भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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श्रीरामलीलारहस्य ३२१ भावगाम्भीर्यका तो कहना ही क्या है; उसके तो जितने अर्थ किये जायँ, थोड़े ही हैं। अब हम इस श्लोकका उपसंहारकर आगेके श्लोकपर विचार करते हैं। भगवान्ने कहा था कि हे व्रजांगनाओ! तुम जाओ। इसपर व्रजांगनाएँ सोचती हैं—ऐसी जल्दी क्या है, वनकी शोभा देखकर चली जायँगी। किंतु भगवान् कह रहे हैं—'मा चिरम्'—देरी मत करो; क्योंकि यह रात्रिकाल पतिशुश्रूषारूप परमधर्मका उपयुक्त समय है और धर्मानुष्ठानमें विलम्ब होना उचित नहीं है। इसलिये तुम जाओ और पतियोंकी तथा उनकी माता आदि सतियोंकी शुश्रूषा करो। इस प्रकार भगवान्के निराकरण करनेपर व्रजांगनाएँ बहुत खिन्न हुईं। वे सन्तप्त होकर दीर्घ निःश्वास छोड़ती हुई कुछ सोच रही हैं—यह देखकर भगवान् कहते हैं— अथवा मदभिस्नेहाद् भवत्यो यन्त्रिताशयाः। आगता ह्युपपन्नं वः प्रीयन्ते मयि जन्तवः ॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।२३) भगवान्की यह रीति है कि वे सीधे-सीधे किसीको उत्तर नहीं देते; न तो सहसा स्वीकार ही करते हैं और न अस्वीकार ही। संसारमें दो प्रकारके लोग ही सुखी होते हैं; या तो परम बोधवान् और या अत्यन्त मूढ़— यश्च मूढतमो लोके यश्च बुद्धेः परं गतः। तावुभौ सुखमेधेते क्लिश्यत्यन्तरितो जनः ॥ (श्रीमद्भा० ३।७।१७) इसलिये भगवन्मार्गमें लगे हुए प्राणी प्रायः व्याकुल ही दिखायी दिया करते हैं। वस्तुतः इस व्याकुलताकी आवश्यकता भी है। जिस समय भगवान्के सम्मिलनकी अभिलाषा क्षुधा-पिपासाके समान अत्यन्त बढ़ जाय, तभी प्राणीको समझना चाहिये कि हम ठीक मार्गपर चल रहे हैं, परंतु यह प्राणी दीर्घकालसे भगवान्से बिछुड़ा हुआ है। इसलिये इसे भगवत्- सम्मिलनकी उत्कट इच्छा होना अत्यन्त दुर्लभ है। जैसे अजीर्णके रोगीको भूख लगना अत्यन्त आनन्दका हेतु होता है, उसी प्रकार प्रपंचासक्त जीवको भगवत्प्राप्तिकी तृष्णा अत्यन्त सौभाग्यका फल है। इसीसे भगवान् शंकराचार्यने भगवत्प्राप्तिके साधनोंमें सबसे अन्तिम साधन मुमुक्षा बतलाया है। इस मुमुक्षाके पश्चात् ही जिज्ञासा होती है। यदि भगवान्के ज्ञानकी उत्कट इच्छा हो जाय तो फिर उनके मिलनेमें कुछ भी देरी न हो। सारे साधन इस जिज्ञासाके लिये ही हैं। भगवान्को जाननेकी यह उत्कट इच्छा भगवत्कृपासे ही होती है। यदि यह हमारे हाथकी चीज होती तो इस प्रकार प्रार्थना क्यों की जाती— 'माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोत्, अनिराकरणमस्तु'। (केनोपनिषद् शान्तिपाठ) यदि हम भगवान्का निराकरण न करनेमें समर्थ होते तो इसके लिये प्रार्थना क्यों की जाती ? परंतु नहीं, हम सब कुछ जानते हुए भी अनादिमायासे मोहित होकर उनका निराकरण करते हैं। हम जान-बूझकर भी अनन्तानर्थके निदानभूत संसारमें गिरते हैं। परंतु किया क्या जाय— 'केनापि देवेन हृदि स्थितेन यथा नियुक्तोऽस्मि तथा करोमि।' इसीसे महानुभाव लोग नास्तिकोंकी भी निन्दा नहीं करते; क्योंकि वे जानते हैं कि यह बात उनके वशकी नहीं है। एक व्यक्ति अपने कल्याणकी कामनासे संसारसे विरक्त होता है, परंतु पीछे मायासे मोहित होकर वह पतित हो जाता है। इसमें उसका क्या दोष है; वह तो अपना कल्याण ही चाहता है। न्यायकुसुमांजलिकार श्रीउदयनाचार्यजी नास्तिकोंके लिये कल्याण-कामना करते हुए भगवान्से प्रार्थना करते हैं— इत्येवं श्रुतिनीतिसम्प्लवजलैर्भूयोभिराक्षालिते येषां नास्पदमदधासि हृदये ते शैलसाराशयाः। किंतु प्रस्तुतविप्रतीपविधयोऽप्युच्चैर्भवच्चिन्तकाः काले कारुणिक त्वयैव कृपया ते भावनीया नराः ॥ (पञ्चमस्तबक १८)