भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
थे, उन्होंने 'नष्टाश्वरथदग्धन्याय'* से परस्पर एक- दूसरेकी कार्यसिद्धि की। अर्थवादने विधिकी स्तुति करके विधिमें रुचि उत्पन्न की और विधिने अर्थवादको अपने फलसे फलवान् बना दिया। इसी प्रकार मन्त्रोंकी सार्थकताके विषयमें भी प्रश्न होनेपर उनका उपयोग द्रव्य और देवताओंके स्मारक होनेमें है, यह समाधान किया जाता है। इस तरह विधि, निषेध, अर्थवाद और मन्त्र— इन सभीका प्रामाण्य क्रियापरत्वेन ही है। इसीसे भगवान् श्रुतिस्वरूपा व्रजांगनाओंसे कहते हैं कि अपने प्रामाण्यके लिये तुम अपने समुदायका ही अनुगमन करो। जिस प्रकार तुम्हारा समुदाय क्रियापरक है, उसी प्रकार तुम भी क्रियापरक हो जाओ, शुद्ध चैतन्यरूप सिद्ध वस्तुका प्रतिपादन मत करो। यदि कहा जाय कि हमारा अप्रामाण्य हो जाने दो तो ऐसा कथन भी ठीक नहीं; क्योंकि तुम सती— अपौरुषेय होनेसे सर्वदोष-विवर्जित हो, तुम्हें मीमांसकोंका संग छोड़ना उचित नहीं है। कुछ 'द्यावाभूमी जनयन् देव एकः' (यजु० १७।१९) इत्यादि श्रुतियाँ कह सकती हैं कि मीमांसक तो हमारे स्वार्थका ही अपलाप करते हैं, क्योंकि वे हमारे सर्वस्व परब्रह्मकी सत्ता ही स्वीकार नहीं करते, फिर हमीं उनकी अपेक्षा क्यों करें? परंतु यह विचार ठीक नहीं है। मीमांसक जो ईश्वरका खण्डन करते हैं, वे केवल वेदनिर्मातृत्वेन उसे स्वीकार नहीं करते; क्योंकि नैयायिकोंके मतानुसार अनुमानसिद्ध सर्वज्ञ ईश्वरकृत होनेके कारण वेदोंका प्रामाण्य है और इधर ईश्वरके सर्वज्ञत्वका ज्ञान भी वेदसे ही होता है। इस प्रकार वेद और ईश्वर इन दोनोंमें अन्योन्याश्रय दोषकी प्राप्ति होती है। इसके सिवा एक दोष यह भी है कि जिन युक्तियोंसे अनुमान करके नैयायिक वेदनिर्माता ईश्वरका सर्वज्ञत्व सिद्ध करते हैं, उन्हीं युक्तियोंसे बौद्ध, ईसाई और यवन लोग अपने धर्मग्रन्थोंके निर्माताओंको सर्वज्ञ सिद्ध कर सकते हैं। वेदान्त-दर्शनके मतमें भी ईश्वरकी सिद्धि अनुमानसे नहीं, बल्कि शास्त्रसे ही होती है; जैसा कि 'शास्त्रयोनित्वात्' (वेदान्त- दर्शन १।१।३), 'तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि', (बृहदारण्यक० ३।९।२६) एवं 'वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः' (गीता १५।१५) इत्यादि वाक्योंसे सिद्ध होता है। वेदोंकी अपौरुषेयता इसीसे शास्त्ररक्षकका आदर भगवान् भी करते हैं। वे कहते हैं—'विप्रप्रसादाद्धरणीधरोऽहम्।' अतः मीमांसक लोग वेदका प्रामाण्य ईश्वरकृत होनेके कारण नहीं मानते। बल्कि अपौरुषेय होनेके कारण मानते हैं। इसीसे उन्होंने जो ईश्वरका खण्डन किया है। वह इसीलिये है कि उन्हें ईश्वरनिर्मितत्वेन वेदका प्रामाण्य इष्ट नहीं है। वह स्वतःप्रमाण है। उत्तरमीमांसा और पूर्वमीमांसाका यह सिद्धान्त है कि प्रमाण स्वतःप्रमाण हुआ करता है; उसका अप्रामाण्य परतः होता है। यदि प्रमाणका प्रामाण्य परतः माना जायगा तो जिस प्रमाणसे उसका प्रामाण्य सिद्ध किया जायगा, उसके प्रामाण्यकी सिद्धिके लिये किसी तीसरे प्रमाणकी अपेक्षा होगी और उनके प्रामाण्यके लिये चौथे प्रमाणकी आवश्यकता होगी। इस प्रकार अनवस्थाका प्रसंग उपस्थित हो जायगा। वेदातिरिक्त अन्य ग्रन्थोंका भी प्रामाण्य तो स्वतः सिद्ध है, किंतु पौरुषेय और सादि होनेके कारण उनका अप्रामाण्य परतः है। उनका पौरुषेयत्व और सादित्व तो उन्हींसे सिद्ध होता है। कोई भी पुरुष सर्वज्ञ नहीं हो सकता; अन्यथा अनेक सर्वज्ञ मानने पड़ेंगे। यदि अनेक सर्वज्ञ माने जायँ तो उनके कथनमें विरोध नहीं होना चाहिये। परंतु ऐसी बात है नहीं; जीवमात्रमें अल्पज्ञत्व, सातिशयत्व और करणापाटव आदि दोष रहते ही हैं। इसलिये उनके रचे हुए ग्रन्थ भी प्रामाणिक नहीं हो सकते।
- दो राजा वनमें गये हुए थे। उनमेंसे एकका घोड़ा मर गया और दूसरेका रथ नष्ट हो गया। वे आपसमें मिल गये। उनमेंसे एकने अपना रथ दिया और दूसरेने घोड़ा। इस प्रकार परस्पर मिलकर वे उस वनसे निकलकर सकुशल नगरमें पहुँच गये। इसे 'नष्टाश्वरथदग्धन्याय' कहते हैं।
जिस प्रकार अन्य ग्रन्थोंका पौरुषेयत्व प्रदर्शित किया जा सकता है, उस प्रकार वेदका पौरुषेयत्व सिद्ध नहीं किया जा सकता। यदि पूछा जाय कि इसमें प्रमाण क्या है ? तो परोक्ष वस्तुके अभावमें तो प्रमाणाभाव ही पर्याप्त प्रमाण होता है। हम तो वेदके कर्ताका अभाव बतला रहे हैं, अतः उसके लिये किसी प्रमाणकी आवश्यकता नहीं है। कहा जा सकता है कि ऐसे भी कितने ही ग्रन्थ हैं कि जिनके कर्ताका ज्ञान नहीं है; तो क्या उन्हें भी अपौरुषेय ही मानना चाहिये ? इसमें हमारा कथन यह है कि उन ग्रन्थोंकी सम्प्रदाय-परम्पराका विच्छेद देखा जाता है, इसलिये वे अपौरुषेय नहीं हो सकते। किंतु वेदोंकी सम्प्रदाय-परम्पराका विच्छेद नहीं हुआ; क्योंकि उसके विच्छेदमें कोई प्रमाण नहीं है। यदि कहा जाय कि कहीं-कहीं वेदोंकी उत्पत्ति भी तो सुनी जाती है; जैसे—'अस्य महतो भूतस्य निश्वसितमेतद्यदृग्वेदो यजुर्वेदः' (बृहदारण्यक० २।४।१०) इत्यादि वाक्योंसे ज्ञात होता है। यह कथन ठीक है, किंतु इसके साथ ही 'वाचा विरूप नित्यया', 'अनादिनिधना नित्या वागुत्सृष्टा स्वयंभुवा' आदि वाक्योंसे उनका नित्यत्व भी प्रमाणित होता है। अतः इन दोनों प्रकारके वाक्योंकी एकवाक्यता होनी चाहिये। इनका अभिप्राय केवल यही है कि पूर्व कल्पकी आनुपूर्वीके समान इस कल्पके आरम्भमें भी भगवान् स्वयम्भूसे उसी आनुपूर्वीके अनुस्मरणपूर्वक वेदोंका आविर्भाव हुआ। इसीसे भगवान् कहते हैं कि तुम अपने समुदायमें जाओ, क्योंकि मीमांसक भी परमब्रह्म परमात्माका खण्डन नहीं करते। वे केवल न्यायप्रतिपादित अनुमानसिद्ध सर्वज्ञ ईश्वरको स्वीकार नहीं करते, अपौरुषेय वेदप्रतिपादित सर्वज्ञ ईश्वरका खण्डन वे कभी नहीं करते। कर्मफल देनेवाला या कर्ममें देवतादिरूपसे ईश्वर उन्हें भी मान्य है ही, परंतु तुम स्वतन्त्र विधि निरपेक्ष अद्वैत ब्रह्ममें मत आसक्त हो। अतः तुम साध्यसाधनमय प्रपंचका ही प्रतिपादन करो, निर्विशेष परब्रह्मका प्रतिपादन करनेका प्रयत्न मत करो। इसमें 'मा चिरम्'—देरी भी नहीं होगी। इसलिये 'शुश्रूषध्वं पतीन्'—अपने-अपने प्रतिपाद्य देवताओंका ही प्रतिपादन करो। समस्त जीवोंके अधिष्ठान साक्षात् परब्रह्म भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र ही हैं यह सुनकर मानो श्रुतियोंको यह सन्देह हुआ कि यदि हम अनन्त परब्रह्मका ही प्रतिपादन करेंगी तो अन्य देवता तो उसीमें आ जायँगे; क्योंकि वे भी तो ब्रह्मसे अभिन्न ही हैं। यह नियम है कि कार्यगत सत्ता कारणमें ही रहती है, अतः समस्त कार्यका पर्यवसान कारणमें ही होता है। जिस प्रकार मृत्तिकाका प्रतिपादनकर देनेपर घटादिका भी प्रतिपादन हो ही जाता है, उसी प्रकार सबके अधिष्ठानभूत परब्रह्मका प्रतिपादन करनेपर अवान्तर देवताओंका प्रतिपादन भी हो ही जाता है। वास्तवमें तो सत्तामात्र शुद्ध ब्रह्म ही सम्पूर्ण शब्दोंका वाच्य है; क्योंकि यह निखिल प्रपंच उसीसे तो उत्पन्न हुआ है—'तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः । आकाशाद्वायुः।' (तैत्तिरीय० २।१) अतः यह ब्रह्मरूप ही है। इसलिये यदि व्रजांगनाएँ अपने प्राकृत पतियोंको छोड़कर भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रके पास गयीं तो उनका पातिव्रत भंग नहीं हुआ, क्योंकि— गोपीनां तत्पतीनां च सर्वेषामेव देहिनाम्। योऽन्तश्चरति सोऽध्यक्षः क्रीडनेनेह देहभाक् ॥ (श्रीमद्भा० १०।३३।३६) जिस प्रकार तरंग समुद्रसे भिन्न नहीं होती, इसलिये यदि एक तरंगके साथ दूसरी तरंगका सम्बन्ध है तो वस्तुतः वह सम्बन्ध समुद्रके ही साथ है; क्योंकि वही समस्त तरंगोंका अधिष्ठान है, इसी प्रकार समस्त जीवोंके अधिष्ठान साक्षात् परब्रह्म भगवान् कृष्णचन्द्र ही हैं। अतः श्रुतियोंको यह विचार हुआ कि यदि हम परब्रह्मका ही प्रतिपादन करेंगी तो भी हमारा पातिव्रत भंग नहीं होगा। इसपर भगवान् कहते हैं—'सच है, मेरे साथ
