भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२० भक्तिसुधा सर्वथा निरोध करनेका भी प्रयत्न करो। ऐसा करते- करते परब्रह्मका साक्षात्कार होनेपर ही इन इन्द्रियोंका क्रन्दन बन्द होगा। इन्द्रियोंको तुष्ट करनेकी चेष्टासे तृष्णा और भी अधिक बढ़ती है इसके विपरीत यदि इन इन्द्रियरूप वत्स और बालकोंको विषयरूप पयःपान कराया जायगा तो ये और भी अधिक क्रन्दन करेंगे। तुम इन्हें जितना ही तृप्त करनेका प्रयत्न करोगे, ये उतने ही अधिक अतृप्त होते जायँगे। अतः इन्हें तृप्त करनेका प्रयत्न छोड़कर तुम अपने एकमात्र परम पति शुद्ध-बुद्ध- मुक्तस्वरूप परब्रह्मकी ही ओर देखो। इसमें कोई आयास भी नहीं है; विषयदर्शनमें तो आयास भी अधिक है और परिणाममें दुःख भी है। परंतु ब्रह्मदर्शनमें तो कोई परिश्रम भी नहीं करना पड़ता और उसका परिणाम भी परम सुखमय है। परब्रह्म तो स्वयंप्रकाश है, उसे प्रकाशित करनेके लिये कोई व्यापार नहीं करना पड़ता; बल्कि उसके लिये तो व्यापारका त्याग ही कर्तव्य है। परंतु विचित्रता तो यही है कि हमसे व्यापार ही नहीं छोड़ा जाता। यदि मन, बुद्धि और इन्द्रियोंका व्यापार छूट जाय तो परब्रह्मकी उपलब्धि तत्काल हो सकती है। यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह। बुद्धिश्च न विचेष्टति तामाहुः परमां गतिम्॥ (कठ० २।३।१०) इसीसे भगवान् कहते हैं—'गोष्ठं मा यात'— जहाँ पशुप्राय जीव रहते हैं, उस प्रपंचकी ओर मत जाओ। ऐसा करनेसे ही उनका क्रन्दन शान्त होगा। यदि प्रतिबिम्बपर दृष्टि न ले जाकर केवल दर्पणपर ही दृष्टि जाय तो प्रतिबिम्बकी प्रतीति नहीं होगी। इसी प्रकार यदि तुम अपनी वृत्तिको अन्तर्मुख करके विषयोंतक नहीं ले जाओगी तो तुम्हें विषम विषाक्त संसारकी प्रतीति नहीं होगी। यदि कहो कि ये इन्द्रियाँ हमारे बालक हैं, हमें इनपर दया करनी ही चाहिये। इन्हें विषय प्रिय हैं, इसलिये हमें इन्हें अभिलषित विषय प्राप्त कराने ही चाहिये—तो इसपर भगवान् कहते हैं—'तान् मा दुह्यत'—तुम इनके लिये अभिलषित पदार्थ प्रस्तुत मत करो। इन्हें विषयप्राप्ति नहीं होगी तो ये स्वयं ही क्रमशः शान्त हो जायँगी। इन्हें विषय देना तो मानो विष देना है। यही बात प्रेमियोंकी आचार्यभूता व्रजांगनाओंसे भगवान् कहते हैं कि तुम व्रजमें मत जाओ। मैं ही निखिल ब्रह्माण्डका परमपति हूँ। अतः तुम मेरी ही सेवा करो। इस समय यदि तुम्हारे बाल- बच्चे क्रन्दन भी करते हों तो भी उन्हें तुम पयःपान मत कराओ और न बछड़ोंके लिये दोहन ही करो; क्योंकि वे तुम्हारे परमधर्मके विरोधी हैं। यदि भगवत्प्रेममें दया आदि धर्म विरोधी होते हों तो उनका त्याग ही करना चाहिये। भगवान्की यह विचित्र वाचोभंगी सुनकर कुछ व्रजांगनाओंकी तो अभिरुचि सुस्थिर हुई और कुछको व्यामोह हुआ। भगवान्का यह वाग्विन्यास बड़ा ही विचित्र था। इससे भिन्न-भिन्न निष्ठावाले भिन्न- भिन्न अर्थ निकाल सकते थे। कर्मियोंके लिये इसमें कर्मानुष्ठानका आदेश था, जिज्ञासुओंके लिये कर्म-संन्यासकी विधि थी, उपासकोंके लिये कर्म- समुच्चयका विधान था, गोपियोंके लिये गोष्ठको लौट जानेका आदेश था और प्रकारान्तरसे न लौटनेके लिये भी अनुमति थी। वस्तुतः रासपंचाध्यायीरूप यह अमृतसिन्धु ऐसा गम्भीर है कि हम इसके एक बिन्दु का मर्म भी यथावत् नहीं समझ सकते। वेद भगवान्की सुषुप्तिके समय उनके अज्ञात रूपसे प्रकट हुए श्वासोच्छ्वास हैं— 'अस्य महतो भूतस्य निश्वसितमेतद्यदृग्वेदः' (बृहदारण्यक० २।४।१०) किंतु उनका मर्म आकलन करनेमें भी बड़े-बड़े मनीषिजन घबराते हैं, फिर जिन वाक्योंका उच्चारण प्रभुने स्वयं लीला-विग्रह धारण करके किया, उनके