भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीरासलीलारहस्य ३११ विषय-भोग-जन्य सुखोंसे इन्द्रिय और इन्द्रियवृत्तियोंको शान्ति मिल सकती है? नहीं, क्योंकि विषय और विषय-सुख तो हैं ही नहीं। अतः तुम सच्चिदानन्दघन परब्रह्मका ही अनुसन्धान करो। इससे यह नामरूपात्मक प्रपंच निवृत्त हो जायगा; फिर तो एकमात्र अचिन्त्यानन्दसौख्य-सुधा-सिन्धु परमात्मा ही रह जायगा और फिर ये उसीकी माधुरीका पान करेंगी। वस्तुतः इन्द्रियोंसे विषयोंका स्फुरण नहीं होता, बल्कि विषयावच्छिन्न चेतनका ही होता है। सबका अधिष्ठानभूत चेतन ही सत्य वस्तु है। उसके सिवा अन्य वस्तुकी सत्ता ही कहाँ है? यहाँ यह सन्देह हो सकता है कि ब्रह्म इन्द्रियोंका विषय कैसे होगा, वह तो अशब्द, अस्पर्श और मन एवं इन्द्रिय आदिका अविषय है। इसमें कहना यह है कि वस्तुतः ब्रह्म ही सारी इन्द्रियोंका विषय हो सकता है। प्रमाणका प्रामाण्य अज्ञात वस्तुका ज्ञान करानेमें ही है। अज्ञानकी दो शक्तियाँ हैं—आवरण और विक्षेप। इनमें आवरणके भी दो भेद हैं—असत्त्वापादक और अभानापादक। ये असत्त्वापादक और अभानापादक आवरक किसी स्वतः सत्ता और स्फूर्तिवाली वस्तुका ही आवरण करेंगे। ऐसी वस्तु ब्रह्म ही है। अतः वही अज्ञानका विषय हो सकता है। इसीसे संक्षेपशारीरककारका कथन है— आश्रयत्वविषयत्वभागिनी निर्भागचितिरेव केवला। पूर्वसिद्धतमसो हि पश्चिमो नाश्रयो भवति नापि गोचरः॥ मिथ्या वस्तुकी तो अज्ञात सत्ता-स्फूर्ति हुआ ही नहीं करती। इसलिये वह प्रमाणका विषय हो ही नहीं सकती। समस्त इन्द्रियोंका विषय एकमात्र परब्रह्म ही हो सकता है, अतः इन्हें उस ब्रह्मानन्द-सुधा-सिन्धुके अमृतका ही पान कराओ। विषयचिन्तनसे दुःखकी प्राप्ति मन एवं समस्त इन्द्रियाँ जबतक विषयचिन्तन करती रहेंगी, तबतक दुःख ही पायेंगी। इन्हें क्या करना चाहिये? केवल ब्रह्माभ्यास। ब्रह्माभ्यासका लक्षण इस प्रकार है— तच्चिन्तनं तत्कथनमन्योन्यं तत्प्रबोधनम्। एतदेकपरत्वं च ब्रह्माभ्यासं विदुर्बुधाः॥ यह बात निश्चित है कि हम जैसा चिन्तन करेंगे, वैसे ही बन जायँगे। इसीसे श्रुति कहती है— 'यत्क्रतुर्भवति तत् कर्म कुरुते यत् कर्म कुरुते तदभिसम्पद्यते॥' (बृहदारण्यक० ४।४।५) जिनके श्रोत्र भगवत्कथाश्रवणमें संलग्न हैं, जिनके चरण भगवद्धामोंकी यात्रा करते हैं, जिनके हाथ निरन्तर भगवत्सेवामें ही लगे रहते हैं, जिनकी घ्राणेन्द्रिय प्रभुके पादपद्मसे संलग्न तुलसिकाका ही आघ्राण करती है तथा जिनके अंग भगवद्भक्तोंके सहवासका अद्भुत आनन्द लूटते हैं, उनके लिये यह संसार संसार ही नहीं रहता। देखिये—नारद, शुकदेव, व्यास एवं वसिष्ठादिके लिये भी तो यही संसार है। वे बारम्बार देह धारण करके यहाँ आते हैं। उनके लिये यह आनन्दस्वरूप है और हमारे लिये यही विषम विषाक्त अग्निपूर्ण कटाह हो रहा है। जिनकी बुद्धिने श्रीकृष्णचन्द्ररूप परमपतिकी शुश्रूषा की है, उनके लिये यह भगवद्रूप हो गया है। इसीसे वे प्रभुके लीलाविग्रहका आस्वादन करनेके लिये सब कुछ जानकर भी थोड़ा-सा भेद स्वीकार करते हैं। शुद्ध परब्रह्म आनन्दरूप है, किंतु उसका सगुण रूप आनन्दकन्द है—वह आनन्दका ही घनीभूत रूप है। जिस प्रकार इक्षुरस मिष्ट है, किंतु शर्करा और मिश्रीमें जो माधुरी है, वह कुछ और ही है, इसी प्रकार भगवान्के दिव्यमंगल विग्रहका सुख विचित्र ही है। उनके कर, चरण, नख, अधर, भूषण, आयुध सभी परम दिव्य हैं; उनके एक-एक अवयवपर कोटि- कोटि कामदेव निछावर किये जा सकते हैं। उनकी उस परमानन्दमयी मूर्तिका सुखास्वादन करनेके लिये ही वे नित्यमुक्त महर्षिगण इस लोकमें अवतरित होते हैं और स्वरूपतः सर्वथा अभिन्न होनेपर भी प्रभुका