सम्बन्ध करनेसे तुम्हारा पातिव्रत तो भंग नहीं होगा तथापि 'क्रन्दन्ति वत्सा बालाश्च' (श्रीमद्भा० १०।२९।२२)—ये बालक और बछड़े तो रो रहे हैं। इसपर दया करनी चाहिये। ये अज्ञानी हैं, अपने अधिष्ठानभूत मुझ परब्रह्मको नहीं जानते, इसलिये बाल हैं तथा इनकी प्रवृत्ति अनात्म पदार्थोंमें है, इस पाशविक प्रवृत्तिके ही कारण ये वत्स हैं। तुम्हें चाहिये कि इनपर दया करके इन्हें इनके इष्ट पदार्थ सोमादिका प्रदान करो।' यदि विचार किया जाय तो उपास्य-उपासनाका पर्यवसान तो प्रेमातिशयमें होता है। उसके लिये उपासना साधन है। 'भक्ति' शब्दके भी दो अर्थ हैं—'भज्यते सेव्यते भगवदाकारमन्तःकरणं क्रियतेऽनया सा भक्तिः' अर्थात् जिसके द्वारा भगवदाकार वृत्ति की जाय उसे भक्ति कहते हैं और दूसरा 'भजनं भक्तिः' भगवदाकार वृत्ति ही भक्ति है। इस प्रकार भक्ति साध्य भी है और साधन भी। इस प्रकार 'उपासना' शब्दका भी तात्पर्य यह है—'लक्ष्यमुपेत्य यद्दीर्घकालं नैरन्तर्येणादरपूर्वकमासनं तदुपासनम्' अर्थात् अपने लक्ष्यतक पहुँचकर जो दीर्घ कालतक अव्यवहित रूपसे उसकी सन्निधिमें रहता है, उसका नाम उपासना है। इस तरह यदि हम अपने ध्येयका दीर्घकालतक सेवन करेंगे तो उसके प्रति हमारे हृदयमें राग उत्पन्न होगा। 'ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।' (गीता २।६२) भगवान्की इस उक्ति के अनुसार यदि हम विषय-चिन्तन करते-करते विषयासक्त हो जाते हैं तो दीर्घकालतक भगवच्चिन्तन करनेपर उनमें भी हमारा राग हो ही जाना चाहिये। प्रेम आरम्भमें ही नहीं होता; वह तो दीर्घकालतक सत्कारपूर्वक अपने प्रियतमका निरन्तर चिन्तन करते रहनेपर ही होता है। जिस समय भगवान्में हमारा प्रेम होगा, उस समय हमें उनकी प्राप्तिकी उत्कट अभिलाषा हो जायगी। प्रेमकी अभिवृद्धि प्रेमास्पदमें ही होती है एक बात और ध्यान देनेकी है, प्रेमकी अभिवृद्धि प्रेमास्पदमें ही हुआ करती है। जो प्रेम करनेयोग्य नहीं होता, उसका दीर्घकालतक चिन्तन किया जाय, तब भी उसमें प्रेम नहीं हो सकता। व्याघ्र और सर्पादिका जन्मभर चिन्तन करते रहो, उनमें प्रेम कभी नहीं होगा। उनमें तो द्वेषकी ही वृद्धि होगी, प्रेम तो प्रेमास्पदमें ही हो सकता है। चिन्तनसे केवल योग्यता मिलती है। प्रेमास्पदका चिन्तन करनेसे प्रेम बढ़ता है और द्वेषका चिन्तन करनेसे द्वेषकी वृद्धि होती है। विषय भी सुखके साधन हैं, इसलिये उनमें भी प्रेम हो जाया करता है। प्रेम दोमें ही होता है—सुखमें तथा सुखके साधनमें। सुखके साधनमें जो प्रेम होता है वह स्थायी नहीं होता, जबतक वह पदार्थ सुखप्रद रहता है, तभीतक उसमें प्रेम रहता है। देखो, जल तभीतक प्रिय लगता है, जबतक हमें तृषा रहती है। परंतु सुख तो सदा ही प्रेमास्पद है। अतः निरतिशय प्रेम सुखमें ही हो सकता। केवल सुखस्वरूप तो एकमात्र श्रीभगवान् ही हैं, इसलिये हमें उन्हींमें प्रेम करना चाहिये। प्रेमके इन दो भेदोंको शास्त्रमें सोपाधिक और निरुपाधिक प्रेम भी कहा है। प्रेमके विषयमें यह नियम है कि अत्यन्त नीच परिस्थितिमें रहनेवाला पुरुष भी उसीको अधिकाधिक प्रेमास्पद समझता है, जो जितना उसका अधिक आन्तरिक होता है। जो देहात्मवादी हैं, जिन्हें विविध प्रकारके सौख्योपभोग ही इष्ट हैं, उनका प्रेम भी आधिकाधिक अन्तरंगमें ही होता है। देखिये, पुत्रादिकी अपेक्षा शरीर अधिक प्रिय है, शरीरकी अपेक्षा मन अधिक प्रिय है; इसीसे मन उद्विग्न होनेपर उसे शान्त करनेके लिये आत्महत्यातक कर लेते हैं। मन भी जब चंचलताके कारण अशान्तिका हेतु दिखायी देने लगता है तो उसके भी नाशका प्रयत्न किया जाता है। यहाँतक कि अन्तमें अभ्यासी लोग बुद्धिका भी निरोध करते हैं। इससे ज्ञात होता है कि जो बुद्धिसे लेकर स्थूल प्रपंचपर्यन्त सम्पूर्ण दृश्यवर्गका प्रकाशक है, वह सर्वान्तरतम आत्मा ही निरुपाधिक परमप्रेमका आस्पद है। हमारा परमाराध्य प्रभु बहिरंग नहीं है। वेद-शास्त्र
श्रीरासलीलारहस्य २९७ उसे सबका अन्तरात्मा कहकर प्रतिपादन करते हैं, अतः जो लोग भगवान्को बहिरंग समझते हैं, वे वस्तुतः उपासनाका रहस्य नहीं जानते। वह तो सर्वान्तरतम है। संसारके सारे पदार्थोंका वियोग हो सकता है, किंतु भगवान्का वियोग कभी नहीं हो सकता; वह तो हमारा परम सखा है। श्रुति कहती है— द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते। तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्य- नश्नन्नन्यो अभिचाकशीति॥ (मुण्डक० ३।१।१) वैष्णव आचार्योंका मत है कि जिस समय जीव ब्रह्मलोकको जाता है—जिन्हें कि वे वैकुण्ठ, गोलोक, साकेत तथा नित्य वृन्दावन आदि नामोंसे पुकारते हैं—उस समय उसे लिंग शरीर छोड़ देना पड़ता है। ब्रह्मलोकको वे शबल ब्रह्मका धाम नहीं मानते। वे उसे शुद्ध चिदानन्दघन भगवान्का चिन्मय धाम मानते हैं। अतः वहाँ जो जीव जाते हैं, वे विरजा नदीमें स्नान करनेपर अपना लिंग शरीर त्याग देते हैं। इस प्रकार लिंग शरीरका तो हमसे वियोग हो जाता है, किंतु भगवान्का वियोग कभी नहीं होता। अतः भगवान् हमारे नित्य सखा हैं। किंतु मैत्री सर्वदा समान और सजातीय व्यक्तियोंमें ही हुआ करती है। अतः जिस प्रकार भगवान् 'सच्चिदानन्द दिनेश' हैं, उसी प्रकार जीव भी 'चेतन अमल सहज सुखरासी' (रा०च०मा० ७।११७।२) है। इसलिये जो उनके स्वभावमें भेद मानते हैं, वे ठीक-ठीक नहीं जानते। भगवान् तभी जीवके परमप्रेमास्पद हो सकते हैं, जब कि जीवको उनका नित्य सम्बन्धी माना जाय। अतः उपासनाका ठीक रहस्य वही जानता है, जिसे उपास्य और उपासकके अभेदका निश्चय है। अन्यथा— 'अन्योऽसावन्योऽहमस्मि न स वेद यथा पशुः।' जो ऐसे अनभिज्ञ लोग हैं, वे ही सर्वमिथ्यात्व निश्चयको सुनकर 'क्रन्दति'—रोते हैं। वे अनभिज्ञ कर्मठ कहे जाते हैं। जो भगवत्प्राप्तिके लिये भगवदर्थ कर्म करते हैं, वे परम विवेकी हैं। ऐसा कर्म करनेके लिये तो भगवान् स्वयं आज्ञा दे रहे हैं— मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः। निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव॥ यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्। [L42
२९८ भक्तिसुधा
उन्हें ही तृप्त करो और उनके लिये अभीष्ट फलरूप दुग्ध दुहो। यह उनके प्रति तुम्हारी करुणा होगी। यद्यपि परब्रह्मकी ही उपासना करनेसे तुम्हारा पातिव्रत भग्न नहीं होगा; क्योंकि—'तमेतं···ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसानाशकेन' (बृहदारण्यक० ४।४।२२)इस श्रुतिके अनुसार विचारवानोंके सारे जप-तपका परम लाभ ब्रह्मज्ञान ही है; तथापि दया तो करनी ही चाहिये। महानुभाव तो सर्वदा 'सर्वभूतहिते रताः' (गीता ५।२५; १२।४) ही हुआ करते हैं; अतः तुम भी उन्हें अभीष्ट वस्तु देकर उनका आप्यायन करो। परमात्मप्रभुका आश्रय लेनेसे प्रपंचकी सहज ही निवृत्ति हो जाती है इस श्लोकका तात्पर्य यह भी हो सकता है कि समस्त प्राणियोंकी बुद्धियाँ ही व्रजांगनाएँ हैं और भगवान् कृष्ण उनके साक्षी हैं। अतः 'तद्यात गोष्ठं मा' ऐसा पदच्छेद करके यह तात्पर्य समझना चाहिये कि अब तुम गोष्ठको मत जाओ अर्थात् साध्यसाधनात्मक प्रपंचका प्रतिपादन मत करो, बल्कि 'शुश्रूषध्वं पतीन्।' यहाँ 'पतीन्' इस पदमें बहुवचन गौरवार्थ है अर्थात् उपक्रम, उपसंहार, अपूर्वता आदि षड्विध लिंगोंसे मेरेमें ही अपना तात्पर्य निश्चय करो। 'त्रैगुण्यविषया वेदा' (गीता २।४५) यह भगवान्का कथन अविवेकियोंकी ही दृष्टिसे है। विचारवानोंका तो यही कथन है कि 'वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो····।' (गीता १५।१५) अतः त्रिगुणमय संसारके साथ संसर्ग करना ही अमंगल है। परब्रह्म परमात्माका अनुस्मरण ही एकमात्र कल्याणका मूल है। अतः श्रुति प्रपंचपरक है—ऐसा प्रसिद्ध होनेसे तुम कलंकित हो जाओगी और यदि त्रिगुणातीत शुद्ध परब्रह्मका प्रतिपादन करोगी तो तुम भी गुणातीत हो जाओगी और इससे तुम्हें महत्ता प्राप्त होगी। परंतु यह होगा कैसे ? इसके लिये तुम 'शुश्रूषध्वं सतीः' अर्थात् 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' (तैत्तिरीय० २।१) आदि जो श्रुतियाँ परब्रह्मका प्रतिपादन करती हैं, उन्हींके सिद्धान्तका अनुसरण करो। यहाँ अपनेमें बुद्धियोंका निश्चय दृढ़ करना है; इसलिये मानो बुद्धियोंके प्रति भगवान् कहते हैं कि 'पतीन् शुश्रूषध्वम्' यहाँ उपाधिभेदके कारण बुद्धियोंके अनेक पति उपपन्न हो सकते हैं। बुद्धि स्वभावसे ही नामरूपात्मक दृश्यकी ओर जाती है। इसीसे भगवान् कहते हैं—'तद्यात मा चिरं गोष्ठम्' अर्थात् अब तुम और अधिक काल दृश्यकी ओर मत जाओ। बल्कि दृश्यकी ओरसे निवृत्त होकर अपने अवभासक समस्त बुद्धियोंके साक्षी सर्वान्तर्यामी परब्रह्मका ही चिन्तन करो। परंतु ऐसा कोई-कोई ही कर पाता है; क्योंकि— पराञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयम्भू- स्तस्मात्पराङ्पश्यति नान्तरात्मन्। (कठ० २।१।१) इसलिये— कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्ष- दावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन् ॥ (कठ० २।१।१) अहा! भगवान्का वह सौन्दर्यसुधासिन्धु कितना महान् है। भगवत्पाद भगवान् शंकराचार्य प्रबोधसुधाकरमें लिखते हैं—'अरी बुद्धि, तू तराजूके एक पलड़ेमें सारे संसारका सुख और दूसरेमें परमानन्दकन्द भगवान् कृष्णके सौन्दर्यसुधाका एक कण रख, तब तू देखेगी कि भगवान्का सौन्दर्यकण ही भारी है। अतः तू सांसारिक विषयोंको छोड़कर भगवान् कृष्णकी सौन्दर्यसुधाका पान किया कर।' इसीसे भगवान् कहते हैं—'अरी बुद्धियो ! अब तुम गोष्ठप्रपंचमें मत जाओ, वहाँ बहुत रह चुकीं। उस स्थानमें तो पशु रहा करते हैं; तुम तो अपने परम प्रियतम मुझ परब्रह्मका ही आश्रय लो।' यदि कहो कि हम स्वतन्त्र नहीं हैं, हम कैसे आपकी ओर आयें! तो भगवान् कहते हैं—तुम अवश्य पराधीन हो, क्योंकि तुम करण हो और करण अपनी प्रवृत्तिके लिये कर्ताके अधीन हुआ करता है; अतः तुम प्रमाताको समझाओ। इसपर श्रुति कहती
