भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 323, कुल 778 में से

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पृष्ठ 323

अवश्य कुछ मुनिश्रेष्ठ होंगे; उन्हींसे इस लीलाका रहस्य खुल सकेगा। इधर-उधर खोजनेपर उसे एक महात्मा दिखायी दिये। महात्मा समाधिस्थ थे। राजकुमार तन-मनसे उनकी सेवा-शुश्रूषा करने लगा। परंतु उनका समाधिसे उत्थान न हुआ। कुछ काल पश्चात् उसकी सच्ची लगन देखकर वही मुनिकुमार प्रकट हुआ और उसे वह यज्ञीय घोड़ा दे दिया। राजकुमारने वह अश्व दूसरे मनुष्योंके साथ राजधानीको भेज दिया और स्वयं वहीं रह गया। तब मुनिकुमारने पूछा—'राजन्! तुम क्या चाहते हो?' राजकुमारने कहा—'भगवन्! मेरी यही इच्छा है कि इन मुनिश्रेष्ठका समाधिसे व्युत्थान हो।' इसपर मुनिकुमारने कहा—'ऐसा होना तो बहुत कठिन है; क्योंकि इस समय ये स्थूल, सूक्ष्म और कारण तीनों शरीरोंका अतिक्रमणकर केवल सत्तामात्र परब्रह्मके साथ एकीभावसे स्थित हैं। तथापि मैं प्रयत्न करता हूँ'— ऐसा कहकर मुनिकुमार समाधिस्थ हो गया। उसने तीनों शरीरोंसे सम्बन्ध छोड़कर सन्मात्रमें स्थित हो मुनिवरके सन्मात्र तत्त्वमें स्थित आत्माको उद्बुद्ध किया। इससे मुनिकी समाधि खुल गयी। मुनिवरने राजकुमार और समाधिस्थ मुनिकुमारको देखा तथा योगबलसे सारा रहस्य जानकर मुनिकुमारको उद्बुद्ध किया। फिर राजकुमारने मुनिवरसे प्रार्थना की—'भगवन्! आप मुझे अपना परिचय देकर कृतार्थ करें और ये मुनिकुमार हमारा अश्व लेकर किस प्रकार इस शिलामें घुस गये थे, यह सब रहस्य बतलानेकी कृपा करें।' मुनिने कहा—'राजन्! पूर्वकालमें मैं एक राजा था। संसारसे निर्वेद होनेपर मैं अपना राज्य छोड़कर सपत्नीक यहाँ तपस्या करने चला आया। एक दिन जब कि मैं समाधिस्थ था, दैववश मेरी रानीकी वृत्ति कुछ चंचल हो गयी और उसने संकल्पसे ही मेरे साथ मैथुन किया। उससे वह गर्भवती हो गयी और यथासमय उससे यह पुत्र उत्पन्न हुआ। पुत्र-प्रसवके पश्चात् उसने तो शरीर छोड़ दिया, फिर मैंने ही इसका लालन-पालन किया। कुछ वयस्क होनेपर इसकी इच्छा राज्य भोगनेकी हुई। तब मैंने इसे योगाभ्यासमें लगाया, उसमें सिद्धि प्राप्त करनेपर इसने संकल्पसे ही इस शिलामें एक ब्रह्माण्ड रच लिया है। यह उस ब्रह्माण्डका ईश्वर है। तुम्हारे अश्वको भी यह वहीं ले गया था।' यह सब वृत्तान्त सुनकर कुतूहलवश राजकुमारको उस मुनिकुमारके संकल्पित ब्रह्माण्डको देखनेकी इच्छा हुई। तब मुनिकुमारने कहा—'अच्छा, तुम मेरे साथ चलो।' किंतु जब राजकुमारने उसके साथ शिलामें प्रवेश करनेका प्रयत्न किया तो वह सफल न हुआ। तब मुनिकुमारने अपने योगबलसे उसे अपने साथ ले लिया। उस शिलामें प्रवेश करनेपर उसे इस ब्रह्माण्डकी अपेक्षा भी अधिक विस्तृत ब्रह्माण्ड दिखायी दिया। वहाँ उसने ऐसा ही आकाश देखा तथा वहाँके ब्रह्मलोक, इन्द्रलोक, वैकुण्ठ, पाताल और रसातलादिमें जाकर ब्रह्मा, विष्णु आदि सब देवताओंका भी दर्शन किया। उसने यह भी देखा कि वहाँ वह मुनिकुमार ही सबसे अधिक पूजनीय है; वहाँके देवगण भी उसे अपना ईश्वर समझते हैं। इस प्रकार केवल एक दिनमें ही उसने वह सारा ब्रह्माण्ड देख लिया। तब उसे फिर इस लोकमें आनेकी इच्छा हुई। उसके कहनेसे मुनिकुमार उसे बाहर ले आया; किंतु उसने देखा कि वहाँका सारा ही रंग-ढंग बदला हुआ है। जहाँ पर्वत था, वह विस्तृत समतल भूमि है, जहाँ नदी थी, वहाँ मरुभूमि दिखायी देती है और जहाँ वन था, वहाँ नगर बसे हुए हैं। यह देखकर उसने मुनिकुमारसे इसका कारण पूछा। मुनिकुमारने कहा—'तुम्हें मेरे ब्रह्माण्डमें तो एक ही दिन व्यतीत हुआ जान पड़ा था; किंतु उतने ही समयमें यहाँ कई युग बीत गये हैं। इसलिये अब यहाँ सब कुछ बदल गया है। तुम्हारे कुलमें भी अब बहुत-सी पीढ़ियाँ बीत चुकी हैं; तुम्हारे सामने जितने मनुष्य थे, उनमें तो केवल तुम ही रह गये हो।' यह सुनकर राजाको बड़ा विस्मय और विषाद हुआ। फिर उसने मुनिकुमारसे इसका रहस्य पूछा।