भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 325, कुल 778 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 325

श्रीरासलीलारहस्य ३१५ प्रत्येक अंग-प्रत्यंग परस्पर संश्लिष्ट हैं। तथापि उस संश्लेषसे प्रेमातिशयके कारण उनमें जो विह्वलता आती है, उससे श्रीवृषभानुनन्दिनीका मन कृष्णसुखका अनुभव नहीं करता और श्रीकृष्णचन्द्रका विह्वल मन श्रीनिकुंजेश्वरीजीकी माधुर्यसुधाका आस्वादन करना भूल जाता है। यहाँ केवल इतना ही विप्रयोग होता है। अब इधर अध्यात्ममें आइये। यह बुद्धिरूपा प्रमदा सुषुप्तिमें थोड़ा-सा उस ब्रह्मसुखका रसास्वादन करती है। इसीसे उस समय इसे आत्मविस्मृति हो जाती है। बस, जिस समय बुद्धि अपनेको भूली कि उसे प्रपंचका भान ही नहीं रहता। फिर तो बुद्धि बुद्धि नहीं रहती, मन मन नहीं रहता और प्राण प्राण नहीं रहते। वे सब केवल चिन्मात्र हो जाते हैं। इसीसे भगवान्ने कहा है कि 'हे बुद्धियो! जबतक तुम मुझमें ही स्थित न होगी, तबतक तुम्हारे बाल-बच्चेरूप ये इन्द्रियाँ और मन आदि रोते ही रहेंगे।' परंतु करें क्या ? बहुत कुछ विचार भी करते हैं, तब भी विषय हमें अपनी ओर आकर्षित कर ही लेते हैं। हम स्वयं उनकी ओर जानेका संकल्प नहीं करते तथापि जिस समय कोई असाधारण रूप हमारे सामने आता है, उस समय नेत्र उसकी ओर खिंच जाते हैं; जिस समय कोई सुमधुर शब्द सुनायी देता है, कान वहाँसे हटना नहीं चाहते; जब कोई दिव्य गन्ध मालूम होती है तो घ्राणेन्द्रिय उसमें फँस ही जाती है तथा जब कोई सुस्वादु पदार्थ सामने आता है तो रसनेन्द्रिय उसका रस लेने ही लगती है। ये सब हठात् हमें अपनी ओर खींच लेते हैं। यह सब उस महामायाका ही प्रभाव है। ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा॥ बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति। (श्रीदुर्गासप्तशती १।५५-५६) यह देवी भगवती कौन है? विषय-रूपमें परिणत हुई प्रकृति ही वह महामाया है। उसके कारण बड़े-बड़े ज्ञानी, तपस्वी और जितेन्द्रिय भी अपनी- अपनी निष्ठासे विचलित हो जाते हैं। नारद, विश्वामित्र और ब्रह्मादिको भी उसने नहीं छोड़ा, फिर हम-जैसे साधारण पुरुषोंकी तो बात ही क्या है? अतः महापुरुषोंका यही उपदेश है कि कोई कैसा ही विवेकी हो, उसे सर्वदा विषयोंसे दूर ही रहना चाहिये; वहाँ उसे अपनी पण्डिताईका भरोसा नहीं करना चाहिये। भगवान् शंकराचार्य कहते हैं- 'आरूढयोगोऽपि निपात्यतेऽधः सङ्गेन योगी किमुताल्पसिद्धिः।' अतः विषयोंके रहते हुए ये बाल-बच्चे तो रोते ही रहेंगे। यदि तुम इनका रोना बन्द करना चाहती हो तो तुम अपने पतिदेव अचिन्त्यानन्द-सुधासिन्धु परब्रह्मका चिन्तन करो। उसमें निश्चल हो जानेपर विषयोंकी सत्ता ही नहीं रहेगी। इस प्रकार जब विषय ही न रहेंगे तो रोयेंगे किसके लिये ? इन्द्रियोंको विषय-सेवन मत कराओ वास्तवमें तो इन्द्रियाँ और इन्द्रियवृत्तियाँ परब्रह्मकी ही ओर जाना चाहती हैं, विषयोंकी ओर जाना इन्हें अभीष्ट नहीं है। परंतु करें क्या, विषयरूप चुम्बक बलात् अपनी ओर खींच लेता है। इसीसे बृहदारण्यकोपनिषद्में इन्द्रियोंको ग्रह बतलाया है और विषयोंको अतिग्रह। इन्द्रियाँ और मन प्राणीको इसी प्रकार ग्रहण किये हुए हैं, जैसे ग्रह अर्थात् भूत। उन ग्रहोंसे गृहीत होकर यह जीव रोता-चिल्लाता है। इन ग्रहोंसे छूटनेके लिये उसे श्रीकृष्णरूप ग्रहकी शरण लेनी चाहिये। जिस समय यह कृष्ण-ग्रह- गृहीतात्मा हो जायगा, उस समय वे क्षुद्र ग्रह इसका कुछ भी न बिगाड़ सकेंगे। किंतु विषय अतिग्रह हैं। आत्मापर मनरूप ग्रह चढ़ा हुआ है, उसपर इन्द्रियरूप दस भूत सवार हैं और उनपर भी विषयरूप विकट भूत लगे हुए हैं। इन अतिग्रहोंसे गृहीत होनेपर भला इन्द्रियोंकी आत्माकी ओर कैसे प्रवृत्ति हो सकती है ? पहले हम कह चुके हैं कि स्वयम्भू भगवान्ने इन्द्रियोंकी बहिर्मुख करके हिंसित कर दिया है। हिंसा किसे कहते हैं ? अनभिमत कर्म करना पड़े-यही हिंसा है। इन्द्रियाँ विषयोंकी ओर जाना नहीं चाहतीं,