भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१८ भक्तिसुधा स्वाधीन न किया जायगा तो वेदान्त-चर्चा केवल तोतेकी कहानी ही होगी।* उससे तुम्हारा कल्याण नहीं हो सकता। अतः यदि तुम वास्तवमें अपना कल्याण चाहते हो तो विषयोंको त्यागो। रसनाको रसास्वादनसे रोको, श्रोत्रोंसे शब्द-ग्रहण मत करो और घ्राणेन्द्रियसे गन्ध मत सूँघो। सारी इन्द्रियोंका निरोध कर दो। मुक्तिमिच्छसि चेत्तात विषयान् विषवत्त्यज। क्षमार्जवदयातोषसत्यं पीयूषवद्भज॥ आत्मलाभका यही उपाय है। इसीसे भगवान्ने कहा है— यच्छेद्वाङ्मनसी प्राज्ञस्तद्यच्छेज्ज्ञान आत्मनि। ज्ञानमात्मनि महति नियच्छेत्तद्यच्छेच्छान्त आत्मनि॥ (कठ०१।३।१३) पहले अपनी इन्द्रियोंकी प्रवृत्तिको शास्त्रीय करो। इससे उनकी उच्छृंखलता शान्त हो जायगी। फिर धीरे- धीरे अभ्यासद्वारा उनसे विषय ग्रहण करना छोड़ दो। श्रीमधुसूदन सरस्वतीने अपनी गीताकी टीकामें कहा है—यदि घरमें चोर घुस रहे हों तो सबसे पहले दरवाजा बन्द कर लेना चाहिये; पीछे कोई और उपाय करो। इसी प्रकार विषयोंपर विजय प्राप्त करनेके लिये पहले इन्द्रियोंको उनके विषयोंसे निवृत्त करो। यदि अन्तःकरणमें भोगवासना बनी हुई हो तो भी इन्द्रियोंसे अन्य विषयोंको तो ग्रहण मत करो। अब जो विषयरूप चोर तुम्हारे अन्तःकरणरूप घरमें घुस आये हैं, उनकी परब्रह्मरूप राजाके यहाँ रिपोर्ट करो, वह अवश्य इनका प्रबन्ध कर देंगे। श्रीगोसाईंजी महाराज कहते हैं— मम हृदय भवन प्रभु तोरा। तहँ बसे आइ बहु चोरा॥ अति कठिन करहिं बरजोरा। मानहिं नहिं बिनय निहोरा॥ × × × कह तुलसिदास सुनु रामा। लूटहिं तसकर तव धामा॥ चिंता यह मोहिं अपारा। अपजस नहिं होइ तुम्हारा॥ (वि०प० १२५) अतः भगवन्, आप उन्हें निकालिये, नहीं तो आपका अपयश अवश्य होगा; क्योंकि— ममता तरुन तमी अँधिआरी। राग द्वेष उलूक सुखकारी॥ तब लगि बसति जीव मन माहीं। जब लगि प्रभु प्रताप रबि नाहीं॥ (रा०च०मा० ५।४७।३-४) वास्तवमें जिस राजाके राज्यमें चोर प्रजाका धन अपहरण करते हैं, उस राजाके लिये वह कलंक ही है; क्योंकि प्रजा तो राजाका सर्वस्व है। 'प्रजायन्त इति प्रजाः' इस व्युत्पत्ति के अनुसार 'प्रजा' शब्दका अर्थ ही पुत्र है। अतः राजाका यह परम कर्तव्य है कि वह प्रजाके हितकी रक्षा करे। प्रभुको एकमात्र आश्रय बना लेनेपर सारे विकार निवृत्त हो जाते हैं इस प्रकार जिस समय यह जीव प्रभुको ही अपना एकमात्र आश्रय बना लेता है, उस समय उसके सारे विकार निवृत्त हो जाते हैं। जब वह स्वयंप्रकाश श्रीहरिके सम्मुख होता है, तब उसके हृदय-भवनका कल्मषरूप अन्धकार तत्काल निवृत्त हो जाता है। अतः भगवान्का भी बुद्धियोंके प्रति यही कथन है कि तुम इन इन्द्रियवृत्तियोंको पयःपान मत कराओ। यह बात ठीक है कि इन्द्रियोंके व्यापारका सर्वथा निरोध नहीं किया जा सकता। शरीर-रक्षाके लिये भोजनादि भी करना ही होगा। अतः आवश्यकता इसी बातकी है कि अपनी प्रवृत्तियोंको शास्त्रीय करो। नित्य-नैमित्तिक कर्मोंका अनुष्ठान करो। उन्हीं विषयोंको ग्रहण करो, जिनके बिना तुम्हारा निर्वाह न हो सके। * एक बार एक व्यक्तिको यह देखकर बड़ी करुणा हुई कि बेचारे निरीह तोते व्यर्थ मनुष्योंके चंगुलमें फँसते हैं। इसलिये उसने सोचा कि इन्हें कोई ऐसा पाठ पढ़ा दिया जाय जिससे ये उसमें न फँसें। उसने एक तोतेको यह बात सिखला दी—'तोते! सावधान रहना। नलीके ऊपर मत बैठना और अगर बैठ जाओ तो उसे छोड़ देना। उसे तुम्हींने पकड़ रखा है, उसने तुम्हें नहीं पकड़ा।' उस तोतेसे सुनकर यह पाठ उस प्रान्तके सब तोतोंनें सीख लिया। सब इसी प्रकार कहने लगे। परंतु उस व्यक्तिने देखा कि एक तोता नलीमें फँसा हुआ है और मुँहसे यही बात कह रहा है। यही दशा साधनहीन वेदान्तियोंकी होती है। वे मुखसे तो अपनेको शुद्ध-बुद्ध-मुक्त कहते रहते हैं; किंतु वस्तुतः रहते विषयोंमें आसक्त ही हैं। इस प्रकारके ज्ञानसे कोई लाभ नहीं हो सकता।