श्रीरासलीलारहस्य २९९ हैं—हम तो उसे बहुत समझाती हैं; परंतु अब तो वह भी विवश है। जैसे दौड़नेवाला पुरुष यद्यपि पादसंचालनमें स्वतन्त्र होता है तथापि वेग बढ़ जानेपर वह भी उस वेगके अधीन हो जाता है; फिर उसकी गति उसके अधीन नहीं रहती। इसी प्रकार यद्यपि प्रमाता जीव स्वतन्त्र है तो भी बुद्धिसे विषय- चिन्तन करते रहनेके कारण अब उसे विवश होकर उसी प्रकारकी प्रवृत्तिमें प्रवृत्त होना पड़ता है। श्रीदुर्गासप्तशतीमें सुरथ नामक राजा और समाधि नामक वैश्यका प्रसंग आता है। सुरथ शत्रुओंसे पराजित होकर भागा था। उसका राज्य शत्रुओंके हाथमें चला गया था। अब उसमें उसका कोई स्वत्व नहीं रहा था तो भी उसे अपने सम्बन्धियों और हाथी-घोड़ोंकी स्मृति सताती थी। इसी प्रकार समाधिको उसके पुत्रादिने घरसे निकाल दिया था तो भी उसे घर और घरवालोंकी ही स्मृति बनी रहती थी। उन्होंने एक मुनिवरके पास जाकर इस अनभिमत चिन्ताका कारण पूछा। तब मुनिने कहा— ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा॥ बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति। (श्रीदुर्गासप्तशती १।५५-५६) अतः भगवान् कहते हैं—यदि तुम्हारी प्रवृत्ति नहीं होती तो 'शुश्रूषध्वं सतीः' भगवती शक्तिका समाश्रयण करो; क्योंकि— सैषा प्रसन्ना वरदा नृणां भवति मुक्तये। सा विद्या परमा मुक्तेर्हेतुभूता सनातनी॥ (श्रीदुर्गासप्तशती १।५७) क्योंकि वह सर्वात्मिका है—'या देवी सर्वभूतेषु भ्रान्तिरूपेण संस्थिता।' (श्रीदुर्गासप्तशती ५।७४) अपनेसे विमुख लोगोंके लिये वही भ्रान्तिरूपसे प्रकट होती है और अपने भक्तोंके लिये वही परम कल्याणी विद्यादेवी है। यच्च किंचित्क्वचिद्वस्तु सदसद्वाखिलात्मिके॥ तस्य सर्वस्य या शक्तिः सा त्वं किं स्तूयसे तदा। (श्रीदुर्गासप्तशती १।८२-८३) अथवा 'सती' शब्दसे सात्त्विकी वृत्ति भी विवक्षित हो सकती है। अतः इसका तात्पर्य यह है कि पहले सात्त्विक वृत्तियाँ जाग्रत् करो। भगवान्का नाम जप करो, प्रभुका गुणगान करो और राजस- तामस वृत्तियोंका त्याग करो। ऐसा करते-करते बादमें परब्रह्म परमात्मआकाराकारिता वृत्ति हो जायगी। इस प्रकार बुद्धियोंको भगवान्का यही उद्देश्य है कि तुम गोष्ठ यानी साध्यसाधनात्मक संसारकी ओर मत जाओ, बल्कि 'पतीन्'—सम्पूर्ण बुद्धियोंके साक्षी परब्रह्म परमात्माका ही आश्रय लो। बुद्धियाँ अपने चरम आश्रयभूत साक्षीका अवलम्बन न करके संसारमें प्रवृत्त होती हैं और फिर उसीमें फँस जाती हैं। अतः भगवान् उन्हें उपदेश करते हैं कि तुम संसारसे विरत होकर अधिष्ठान परमात्माकी ओर ही जाओ। वह आत्मा जाग्रदादि तीनों अवस्थाओंका साक्षी है, वह यह जानता है कि इस समय मेरी बुद्धि सात्त्विक है, इस समय राजस है और इस समय मोहग्रस्त है। इस प्रकार जो काम, संकल्प, विचिकित्सा, धी, ह्री आदि अन्तःकरणके धर्मोंको जानता है, जो जाग्रत् और स्वप्नमें प्रमाता, प्रमाण एवं प्रमेयरूप त्रिपुटीका अवभासक है और सुषुप्तिमें उनके अभावको प्रकाशित करता है, उस सर्वावभासक परमतत्त्वपर दृष्टि पहुँचनेपर यह निखिल प्रपंच सहजहीमें निवृत्त हो जाता है। किंतु यह है अत्यन्त दुर्लभ; इसीसे कहा है— कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्ष- दावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन्॥ (कठ० २।१।१) 'धीर' शब्दका अर्थ है—'धियम् ईरयति प्रेरयति इति धीरः' अर्थात् जो बुद्धि आदि कार्यकारण- संघातको अपने अधीन रखता है—स्वयं उसके अधीन नहीं होता। ऐसा कोई देहाभिमानी नहीं हो सकता। इसीलिये भगवान्ने कहा है— 'अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते॥' (गीता १२।५)
३०० भक्तिसुधा इन्द्रिय, मन, बुद्धि, अहंकार — सभीका अवभासक सर्वसाक्षी परमात्मा ही है वह बुद्धिका प्रेरक नील-पीतादि किसी रूपवाला नहीं है। वह तो अत्यन्त सूक्ष्म है। देखो—इन नील- पीतादिका प्रकाशक पहले तो सूर्यका प्रकाश देखा जाता है। जिस प्रकार नील-पीतादि रूपवान् हैं, उसी प्रकार उन्हें प्रकाशित करनेवाले सूर्य एवं अग्नि आदिके आलोक भी रूपवान् हैं; परंतु अपने प्रकाश्य नील-पीतादिकी अपेक्षा उनमें बहुत सूक्ष्म है। उस सौर आलोकका प्रकाशन चाक्षुष-ज्योतिसे होता है; वह रूपरहित है। इस प्रकार रूपरहित तत्त्व रूपवान्को प्रकाशित कर रहा है। यह भी अनुभवमें आता है कि जो नेत्रज्योति निर्दोष होती है, वह आलोकको ठीक- ठीक प्रकाशित कर सकती है और जो सदोष होती है, वह उसका ठीक-ठीक प्रकाशन नहीं कर सकती। किंतु यह कौन जानता है कि नेत्र सदोष है या निर्दोष? इस बातको मन जानता है; चक्षुके पाटवापाटवका ज्ञाता मन है। मनमें भी रूप नहीं है। इसी प्रकार मनके चांचल्यादिको जाननेवाली बुद्धि है और बुद्धि अपना कार्य अहंकारपूर्वक करती है; जैसे कि यह कहा जाता है कि 'मैं' अपनी बुद्धिद्वारा मनका निरोध करूँगा। इस प्रकार हम देखते हैं कि बुद्धि इस 'मैं' का कारण है। यह 'मैं' अत्यन्त सूक्ष्म है। यदि हम कुछ काल बुद्धि आदिसे रहित केवल 'मैं' का ही चिन्तन करें तो हमारे सामने 'मैं' और 'मैं' के साक्षीका भेद सुस्पष्ट हो जायगा। इस समय तो 'मैं' और चिदात्माका अन्योन्याध्यास हो रहा है। जिस प्रकार तपे हुए लोहपिण्डमें अग्निरहित लोहपिण्ड और लोहपिण्डरहित अग्निका भान नहीं हो सकता, उसी प्रकार इस समय हमें 'मैं' से रहित चेतन और चेतनरहित 'मैं' की प्रतीति नहीं हो सकती। सुषुप्तिमें 'मैं' का अभाव रहता है। उस समय चिदात्मा 'मैं' के अभावका प्रकाशक है। इस प्रकार वह स्पष्टतया 'मैं' के भाव और अभाव दोनोंहीका प्रकाशक प्रतीत हो रहा है। इसी क्रमसे हम उसे शब्द, स्पर्श, रस और गन्धके चरम अवभासकरूपसे भी निश्चय कर सकते हैं। अतः विषयोंकी अवभासक पंच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं, इन्द्रियोंका अवभासक मन है, मनकी प्रकाशिका बुद्धि है, बुद्धिका प्रेरक अहंकार है और इन मन, बुद्धि, अहंकार सभीका भासक चिदात्मा है। व्यवहारमें देखते हैं कि गन्धाकाराकारितवृत्ति, रूपाकाराकारितवृत्ति, रसाकाराकारितवृत्ति, स्पर्शाकारा- कारितवृत्ति और शब्दाकाराकारितवृत्ति — इन सबमें परस्पर भेद है। इसी प्रकार इनको ग्रहण करनेवाली इन्द्रियोंमें भी भेद है। इनके भेद और अभेदका विवेक करो। इनमें जो भेद है, वही प्रपंच है और जो अभेद है, वही परमार्थ है। उत्पन्न तथा नष्ट होनेवाली गन्धवृत्ति, रसवृत्ति, स्पर्शवृत्ति आदि पृथक् हैं, परंतु उन वृत्तियोंकी उत्पत्ति, स्थिति, नाश तथा उनके स्वरूपोंका भासन करनेवाला अखण्ड बोध या निर्विकार भान सदा एकरस तथा एक ही है। जिस प्रकार नील-पीत-रहित आदि रूपोंका अवभासक सौर आलोक एक ही है, किंतु उसके प्रकाश्य भिन्न हैं, उसी प्रकार दृश्य अनेक हैं और द्रष्टा एक ही है, किंतु नील-पीतादि दृश्योंको प्रकाशित करते समय उनका अवभासक सौर आलोक तद्रूप हो जाता है; उन नील-पीतादिकी सन्धिमें जो उसका निर्विशेष रूप रहता है, वही उसका शुद्ध स्वरूप है। इसी बातको पंचदशीकारने एक अन्य दृष्टान्तद्वारा इस प्रकार स्पष्ट किया है — खादित्यदीपिते कुड्ये दर्पणादित्यदीप्तिवत् । कूटस्थभासितो देहो धीस्थजीवेन भास्यते ॥ (पंचदशी ८।१) एक स्थानपर कई दर्पण रखे हुए हैं। उनमें सूर्यकी किरणें पड़कर फिर समीपस्थ भित्तिपर प्रतिफलित हो रही हैं। वे दर्पणालोक और उनकी सन्धियाँ ये दोनों ही सौर आलोकसे प्रकाशित हैं; किंतु सन्धियाँ केवल सौरलोकसे प्रकाशित हैं और दर्पणालोक दर्पणमें पड़े हुए सौरलोकके आभाससे भी प्रकाशित हैं। इसी प्रकार विषयोंकी स्फूर्ति तो चेतन तथा
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अन्तःकरणस्थ चिदाभास दोनोंके योगसे होती है, किंतु उन विषयोंकी सन्धि अर्थात् निर्विषय स्थिति केवल चेतनसे ही भासित होती है। अतः आत्मसाक्षात्कार करनेके लिये पहले हमें शब्द, स्पर्श, रूप, रस एवं गन्धादिकी वासनाओंसे वासित अन्तःकरणद्वारा विषयोंसे हटाकर इन्द्रियोंको स्वाधीन करना होगा। फिर बुद्धिसे मनका और अहंकारसे बुद्धिका संयम करना होगा। तत्पश्चात् अपने स्वरूपभूत साक्षीसे अहंकारको पृथक् निश्चय करनेपर हम अपने शुद्ध स्वरूपका बोध प्राप्त कर सकेंगे। सबसे पहले सम्पूर्ण प्रतीयमान प्रपंचको पृथिवीमात्र चिन्तन करो; घट, पट, गृह, उद्यान आदि सभी वस्तुओंको केवल पृथिवीतत्त्व ही अनुभव करो। फिर इस पृथिवीतत्त्वका जलतत्त्वमें लय करो और सर्वत्र केवल जलतत्त्वको ही व्याप्त देखो। तत्पश्चात् जलको अग्नितत्त्वमें लीन करो तथा सब पदार्थोंको तेजोमय ही देखो। इसी प्रकार फिर उन्हें क्रमशः वायुरूप और आकाशरूप देखो। इस चिन्तनके बढ़नेके साथ क्रमशः गन्धादि विषयोंकी निवृत्ति होती जायगी। वृत्ति प्रायः तेजसे आगे नहीं बढ़ती। वायु और आकाश रूपरहित पदार्थ हैं, इसलिये उनपर दृष्टि जमना बहुत कठिन है। यदि मन वायुतत्त्वमें स्थित हो गया तो उसे अन्धकार और प्रकाशकी भी प्रतीति नहीं होगी; क्योंकि ये दोनों तो तेजके अन्तर्गत हैं। रूपकी निवृत्ति होनेपर तो सारा ही विक्षेप निवृत्त हो जाता है। अब केवल स्पर्श और शब्द रह जाते हैं, स्पर्शकी निवृत्ति होनेपर केवल शब्द ही शेष रहता है। इससे आगे बढ़कर शब्दको देखनेवाले मनमें ही स्थित हो जाओ। फिर तटस्थवृत्तिसे मनकी गतिको देखो और तत्पश्चात् उसे देखनेवालेको देखो। इस प्रकार बुद्धि तुम्हारा दृश्य हो जायगी। बुद्धिका द्रष्टा अहंकार है। इससे आगे अहंकार भी भास्य कोटिमें आ जाना चाहिये। तत्पश्चात् उसकी भी प्रतीति नहीं होगी और केवल सर्वावभासक चिदात्मा ही रह जायगा। इस प्रकार बुद्धि सबके अधिष्ठानभूत केवल आत्मामें ही स्थित हो जाती है; उस समय उसके भास्य शब्द-स्पर्शादि प्रपंचमेंसे कुछ भी प्रतीत नहीं होता। अब हम प्रकृत विषयपर आते हैं। भगवान्का उपदेश है—'शुश्रूषध्वं पतीन्' अर्थात् जो सर्वावभासक चिदात्मा जाग्रत् और स्वप्न-अवस्थाओंमें प्रतीत होनेवाले द्वैतका तथा सुषुप्तिमें अनुभव हुए अज्ञानका साक्षी है, तुम उस परम पतिका ही आश्रय लो। अतः तुम नामरूपात्मक प्रपंचकी ओर मत जाओ, बल्कि उसके अवभासक सर्वसाक्षी परमात्माका चिन्तन करो। यदि कहो कि उसमें तो हमारी गति नहीं है, हम किस प्रकार ऐसा करें तो उसके लिये 'शुश्रूषध्वं सतीः।' 