भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 327, कुल 778 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 327

श्रीरामलीलारहस्य ३१७ देश, काल और वस्तुके अन्तर्गत ही होगा। किंतु देश, काल और वस्तु तो प्रतिबिम्बके ही अन्तर्गत हैं। यदि कहो कि अनुमानसे तो कोई-न-कोई बिम्ब मानना ही होगा; क्योंकि लोकमें बिना बिम्बका कोई प्रतिबिम्ब देखनेमें नहीं आता। किंतु अनुमान भी तो एक ज्ञान ही है; अतः यह भी ज्ञानस्वरूप ब्रह्मसे बाहर नहीं हो सकता, फिर उसमें ज्ञेय पदार्थ तो ब्रह्मके बाहर हो ही कैसे सकता है ? अतः ब्रह्ममें जो प्रतिबिम्ब है, वह बिम्बरहित है। यह इस दर्पणकी विलक्षणता है। यही इसकी अनिर्वचनीया शक्तिरूपा माया है। यही माया सबको मोहित किये हुए है। किंतु यह इसका स्वभाव अवश्य है कि यदि तुम इसमें प्रतिबिम्बित प्रपंचको देखना छोड़ दो तो तुम्हें शुद्ध ब्रह्मका साक्षात्कार हो जायगा और साक्षात्कार होते ही माया और उसका प्रपंच सदाके लिये मिट जायगा। इसीसे भगवान् बुद्धियोंसे कहते हैं—'मा यात गोष्ठम्' —तुम विषयोंकी ओर मत जाओ; बल्कि इन इन्द्रियोंके विषयरूप हाऊकी निवृत्तिके लिये तुम केवल शुद्ध परब्रह्मको ही देखो। तुम भास्यवर्गको मत देखो, केवल भानको ही देखो। ऐसा करनेके लिये भगवान् क्यों कहते हैं ? क्योंकि 'क्रन्दन्ति वत्सा बालाश्च' —ये इन्द्रियाँ रो रही हैं। अतः न तो तुम्हीं प्रपंचको देखो और न इन्हींको दिखाओ अन्यथा इनकी मृत्यु हो जायगी। देखो—जिस समय तुम इस प्रपंचको देखती हो, उस समय तुम्हारे ये बालक भी उसे ही देखने लगते हैं। अतः तुम उसे मत देखो और 'तान् मा पाययत मा दुह्यत च' अर्थात् इन इन्द्रियोंको विषय-सेवन मत कराओ और न इनके सामने विषयोंको ही आने दो; क्योंकि इन्हें विषयरूप पयःपान कराना तो विष ही पिलाना है। इन्हें वह प्रिय अवश्य है, परंतु उसके सेवनसे इनका अनिष्ट ही होगा। रोगी बालक कुपथ्य करना चाहा ही करता है, परंतु माता उसे करने थोड़े ही देती है। उनके सेवनसे इन्हें शान्ति या तृप्ति भी नहीं हो सकती। विषय-सेवनसे तो इनकी विषयाभिलाषा और भी बढ़ जायगी— 'भोगमनुविवर्धत इन्द्रियाणां कौशलम्।' अतः इनके हितके लिये इन्हें विषय-सेवन मत करने दो। विषय-सेवन न करनेसे इन्द्रियोंकी भोग- वासना निर्बल पड़ जायगी। यह ठीक है कि इन्द्रियोंके निग्रहसे उनकी बाह्य प्रवृत्ति मन्द पड़ जाती है तथापि उनकी आन्तरिक शक्ति बढ़ जाती है। एक व्यक्ति कुछ काल मौन रहता है। इससे वागिन्द्रिय अवश्य मन्द पड़ जाती है। वह अधिक बोल नहीं सकता। परंतु वह जो कुछ कहता है, वही हो जाता है। यदि वह वटवृक्षको नीमका वृक्ष बतला दे तो उसे निम्बवृक्ष हो जाना पड़ता है। योगदर्शनमें मौनसे वाक्सिद्धि मानी गयी है। इसी प्रकार जो बालब्रह्मचारी है, वह एकाएक कामाहत नहीं होता। अत्यन्त रूपवती स्त्रियोंको देखकर भी उसका चित्त विचलित नहीं होता। एक बार महर्षि नारद तप कर रहे थे। उन्हें तपोभ्रष्ट करनेके लिये इन्द्रने कुछ अप्सराएँ भेजीं, परंतु उनके सारे हाव- भाव कटाक्ष उन्हें विचलित करनेमें समर्थ न हो सके। करते कैसे! इस समय श्रीनारदजीकी मनोवृत्ति तो एकमात्र भगवत्तत्त्वमें ही स्थित थी, उसे तो उनका भान भी नहीं हुआ। इस समय भगवान्‌की उनपर पूर्ण कृपा थी। भला जिनके ऊपर भगवान्‌की कृपा है, उनका कोई क्या बिगाड़ सकता है ? सीम कि चाँपि सकइ कोउ तासू। बड़ रखवार रमापति जासू॥ (रा०च०मा० १।१२६।८) भगवान् कृष्णने भी उद्धवको यही उपदेश किया है कि हे उद्धव! ये इन्द्रियाँ मनुष्यको ठगनेवाली हैं। ये उसे असदभिनिवेशमें ग्रस्त कर देती हैं; अतः तुम इनसे विषयसेवन मत करो। तस्मादुद्धव मा भुङ्क्ष्व विषयानसदिन्द्रियैः। आत्माग्रहणनिर्भातं पश्य वैकल्पिकं भ्रमम्॥ (श्रीमद्भा० ११।२२।५६) भगवान् शंकराचार्यजीने भी यही कहा है कि शम, दम, उपरति, तितिक्षा आदि साधनोंसे सम्पन्न होकर ही ब्रह्मविचार करना चाहिये। यदि इन्द्रियोंको