भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 324, कुल 778 में से
संदर्भ में पढ़ेंमुनिकुमार बोला—'राजन्! वस्तुतः यह प्रपंच संकल्पमात्र है। साधारण लोगोंके संकल्प शुद्ध नहीं होते, उनमें कई संकल्पोंका सांकर्य रहता है; इसलिये वे सिद्ध भी नहीं होते। यदि हमारा संकल्प सिद्ध हो जाय और उसमें अन्य संकल्पोंका मेल न रहे तो हम उसे प्रत्यक्ष व्यावहारिक रूपमें देख सकते हैं। जिस संकल्पकी पूर्वकोटि और परकोटि ज्ञात होती है, वह तो कल्पना ही है, वह सिद्ध संकल्प नहीं है। यदि हमारा संकल्प ऐसा हो जाय कि उसकी पूर्वकोटिका [अर्थात् वह कब और किस प्रकार आरम्भ हुआ था—इस बातका] भान न रहे तो वह अवश्य प्रत्यक्ष हो जायगा। मेरा संकल्प सिद्ध हो गया है। उस संकल्प-शक्तिसे ही मैंने इस शिलामें ब्रह्माण्डकी भावना कर ली है। मेरा ब्रह्माण्ड इस ब्रह्माण्डकी अपेक्षा बृहत्तर है। जितने समयमें मैंने वहाँ एक दिनकी भावना की थी, उतने समयमें इस ब्रह्माण्डके ब्रह्माने कई युगोंकी भावना की। अतः वहाँ केवल एक दिन हुआ और यहाँ कई युग बीत गये। वस्तुतः सारा प्रपंच भगवान्का संकल्प ही है। जो शक्ति भगवान्में है, वही योगियोंमें भी हो जाती है। वे यदि घटको पट कहें तो उसे पट होना पड़ेगा। ब्रह्मादिका संकल्प भी ऐसा ही है। इसीसे उनके संकल्पित पदार्थ उन्हें भी प्रतीत होते हैं और हमें भी। अन्य पुरुषोंके संकल्प ऐसे नहीं होते, उन्हें अपने संकल्पोंकी पूर्वकोटि ज्ञात रहती है; अतः उनके संकल्पित पदार्थ केवल उन्हें ही प्रतीत होते हैं, दूसरोंको नहीं।' इसीसे पहले कहा गया है—'मनसो ह्युन्मनीभावे द्वैतं नैवोपलभ्यते ॥' क्योंकि प्रपंचकी प्रतीति मनकी चंचलतामें ही होती है, उसकी स्थिरतामें नहीं। अतः भगवान् बुद्धियोंसे कहते हैं—'अरी बुद्धियो! जबतक तुम स्थिर होकर अपने परम प्रेमास्पद परब्रह्म परमात्माका सुखास्वादन न करोगी, तबतक तुम्हारा श्रम निवृत्त न होगा। श्रमकी निवृत्ति परमप्रेमास्पदके सुखास्वादनसे ही होती है; क्योंकि जिस समय प्राणी प्रेमविह्वल होता है, उस समय उसकी इन्द्रियाँ और मन शिथिल पड़ जाते हैं। जिस समय कोई प्रेमी दीर्घकालके प्रवासके अनन्तर अपनी प्रियतमासे मिलता है और उन दोनोंका परस्पर आलिंगन होता है, उस समय उन्हें बाहर- भीतरका कुछ भी ज्ञान नहीं रहता। यह दशा प्राकृत प्रेमियोंकी है, फिर परमानन्द-सौख्य-सुधासिन्धु श्रीश्यामसुन्दरका संयोग होनेपर उनके दिव्य रूप, दिव्य स्पर्श एवं दिव्य गन्धका समास्वादन करनेपर जो विलक्षण स्थिति होती है, उसका तो कहना ही क्या है? श्रुति कहती है—उस समय तो न बाह्य जगत्का ज्ञान रहता है और न आन्तरका—'नान्तरं किञ्चन वेद न बाह्यम्।' उस समय उसका चित्त भी अपने अधिष्ठानभूत चिदात्मामें लीन हो जाता है— 'तच्चापि चित्तवडिशं शनकैर्वियुङ्क्ते।' लीलाके विकासके लिये नित्य अभिन्न श्रीवृषभानुदुलारी और रासेश्वर श्रीकृष्णका द्वैधीभाव जिस समय जीवको अपने एकमात्र प्रियतम परमानन्दकन्द श्रीकृष्णचन्द्रका आश्लेष होता है, उस समय जो आनन्दातिरेक होता है, उसमें उसके मन और इन्द्रिय आदि ऐसे परिप्लुत हो जाते हैं कि उसे अपना भी भान नहीं रहता। उस स्थितिमें भक्त और भगवान्का सर्वथा अभेद हो जाता है। भगवान्की नित्यनिकुंज- लीलामें श्रीवृषभानुदुलारीके साथ उनका नित्य संयोग रहता है। वहाँ उनका कभी विप्रयोग नहीं होता, क्योंकि भगवान् कृष्ण अचिन्त्यानन्द-सुधासिन्धु हैं और श्रीरासेश्वरीजी उनकी मधुरिमा हैं। वस्तुतः वे एक ही तत्त्व हैं, केवल रसानुभूतिके लिये ही उनके दिव्यमंगल विग्रहोंका प्रादुर्भाव हुआ है। वे यद्यपि सर्वदा एकरूप हैं तथापि लीलाविशेषोपयुक्त रसाभिव्यक्तिके लिये उनका विप्रयोग आवश्यक है। अतः लीलाविशेषके विकासके लिये ही उनका द्वैधीभाव होता है। उस समय जितने भावोंकी अपेक्षा है, उन सभीका प्रादुर्भाव होता है। यह ठीक है कि उस नित्य लीलामें उनका कायिक और ऐन्द्रियक विप्रयोग कभी नहीं होता। उनके मन, प्राण, नेत्र तथा