'सती' शब्दका अर्थ पहले ही कहा जा चुका है। तात्पर्य यह है कि इसके लिये तुम ब्रह्मविद्यारूपिणी भगवती महामायाकी उपासना करो। देखो, गोपियोंको भी श्रीकात्यायनीदेवीकी उपासना करनेसे ही परब्रह्मस्वरूप भगवान् कृष्णकी प्राप्ति हुई थी। ऐसी ही एक गाथा उपनिषदोंमें आती है। जिस समय देवासुर-संग्राममें परब्रह्म परमात्माके प्रसादसे देवताओंको विजय प्राप्त हुई तो वे भगवान्को भूल गये और उस विजयको अपने ही पुरुषार्थका फल मानने लगे। उस समय परम दयालु भगवान् अपने मोहग्रस्त अनुचरोंका व्यामोह दूर करनेके लिये एक विचित्र रूपसे उनके सामने प्रकट हुए। भगवान्के उस विचित्र अनन्त प्रकाशमय विग्रहको देखकर देवताओंको बड़ा कुतूहल हुआ और उन्हें यह जाननेके लिये बड़ी उत्सुकता हुई कि यह यक्ष कौन है? यह बात जाननेके लिये सबसे पहले अग्निदेव गये। भगवान्ने उनसे पूछा—'तुम कौन हो?' अग्निने बड़े गर्वसे कहा—'मैं अग्नि हूँ, लोग मुझे जातवेदा कहते हैं।' भगवान्ने कहा—'तुम क्या कर सकते हो?' अग्निदेवने कहा—'संसारमें जितने पदार्थ हैं, मैं उन सभीको जला सकता हूँ।' तब यक्षभगवान्ने उनके आगे एक तृण रखकर कहा—'भला इसे तो जलाओ।' अग्निदेव
३०२ भक्तिसुधा अपना सारा पुरुषार्थ लगाकर हार गये, किंतु वे उसे जलानेमें समर्थ न हुए और इस प्रकार मान-मर्दन हो जानेसे चुपचाप लौट आये। उनके पीछे वायुदेवता गये। किंतु उनकी भी वही गति हुई। वे भी एक क्षुद्र तृणमात्रको उड़ानेमें समर्थ न हुए। इस प्रकार अग्नि और वायुके विफलमनोरथ होकर लौट आनेपर स्वयं देवराज इन्द्र उस यक्षका परिचय प्राप्त करनेके लिये चले। देवराजको देखते ही यक्षभगवान् अन्तर्धान हो गये। इससे इन्द्रको बड़ा परिताप हुआ। वे सोचने लगे—'अहो! मुझे सन्निधानसे उनके दर्शन और सम्भाषणका भी सौभाग्य प्राप्त न हो सका।' जिस समय जीवको भगवद्विरहके कारण परिताप होता है, उसी समय उसे भगवत्साक्षात्कारकी योग्यता प्राप्त होती है। वह क्षण बड़े सौभाग्यसे प्राप्त होता है, जिसमें प्राणी अपने प्रियतमकी विरह- वेदनासे तड़पने लगता है और उसका रोम-रोम भगवद्दर्शनके लिये उत्कण्ठित हो उठता है। देखिये, जिस समय भगवान्के साथ व्रजांगनाओंका संयोग था, उस समय उनकी उपासना उतनी प्रबल नहीं थी; किंतु जब उन्हें भगवान्का वियोग हुआ, तब उनकी लगन इतनी बढ़ी कि उस विरहाग्निने उन्हें केवल इसीलिये नहीं जलाया; क्योंकि उनके हृदयमें भगवान्की प्रेममयी मूर्ति विराजमान थी। उस आनन्द-सुधासिन्धुके कारण ही उनकी रक्षा हुई। इसी भावका वर्णन करते हुए श्रीवल्लभाचार्यजीने यह श्रुति कही है— 'को ह्येवान्यात्कः प्राण्याद् यदेष आकाश आनन्दो न स्यात्।' (तैत्तिरीय० २।७) अर्थात् यदि सहृदय प्रेमियोंके अन्तःकरणोंमें प्रेमानन्दरूप सुधा न होती तो अपने प्रियतमके वियोगमें उनमेंसे कौन चेष्टा करता और कौन प्राण धारण करता ? वे तो तत्काल उस विरहानलमें भस्म हो जाते। अतः यदि भगवान्के वियोगका सन्ताप न हुआ तो यह जीवन व्यर्थ है; भगवान् वाल्मीकि कहते हैं— यश्च रामं न पश्येत्तु यं च रामो न पश्यति। निन्दितः सर्वलोकेषु स्वात्माप्येनं विगर्हते ॥ (वा०रा० २।१७।१४) वस्तुतः यह भगवदर्थ सन्ताप ही परम तप है। इस प्रकार जब इन्द्रने इस सन्ताप-रूप तपसे अपना मनोमल भस्म कर दिया तो उमादेवीका आविर्भाव हुआ। उसीने उन्हें भगवान्का परिचय दिया। अतः स्मरण रखना चाहिये कि यह महावाक्यजनित ब्रह्माकारवृत्तिरूपा उमा ही प्रकट होकर जीवको परब्रह्मके पास ले जाती हैं। अतः हे बुद्धियो! यदि तुम मुझ परब्रह्मके पास आना चाहती हो तो 'शुश्रूषध्वं सतीः' भगवती शक्तिकी उपासना करो अथवा जैसा हम पहले कह चुके हैं, सात्त्विक वृत्तियाँ ही सतियाँ हैं, उन्हें उद्बुद्ध करो। उनके उद्बुद्ध होनेसे जब तुम्हारी राजस-तामस वृत्तियाँ नष्ट हो जायँगी, तभी तुम उन्हें प्राप्त कर सकोगी। अब यदि श्रुतियाँ कहें कि महाराज ठीक है, परंतु यदि हम संसारको छोड़कर अपने परम प्रियतम परब्रह्मका ही अवलम्बन करें, प्रपंचका आश्रयण करना छोड़ दें तो उस अस्पर्शयोगको सुनकर जो बाल-वत्सस्थानीय अज्ञजन हैं, वे रोने लगेंगे; क्योंकि उनके लिये तो संसार ही सब कुछ है। वे तो पुत्र- कलत्र और धन-धामादिको ही अपना सर्वस्व समझते हैं। इसपर भगवान् कहते हैं—'वत्सा बालाश्च क्रन्दन्ति मा' अर्थात् ये वत्स और बालक भी क्रन्दन नहीं करेंगे। क्यों नहीं करेंगे? क्योंकि विवेकीके लिये संसार असत् होनेपर भी उन अविवेकियोंकी दृष्टिमें तो वह सत्य ही रहेगा। 'नष्टमप्यनष्टं तदन्यसाधारणत्वात्' देखो—स्वप्नप्रपंच तो उसीका निवृत्त होगा, जो जागेगा। जो जगा नहीं है, उसके लिये तो स्वप्नका सारा व्यापार सत्य ही होता है। इसी प्रकार यह दृश्य-प्रपंच भी उसीके लिये मिथ्या होगा जो अपने शुद्ध स्वरूपमें जागेगा, उसे तो इसकी निवृत्ति इष्ट ही है। इसके विपरीत अप्रबुद्धके लिये इसकी निवृत्ति होगी नहीं।' भगवान्ने कहा है—
श्रीरासलीलारहस्य ३०३ यथा ह्यप्रतिबुद्धस्य प्रस्वापो बह्वनर्थभृत्। स एव प्रतिबुद्धस्य न वै मोहाय कल्पते॥ (श्रीमद्भा० ३।२७।२५; ११।२८।१४) इसलिये बाल-वत्सस्थानीय अज्ञजन भी क्रन्दन नहीं करेंगे। दूसरी बात यह है कि यदि वे रोयेंगे तो यह बतलाओ कि तत्त्वज्ञान होनेसे पहले रोयेंगे या पीछे? पीछे तो रो नहीं सकते; क्योंकि उस समय तो वे अचिन्त्यानन्द-महार्णव श्रीभगवान्में अभिन्नरूपसे स्थित हो जानेके कारण प्रपंचकी अपेक्षासे ही रहित हो जाते हैं। भला अमृतके समुद्रको पाकर क्षुद्र कूप-तड़ागादिके लिये कौन व्यग्र होता है? और पहले इसलिये नहीं रो सकते कि प्रपंचका मिथ्यात्व सुनकर भी उसपर उनकी निष्ठा नहीं होगी। देखो—यह मनुष्य-शरीर कितना घृणित है? इसके ऊपर यदि चर्म न होता तो इसपर मक्खियाँ भिनकतीं। इसमें क्षणभर भी रहनेकी इच्छा न होती। इस बातको समझनेके लिये विशेष विचारकी भी आवश्यकता नहीं है। इस शरीरमें अस्थि, मांस, रक्त आदि घृणित पदार्थ ही भरे हुए हैं। यह बात बहुत साधारण बुद्धिवाले पुरुषोंको भी सुगमतासे समझायी जा सकती है तो भी हमारे-जैसे अज्ञानियोंकी तो बात ही क्या है, बड़े-बड़े ऋषि-मुनि भी रम्भा-उर्वशी आदि अप्सराओंके उस अत्यन्त घृणित शरीरके ही लावण्यमें फँस गये थे। इस प्रकार सब कुछ जानकर भी उन्हें जो मोह हुआ, वह भगवती महामायाकी ही महिमा है— दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया। मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥ (गीता ७।१४) ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा॥ बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति। (श्रीदुर्गासप्तशती १।५५-५६) अतः भगवान् कहते हैं—यदि तुम संसारका मिथ्यात्व प्रतिपादन करोगी तो भी वे अज्ञजन नहीं रोयेंगे, क्योंकि उनकी तो उसमें गति ही नहीं होगी। अब यह भी सन्देह हो सकता है कि यदि अज्ञानियोंको परोक्षरूपसे भी यह निश्चय हो जायगा कि ऐन्द्रपद आदि अब मिथ्या हैं तो भी वे यज्ञ- यागादिमें प्रवृत्त नहीं होंगे। वस्तुतः ऐसे अनधिकारियोंने ही अद्वैतवादको कलंकित कर रखा है। उन्हें भले ही ब्रह्मका अपरोक्ष साक्षात्कार न हुआ हो तथापि यह तो निश्चय हो ही जाता है कि कर्म नहीं, धर्म नहीं, लोक नहीं और वर्णाश्रमाचार भी नहीं। अतः वे धर्म- कर्मादिको तिलांजलि दे देते हैं। इन अनधिकारियोंके कारण ही अद्वैतवादको कलंकित होना पड़ा है। ऊपरी दृष्टिसे देखा जाय तो अद्वैतवादी और नास्तिकोंमें कोई भेद दिखायी नहीं देगा। मुक्तावस्थामें दृश्यकी व्यर्थता तो नैयायिकोंके मतमें भी हो जाती है। यह ठीक है कि वे उसका मिथ्यात्व स्वीकार नहीं करते; तथापि मुक्त पुरुषको तो उसका विशेष ज्ञान निवृत्त हो जानेके कारण प्रपंचका भान नहीं होता। यही बात सांख्य मतके विषयमें कही जा सकती है। वस्तुतः संसारसे सम्बन्ध छूट जानेपर और प्रभुसे सम्बन्ध जुड़ जानेपर लोक-वेदकी विधि छूट ही जाती है। सब आचार्योंका ऐसा ही मत है। यदा यमनुगृह्णाति भगवान्आत्मभावितः। स जहाति मतिं लोके वेदे च परिनिष्ठिताम्॥ (श्रीमद्भा० ४।२९।४६) और यही नास्तिकोंका भी लक्षण है। देखा जाय तो तत्त्वज्ञ और व्रात्य—इन दोनोंका बाह्य रूप एक ही होता है। देखिये, जिस प्रकार यवनादि शिखा-सूत्रादिसे रहित होते हैं, उसी प्रकार एक परमहंस भी होता है। यही नहीं, भगवान् शंकरको भी 'व्रात्य' कहा गया है—'व्रात्यानां पतये नमः'। इस प्रकार देखा जाय तो एक तत्त्वज्ञका स्वरूप तो अवश्य व्रात्यके समान ही होता है; तथापि उनमें वस्तुतः बहुत अन्तर होता है। उनमेंसे एक तो साधनकोटिको पार कर गया है और दूसरेने उसमें प्रवेश भी नहीं किया। इस समय अवश्य दोनों ही साधनके संसर्गसे रहित हैं। इस प्रकार यज्ञ-यागादिका अनुष्ठान न करनेपर
