भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 329, कुल 778 में से
संदर्भ में पढ़ेंभगवान्के दिये हुए देह और इन्द्रियोंका सदुपयोग करो। भगवान्ने अपनी प्राप्तिके लिये ही ये देह और इन्द्रियाँ आदि दी हैं। अतः इनसे वही कार्य करो, जो भगवत्प्राप्तिमें सहायक हैं। इनकी सात्त्विकी प्रवृत्तिको प्रबल करो, राजसको निर्बल कर दो और तामस प्रवृत्ति बिलकुल मत होने दो। देखो, जिस समय हनुमान्जी लंकाको गये थे, उस समय पहले उन्हें सुरसा मिली। उसे उन्होंने अपने पुरुषार्थसे प्रसन्नकर उसका आशीर्वाद प्राप्त किया। वह देवमाता थी, अतः सात्त्विकी प्रवृत्तिरूपा होनेके कारण उसे अपने अनुकूल कर लेना ही उचित था। उसके पश्चात् छायाग्राहिणी सिंहिका राक्षसी मिली, जो समुद्रमें ऊपर उड़नेवाले प्राणियोंकी छाया पकड़कर उन्हें गिरा लेती और फिर खा जाती थी। वह तामस प्रवृत्ति की थी। उसे उन्होंने मार डाला। फिर लंकामें पहुँचनेपर उन्हें लंकिनी मिली। उसने भी उनका मार्ग रोका; किंतु उसे उन्होंने एक मुक्केसे ही ठीक कर लिया। वह राजस प्रवृत्ति थी; उसे दमनसे शिथिल कर देना ही ठीक था। इसी प्रकार हमें सात्त्विक प्रवृत्तिको बढ़ाना चाहिये, राजस प्रवृत्तिको शिथिल कर देना चाहिये और तामसका सर्वथा नाश कर देना चाहिये। वे तो पापरूपा हैं। अतः जो कर्म शास्त्रविहित हैं, उनका तो यथाशक्ति पालन करो। 'यथाशक्ति' शब्दका प्रयोग विहित कर्मोंके लिये ही हो सकता है, पापकर्मोंमें 'यथाशक्ति' शब्दकी प्रवृत्ति नहीं हो सकती। विहित कर्मोंमें भी जिनके न करनेसे प्रत्यवाय होता है, वे तो अवश्य करने चाहिये। अग्निष्टोमादि याग अत्यधिक अर्थसाध्य हैं; प्रत्येक व्यक्ति उनका अनुष्ठान करनेमें समर्थ नहीं है। इसलिये 'यथाशक्ति' शब्दका प्रयोग उन्हींके लिये किया गया है। सन्ध्या, अग्निहोत्र एवं बलिवैश्वदेव आदि कर्मोंको, जिनमें न तो विशेष परिश्रम है और न व्यय ही, अवश्य करना ही चाहिये। आजकल एक परिष्कृत सनातनधर्मका आविर्भाव हुआ है। उसके अनुयायी शास्त्रके किसी अंशको तो प्रामाणिक मानते हैं और किसीकी उपेक्षा कर देते हैं। परंतु इसे शास्त्रका प्रामाण्य स्वीकार करना नहीं कहा जा सकता। इसे तो स्वेच्छाचार ही कहा जायगा। तुम कहते हो गीता हमारा सर्वस्व है, किंतु गीता तो कहती है— यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः। न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्॥ (गीता १६।२३) अब देखना यह है कि शास्त्र क्या कहता है? तुम शूद्रोंको शास्त्राध्ययन कराना चाहते हो, परंतु शास्त्र तो इसकी आज्ञा नहीं देता। यही नहीं, वर्णाश्रम-धर्मका भी लोप करना चाहते हो। शूद्र और वैश्य ब्राह्मणोंका कर्म कर रहे हैं और ब्राह्मण वैश्य तथा शूद्रोंका। परंतु शास्त्र तो कहता है— 'स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥' (गीता ३।३५) अपने वर्णधर्ममें तुम्हारी प्रवृत्ति नहीं होती, उसमें तुम्हें दोष दिखायी देता है। यह तुम्हारा व्यामोह ही है। अर्जुनको भी ऐसा ही व्यामोह हुआ था। इसीसे वह युद्धमें दोषदृष्टिकर भिक्षा माँगनेके लिये तैयार हो गया था। परंतु बाह्य दृष्टिसे ऐसा दोष किस कर्ममें नहीं रहता— 'सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः॥' (गीता १८।४८) भाई, समाजका कोई भी अंग व्यर्थ नहीं है। जैसे सिर आवश्यक है, वैसे ही चरण भी है। शरीरके किसी भी अंगमें पीड़ा हो, उसके कारण सारा शरीर ही अस्वस्थ रहा करता है। अतः हम किसी भी वर्णको नगण्य और हेय नहीं समझते। हमारे विचारसे तो सभीको परधर्मकी ओर प्रवृत्त न होकर अपने ही वर्णके लिये विहित कर्मोंका यथाशक्ति अनुष्ठान करना चाहिये। इस प्रकार स्वधर्मानुष्ठान करते हुए नित्यप्रति कुछ कालके लिये अपनी इन्द्रियोंकी वृत्तियोंका