागवत (११।४।१०)-में कहा है— 'त्वां सेवतां सुरकृता बहवोऽन्तरायाः स्वौको विलङ्घ्य परमं व्रजतां पदं ते।' देवता लोग नहीं चाहते कि यह प्राणी उनके पंजेसे निकलकर भगवद्धाममें प्रवेश करे। श्रुति भगवती कहती है 'नैतद्देवानां प्रियं यदैतन्मनुष्या विद्युः' अतः ऐसी परिस्थिति होनेपर ये बालक और वत्सरूप देवगण क्रन्दन करने लगते हैं। बाल अज्ञको कहते हैं। देवता लोग भोगप्रधान हैं, अभोक्ता आत्मतत्त्वमें उनकी गति नहीं है, इसलिये वे 'बाल' हैं तथा ऐसी पाशविक प्रवृत्तिके कारण ही उन्हें 'वत्साः' कहा गया है। देवताओंको 'असुर' भी कहा गया है— 'असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसावृताः।' (ईशावास्य० ३) 'असु' शब्दका अर्थ प्राण है; 'असुषु रमन्त इति असुराः' इस व्युत्पत्तिके अनुसार देवताओंको असुर कहा गया है, क्योंकि उनकी प्रवृत्ति प्राणादि अनात्माके पोषणमें ही है। जिस समय देवासुर-संग्राममें देवताओंको विजय प्राप्त हुई तो वे भगवान्को भूलकर अभिमानवश उसे अपना ही पुरुषार्थ समझने लगे। वे इस बातको भूल गये कि हमारे देह, इन्द्रिय एवं अन्तःकरण आदि सभी जड़ हैं। सर्वान्तर्यामी श्रीहरिकी प्रेरणाके बिना उनमें कुछ भी गति नहीं हो सकती। ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति। भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया॥ (गीता १८।६१) इस प्रकार देवताओंको मोहवश असुरभावको प्राप्त होते देखकर भगवान्ने उनका मानमर्दन किया और तब उनकी आँखें खुलीं। परंतु देवताओंका यह असुरत्व सापेक्ष है। जो लोग जगन्मोहिनी मायाके अधिकारको पार कर गये हैं, जिनका बुद्ध्यादिमें आत्मत्वाभिनिवेश सर्वथा गलित हो गया है और जिन्हें निखिल प्रपंच अपने स्वरूपभूत चिदाकाशमें प्रतीत होते हुए तलमलिन्यके समान सर्वथा असत् अनुभव होता है, उन तत्त्वनिष्ठ जीवन्मुक्तोंकी अपेक्षासे ही वे 'असुर' हैं। अन्य मनुष्यों एवं असुरोंकी अपेक्षा तो वे 'सुर' ही हैं। वस्तुतः सारा विवाद व्यष्टि-अभिमानमें ही है। व्यष्टि-अभिमानके कारण ही जीव अपनेको पण्डित, बुद्धिमान्, ऐश्वर्यशाली, सुखी, दुःखी अथवा अशक्त समझता है। यदि इस परिच्छिन्नत्वाभिमानको छोड़कर समष्टिमें आत्मबुद्धि हो जाय तो फिर कोई विवाद