भी अद्वैतनिष्ठ महात्माको अवैदिक नहीं कहा जा सकता। वस्तुतः वेदका प्रामाण्य माननेवाला तो वही है। वैदिक तो उसीको कहना चाहिये, जो वेदार्थको अबाधित रखे। वेद कहते हैं—'एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म' (पैंगलोपनिषद् १), 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' (तैत्तिरीय० २।१) इत्यादि। अतः जो ब्रह्मको सजातीय, विजातीय एवं स्वगतभेदसे रहित मानते हैं, वे तो ब्रह्मसे भिन्न वेदकी भी सत्ता नहीं मानते। वेदकी पृथक् सत्ता माननेपर तो वेदको सजातीयादि भेदसे रहित सिद्ध नहीं किया जा सकता। अतः ऐसी अवस्थामें वेद अप्रामाणिक हो जाता है। इसलिये अपने प्रामाण्यके लिये वेद स्वतः ही अपना अभाव प्रतिपादन करते हैं— 'अत्र वेदा अवेदा ब्राह्मणा अब्राह्मणाः पुल्कसा अपुल्कसाः।' कार्य जबतक अपने कारणसे भिन्न रहता है, तभीतक उसकी पृथक् उपलब्धि होती है। कारणसे अभिन्न होनेपर उसकी पृथक् प्रतीति नहीं होती। वेद भी ब्रह्मके कार्य हैं—'अस्य महतो भूतस्य निश्श्वसितमेतद्यदृग्वेदः' (बृहदारण्यक० २।४।१०) अतः वस्तुतः वे परब्रह्मसे व्यतिरिक्त नहीं हैं। घटादि तभीतक उपलब्ध होते हैं, जबतक वे अपने कारण मृत्तिकामें नहीं मिलते। उसमें मिल जानेपर उनकी पृथक् प्रतीति नहीं होती। अतः वेदको ब्रह्मसे व्यतिरिक्त न मानना उनका तिरस्कार नहीं है; यह तो उसका सम्मान ही है। जो पुरुष वेदको ब्रह्मसे भिन्न मानता है, उसपर तो वेद कुपित होते हैं और उसे स्वार्थसे भ्रष्ट कर देते हैं। श्रुति स्वयं कहती है— वेदास्तं परादुर्योऽन्यत्रात्मनो वेदान् वेद.... सर्वं तं परादाद् योऽन्यत्रात्मनः सर्वं वेद॥ (बृहदारण्यक० ४।५।७) क्योंकि ब्रह्मसे वियोग होना किसीको इष्ट नहीं है। तुम भी तो परब्रह्मसे वियुक्त होनेके कारण ही तड़प रहे हो। वेदोंको भी भगवान्का वियोग कैसे सह्य हो सकता है? फिर तुम उन्हें भगवान्से व्यतिरिक्त क्यों समझते हो ? तुम यज्ञयागादि कर्मोंको भगवान्से भिन्न क्यों मानते हो? यदि तुम एक अणुको भी ब्रह्मसे पृथक् समझोगे तो वह अवश्य तुम्हारे लिये भय उपस्थित कर देगा। प्रेमी तो अपना भी पृथक् अस्तित्व नहीं रखना चाहता। जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं। कबिरा नगरी एकमें राजा दो न समाहिं॥ यदि हम अपनी पृथक् सत्ता रखेंगे तो ब्रह्ममें वस्तु-परिच्छेद आ जायगा तथा जिस देशमें हम रहेंगे, उसमें ब्रह्म नहीं रहेगा। इसलिये ब्रह्ममें देशपरिच्छेद भी हो जायगा। इसीसे भावुक पुरुष अपनी सत्ता प्रभुको ही समर्पित कर देते हैं; वे प्रभुसे पृथक् रहकर उनके पूर्णत्वको खण्डित करना नहीं चाहते। अतः पहले अपने धन-धान्यादि प्रभुको समर्पण करो, फिर देह समर्पित कर दो और तदनन्तर मन, बुद्धि और प्राण भी प्रभुको ही अर्पण कर दो। परिणाममें तुम भी उन्हींमें समर्पित हो जाओगे। भगवान् कहते हैं— 'निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः ॥' (गीता १२।८) यदि घटाकाश अपनेको महाकाशसे पृथक् समझता है तो जिस देशमें वह अपनी सत्ता मानेगा, उस देशमें उसे महाकाशकी सत्ता अस्वीकार करनी पड़ेगी। इस प्रकार वह महाकाशकी पूर्णताको खण्डित कर देगा। इसीसे घटाकाश कहता है—'मैं अपनी सत्ता रखकर अपने प्रभुकी अपूर्णता नहीं करूँगा। मैं अपनेको भी उन्हें ही समर्पित कर दूँगा।' आत्मसमर्पणरूप अद्वैतदर्शन ही सच्ची पूजा और उत्कृष्टतम भक्ति है यही अद्वैतवादियोंका सिद्धान्त है। वे प्रभुको आत्मसमर्पण भी कर देते हैं। यही उनकी अद्भुत भक्ति है। वे अपने प्रियतमको अपने-आपको भी दे डालते हैं, क्योंकि आत्मा ही सबसे बढ़कर प्रिय है; इसीके लिये प्रत्येक वस्तु प्रिय हुआ करती है— 'आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति।' (बृहदारण्यक० २।४।५) अतः यदि तुम अपनेको परम प्रेमास्पदको
श्रीरासलीलारहस्य ३०५ समर्पण न करके केवल स्त्री, धन और मन आदि ही प्रभुको अर्पण करते हो तो तुम सच्चे प्रेमी नहीं कहे जा सकते। अतः आत्मसमर्पणरूप अद्वैत दर्शन ही सच्ची पूजा है और यही उत्कृष्टतम भक्ति है। हाँ, मूर्ख पुरुषोंके लिये यह सिद्धान्त अवश्य बहुत भयावह है। इस सिद्धान्तके ब्याजसे वे देहको भी ब्रह्म मान सकते हैं। परंतु वस्तुतः यह सिद्धान्त भक्तिका घातक नहीं है। यह तो उसकी चरमावस्था है। किन्हीं महानुभावोंने कहा है कि—‘पहले उपासनाकी भावना करते-करते ऊपर-नीचे सर्वत्र ब्रह्म ही दिखायी देता है। अतः पहले ‘ब्रह्मैवाधस्ताद्ब्रह्मैवोपरिष्टात्’ यह श्रुति ही चरितार्थ होती है। पीछे एक संचारी भावविशेषका अभ्युत्थान होनेपर ऐसा होता है कि जिससे वह अपनेको ही प्रियतमरूपसे देखने लगता है। उसी अवस्थाका प्रतिपादन ‘अहमेवाधस्तादहमुपरिष्टात्’ (छान्दोग्य० ७।२५।१) इस श्रुतिने किया है।’ श्रीगोस्वामी तुलसीदासजीका कथन है— सो अनन्य जाकें असि मति न टरइ हनुमंत। मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत॥ (रा०च०मा० ४।३) ‘श्रवन कथा, मुख नाम, हृदय हरि, ....नयननि निरखि कृपा-समुद्र हरि....।’ (विनय-पत्रिका २०५) इस प्रकार निरन्तर सर्वत्र भगवद्दर्शन ही करना चाहिये। श्रीमद्भागवत (११।२।३५)-में कहा है— यानास्थाय नरो राजन् न प्रमाद्येत कर्हिचित्। धावन् निमील्य वा नेत्रे न स्खलेन्न पतेदिह॥ यही निर्भय मार्ग है। इस मार्गमें चलनेवाला कभी किसी अन्तरायसे आक्रान्त नहीं होता। एष निष्कण्टकः पन्था यत्र सम्पूज्यते हरिः। कुपथं तं विजानीयाद् गोविन्दरहितागमम्॥ इस प्रकार सबको ब्रह्ममय देखते हुए जबतक तुम अपने आत्माको भी ब्रह्मसे अभिन्न न देखोगे, तबतक तुम अपने प्रियतम परब्रह्मकी पूर्णताकी रक्षा नहीं कर सकोगे। अतः तुम अपनेको भी प्रभुमें ही समर्पित कर दो। किंतु वह समर्पण किया कैसे जाय? उसका स्वरूप क्या है? क्या घड़ेमें बेर डालना बेरका समर्पण है? इसका नाम समर्पण नहीं है। समर्पणमें अपनी सत्ता पृथक् नहीं रहती, जिस प्रकार घटाकाशकी सत्ता महाकाशसे पृथक् नहीं है। जिस समय तरंग समुद्रमें लीन होती है, उस समय क्या समुद्रसे पृथक् उसकी उपलब्धि हो सकती है? अतः भगवान्से पृथक् अपनी सत्ता न रखना ही उनका सम्मान है। यदि तुम उनसे अपना भेद रखते हो तो तुम उनका अनादर करते हो। भला, जिस पत्नीने अपने पतिको त्याग दिया हो, उसकी कीर्ति हो सकती है? इसी प्रकार यदि जीव अपनेको परब्रह्मसे पृथक् समझे तो उसके लिये इससे बढ़कर और क्या कलंक हो सकता है? ऐसा कलंक तो उसके लिये आत्मघातके समान है; क्योंकि— ‘सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते॥’ (गीता २।३४) इसीलिये उपनिषद् पढ़नेवाले भगवान्से प्रार्थना करते हैं—‘माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोत्, अनिराकरणमस्तु’ (केनोपनिषद् शान्तिपाठ)। प्रभु दीर्घकालसे हमारा निराकरण करते आये हैं और हम प्रभुका निराकरण करते आये हैं। इसीसे हमें कीट-पतंगादि योनियोंमें भ्रमना पड़ा है। यह अनिराकरण तो प्रभुकी कृपासे ही होगा। वे ही हमें ऐसी बुद्धि प्रदान कर सकते हैं; क्योंकि ये चरण असत्पुरुषोंको अत्यन्त दुष्प्राप हैं। जिस समय पुरुषोंका संसरण समाप्त होनेको होता है, हे नाथ! तभी आपके श्रीचरणोंमें प्राणियोंको रति होती है। वस्तुतः मायामोहित जीव बरबस प्रभुको भूलकर प्रपंचमें फँसा हुआ है और प्रभुकी उपेक्षा करता है। अतएव ऋषि यही प्रार्थना करता है—हे दयामय! आप ही कृपा करें कि मैं आपका अनादर या उपेक्षा न करूँ। हे दयामय! मायामोहित होकर ही हमने आपका अनादर किया है। अपने अन्तरात्मा प्रियतम सर्वस्वका अपमान मोहसे ही हमने किया है, अतः आप मेरी उपेक्षा न
३०६ भक्तिसुधा करें। इस प्रार्थनाके साथ-साथ आपहीसे यह भी प्रार्थना है कि मैं आपका अनादर न करूँ। अक्रूरजी महाराज कहते हैं— सोऽहं तवाङ्घ्र्युपगतोऽस्म्यसतां दुरापं तच्चाप्यहं भवदनुग्रह ईश मन्ये। पुंसो भवेद् यर्हि संसरणापवर्ग- स्त्वय्यब्जनाभ सदुपासनया मतिः स्यात्॥ (श्रीमद्भा० १०।४०।२८) हे नाथ! आज मैं आपके चरणोंकी शरण आया हूँ, यह भी आपके अनुग्रहका फल है। जबतक प्रभु कृपा न करें, जबतक वे हाथ न लगायें, तबतक हमारी नैया किनारे नहीं लग सकती। श्रीगोसाईंजी महाराजका कथन है— ग्यान-भगति साधन अनेक, सब सत्य, झूठ कछु नाहीँ। (वि०प० ११६) प्रभुकृपाकी प्रतीक्षा करते रहना चाहिये अर्थात् ये सारे साधन हैं तथापि जबतक आपका करावलम्ब न हो, तबतक मेरे किये तो कुछ होना नहीं है। अतः ऐसी बुद्धि तो प्रभुकृपासाध्य है। हमें तो केवल प्रभुकृपाकी प्रतीक्षा करते रहना चाहिये। आखिर जाओगे कहाँ? दर-दर घूमते जन्म-जन्मान्तर बीत गये, कहीं कोई ठिकाना नहीं मिला। अब प्रभुके सिवा और आश्रय ही कहाँ है? तत्तेऽनुकम्पां सुसमीक्षमाणो भुञ्जान एवात्मकृतं विपाकम्। हृद्वाग्वपुर्भिर्विदधन्नमस्ते जीवेत यो मुक्तिपदे स दायभाक्॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।८) भगवान्की कृपा कब होती है, इसका कोई निश्चित समय नहीं है। इसलिये हर समय सावधान रहो। ऐसा न हो, तुम्हारी असावधानीमें प्रभुकृपाकी घड़ी यों ही निकल जाय और तुम उससे वंचित ही रह जाओ। मान लो, भगवान् कोई परदानशीन स्वामी हैं और तुम उनके द्वारपर बैठे हो। वे हर समय तो परदेसे बाहर आते नहीं हैं, परंतु जिस समय वे आये उस समय तुम सो गये तो इसमें प्रभुका क्या दोष है? इसलिये तुम सदा सावधान रहो। प्रभु अतिथिका अनादर कभी नहीं करते। वे दीनवत्सल हैं; उन्हें दीन बहुत प्यारे हैं। इसीसे श्रीगोसाईंजी कहते हैं— जाउँ कहाँ तजि चरन तुम्हारे। काको नाम पतित-पावन जग, केहि अति दीन पियारे॥ (वि०प० १०१) इसलिये हमें प्रभुको छोड़कर कहीं अन्यत्र नहीं जाना चाहिये। धनियोंके द्वारोंपर हम बहुत भटक लिये। अब उनका मुख मत देखो। वेदान्तदेशिकाचार्यजी कहते हैं— दुरीश्वरद्वारबहिर्वितर्दिका दुरासिकायै रचितोऽयमञ्जलिः। यदञ्जनाभं निरपायमस्ति मे धनञ्जयस्यन्दनभूषणं धनम्॥ दुरीश्वरोंके द्वारकी बहिर्वितर्दिकापर दुराशाको लेकर जो बैठना है, उसके लिये मैंने हाथ जोड़ दिया; क्योंकि हमारे पास तो धनंजयके रथका अति सुन्दर भूषण अंजनाभ श्रीकृष्ण ही अनपाय धन हैं। फिर हमें औरकी क्या आवश्यकता है? परंतु सो मत जाना; सदा सावधान रहकर प्रभुकी ओर टकटकी लगाये रहना। प्रभुका प्राकट्य बहुत जल्दी-जल्दी हुआ करता है। यहाँ अध्यात्म-प्रेमियोंको तनिक ध्यान देना चाहिये। देखिये, घटाकार वृत्तिकी निवृत्ति हुई और अभी पटाकार वृत्तिका उदय नहीं हुआ। इस सन्धिमें प्रभुकी झाँकी होती है। अज्ञान और उसके कार्य प्रभुके आवरक हैं। विषयको प्रकाशित करनेवाली वृत्तिका नाम प्रमाण है, विषयको प्रमेय कहते हैं और प्रमाणके आश्रयभूत चेतनका नाम प्रमाता है। इनमें एकके न रहनेपर तीनों ही नहीं रहते। किंतु इन तीनोंका और इन तीनोंके अभावका प्रकाशक आत्मा है। इसी भावको यह श्लोक व्यक्त करता है— एकमेकतराभावे यदा नोपलभामहे। त्रितयं तत्र यो वेद स आत्मा स्वाश्रयाश्रयः॥ (श्रीमद्भा० २।१०।९)
