भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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३१२ भक्तिसुधा

आनन्द भोगनेके लिये भेद स्वीकार करते हैं; क्योंकि बिना भेदके भोग नहीं हो सकता। यही भगवल्लीलाका निगूढ़ रहस्य है। ऊपर कहा जा चुका है कि बुद्धियोंके प्रति भगवान्‌का कथन है कि तुम संसारकी ओर मत जाओ, अपने परमपति परमात्माका ही अनुसन्धान करो। यहाँ 'क्रन्दन्ति वत्सा बालाश्च' का तात्पर्य यह है कि जबतक तुमलोग परब्रह्म परमात्माका अनुसन्धान न करोगी, तबतक इन्द्रिय और इन्द्रियवृत्तिरूप बालक तथा बछड़े क्रन्दन करते रहेंगे; क्योंकि ब्रह्मानुसन्धान न करनेपर तो प्रपंचकी प्रतीति बनी ही रहेगी। वस्तुतः इस संसारकी सत्ता मनकी चंचलता रहनेतक ही है, उस चंचलताका निरोध होनेपर फिर प्रपंचकी प्रतीति नहीं होती। 'मनसो ह्युन्मनीभावे द्वैतं नैवोपलभ्यते॥' (पैङ्गोपनिषद् ४।२०) अतः प्रपंचकी प्रतीति और उसके कारण इन्द्रियोंके क्रन्दनका हेतु तुम्हीं हो। जिस प्रकार महासमुद्रमें वायुके योगसे कुछ हलचल होनेपर ही तरंगमालाका प्रादुर्भाव होता है, उसी प्रकार बुद्धिके स्फुरणसे ही चित्समुद्रमें कुछ हलचल होती है। इसीका नाम मन है। योगवासिष्ठमें कहा है— स आत्मा सर्वगो राम नित्योदितवपुर्महान्। यन्मनाक् मननीं शक्तिं धत्ते तन्मन उच्यते॥ अतः थोड़ी-सी मननी शक्तिको धारण करनेपर परब्रह्म ही मनरूपसे प्रादुर्भूत होता है। किंतु मनकी वह मननी शक्ति क्या है? यदि हम इस बातका विचार करें कि तरंग क्या है तो यही निश्चय होगा कि वस्तुतः वह समुद्र ही है। वायुके कारण ही उसकी पृथक् प्रतीति होती है। इसी प्रकार मन भी मायाशक्तिके कारण ही अपने अधिष्ठानरूप परब्रह्मसे पृथक् प्रतीत होता है। अतः चित्तका जगत्- सम्बन्ध-स्फुरण ही मननी शक्ति है, वस्तुतः व्यावहारिक जगत्‌में स्फुरण ही चित्‌का चित्त्व है, वही सृष्टिका बीज है, उसीको भगवान्‌का ईक्षण, संकल्प अथवा आदिसंवेदन कहकर भी पुकारा जाता है। मन साक्षीभास्य माना जाता है। उसकी कभी अज्ञात सत्ता नहीं रहती। जिस प्रकार समुद्रके बिना तरंगकी सत्ता नहीं होती, उसी प्रकार शुद्ध चेतनसे भिन्न मन नहीं है। यदि मननी शक्तिका निरोध हो जाय तो चित्त चित् हो जाता है। वस्तुतः चित् तकाररहित चित्त ही है। योगवासिष्ठमें कहा है— 'चित्तं चिद्विजानीयात्तकाररहितं यदा।' यह तकार ही चंचलता है। इस चंचलताके कारण ही नित्य-शुद्ध-बुद्ध निर्विकार ब्रह्ममें प्रपंचकी प्रतीति हुई है। इसकी निवृत्ति होनेपर तो मनका मनस्त्व ही नहीं रहता। फिर तो यह प्रपंच ब्रह्म ही हो जाता है; क्योंकि वास्तवमें तो अन्वय-व्यतिरेकसे ब्रह्म ही है—ब्रह्मकी सत्तासे ही इसकी सत्ता है, ब्रह्मको छोड़कर तो इसकी सत्ता ही नहीं है। माया या अज्ञान भी अधिष्ठानसे भिन्न नहीं है। श्रीगोसाईं तुलसीदासजी कहते हैं—जिस प्रकार काष्ठमें अनेकों पुतलियाँ और कपासमें तरह-तरहके वस्त्र निहित हैं, उसी प्रकार चित्तमें ही सारा प्रपंच है। यदि चित्त स्वाधीन हो जाय तो भले ही संसारके सारे पदार्थ बने रहें, उनसे अपना क्या हानि-लाभ होता है? चित्तमें ही सारा प्रपंच है—योगवासिष्ठका एक दृष्टान्त इस विषयमें एक गाथा है—एक राजा अश्वमेध- यज्ञ कर रहा था। यज्ञीय अश्व छोड़ा गया, बहुत- से सैनिक अश्वकी रक्षा करने चले। उस अश्वको एक मुनिकुमारने पकड़ लिया और उस सारी सेनाको जीतकर वह उसे लेकर एक शिलामें घुस गया। यह अद्भुत व्यापार देखकर बचे-खुचे सैनिकोंको बड़ा आश्चर्य हुआ और उन्होंने जाकर सारा हाल राजाको सुना दिया। राजाने उस अश्वको लानेके लिये कुछ आदमियोंके साथ अपने भाईको भेजा। वह राजकुमार जब उस स्थानपर पहुँचा तो एक शिलाके सिवा वहाँ और उसे कुछ भी न मिला। उसने सोचा कि यहाँ