भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 300, कुल 778 में से
संदर्भ में पढ़ेंगोलोक ले जाती है। अश्वत्थ वृक्ष स्वयं स्थावर है, किंतु अपनी पूजा करनेवालेका कल्याण कर सकता है। इसी प्रकार ब्राह्मण यद्यपि शरीरदृष्टिसे अस्थिमांस एवं चर्मरूप ही है तो भी अपनेमें श्रद्धा रखनेवालेके लिये तो सब प्रकारके मंगलका ही कारण होता है। ब्राह्मण यदि दुराचारी भी हो तो भी पूजनीय है। श्रीगोसांईजी महाराज कहते हैं— पूजिअ बिप्र सील गुन हीना। सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना॥ (रा०च०मा० ३।३४।२) ऐसी ही बात एक स्मृतिमें भी कही गयी है— दुःशीलोऽपि द्विजः पूज्यः न तु शूद्रो जितेन्द्रियः। कः परित्यज्य गां दुष्टां दुहेच्छीलवतीं खरीम् ॥ भगवान् कृष्ण कहते हैं— न ब्राह्मणान्मे दयितं रूपमेतच्चतुर्भुजम्। सर्ववेदमयो विप्रः सर्वदेवमयो ह्यहम् ॥ (श्रीमद्भा० १०।८६।५४) यह बात सुशिक्षित और सदाचारसम्पन्न ब्राह्मणोंके लिये ही कही गयी हो, ऐसी बात नहीं है। भगवान्का तो यह कथन है कि— ब्राह्मणो जन्मना श्रेयान् सर्वेषां प्राणिनामिह। तपसा विद्यया तुष्ट्या किमु मत्कलया युतः ॥ (श्रीमद्भा० १०।८६।५३) किंतु इससे यह नहीं समझना चाहिये कि गुणहीन ब्राह्मण स्वयं भी कल्याणका पात्र हो सकता है। उसे स्वयं तो नरक ही भोगना पड़ेगा। उसकी अपेक्षा तो स्वधर्मनिष्ठ शूद्रकी ही सद्गति होनी अधिक सम्भव है। इसी भावको लक्ष्यमें रखकर श्रीमद्भागवत (७।९।१०)-में कहा है— 'विप्राद् द्विषड्गुणयुतादरविन्दनाभपादारविन्द- विमुखाच्छ्वपचं वरिष्ठम्। मन्ये....॥' इस प्रकार श्रीमद्भागवतमें कहीं तो गुणहीन ब्राह्मणको भी सर्वथा पूजनीय बतलाया गया है और कहीं भगवद्भक्तिहीन द्वादश-गुण-विशिष्ट ब्राह्मणकी अपेक्षा भगवच्चरणानुरागी श्वपचकी उत्कृष्टता दिखलायी गयी है। आजकल ब्राह्मण लोग तो प्रशंसापरक वाक्योंको लेकर अपनी पूजनीयताका दावा करते हैं और अब्राह्मण लोग निन्दापरक वाक्योंको लेकर उन्हें नीचा दिखानेका प्रयत्न करते हैं। परंतु बात बिलकुल उल्टी है। वस्तुतः ब्राह्मणोंको तो यह चाहिये कि अपने ब्राह्मणत्वका अभिमान छोड़कर निन्दापरक वाक्योंके अभिप्रायानुसार भगवद्भक्ति और शास्त्रानुमोदित आचरणको ग्रहण करें तथा अब्राह्मणोंको यह उचित है कि ब्राह्मणोंके गुणदोषकी ओर न देखकर ब्राह्मणमात्रमें श्रद्धा रखें; क्योंकि शास्त्रमें जहाँ आचारहीन ब्राह्मणकी निन्दा की गयी है, वह उनके कल्याणकी दृष्टिसे है और जहाँ उनकी प्रशंसा की गयी है, वह ब्राह्मणेतर वर्णोंकी ब्राह्मणमात्रके प्रति श्रद्धा परिपक्व करनेके लिये है। संसारमें शास्त्रज्ञ होना सरल है, परंतु अपने परम प्रेमास्पद प्रभुको स्वानुकूल कर लेना परम दुर्लभ है। किंतु भूषण यही है। पत्नी बड़ी रूपवती हो और तरह-तरहके वस्त्रालंकारोंसे सुसज्जिता हो, परंतु यह उसका भूषण नहीं है। उसकी वास्तविक शोभा तो इसीमें है कि वह अपने प्राणाधार प्रियतमको अपने अनुकूल बना ले। इसी प्रकार शास्त्रज्ञोंका भूषण भी यही है कि वे परम प्रभु श्रीपरमात्माको अपने अनुकूल कर लें। जहाँ भगवान् रहते हैं, वहीं सारे गुण रहते हैं; अतः यदि भगवान् प्रसन्न हो गये तो मानो सर्वगुणसम्पन्नता प्राप्त हो गयी। इसीसे 'पतीन् शुश्रूषध्वम्' ऐसा कहा है और इस पतिशुश्रूषाका प्रकार समझनेके लिये 'शुश्रूषध्वं सतीः' यह कहा है। यहाँ व्रजांगनाओंके लिये 'सतीः' शब्दसे क्या विवक्षित होगा ? उनके लिये जो भिन्न यूथेश्वरियाँ हैं, वे ही सती हैं। उनकी शुश्रूषा करनेसे ही वे अचिन्त्यानन्दसुधासिन्धु भगवान्के सौन्दर्य एवं माधुर्य रसका समास्वादन कर सकेंगी; क्योंकि वे यूथेश्वरियाँ भगवान्को स्वाधीन करना जानती हैं। भगवान्का यह उपदेश पहले भी है कि यहाँ जो आह्लादिनीशक्तिस्वरूपा श्रीराधेश्वरी हैं, उनके कृपाकटाक्षसे ही यूथेश्वरी व्रजबालाओंको भगवान्को स्वाधीन करनेका सामर्थ्य