श्रीरामलीलारहस्य ३०७ अतः जिस समय प्रमाता एक वृत्ति उत्पादन करके शान्त होता है, उसके पश्चात् दूसरी वृत्ति उत्पन्न करनेसे पूर्व वह विश्राम लेता है। उस विश्रान्तिके समय ही उसके शुद्ध स्वरूपकी उपलब्धि होती है। इसलिये प्रति पल सावधान रहो। निमेषोन्मेष करना भी भूल जाओ। सदा निर्निमेष दृष्टिसे प्रभुकी बाट निहारते रहो। हमें प्रभुका निराकरण नहीं करना चाहिये और प्रभुसे प्रार्थना करनी चाहिये कि वे हमारा निराकरण न करें। इस प्रकार सारे लौकिक-वैदिक कर्मोंको प्रभुसे अभिन्न समझना ही प्रभुकी परमोत्कृष्ट भक्ति है। यह प्रभुका अनादर नहीं है। ब्रह्मज्ञानके अधिकारीका निर्णय किंतु दुराचारियोंने ब्रह्मज्ञानपर कलंक लगा दिया। जो बात सर्वोच्च कोटिकी थी, उसे वे श्रीगणेशमें ही करने लगे। जिसने भगवत्तत्त्वको प्राप्त कर लिया है, वह यदि वैदिक-स्मार्तकर्मोंको छोड़ता है तो ठीक ही है, किंतु जिसने अभी प्रभुकी ओर पदार्पण भी नहीं किया, वह यदि अपने कर्तव्य- कर्मोंको तिलांजलि देता है तो उसका कल्याण अनन्तकोटि जन्मोंमें भी नहीं होगा। जिसे सुधा- समुद्रकी प्राप्ति हो गयी है; वह यदि वापी, कूप, तड़ागादिकी अवहेलना करेगा तो प्यासा मर जायगा ! अतः पहले अपनेको भगवान्में समर्पित करो; पहले सबको ब्रह्मरूप देखो, पीछे अपनेको ब्रह्मरूप देखना। यह ठीक है कि अनभिज्ञ लोग ब्रह्मतत्त्वका साक्षात्कार किये बिना ही लौकिक-वैदिक कर्मोंका मिथ्यात्व मान बैठेंगे। किंतु यह उनकी अनधिकार- चेष्टा ही होगी। जिन्होंने श्रौत-स्मार्तकर्मोंका अनुष्ठान नहीं किया; जिन्हें इहामुत्रफलभोगसे वैराग्य नहीं हुआ, जो सदसद्वस्तुका विवेक करनेमें असमर्थ हैं, जिनके पास शमदमादि साधनोंका भी अभाव है और जिन्हें विषयी जनोंकी भोगेच्छाके समान तीव्र मुमुक्षा नहीं है, वे तो ब्रह्मजिज्ञासाके अधिकारी ही नहीं हैं। ऐसे लोगोंको ब्रह्मज्ञानमें प्रवृत्त होनेके लिये तो भगवान् शंकराचार्यने निषेध किया है। श्रीगोसाईंजी महाराज भी कहते हैं— 'बादि बिरति बिनु ब्रह्मबिचारू ॥' (रा०च०मा० २।१७८।४) ऐसे अनधिकारी लोग जब ब्रह्मविद्याकी ओर प्रवृत्त होते हैं, तब वे धर्म, कर्म और पाप-पुण्यादिका तो मिथ्यात्व निश्चय कर लेते हैं, किंतु भोगको सत्य ही मानते हैं। अतः निश्चय हुआ कि 'वत्सा बालाश्च क्रन्दन्ति' यह कथन ठीक ही है। इसीका उत्तर भगवान् देते हैं कि वे नहीं रोयेंगे, क्योंकि इसमें वेद-शास्त्रादिका दोष नहीं है। शास्त्रमें तो सभी प्रकारके साधनोंका निरूपण है। उसमें यह नियम नहीं है कि प्रत्येक व्यक्तिके लिये वे सभी साधन कर्तव्य हैं; उनमें जिसके लिये जो साधन उपयुक्त हो, उसे उसीका आश्रय लेना चाहिये। औषधालयमें सभी प्रकारकी ओषधियाँ रहती हैं। इस बातका निर्णय तो वैद्य ही कर सकता है कि किस रोगीको कौन-सी ओषधि देनी चाहिये। यदि वैद्यकी शरण न लेकर रोगी स्वयं ही मनमानी ओषधि लेने लगे तो इसमें वैद्य या औषधालयका क्या दोष ? यह तो उसीका अपराध है। इसी प्रकार शास्त्रोक्त कौन साधन किसके लिये उपयुक्त है, इसका निर्णय तो श्रोत्रिय और ब्रह्मनिष्ठ गुरु ही कर सकते हैं। अतः आत्मकल्याणकी इच्छा रखनेवाले साधकोंको उन्हींकी शरण लेनी चाहिये। कर्म और उपासनाका समुच्चय शास्त्रमें तो जहाँ कर्मका प्रकरण है, वहाँ ज्ञानकी निन्दा की गयी है और जहाँ ज्ञानका प्रकरण है, वहाँ कर्म और उपासनाकी तुच्छता दिखलायी है। ईशावास्योपनिषद् (९)-कहती है— अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते। ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायाꣳरताः ॥ अर्थात् जो केवल कर्ममें ही तत्पर रहते हैं, वे अदर्शनात्मक अज्ञानमें प्रवेश करते हैं और जो केवल उपासनामें ही लगे हुए हैं, वे तो उनसे भी अधिक अँधेरेमें जाते हैं। किंतु यहाँ जो कर्म और उपासनाकी
३०८ भक्तिसुधा निन्दा की गयी है, वह कर्म या उपासनाके त्यागके लिये नहीं है, बल्कि उनके समुच्चयानुष्ठानका विधान करनेके लिये है। मीमांसकोंका मत है— 'नहि निन्दा निन्द्यं निन्दितुं प्रवर्तते अपितु विधेयं स्तोतुम्।' यदि उपर्युक्त श्रुतिका अभिप्राय कर्म और उपासनाके त्यागमें ही होता तो श्रुत्यन्तरसे जो कर्म और उपासनाका विधान सुना जाता है, वह अप्रामाणिक हो जायगा और इस प्रकार श्रुतिविरोध भी होगा। इसीसे भगवान् शंकराचार्यजी कहते हैं— 'न शास्त्रविहितं किञ्चिदप्यकर्तव्यतामियात्।' अतः इस निन्दाका अभिप्राय कर्म और उपासनाके त्यागमें नहीं, बल्कि उसके समुच्चयकी स्तुतिमें है। इसलिये केवल कर्म या केवल उपासनामें प्रवृत्त न होकर उन दोनोंका साथ-साथ अनुष्ठान करना चाहिये। यदि कर्म और उपासनासे 'अन्धं तमः' की ही प्राप्ति हुआ करती तो 'विद्यया देवलोकः कर्मणा पितृलोकः' ऐसी विधि न होती। यद्यपि कहीं-कहीं त्यागके लिये भी निन्दा की जाती है; जैसे मिथ्या-भाषणादिकी। किंतु यहाँ ऐसा नहीं हो सकता; क्योंकि यहाँ इसकी विधि पायी जाती है। श्रुतिमें ऐसा बहुत देखा जाता है कि कहीं एक वस्तुका विधान और कहीं उसीका निषेध है। आपाततः इसमें बहुत विरोध मालूम होता है। विधि धर्मके लिये होती है और निषेध पापके लिये। एक ही कर्ममें पाप और पुण्य दोनों हो नहीं सकते। किंतु ऐसा देखा जाता है कि 'अग्नीषोमीयं पशुमालभेत' और 'मा हिंस्यात्सर्वभूतानि' इत्यादि वाक्योंमेंसे एक हिंसाका विधान और दूसरा उसका निषेध करता है। इसका तात्पर्य यही समझना चाहिये कि यागोपयुक्त हिंसाका निषेध नहीं है और यागानुपयुक्त हिंसाका निषेध किया गया है। अर्थवादका आपाततः प्रतीयमान अर्थ नहीं लिया जाता। पूर्वमीमांसक तो अर्थवादका स्वार्थमें तात्पर्य ही नहीं मानते। उत्तरमीमांसकोंका विचार दूसरा है। वे अर्थवादके तीन भेद मानते हैं—भूतवाद, गुणवाद और अनुवाद। जो मानान्तर सिद्ध अर्थका प्रतिपादन करता है, उसे अनुवाद कहते हैं; जैसे—'अग्निर्हिमस्य भेषजम्।' जो मानान्तरसे विरुद्ध अर्थका प्रतिपादन करता है, उसे गुणवाद कहा जाता है; जैसे 'आदित्यो यूपः' और जो मानान्तरसे अविरुद्ध और मानान्तरसे असिद्ध अर्थका प्रतिपादन करता है, उसे भूतवाद कहते हैं; जैसे 'वज्रहस्तः पुरन्दरः।' प्रस्तुत अर्थवाद गुणवाद है; क्योंकि वह श्रुत्यन्तरसे विहित कर्म और उपासनाकी निन्दा करता है अर्थात् मानान्तरसे विरुद्ध अर्थका प्रतिपादन करता है। किंतु यहाँ जो कर्म और उपासनाके फलको अन्धंतम कहा है, वह सापेक्ष है। इस प्रसंगमें महाभारतकी एक कथाका स्मरण होता है। एक ब्राह्मण गायत्रीका जप किया करता था। उसकी प्रौढ़ जपनिष्ठासे प्रसन्न होकर गायत्रीदेवी उसके सम्मुख प्रकट हुईं। देवीने उस ब्राह्मणदेवताको वर दिया कि जापकको जिस नरककी प्राप्ति होती है, वह तुम्हें न मिले। जापकको नरक मिलता है—यह बात बड़ी कुतूहलजनक मालूम होती है। परंतु इसका तात्पर्य दूसरा है। यहाँ ब्रह्मलोकको ही 'नरक' कहा गया है; क्योंकि विशुद्ध ब्रह्मकी अपेक्षा ब्रह्मलोक निकृष्ट ही है। अतः उसे नरक कहा जाय तो अनुचित न होगा। इसी प्रकार यहाँ जो अदर्शनात्मक तम कहा है, वह मोक्षपदकी अपेक्षासे ही है। उपासनासे और भी अधिक 'अन्धं तमः' की प्राप्ति बतलायी, इसका कारण यह है कि उपासना मानस कृत्य है; सर्वसाधारणके लिये यह भी सुगम नहीं है। भला, जिन लोगोंके हस्तपादादि देहावयव भी सुसंयत नहीं हैं, वे उस मानव-व्यापारको ठीक-ठीक कैसे निभा सकेंगे? कर्म करनेसे कर्मेन्द्रियाँ और ज्ञानेन्द्रियाँ सुसंयत होती हैं; क्योंकि कर्मकाण्डमें प्रत्येक चेष्टा नियमबद्ध है। खाना, पीना, सोना, बोलना सभी नियमित रूपसे ही करना पड़ता है। वैदिक कर्मोंका अनुष्ठान करते समय जिस कर्मके लिये जैसी विधि है, उससे तनिक भी इधर-उधर होनेपर प्रायश्चित्त करना पड़ता है।
श्रीरासलीलारहस्य ३०९
