भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१६ | भक्तिसुधा
भगवान्ने इन्द्रियोंको बहिर्मुख कर दिया। इससे उन्हें बलात्कार उनकी ओर जाना पड़ा। यही उनकी हिंसा है। अतः भगवान् कहते हैं—'हे बुद्धियो! ये इन्द्रियरूप बालक विषयोंकी ओर जानेसे रो रहे हैं और परमानन्द-सुधाका पान नहीं कर पाते। इसमें कारण तुम्हीं हो, क्योंकि यदि तुम चंचलता छोड़ दो तो इन विषयोंकी सत्ता ही न रहे। उस समय ये इन्द्रियाँ जायँगी ही कहाँ? तब तो ये ब्रह्मानन्द-सुधाका ही पान करेंगी। अतः इन्हें शान्त और तृप्त करनेके लिये भी तुम मेरा ही चिन्तन करो।' इन्द्रिय और इन्द्रियवृत्तियाँ बुद्धिकी ही अवस्था- विशेष हैं। इसलिये ये उसके बालक ही हैं। जिस प्रकार दर्पणके भीतर अनेक प्रकारके पदार्थ प्रतिबिम्बित होते हैं, उसी प्रकार शुद्ध चैतन्य-रूप दर्पणमें समस्त प्रपंच प्रतिबिम्बित हैं। दर्पणमें जो आकाशकी प्रतीति होती है, वह वस्तुतः निरवकाशमें ही अवकाशकी प्रतीति है। दर्पणके अवयव इतने सघन हैं कि उनमें किसी पदार्थका प्रवेश होना सम्भव ही नहीं है। अतः उसमें जितने समुद्र, नदी, पर्वत एवं वन आदि प्रतीत होते हैं, वे सब असत् ही हैं। इसी प्रकार शुद्ध चैतन्यरूप दर्पणमें अनेकविध प्रपंच प्रतीत हो रहा है। परंतु वस्तुतः वह सब केवल स्वयं-प्रकाश शुद्ध चेतन ही है। परंतु उनकी प्रतीति क्यों होती है ? यहाँ दो बातें ध्यान देनेकी हैं—(१) जिस समय आप दर्पणके शुद्ध स्वरूपपर दृष्टि ले जायँगे, उस समय आपको उसमें प्रतिबिम्बित पदार्थ दिखायी नहीं देंगे और जिस समय आप प्रतिबिम्बित पदार्थ देखेंगे, उस समय दर्पणका शुद्ध स्वरूप नहीं देख सकेंगे। यही बात परब्रह्मके विषयमें भी है। परब्रह्मको ग्रहण करनेवाली वृत्ति प्रपंचको ग्रहण नहीं कर सकती और प्रपंचको ग्रहण करनेवाली वृत्ति परब्रह्मको ग्रहण नहीं कर सकती। (२) यह भी निश्चित बात है कि प्रतिबिम्बित पदार्थोंकी सत्ता दर्पणके ही अधीन है और वस्तुतः दर्पणको ग्रहण किये बिना हम प्रतिबिम्बितको ग्रहण भी नहीं कर सकते। यह कभी सम्भव नहीं है कि हम तरंगको तो देख लें और जलको न देखें तथा हमें सौरलोक या चन्द्रालोककी प्रतीति तो न हो, किंतु उनसे प्रकाश्य पदार्थोंकी प्रतीति हो जाय। इसी प्रकार हमें पहले ब्रह्मका ग्रहण होता है और पीछे प्रपंचका; क्योंकि सारे पदार्थ उसीके प्रकाशसे प्रकाशित हैं— 'तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥' (श्वेताश्वतर० ६।१४) किंतु इस समय जो ब्रह्मका ग्रहण होता है, वह उसके शबल रूपका होता है। उसके शुद्ध स्वरूपका ग्रहण तो प्रपंचकी उपेक्षा करते-करते उसकी अप्रतीति होनेपर ही होगा; जिस प्रकार कि शुद्ध दर्पणका ग्रहण तभी हो सकता है जब कि प्रतिबिम्बका ग्रहण न किया जाय। जिस समय बुद्धि प्रपंचको ग्रहण करती है, उस समय वह बहुत घबराती है; क्योंकि इसमें सिंह- व्याघ्रादि बड़े-बड़े भयानक पदार्थ भी हैं। लोकमें प्रतिबिम्बसे भय होना प्रसिद्ध है। माता बालकको अपनी परछाईं नहीं देखने देती, क्योंकि उसे भय है कि वह उसे वेताल समझकर डर जायगा। स्वकल्पित मिथ्या वेतालसे भी मृत्यु हो जाती है। इसी प्रकार यह प्रपंच चिद्रूप दर्पणमें प्रतिबिम्बित परछाईं है। अतः विवेकवती बुद्धिरूप माताको उचित है कि वह इन्द्रिय और इन्द्रियवृत्तिरूप अपने बालकोंको उनके कल्याणके लिये यह प्रपंचरूप परछाईं न देखने दे और केवल दर्पणस्थानीय ब्रह्मको ही देखे। यहाँ यह शंका न करनी चाहिये कि प्रतिबिम्ब तो किसी बिम्बका हुआ करता है; अतः परब्रह्ममें जो प्रपंच प्रतिफलित होता है, उसका भी कोई बिम्ब होना चाहिये। दर्पणादि परिच्छिन्न पदार्थ हैं, इसलिये उनमें जो प्रतिबिम्ब पड़ता है, वह बिम्बके ही कारण होता है; किंतु ब्रह्म तो अपरिच्छिन्न है, उससे पृथक् और स्थान ही कहाँ है, जहाँ उसमें प्रतिफलित होनेवाला बिम्ब रहेगा। बिम्बभूत जो कोई भी पदार्थ होगा, वह