इसलिए कर्मानुष्ठानसे इन्द्रियोंकी प्रवृत्ति सर्वथा सुसंयत हो जाती है। इन्द्रियोंके संयत होनेपर उपासनामें प्रवृत्त होना सम्भव है। इसीसे उपासकको कर्ममें भी प्रवृत्त करनेके लिये यह श्रुति केवल उपासनामें भय प्रदर्शित करती है। कर्मकाण्डीको जो 'अन्धं तमः' की प्राप्ति बतलायी, वह इसलिये है कि उसे केवल कर्ममें ही न रह जाना चाहिये। यदि वह कर्मजड़ हो गया तो उपासनासाध्य उत्कृष्ट फलसे वंचित रह जायगा; अतः कर्मके साथ-साथ उसे उपासनाका भी अनुष्ठान करना चाहिये। फिर जिस समय कर्म और उपासनासे ऊपर उठे हुए जिज्ञासुको श्रुति तत्त्वज्ञानका उपदेश करती है, उस समय कर्मादिसे उसकी प्रवृत्ति हटानेके लिये वह कर्मकी निन्दा करती है। उस समय वह कहती है—'प्लवा ह्येते अदृढा यज्ञरूपा' (मुण्डक० १।२।७) परंतु कर्मकाण्डका प्रतिपादन करते समय वह ऐसा कभी नहीं कह सकती। अतः भगवान् कहते हैं—'हे श्रुतियो! यदि तुम मुझमें अपना तात्पर्य निश्चय करोगी और इससे अज्ञानी लोग क्रन्दन करेंगे तो इसमें तुम्हारा दोष नहीं होगा। इसके लिये तो वे ही उत्तरदायी होंगे। उन्हें चाहिये कि वे किसी विज्ञकी शरणमें जाकर श्रुत्यर्थका अनुशीलन करें।' वस्तुतः यह पद्धति है कि जो जिस निष्ठावाला हो, उसे उसी निष्ठावालोंका संग करना चाहिये। कर्मी कर्मीका, भक्त भक्तका और ज्ञानी ज्ञानियोंका संग करें। शास्त्रका तात्पर्य समझनेके लिये भी शास्त्रज्ञ गुरुकी शरणमें ही जाना चाहिये, शास्त्रका मर्म विज्ञ पुरुष ही खोल सकते हैं। अतः भगवान् कहते हैं—'तान् पाययत दुह्यत च न'—तुम उन्हें पयपान मत कराओ और उनके लिये कर्मफल दुहनेकी चेष्टा भी मत करो। तुम तो मेरा ही प्रतिपादन करो; क्योंकि महातात्पर्यका प्रतिपादन होनेपर अवान्तर तात्पर्य तो उसीमें आ जाते हैं। यह नियम है कि किसी उत्कृष्ट धर्मका निर्वाह करनेमें निकृष्ट धर्मका अपवाद भी हो जाय तो कोई दोष नहीं होता। अतः 'पतीन् शुश्रूषध्वम्'—अपने परमतात्पर्य परब्रह्मका ही प्रतिपादन करो। एक पतिव्रता अपने पतिदेवकी चरणसेवा कर रही थी। पतिदेव सोये हुए थे। इसी समय उसका पुत्र अग्निकी ओर जाने लगा। उसके चित्तमें उसे उधर जानेसे रोकनेका विचार हुआ, परंतु ऐसा करनेके लिये उसे पतिसेवा छोड़नी पड़ती। इसलिये उसने पतिसेवाको ही अपना परम कर्तव्य समझकर बच्चेको बचानेका कोई प्रयत्न नहीं किया। इस उत्कृष्ट धर्मके प्रतापसे अग्निदेव शीतल हो गये और बालकका बाल भी बाँका नहीं हुआ। इसीसे भगवान् कहते हैं— हे श्रुतियो! जबतक तुम अपने परमतात्पर्यका विषय शुद्ध बुद्ध मुक्त परब्रह्मका प्रतिपादन करनेमें प्रवृत्त नहीं हुई थीं, तबतक तो कर्म और उपासनाका पोषण करके उन अज्ञ जनोंको पयपान करा सकती थीं, परंतु अब, जबकि तुम इस ओर आयी हो, तुम उनके लिये कर्मफलरूप दुग्धका दोहन करनेकी चेष्टा मत करो। इधर बुद्धियोंकी दृष्टिसे देखें तो उन्हें भगवान् यही उपदेश देते हैं कि 'मा यात गोष्ठम्'—घट- पटादि अनात्म विषयोंकी ओर मत जाओ; बल्कि 'शुश्रूषध्वं पतीन्' अपने अवभासक और अधिष्ठानभूत परब्रह्मकी ओर देखो। इस प्रसंगमें 'क्रन्दन्ति वत्सा बालाश्च' (श्रीमद्भा० १०।२९।२२)—इसका यह तात्पर्य है कि जबतक परब्रह्मकी अनुभूति नहीं होती, तबतक अन्तःकरण और इन्द्रियाँ घबराये रहते हैं। उनकी जो बाह्य-प्रवृत्ति है, वह उनके दुःखका ही कारण है। श्रुति कहती है— 'पराञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयम्भूः' (कठ० २।१।१) यहाँ 'व्यतृणत्' शब्दपर विशेष रूपसे विचार करना है। भगवान् भाष्यकारने 'व्यतृणत्' का पर्याय 'हिंसितवान्' लिखा है अर्थात् स्वयम्भू परमात्माने इन्द्रियोंको बहिर्मुख करके हिंसित कर दिया है। बहिर्मुख होनेमें इन्द्रियोंकी हिंसा कैसे मानी गयी? इसमें यही कहना है कि अपने प्रियतमसे विमुख कर
देना हिंसा ही तो है। इन्द्रियाँ अपने परम प्रेमास्पद सर्वान्तरतम परमात्माका अनुभव नहीं कर रहीं, बल्कि नाम-रूपात्मक संसारमें ही भटक रही हैं, यही उनका वध है। अतः जबतक हमारी समस्त इन्द्रियोंकी प्रवृत्ति परब्रह्म परमात्माकी ओर नहीं होती, तबतक वे अत्यन्त व्यग्र रहती हैं। यही उनका क्रन्दन है— मन करि बिषय अनल बन जरई। होइ सुखी जौं एहिं सर परई॥ (रा०च०मा० १।३५।८) प्रायः यह देखा जाता है कि विविधविध भोग- सामग्रीसे सम्पन्न महानुभाव भी अशान्तिके चंगुलमें फँसे रहते हैं। उनकी भोगतृष्णाको जैसे-जैसे भोजन मिलता जाता है, वैसे-वैसे ही वह और भी अधिक उत्तेजित होती जाती है। जिस प्रकार विषम विषाक्त अग्निके कटाहमें पड़ा हुआ कीट तड़पता है, उसी प्रकार सांसारिक भोगोंमें फँसे हुए जीव निरन्तर बेचैन रहते हैं। परंतु किया क्या जाय, यह उनका स्वभाव ही है; जैसे शूकरको विष्ठासे ही प्रेम होता है, उसी प्रकार इन इन्द्रियोंकी प्रीति विषयोंमें ही होती है। उस अपनी वासनाके कारण जीव दुःखमें ही सुखका अनुभव कर रहे हैं। जिस प्रकार दाद खुजलानेमें सुख मालूम होता है। उसी प्रकार विषयोंमें सुख जान पड़ता है। इस व्यामोहसे निकलो और परब्रह्म परमात्माकी ओर बढ़ो। जिस समय तुम्हारी प्रवृत्ति नामरूपोपाधिनिर्मुक्त परब्रह्ममें ही होगी, उसी समय तुम्हें शान्ति प्राप्त होगी। फिर तो 'यत्र यत्र मनो याति तत्र तत्र परं पदम्' (पैङ्गलोपनिषद् ४। २१) इस उक्तिके अनुसार सर्वत्र सुखका ही भान होगा। 'आनन्दाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते।' (तैत्तिरीय० ३।६) इस श्रुतिके अनुसार यह नामरूपात्मक जगत् आनन्दात्मक परब्रह्मसे ही उत्पन्न हुआ है। इसलिये यह आनन्दमय ही है। जिस प्रकार स्वाभाविक सौगन्ध्योपहित चन्दनमें मृत्तिका एवं जलादिके योगसे अस्वाभाविक दुर्गन्धकी प्रतीति होती है अथवा पित्त बिगड़ जानेके कारण मिश्री कड़वी जान पड़ती है, उसी प्रकार अचिन्त्यानन्त सौख्यसुधासिन्धु ब्रह्ममें अज्ञानजनित उपाधिके कारण इस दुःखमय प्रपंचकी प्रतीति होती है। अधिष्ठान ब्रह्मका ज्ञान होनेपर उसकी निवृत्ति हो जाती है। अतः 'तान् पाययत दुह्यत' इन इन्द्रियोंको पान कराओ और दुहो। क्या पान कराओ? परब्रह्मामृत; क्योंकि जब बुद्धि ब्रह्माकार रहने लगेगी तो विषय दुःखमय नहीं रहेंगे, वे भी ब्रह्ममय हो जायँगे। अतः इन्द्रियोंको उस परमानन्दसुधासिन्धुमें निमज्जित करनेके लिये दृश्यमात्रको परब्रह्म-रूपमें देखो। ऊपर जो पतिव्रताकी गाथा कही है, उसमें यदि वह पतिव्रता लौकिक साधनोंसे अपने बालकको बचानेका प्रयत्न करती तो वह सदाके लिये उसकी रक्षा नहीं कर सकती थी। उसे सदाके लिये तो वह तभी सुरक्षित कर सकती थी, जब कि अग्नि शीतल हो जाय। इसके लिये तो पतिशुश्रूषण ही एकमात्र साधन था। उस परमधर्मका दृढ़तापूर्वक पालन करके ही उसने अग्निका स्वभाव बदल दिया। सांख्य, नैयायिक और वैशेषिक आदि मतावलम्बियोंकी विवेकवती बुद्धि अपने मन, बुद्धि, इन्द्रिय और इन्द्रियवृत्तिरूप बालकोंको सर्वथा सुरक्षित नहीं करती। वह अपने बालकोंको अग्निसे बचा तो लेती है, परंतु अग्निके भयका सर्वथा नाश नहीं करती; क्योंकि प्रपंचका अत्यन्ताभाव तो उस मतमें है नहीं। यह काम तो अद्वैतनिष्ठ बुद्धि ही करती है। ऐसा कहकर हम अद्वैतवादका पक्ष नहीं करते; हमारा तो केवल यही मत है कि जिनके मतमें पूर्ण सच्चिदानन्दघन परब्रह्मसे भिन्न किसी दूसरी वस्तुकी सत्ता रहती है, उनके यहाँ तो दुःखका बीज रह ही जाता है। इसी दृष्टिसे बुद्धियोंके प्रति भगवान्का यही कथन है कि 'शुश्रूषध्वं पतीन्' तुम परब्रह्माकाराकारित वृत्तिमें परिणत होकर इन्हें ब्रह्मामृतका पान कराओ और इनकी तृष्णाको शान्त करो—इनका मनोरथ पूर्ण करो। वस्तुतः विषय-सेवनसे इन्हें सुख नहीं मिल सकता। भला मृगतृष्णाका जल पीनेसे किसीकी प्यास गयी है? उसमें जल है ही कहाँ? इसी प्रकार क्या
श्रीरासलीलारहस्य ३११ विषय-भोग-जन्य सुखोंसे इन्द्रिय और इन्द्रियवृत्तियोंको शान्ति मिल सकती है? नहीं, क्योंकि विषय और विषय-सुख तो हैं ही नहीं। अतः तुम सच्चिदानन्दघन परब्रह्मका ही अनुसन्धान करो। इससे यह नामरूपात्मक प्रपंच निवृत्त हो जायगा; फिर तो एकमात्र अचिन्त्यानन्दसौख्य-सुधा-सिन्धु परमात्मा ही रह जायगा और फिर ये उसीकी माधुरीका पान करेंगी। वस्तुतः इन्द्रियोंसे विषयोंका स्फुरण नहीं होता, बल्कि विषयावच्छिन्न चेतनका ही होता है। सबका अधिष्ठानभूत चेतन ही सत्य वस्तु है। उसके सिवा अन्य वस्तुकी सत्ता ही कहाँ है? यहाँ यह सन्देह हो सकता है कि ब्रह्म इन्द्रियोंका विषय कैसे होगा, वह तो अशब्द, अस्पर्श और मन एवं इन्द्रिय आदिका अविषय है। इसमें कहना यह है कि वस्तुतः ब्रह्म ही सारी इन्द्रियोंका विषय हो सकता है। प्रमाणका प्रामाण्य अज्ञात वस्तुका ज्ञान करानेमें ही है। अज्ञानकी दो शक्तियाँ हैं—आवरण और विक्षेप। इनमें आवरणके भी दो भेद हैं—असत्त्वापादक और अभानापादक। ये असत्त्वापादक और अभानापादक आवरक किसी स्वतः सत्ता और स्फूर्तिवाली वस्तुका ही आवरण करेंगे। ऐसी वस्तु ब्रह्म ही है। अतः वही अज्ञानका विषय हो सकता है। इसीसे संक्षेपशारीरककारका कथन है— आश्रयत्वविषयत्वभागिनी निर्भागचितिरेव केवला। पूर्वसिद्धतमसो हि पश्चिमो नाश्रयो भवति नापि गोचरः॥ मिथ्या वस्तुकी तो अज्ञात सत्ता-स्फूर्ति हुआ ही नहीं करती। इसलिये वह प्रमाणका विषय हो ही नहीं सकती। समस्त इन्द्रियोंका विषय एकमात्र परब्रह्म ही हो सकता है, अतः इन्हें उस ब्रह्मानन्द-सुधा-सिन्धुके अमृतका ही पान कराओ। विषयचिन्तनसे दुःखकी प्राप्ति मन एवं समस्त इन्द्रियाँ जबतक विषयचिन्तन करती रहेंगी, तबतक दुःख ही पायेंगी। इन्हें क्या करना चाहिये? केवल ब्रह्माभ्यास। ब्रह्माभ्यासका लक्षण इस प्रकार है— तच्चिन्तनं तत्कथनमन्योन्यं तत्प्रबोधनम्। एतदेकपरत्वं च ब्रह्माभ्यासं विदुर्बुधाः॥ यह बात निश्चित है कि हम जैसा चिन्तन करेंगे, वैसे ही बन जायँगे। इसीसे श्रुति कहती है— 'यत्क्रतुर्भवति तत् कर्म कुरुते यत् कर्म कुरुते तदभिसम्पद्यते॥' (बृहदारण्यक० ४।४।५) जिनके श्रोत्र भगवत्कथाश्रवणमें संलग्न हैं, जिनके चरण भगवद्धामोंकी यात्रा करते हैं, जिनके हाथ निरन्तर भगवत्सेवामें ही लगे रहते हैं, जिनकी घ्राणेन्द्रिय प्रभुके पादपद्मसे संलग्न तुलसिकाका ही आघ्राण करती है तथा जिनके अंग भगवद्भक्तोंके सहवासका अद्भुत आनन्द लूटते हैं, उनके लिये यह संसार संसार ही नहीं रहता। देखिये—नारद, शुकदेव, व्यास एवं वसिष्ठादिके लिये भी तो यही संसार है। वे बारम्बार देह धारण करके यहाँ आते हैं। उनके लिये यह आनन्दस्वरूप है और हमारे लिये यही विषम विषाक्त अग्निपूर्ण कटाह हो रहा है। जिनकी बुद्धिने श्रीकृष्णचन्द्ररूप परमपतिकी शुश्रूषा की है, उनके लिये यह भगवद्रूप हो गया है। इसीसे वे प्रभुके लीलाविग्रहका आस्वादन करनेके लिये सब कुछ जानकर भी थोड़ा-सा भेद स्वीकार करते हैं। शुद्ध परब्रह्म आनन्दरूप है, किंतु उसका सगुण रूप आनन्दकन्द है—वह आनन्दका ही घनीभूत रूप है। जिस प्रकार इक्षुरस मिष्ट है, किंतु शर्करा और मिश्रीमें जो माधुरी है, वह कुछ और ही है, इसी प्रकार भगवान्के दिव्यमंगल विग्रहका सुख विचित्र ही है। उनके कर, चरण, नख, अधर, भूषण, आयुध सभी परम दिव्य हैं; उनके एक-एक अवयवपर कोटि- कोटि कामदेव निछावर किये जा सकते हैं। उनकी उस परमानन्दमयी मूर्तिका सुखास्वादन करनेके लिये ही वे नित्यमुक्त महर्षिगण इस लोकमें अवतरित होते हैं और स्वरूपतः सर्वथा अभिन्न होनेपर भी प्रभुका
३१२ भक्तिसुधा
आनन्द भोगनेके लिये भेद स्वीकार करते हैं; क्योंकि बिना भेदके भोग नहीं हो सकता। यही भगवल्लीलाका निगूढ़ रहस्य है। ऊपर कहा जा चुका है कि बुद्धियोंके प्रति भगवान्का कथन है कि तुम संसारकी ओर मत जाओ, अपने परमपति परमात्माका ही अनुसन्धान करो। यहाँ 'क्रन्दन्ति वत्सा बालाश्च' का तात्पर्य यह है कि जबतक तुमलोग परब्रह्म परमात्माका अनुसन्धान न करोगी, तबतक इन्द्रिय और इन्द्रियवृत्तिरूप बालक तथा बछड़े क्रन्दन करते रहेंगे; क्योंकि ब्रह्मानुसन्धान न करनेपर तो प्रपंचकी प्रतीति बनी ही रहेगी। वस्तुतः इस संसारकी सत्ता मनकी चंचलता रहनेतक ही है, उस चंचलताका निरोध होनेपर फिर प्रपंचकी प्रतीति नहीं होती। 'मनसो ह्युन्मनीभावे द्वैतं नैवोपलभ्यते॥' (पैङ्गोपनिषद् ४।२०) अतः प्रपंचकी प्रतीति और उसके कारण इन्द्रियोंके क्रन्दनका हेतु तुम्हीं हो। जिस प्रकार महासमुद्रमें वायुके योगसे कुछ हलचल होनेपर ही तरंगमालाका प्रादुर्भाव होता है, उसी प्रकार बुद्धिके स्फुरणसे ही चित्समुद्रमें कुछ हलचल होती है। इसीका नाम मन है। योगवासिष्ठमें कहा है— स आत्मा सर्वगो राम नित्योदितवपुर्महान्। यन्मनाक् मननीं शक्तिं धत्ते तन्मन उच्यते॥ अतः थोड़ी-सी मननी शक्तिको धारण करनेपर परब्रह्म ही मनरूपसे प्रादुर्भूत होता है। किंतु मनकी वह मननी शक्ति क्या है? यदि हम इस बातका विचार करें कि तरंग क्या है तो यही निश्चय होगा कि वस्तुतः वह समुद्र ही है। वायुके कारण ही उसकी पृथक् प्रतीति होती है। इसी प्रकार मन भी मायाशक्तिके कारण ही अपने अधिष्ठानरूप परब्रह्मसे पृथक् प्रतीत होता है। अतः चित्तका जगत्- सम्बन्ध-स्फुरण ही मननी शक्ति है, वस्तुतः व्यावहारिक जगत्में स्फुरण ही चित्का चित्त्व है, वही सृष्टिका बीज है, उसीको भगवान्का ईक्षण, संकल्प अथवा आदिसंवेदन कहकर भी पुकारा जाता है। मन साक्षीभास्य माना जाता है। उसकी कभी अज्ञात सत्ता नहीं रहती। जिस प्रकार समुद्रके बिना तरंगकी सत्ता नहीं होती, उसी प्रकार शुद्ध चेतनसे भिन्न मन नहीं है। यदि मननी शक्तिका निरोध हो जाय तो चित्त चित् हो जाता है। वस्तुतः चित् तकाररहित चित्त ही है। योगवासिष्ठमें कहा है— 'चित्तं चिद्विजानीयात्तकाररहितं यदा।' यह तकार ही चंचलता है। इस चंचलताके कारण ही नित्य-शुद्ध-बुद्ध निर्विकार ब्रह्ममें प्रपंचकी प्रतीति हुई है। इसकी निवृत्ति होनेपर तो मनका मनस्त्व ही नहीं रहता। फिर तो यह प्रपंच ब्रह्म ही हो जाता है; क्योंकि वास्तवमें तो अन्वय-व्यतिरेकसे ब्रह्म ही है—ब्रह्मकी सत्तासे ही इसकी सत्ता है, ब्रह्मको छोड़कर तो इसकी सत्ता ही नहीं है। माया या अज्ञान भी अधिष्ठानसे भिन्न नहीं है। श्रीगोसाईं तुलसीदासजी कहते हैं—जिस प्रकार काष्ठमें अनेकों पुतलियाँ और कपासमें तरह-तरहके वस्त्र निहित हैं, उसी प्रकार चित्तमें ही सारा प्रपंच है। यदि चित्त स्वाधीन हो जाय तो भले ही संसारके सारे पदार्थ बने रहें, उनसे अपना क्या हानि-लाभ होता है? चित्तमें ही सारा प्रपंच है—योगवासिष्ठका एक दृष्टान्त इस विषयमें एक गाथा है—एक राजा अश्वमेध- यज्ञ कर रहा था। यज्ञीय अश्व छोड़ा गया, बहुत- से सैनिक अश्वकी रक्षा करने चले। उस अश्वको एक मुनिकुमारने पकड़ लिया और उस सारी सेनाको जीतकर वह उसे लेकर एक शिलामें घुस गया। यह अद्भुत व्यापार देखकर बचे-खुचे सैनिकोंको बड़ा आश्चर्य हुआ और उन्होंने जाकर सारा हाल राजाको सुना दिया। राजाने उस अश्वको लानेके लिये कुछ आदमियोंके साथ अपने भाईको भेजा। वह राजकुमार जब उस स्थानपर पहुँचा तो एक शिलाके सिवा वहाँ और उसे कुछ भी न मिला। उसने सोचा कि यहाँ
अवश्य कुछ मुनिश्रेष्ठ होंगे; उन्हींसे इस लीलाका रहस्य खुल सकेगा। इधर-उधर खोजनेपर उसे एक महात्मा दिखायी दिये। महात्मा समाधिस्थ थे। राजकुमार तन-मनसे उनकी सेवा-शुश्रूषा करने लगा। परंतु उनका समाधिसे उत्थान न हुआ। कुछ काल पश्चात् उसकी सच्ची लगन देखकर वही मुनिकुमार प्रकट हुआ और उसे वह यज्ञीय घोड़ा दे दिया। राजकुमारने वह अश्व दूसरे मनुष्योंके साथ राजधानीको भेज दिया और स्वयं वहीं रह गया। तब मुनिकुमारने पूछा—'राजन्! तुम क्या चाहते हो?' राजकुमारने कहा—'भगवन्! मेरी यही इच्छा है कि इन मुनिश्रेष्ठका समाधिसे व्युत्थान हो।' इसपर मुनिकुमारने कहा—'ऐसा होना तो बहुत कठिन है; क्योंकि इस समय ये स्थूल, सूक्ष्म और कारण तीनों शरीरोंका अतिक्रमणकर केवल सत्तामात्र परब्रह्मके साथ एकीभावसे स्थित हैं। तथापि मैं प्रयत्न करता हूँ'— ऐसा कहकर मुनिकुमार समाधिस्थ हो गया। उसने तीनों शरीरोंसे सम्बन्ध छोड़कर सन्मात्रमें स्थित हो मुनिवरके सन्मात्र तत्त्वमें स्थित आत्माको उद्बुद्ध किया। इससे मुनिकी समाधि खुल गयी। मुनिवरने राजकुमार और समाधिस्थ मुनिकुमारको देखा तथा योगबलसे सारा रहस्य जानकर मुनिकुमारको उद्बुद्ध किया। फिर राजकुमारने मुनिवरसे प्रार्थना की—'भगवन्! आप मुझे अपना परिचय देकर कृतार्थ करें और ये मुनिकुमार हमारा अश्व लेकर किस प्रकार इस शिलामें घुस गये थे, यह सब रहस्य बतलानेकी कृपा करें।' मुनिने कहा—'राजन्! पूर्वकालमें मैं एक राजा था। संसारसे निर्वेद होनेपर मैं अपना राज्य छोड़कर सपत्नीक यहाँ तपस्या करने चला आया। एक दिन जब कि मैं समाधिस्थ था, दैववश मेरी रानीकी वृत्ति कुछ चंचल हो गयी और उसने संकल्पसे ही मेरे साथ मैथुन किया। उससे वह गर्भवती हो गयी और यथासमय उससे यह पुत्र उत्पन्न हुआ। पुत्र-प्रसवके पश्चात् उसने तो शरीर छोड़ दिया, फिर मैंने ही इसका लालन-पालन किया। कुछ वयस्क होनेपर इसकी इच्छा राज्य भोगनेकी हुई। तब मैंने इसे योगाभ्यासमें लगाया, उसमें सिद्धि प्राप्त करनेपर इसने संकल्पसे ही इस शिलामें एक ब्रह्माण्ड रच लिया है। यह उस ब्रह्माण्डका ईश्वर है। तुम्हारे अश्वको भी यह वहीं ले गया था।' यह सब वृत्तान्त सुनकर कुतूहलवश राजकुमारको उस मुनिकुमारके संकल्पित ब्रह्माण्डको देखनेकी इच्छा हुई। तब मुनिकुमारने कहा—'अच्छा, तुम मेरे साथ चलो।' किंतु जब राजकुमारने उसके साथ शिलामें प्रवेश करनेका प्रयत्न किया तो वह सफल न हुआ। तब मुनिकुमारने अपने योगबलसे उसे अपने साथ ले लिया। उस शिलामें प्रवेश करनेपर उसे इस ब्रह्माण्डकी अपेक्षा भी अधिक विस्तृत ब्रह्माण्ड दिखायी दिया। वहाँ उसने ऐसा ही आकाश देखा तथा वहाँके ब्रह्मलोक, इन्द्रलोक, वैकुण्ठ, पाताल और रसातलादिमें जाकर ब्रह्मा, विष्णु आदि सब देवताओंका भी दर्शन किया। उसने यह भी देखा कि वहाँ वह मुनिकुमार ही सबसे अधिक पूजनीय है; वहाँके देवगण भी उसे अपना ईश्वर समझते हैं। इस प्रकार केवल एक दिनमें ही उसने वह सारा ब्रह्माण्ड देख लिया। तब उसे फिर इस लोकमें आनेकी इच्छा हुई। उसके कहनेसे मुनिकुमार उसे बाहर ले आया; किंतु उसने देखा कि वहाँका सारा ही रंग-ढंग बदला हुआ है। जहाँ पर्वत था, वह विस्तृत समतल भूमि है, जहाँ नदी थी, वहाँ मरुभूमि दिखायी देती है और जहाँ वन था, वहाँ नगर बसे हुए हैं। यह देखकर उसने मुनिकुमारसे इसका कारण पूछा। मुनिकुमारने कहा—'तुम्हें मेरे ब्रह्माण्डमें तो एक ही दिन व्यतीत हुआ जान पड़ा था; किंतु उतने ही समयमें यहाँ कई युग बीत गये हैं। इसलिये अब यहाँ सब कुछ बदल गया है। तुम्हारे कुलमें भी अब बहुत-सी पीढ़ियाँ बीत चुकी हैं; तुम्हारे सामने जितने मनुष्य थे, उनमें तो केवल तुम ही रह गये हो।' यह सुनकर राजाको बड़ा विस्मय और विषाद हुआ। फिर उसने मुनिकुमारसे इसका रहस्य पूछा।